वर्दी की धूल: मेजर जनरल का मौन प्रतिशोध

अध्याय 1: सरस्वती विद्या मंदिर का ढोंग

शहर के कोलाहल से दूर, सरस्वती विद्या मंदिर अपनी ऊँची चहारदीवारी के पीछे शिक्षा का नहीं, बल्कि रसूख का केंद्र बन चुका था। यहाँ की दीवारों पर महापुरुषों की तस्वीरें तो थीं, लेकिन उनके आदर्शों का नामोनिशान नहीं था। स्कूल के प्रिंसिपल, मिस्टर खन्ना, एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी नैतिकता उनकी जेब में पड़े नोटों के बंडलों के साथ बदलती रहती थी।

इस चकाचौंध के बीच एक साया था जो सुबह के अंधेरे में आता और रात के सन्नाटे में जाता—प्रताप। 60 साल की उम्र, चेहरे पर झुर्रियों का जाल, और फटी हुई नीली कमीज। प्रताप स्कूल का मुख्य सफाई कर्मचारी था। वह हर उस कोने को साफ करता जहाँ अमीर घरों के बिगड़े बच्चे गंदगी फैलाते थे। लेकिन प्रताप के काम करने के तरीके में कुछ अलग था। वह जब झाड़ू पकड़ता, तो उसकी पकड़ में एक ऐसी मजबूती होती थी जैसे कोई सैनिक अपनी राइफल थामे हो।

अध्याय 2: अपमान की चरम सीमा

वह मंगलवार की दोपहर थी। स्कूल का लंच ब्रेक चल रहा था। प्रताप स्कूल के उस चबूतरे की सफाई कर रहा था जहाँ तिरंगा फहराया जाता था। उसके लिए वह केवल पत्थर का एक ढांचा नहीं, बल्कि देश की अस्मिता का केंद्र था।

तभी आर्यन अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँचा। आर्यन शहर के सबसे बड़े भू-माफिया और नेता, जगत सेठी का बेटा था। आर्यन के हाथ में एक महंगी कोल्ड ड्रिंक थी। उसने जानबूझकर आधी बोतल उस साफ फर्श पर उड़ेल दी जिसे प्रताप ने अभी-अभी चमकाया था।

प्रताप ने धीरे से सिर उठाया। “बेटा, यहाँ तिरंगा फहराया जाता है। इसे गंदा मत करो।”

आर्यन के अहंकार को चोट पहुँची। “ए बुड्ढे! तू मुझे सिखाएगा? तू जानता नहीं मेरा बाप कौन है? तू और तेरी यह झाड़ू मेरे जूतों की धूल के बराबर हैं।”

प्रताप शांत खड़ा रहा, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी बिजली कौंधी। आर्यन ने तैश में आकर अपनी कोल्ड ड्रिंक की बाकी बूंदें प्रताप के सफेद बालों पर टपका दीं। “ले, अब इसे भी साफ कर!”

अध्याय 3: खन्ना की चापलूसी और प्रताप का निष्कासन

शोर सुनकर प्रिंसिपल खन्ना वहाँ दौड़ते हुए आए। उन्होंने देखा कि आर्यन गुस्से में है। खन्ना जानते थे कि अगर सेठी जी नाराज हुए तो स्कूल का डोनेशन बंद हो जाएगा। उन्होंने आव देखा न ताव, प्रताप के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।

“प्रताप! तेरी हिम्मत कैसे हुई आर्यन बाबा से जुबान लड़ाने की? अभी के अभी इनके पैरों में गिरकर माफी माँग!” खन्ना चिल्लाया।

प्रताप की आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक ज्वालामुखी था। “सर, मैंने तिरंगे का अपमान होने से रोका है। मैं माफी नहीं माँगूँगा।”

खन्ना ने प्रताप का कॉलर पकड़ा और उसे घसीटते हुए स्कूल के गेट तक ले गया। सबके सामने उसे एक लात मारी और कहा, “निकल जा यहाँ से! तेरी मनहूस शक्ल दोबारा यहाँ दिखी तो पुलिस के हवाले कर दूँगा। तू बस एक मामूली सफाई वाला है, अपनी औकात में रह।”

प्रताप धूल में गिर गया। उसके घुटने छिल गए। आर्यन और उसके दोस्त ठहाके मार रहे थे। प्रताप उठा, उसने अपनी फटी हुई कमीज झाड़ी और बिना पीछे मुड़े वहाँ से चला गया।

अध्याय 4: संदूक का राज और अतीत की गूँज

उस रात प्रताप अपनी तंग कोठरी में अकेला था। उसने अपने पुराने लोहे के संदूक को निकाला। जंग लगे ताले को खोलते ही अंदर से एक खुशबू आई—अनुशासन और बलिदान की खुशबू।

