वर्दी की धूल और ममता का त्याग: आईपीएस अभिनव और शालिनी की महागाथा

अध्याय 1: जबलपुर की वह धूल भरी सुबह

जबलपुर की सुबह उस दिन किसी खबर की तरह नहीं थी, बस रोज़ की तरह थी। फ्लाई ओवर के नीचे निर्माण स्थल की आवाज़ें, फावड़े की खनक, गिट्टी की चरमराहट और मजदूरों की थकी हुई पुकारें वातावरण में घुली थीं। आईपीएस अभिनव प्रताप सिंह अपनी सरकारी गाड़ी में रूटीन निरीक्षण पर निकले थे। वर्दी की कॉलर सही थी, जूते चमक रहे थे और चेहरे पर वही अफसर वाला संयम था जो बड़ी कुर्सियों पर बैठने वालों को सीखना पड़ता है।

गाड़ी रुकी और अभिनव निरीक्षण के लिए नीचे उतरे। ठेकेदार की छोटी सी भीड़ पहले से तैयार थी। अभिनव ने गाड़ी से उतरते ही सवाल शुरू किए—सेफ्टी ऑफिसर कौन है? पिछले हफ्ते की मजदूरी कब दी? हेलमेट कितने हैं? उसकी आवाज ना ऊंची थी ना नर्म, बस सदी हुई। तभी, मजदूरों की कतार के किनारे कुछ महिलाएं सिर पर ईंटों की टोकरियां रखे खड़ी थी। धूप सीधे उनके चेहरों पर पड़ रही थी।

अचानक, अभिनv की नज़र एक चेहरे पर अटक गई। वह महिला थोड़ी दूर सड़क की तरफ ईंटों का ढेर सजा रही थी। साड़ी पुरानी थी, हाथों पर सीमेंट की परत जमी थी और बाल धूल में चिपके हुए थे। उसकी आँखें नीचे थीं, लेकिन उसकी चाल में एक अजीब सी परिचित लय थी। जब उस महिला ने पसीने पोंछने के लिए सिर उठाया, तो अभिनव के भीतर कुछ टूट कर गिर गया। वो चेहरा धूप और मेहनत से बदल गया था, लेकिन पहचान बदल नहीं सकती थी। वो शालिनी थी—उसकी पत्नी।

अध्याय 2: एक खामोश मुलाक़ात और कड़वा सच

शालिनी, जिसे घर वाले अब तक बस इतना कहते रहे थे कि वह ‘मायके में’ है और खुश है। वही शालिनी जिसे अभिनव ने पिछले एक महीने में कई बार फोन किया था और हर बार जवाब आधा मिला था। अभिनव की सांस जैसे एक पल के लिए अटक गई। शालिनी की नजर भी उस पर पड़ गई। उसके चेहरे पर ना कोई चीख थी ना कोई नाटकीयता, बस एक स्थिर सी थकान थी।

अभिनव ठेकेदार की बातें सुननी बंद कर दी और शालिनी की तरफ बढ़ा। उसके भीतर दो आदमी एक दूसरे से लड़ रहे थे—एक आईपीएस जिसे व्यवस्था चाहिए और एक पति जिसे जवाब चाहिए। उसने बहुत धीमे से कहा, “शालिनी।” शालिनी ने ईंट नीचे रखी और उसकी तरफ देखा, पर उस देखने में सवाल नहीं था। उसने बस इतना कहा, “सर, काम चल रहा है।” यह संबोधन अभिनv को चाकू की तरह लगा। शालिनी की आवाज में यह शब्द केवल सम्मान नहीं था, यह एक गहरी दूरी थी।

अध्याय 3: त्याग की अदृश्य कहानी (फ्लैशबैक)

यह कहानी उससे बहुत पहले शुरू हो गई थी। अभिनव दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। कोचिंग, किताबें और टेस्ट, सब कुछ पैसे मांगते थे। शालिनी जानती थी कि अगर वह अभी सच बोल देगी तो अभिनव पढ़ाई छोड़कर लौट आएगा। उसने तय किया कि वह ऐसा नहीं होने देगी। उसने पहली बार निर्माण स्थल पर दिहाड़ी का काम ढूंढा।

