खाकी का दाग और इंसाफ की ज्वाला: डीएम अदिति वर्मा का प्रतिशोध

अध्याय 1: सराफा बाजार की दहकती दोपहर

मई का महीना था और दिल्ली के पास बसे उस जिले में सूरज जैसे आग बरसा रहा था। दोपहर के 1:00 बज रहे थे। सराफा बाजार अपनी पूरी रफ्तार में था, लेकिन गर्मी इतनी तेज थी कि सड़क का डामर भी पिघलने को तैयार था। फिर भी, भीड़ कम नहीं थी।

इसी भीड़भाड़ के बीच एक युवती खड़ी थी। उसने एक सादा सी कॉटन की कुर्ती और नीली जींस पहन रखी थी। पैरों में कोल्हापुरी चप्पल और कंधे पर एक झोला। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, बस आंखों में एक अजीब सी चमक। पूरा जिला उसे ‘डीएम अदिति वर्मा’ के नाम से जानता था, लेकिन आज वह सिर्फ एक आम नागरिक थी।

उसका छोटा भाई आकाश, जो दूर रहकर पढ़ाई कर रहा था, उसका फोन आज सुबह टूट गया था। अदिति को उसे पैसे भेजने थे, लेकिन नेट बैंकिंग का सर्वर डाउन था। इसीलिए उसने सोचा कि बाजार की किसी पुरानी विश्वसनीय दुकान के जरिए कैश ट्रांसफर करवा ले। वह रामदीन काका की दुकान पर पहुँची।

“अरे बेटी, गर्मी बहुत है आज। जरा पंखे के नीचे आ जाओ,” बुजुर्ग रामदीन ने स्नेह से कहा।

“शुक्रिया काका। मुझे भाई को 10,000 रुपये भेजने हैं। मैं आपको ऑनलाइन भेज रही हूँ, आप उसे कैश ट्रांसफर करवा देना,” अदिति ने मुस्कुराते हुए कहा।

अभी क्यूआर कोड स्कैन ही हो रहा था कि अचानक सायरन की गूंज सुनाई दी।

अध्याय 2: वर्दी का अहंकार और इंस्पेक्टर भूपेंद्र

पुलिस की गाड़ी सीधी रामदीन काका की दुकान के आगे रुकी। इंस्पेक्टर भूपेंद्र सिंह गाड़ी से उतरा। उसकी वर्दी पर लगे सितारे उसकी वीरता के नहीं, बल्कि उसके अहंकार के प्रतीक थे। उसके पीछे तीन-चार सिपाही भी उतरे।

“क्यों बे रामलाल! बड़ी दुकान चल रही है आजकल? लगता है नोट गिनने की मशीन लगा ली है,” भूपेंद्र ने हिकारत से कहा।

“अरे नहीं साहब, बस दाल-रोटी चल रही है। ठंडा मंगवाऊं?” रामदीन ने हाथ जोड़कर पूछा।

“ठंडा बाद में पिएंगे। पहले यह बता, पिछले महीने का हफ्ता थाने क्यों नहीं पहुँचा? भूल गया कि इस इलाके का बादशाह कौन है?” भूपेंद्र ने चिल्लाते हुए रामदीन को धक्का दिया।

रामदीन जमीन पर गिर पड़े। उनका चश्मा टूट गया। भूपेंद्र ने गल्ले से पैसे निकाले—वे वही पैसे थे जो अदिति ने अभी ट्रांसफर किए थे। “ये रख रहा हूँ जब्ती में, कल थाने आ जाना।”

अदिति यह सब देख रही थी। उसका खून खौल उठा। वह आगे बढ़ी और बोली, “रुकिए इंस्पेक्टर! आपको किसी बेगुनाह बुजुर्ग पर हाथ उठाने का कोई हक नहीं है। और बगैर किसी रसीद के आप गल्ले से पैसे कैसे निकाल सकते हैं? यह कानून नहीं, खुली डकैती है।”

बाजार के लोग सन्न रह गए। एक साधारण सी लड़की दरोगा से भिड़ रही थी।

अध्याय 3: अपमान की चरम सीमा

भूपेंद्र ने अदिति को ऊपर से नीचे तक देखा। “ओह! तो अब मुझे सड़क पर कानून सिखाया जाएगा? मैडम, कानून की किताब घर पर पढ़नी चाहिए। पुलिस वाले को मत सिखाओ।”

“बात क्रांति की नहीं, हक की है। जो पैसे आपने रखे हैं, उन्हें वापस डालिए,” अदिति ने कड़क आवाज में कहा।

भूपेंद्र का अहंकार सातवें आसमान पर था। “ज्यादा जुबान चलती है तेरी? वीडियो बनाएगी?” उसने झपटकर अदिति का फोन छीना और जमीन पर पटक दिया। “अब क्या करेगी?”

उसने अदिति को एक जोरदार थप्पड़ मारा। बाजार में सन्नाटा छा गया। “इसे उठाओ और जीप में डालो! सरकारी काम में बाधा डालने के जुर्म में इसे थाने में सबक सिखाऊंगा।”

अदिति की आंखों में आंसू नहीं थे, सिर्फ एक शांत प्रतिशोध था। उसने धीरे से कहा, “राजेंद्र सिंह, यह थप्पड़ तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा।”

अध्याय 4: थाना और ‘कमरा नंबर तीन’

अदिति को थाने लाया गया। भूपेंद्र ने उसे ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ वाले कमरा नंबर तीन में रखने का आदेश दिया। वह चाहता था कि वह डर जाए, माफी मांगे।

वहां एक सिपाही, ‘वजह’ (Wajahat), पानी लेकर आया। “मैडम, आपने साहब से पंगा लेकर ठीक नहीं किया। माफी मांग लीजिए।”

अदिति ने उसकी ओर देखा। “वजह, क्या तुम भी बाकी सबकी तरह हो?”

