विश्वासघात का ऑडिट: एक मां का प्रतिशोध
अध्याय 1: वह खौफनाक शाम
मेरा नाम अर्चना भट्ट है। उम्र 53 साल। पिछले 28 सालों से मैं ‘गुप्ता मेटल वर्क्स’ में सीनियर अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत हूँ। मेरा काम सरल नहीं है—हर महीने 500 से अधिक कर्मचारियों के खातों का ऑडिट करना, जाली दस्तखत पकड़ना और वित्तीय धोखाधड़ी को उजागर करना। लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस हुनर को मैंने दफ्तर की फाइलों में आजमाया, एक दिन वही हुनर मेरी इकलौती बेटी की जिंदगी बचाएगा।
शादी के दो साल बाद, जब मैं बिना बताए अपनी बेटी निशा के घर पहुँची, तो वहां जो मंजर देखा, उसने मेरी रूह कंपा दी। समीर, मेरा दामाद, जिसे मैंने एक सफल रियलस्टेट कारोबारी समझा था, वह अपने दोस्तों के साथ शराब पी रहा था। निशा फर्श पर फटे कपड़ों में बेसुध पड़ी थी। समीर ने अपने महंगे जूते उसकी पीठ पर रगड़ते हुए अपने मेहमानों से हंसकर कहा, “यह हमारी पागल नौकरानी है। कभी-कभी इसे दौरे पड़ते हैं, तो यह यहीं सो जाती है।”
पूरा कमरा ठहाकों से गूँज उठा। मेरी बेटी, जिसे मैंने 28 साल तक अपनी पलकों पर बिठाया था, वह आज एक सड़ी हुई चटाई पर पड़ी अपमानित हो रही थी।
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अध्याय 2: ऑडिट की शुरुआत
समीर को लगा कि मैं एक कमजोर, विधवा मां हूँ जिसे वह अपनी मीठी बातों से बहला लेगा। उसने मुझे बताया कि निशा की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और वह उसका इलाज करा रहा है। लेकिन मेरी ‘ऑडिटर की नजर’ ने कुछ और ही देख लिया। किचन काउंटर पर रखी दवाइयों की शीशी 6 महीने पहले ही एक्सपायर हो चुकी थी। समीर ने दावा किया था कि वह नई दवाइयां लाया है—यह उसका पहला बड़ा झूठ था।
मैंने तय किया कि मैं निशा को तुरंत वहां से नहीं ले जाऊंगी, क्योंकि समीर उसे ‘कानूनी रूप से पागल’ घोषित करने की साजिश रच रहा था। अगर मैं उसे बिना योजना के ले जाती, तो वह मुझ पर अपहरण का केस कर देता। मुझे सबूत चाहिए थे।
मैंने अपने ऑफिस के वकील, राघव त्रिवेदी की मदद ली। हमने समीर धवन का ‘बैकग्राउंड ऑडिट’ शुरू किया। दो दिन बाद राघव जी ने जो बताया, उसने मेरे पैरों तले जमीन खिसका दी। समीर के नाम पर कोई रियलस्टेट कंपनी रजिस्टर्ड नहीं थी। वह एक आदतन जुआरी था और उस पर सट्टेबाजी के कारण 47 लाख रुपये का कर्ज था।

अध्याय 3: जाली दस्तखत और प्रॉपर्टी का जाल
समीर ने मुझसे 15 लाख रुपये मांगे थे, यह कहकर कि वह एक बड़ी डील कर रहा है। जब मैंने मना किया, तो उसने एक नया खेल खेला। मुझे एक लीगल नोटिस मिला, जिसमें दावा किया गया था कि निशा ने अपनी ‘मानसिक अस्वस्थता’ के कारण अपने पति समीर को पावर ऑफ अटॉर्नी दे दी है। इस दस्तावेज के आधार पर समीर मेरा वह फ्लैट हड़पना चाहता था, जिसे मेरे स्वर्गीय पति राजीव और मैंने 20 साल की मेहनत से खरीदा था।