पहली बार ईंट उठाते हुए उसकी पीठ में झटका लगा, हथेलियों में छाले पड़े, धूप ने आंखें जला दी। लेकिन शाम को जब उसे दिहाड़ी मिली, तो उसने सीधे पोस्ट ऑफिस जाकर मनीऑर्डर भरा। नाम—अभिनव प्रताप सिंह। वजह—पढ़ाई। उसने यह बात अभिनv को कभी नहीं बताई। फोन पर हमेशा यही कहा, “सब ठीक है।” वह जानती थी कि हर भेजा गया नोट अभिनव के सपने में एक सीढ़ी जोड़ रहा है।

अध्याय 4: घर का असली चेहरा और नफरत का बीज

शालिनी के ससुराल वालों को यह पता चल गया था कि वह मज़दूरी कर रही है। यहीं से जलन ने आकार लेना शुरू किया। पिता की इच्छा थी कि बेटा बड़ा बने पर इतनी ऊंचाई तक नहीं कि घर के फैसले बदलने लगे। मां चाहती थी कि बहू घर संभाले पर इतनी समझदार ना हो कि सवाल पूछने लगे।

उन्होंने शालिनी पर आरोप लगाए कि वह पैसे कहाँ से लाती है। अंततः एक शाम सब ने बैठकर फैसला सुनाया कि “अभी तुम मायके में रहो, घर का माहौल ठीक नहीं है।” शालिनी समझ गई कि यह वो दरवाजा है जो चुपचाप बंद किया जा रहा है। उसने अभिनv की पढ़ाई खराब ना हो, इसलिए उसे कुछ नहीं बताया और उसी रात मायके लौट गई। वह वहाँ भी मज़दूरी करती रही और पैसे भेजती रही।

अध्याय 5: चयन का दिन और आखिरी मनीऑर्डर

जब अखबार में अभिनव की तस्वीर छपी—”आईपीएस चयनित”, तो शालिनी उस दिन भी काम पर थी। अभिनव ने फोन करके बताया, उसने ईंट नीचे रखी और दीवार से टेक लगाकर खड़ी हो गई। उसने उसी दिन आखिरी बार पैसे भेजे। उसे लगा कि उसका काम पूरा हो गया है।

लेकिन घर वालों के लिए यह खबर और भी असहज थी। अब बहू अगर लौटेगी तो आईपीएस की पत्नी बनकर लौटेगी, जो घर के पुराने संतुलन को तोड़ सकती थी। इसलिए अभिनव को बताया गया कि वह मायके में खुश है और आना नहीं चाहती। अभिनव ने अपनी व्यस्तता में इस झूठ पर भरोसा कर लिया।

अध्याय 6: आत्म-बोध और न्याय की शुरुआत

उस रात अभिनव सो नहीं पाया। अगली सुबह वह सीधे अपने पुराने घर पहुंचा और कड़े स्वर में पूछा, “शालिनी कब निकली थी?” जब सच सामने आया कि शालिनी मज़दूरी करके उसे अफ़सर बनाती रही और घर वालों ने उसे बाहर रखा, तो अभिनव का खून खौल उठा। उसने उसी पल घर से नाता तोड़ लिया।

वह वापस फ्लाई ओवर के नीचे पहुँचा। उसने शालिनी से कहा, “मैं तुम्हें यहाँ से लेने आया हूँ।” शालिनी ने उसकी ओर देखा और कहा, “सुरक्षा अब किसी घर से नहीं मिलती सर, सुरक्षा अब काम से मिलती है।” अभिनव ने समझ लिया कि माफ़ी माँगना काफ़ी नहीं है, उसे व्यवस्था बदलनी होगी।

अध्याय 7: एक नया जबलपुर और स्वाभिमान का अंत

अभिनव ने आईपीएस के रूप में निर्माण स्थलों पर मजदूरी भुगतान, सुरक्षा और महिला मजदूरों के अधिकारों पर कड़े कानून लागू किए। शालिनी ने तुरंत काम नहीं छोड़ा, वह अपनी मेहनत की कमाई पर जीना चाहती थी। धीरे-धीरे अभिनव ने उसका विश्वास वापस जीता।

शहर को कभी यह पूरी कहानी पता नहीं चली कि एक आईपीएस की वर्दी के धागों में कितनी ईंटों की धूल लगी है। लेकिन शालिनी जानती थी कि उसने अपने हाथों से एक सपना खड़ा किया था और उसी प्रक्रिया में खुद को भी पहचान लिया था।


समाप्त