“नहीं मैडम, मैं तो बस नौकरी कर रहा हूँ। घर में बीमार मां है,” वजह ने नजरें झुकाकर कहा।

अदिति ने शांति से जवाब दिया, “सिस्टम खुद नहीं बनता वजह, लोग बनाते हैं। मेरा नाम अंजलि लिख लो रजिस्टर में।”

वजह को कुछ अजीब लगा। उस लड़की की आंखों का आत्मविश्वास किसी आम टीचर या छात्रा का नहीं था। उसने चुपके से अपने फोन से एसएसपी (SSP) को एक गुप्त मैसेज भेजा— “सर, सिटी कोतवाली में कुछ बहुत गलत हो रहा है। एक महिला को अवैध हिरासत में लिया गया है।”

अध्याय 5: नकाब उतरने का वक्त

भूपेंद्र कमरे में दाखिल हुआ। उसने बेल्ट मेज पर रखी। “हाँ तो टीचर मैडम! अब बताओ, बच्चों को क्या सिखाती हो? पुलिस से लड़ना?”

“मैं बच्चों को सच बोलना सिखाती हूँ और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना,” अदिति ने जवाब दिया।

भूपेंद्र ने हाथ उठाया ही था कि तभी बाहर चार सरकारी गाड़ियों के सायरन गूंजे। एसएसपी राजीव और उनकी टीम अंदर दाखिल हुई।

“हथियार नीचे करो!” राजीव ने चिल्लाकर कहा।

भूपेंद्र घबरा गया। “सर, यह लड़की अपराधी है, इसने मुझ पर हमला किया…”

राजीव ने उसे नजरअंदाज किया और अदिति के पास जाकर कड़क सैल्यूट मारा। “जय हिंद मैम! हमें पहुँचने में देर हो गई, उसके लिए माजरत।”

पूरे थाने में सन्नाटा छा गया। भूपेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई। “मैम? आप डीएम हैं?”

अदिति अपनी जगह से उठी। उसकी सादगी अब सत्ता में बदल चुकी थी। उसने मेज पर रखी अपनी आईडी (ID) दिखाई। “हाँ भूपेंद्र, मैं वो सिस्टम हूँ जिसे तुम जैसे लोगों ने खोखला कर रखा है।”

अध्याय 6: न्याय का प्रहार

अदिति ने अपनी वर्दी का गौरव वापस पाने के लिए आदेश देना शुरू किया। “एसएसपी साहब, इसे अभी सस्पेंड कीजिए। इसकी बेल्ट, टोपी और बैज सब जमा कर लीजिए। यह अब पुलिस वाला नहीं, एक विचाराधीन कैदी है।”

भूपेंद्र पैरों में गिर पड़ा। “मैम, मुझे पता नहीं था कि आप डीएम हैं… गलती हो गई।”

“यही तो तुम्हारी समस्या है भूपेंद्र। अगर मैं डीएम न होती, एक आम औरत होती, तो क्या तुम्हारा यह जुल्म जायज था? वर्दी जुल्म का लाइसेंस नहीं देती, सुरक्षा की जिम्मेदारी देती है।”

अदिति ने खुद एफआईआर लिखवाई। “लिखिए शिकायतकर्ता—अदिति वर्मा। आरोपी—भूपेंद्र सिंह और सहयोगी स्टाफ। धाराएं—मारपीट, अवैध हिरासत, भ्रष्टाचार, और महिला के साथ दुर्व्यवहार।”

भूपेंद्र को उन्हीं हथकड़ियों में ले जाया गया जिनसे वह बेगुनाहों को डराता था। अदिति ने वजह की तारीफ की। “वजह जैसे ईमानदार लोग ही खाकी की इज्जत बचाए हुए हैं। राजीव, इसका नाम कमेंडेशन अवार्ड के लिए भेजिए।”

उपसंहार: सराफा बाजार का एतमाद

अदिति वापस सराफा बाजार पहुँची। रामदीन काका के पास जाकर उसने उनके फटे हुए कुर्ते को देखा। बाजार के लोग शर्मिंदा थे कि वे चुप रहे।

“काका, शर्मिंदा मत होइए। आज जो हुआ वह मेरे जमीर के लिए जरूरी था। लेकिन आप सबसे मेरी एक शिकायत है—जब अन्याय हो रहा था, तो आप वीडियो बना रहे थे, तमाशा देख रहे थे। अगर आप 100 लोग मिलकर विरोध करते, तो भूपेंद्र की हिम्मत नहीं होती।”

अदिति ने साबित कर दिया कि वर्दी सिर्फ पहनने से इज्जत नहीं देती, वह किरदार से मिलती है। उस दिन सराफा बाजार में डर खत्म हुआ और कानून पर विश्वास फिर से लौट आया।


अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का अगला हिस्सा लिखूँ, जहाँ डीएम अदिति वर्मा जिले के अन्य भ्रष्ट विभागों की ‘सफाई’ करती हैं? या फिर आप कांस्टेबल ‘वजह’ के प्रमोशन और उसके द्वारा किए गए साहसी कार्यों की कहानी पढ़ना चाहेंगे?