नोटिस पर निशा के हस्ताक्षर थे। मैंने अपनी मेज पर वह कागज रखा और मैग्निफाइंग ग्लास (Magnifying glass) से उसे देखा। 28 साल तक दस्तखत पहचानने के अनुभव ने मुझे तुरंत बता दिया—ये दस्तखत जाली थे। पेन का प्रेशर और अक्षरों की बनावट निशा की शैली से मेल नहीं खाती थी।
मैंने चुपके से निशा के घर में एक छोटा वॉयस रिकॉर्डर छिपा दिया। एक हफ्ते बाद जब मैंने उसे सुना, तो समीर का असली चेहरा सामने आ गया। वह अपने दोस्तों से कह रहा था, “उस बुढ़िया की प्रॉपर्टी अब मेरी है। बस इस पागल औरत (निशा) को कुछ और दिन दवाओं के नशे में रखना है।”
अध्याय 4: अंतिम मिलान (The Final Reconciliation)
वह रात आ गई जब समीर ने अपने ‘निवेशकों’ (जो वास्तव में उसके सट्टेबाज दोस्त थे) को डिनर पर बुलाया। मैं बिना बुलाए वहां पहुँची। समीर फिर वही नाटक कर रहा था—निशा फर्श पर पड़ी थी और वह उसे ‘पागल नौकरानी’ बताकर अपमानित कर रहा था।
मैंने अपना फोन निकाला और पुलिस को सूचना दी। 10 मिनट में इंस्पेक्टर मलिक और मेरे वकील राघव जी वहां पहुँच गए। मैंने मेहमानों के सामने समीर की सारी पोल खोल दी। “समीर धवन, तुम एक जुआरी हो,” मैंने गरजते हुए कहा। मैंने प्रोजेक्टर पर उसके बैंक स्टेटमेंट्स और सट्टेबाजी के ठिकानों की तस्वीरें दिखाईं। “और यह पावर ऑफ अटॉर्नी जाली है। मेरे पास फॉरेंसिक रिपोर्ट है जो साबित करती है कि ये दस्तखत तुमने किए हैं।”
समीर का चेहरा सफेद पड़ गया। जब इंस्पेक्टर ने उसे हथकड़ी पहनाई, तो वह गिड़गिड़ाने लगा। लेकिन उस मां के सामने उसकी कोई भीख काम नहीं आई, जिसकी ममता अब प्रतिशोध की ज्वाला बन चुकी थी।
अध्याय 5: न्याय और नई सुबह
समीर को धोखाधड़ी, जालसाजी और घरेलू हिंसा के मामले में 3 साल की सजा हुई। निशा का तलाक मंजूर हो गया और उसे समीर के उन खातों से हर्जाना मिला जो उसने गुप्त रूप से रखे थे (जिसका पता मैंने उसके ऑडिट के दौरान लगाया था)।
आज निशा मेरे साथ सुरक्षित है। वह मेरी कंपनी में असिस्टेंट अकाउंटेंट के तौर पर काम सीख रही है। उसके चेहरे की मुस्कान अब वापस आ गई है। वह अब ‘पागल नौकरानी’ नहीं, बल्कि एक सशक्त महिला है।
अर्चना भट्ट का संदेश: “उम्र हमें बूढ़ा बना सकती है, पर बुद्धू नहीं। हमारे पास अनुभव का वह खजाना है जिसे कोई भी अपराधी नहीं चुरा सकता। अपने बच्चों के लिए ढाल बनिए, लेकिन अपने दिमाग को हमेशा सतर्क रखिए।”
निष्कर्ष
यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सच्चाई और सही योजना के सामने वह टिक नहीं सकती। एक मां की ताकत और उसके पेशेवर अनुभव ने एक उजड़ते हुए जीवन को फिर से संवार दिया।
क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का एक और भाग लिखूँ, जिसमें अर्चना और निशा मिलकर अन्य महिलाओं को कानूनी और वित्तीय सहायता देने के लिए एक संस्था शुरू करती हैं?
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