अंदर एक जैतून के रंग की वर्दी (Olive Green Uniform) तह करके रखी थी। उस पर लगे ‘मेजर जनरल’ के सितारे और ‘महावीर चक्र’ की पट्टी रात के अंधेरे में भी चमक रही थी। प्रताप ने वर्दी को अपने माथे से लगाया। उसे याद आया कारगिल का वह मोर्चा जहाँ उसने अपनी एक टांग में गोली खाने के बाद भी दुश्मन के बंकर को तबाह किया था।

उसने अपना सैटेलाइट फोन निकाला और एक नंबर मिलाया। “मेजर जनरल प्रताप सिंह बोल रहा हूँ। कल सुबह सरस्वती विद्या मंदिर के मैदान पर ‘ऑपरेशन स्वाभिमान’ शुरू होगा। मुझे मेरी रेजिमेंट चाहिए।”

अध्याय 5: आसमान से उतरा न्याय

अगले दिन स्कूल का वार्षिक उत्सव था। शहर के तमाम वीआईपी (VIP) अतिथि आए हुए थे। जगत सेठी मुख्य अतिथि की बगल वाली कुर्सी पर बैठा अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा था। खन्ना मंच से बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था।

तभी आसमान में एक गड़गड़ाहट हुई। दो ‘ध्रुव’ हेलिकॉप्टर स्कूल के ऊपर मंडराने लगे। हवा के दबाव से टेंट उखड़ने लगे। लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे। हेलिकॉप्टर मैदान में उतरे और उनमें से भारतीय सेना के ‘पैरा कमांडो’ (Para Commandos) बाहर निकले। उन्होंने पूरे स्कूल को घेर लिया।

भीड़ के बीच से एक शख्स आगे बढ़ा। साढ़े छह फीट लंबा कद, सीना तना हुआ, और आँखों में साक्षात यमराज का क्रोध। वह प्रताप था, लेकिन आज वह सफाई वाला नहीं, बल्कि देश का गौरव मेजर जनरल प्रताप सिंह था।

अध्याय 6: सिंहासन का काँपना

प्रताप सीधे मंच पर चढ़ा। खन्ना की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। जगत सेठी ने खड़े होकर पूछा, “आप कौन हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं?”

प्रताप ने उसे एक गहरी नजर से देखा और माइक संभाला। “मैं वह हूँ जिसे कल तुम्हारे बेटे ने ‘दो कौड़ी का नौकर’ कहा था और तुम्हारे इस पालतू प्रिंसिपल ने लात मारी थी।”

पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया। प्रताप ने आगे कहा, “खन्ना, तुमने जिस वर्दी को धूल में मिलाया, वह वर्दी इस देश की सीमाओं की ढाल है। तुमने सोचा कि एक सफाई वाला कमजोर होता है? सफाई करने वाला हाथ गंदा नहीं होता, गंदा वह दिमाग होता है जो ऊँच-नीच का भेद करता है।”

प्रताप ने अपनी बटालियन को आदेश दिया। मिनटों के भीतर स्कूल के कागजात खंगाले गए। पता चला कि जगत सेठी ने स्कूल की जमीन हड़प कर वहां अवैध निर्माण किया था।

अध्याय 7: प्रायश्चित की धूल

आर्यन और उसके पिता को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। खन्ना के हाथ-पैर काँप रहे थे। प्रताप ने आर्यन को अपने पास बुलाया।

“बेटा, दौलत विरासत में मिल सकती है, संस्कार नहीं। कल तुमने मेरा अपमान किया, मैंने माफ किया। लेकिन तुमने जहाँ गंदगी फैलाई, वह जगह पवित्र थी। जाओ, झाड़ू उठाओ और इस पूरे मैदान को साफ करो।”

आर्यन, जो कल तक घमंड में चूर था, आज अपने आंसुओं से फर्श धो रहा था। उसने सबके सामने प्रताप के पैर छुए और अपनी गलती मानी।

उपसंहार: विदाई और विरासत

मेजर जनरल प्रताप सिंह ने तिरंगे को सलामी दी और अपने हेलिकॉप्टर की ओर चल दिए। उन्होंने जाते-जाते खन्ना से कहा, “स्कूल का काम इंसान बनाना है, रोबोट या गुलाम नहीं। अगली बार जब किसी सफाई वाले को देखो, तो याद रखना कि शायद वह भी किसी मोर्चे का नायक हो।”

आज उस स्कूल के गेट पर प्रताप की सफाई वाली झाड़ू और उनकी वर्दी की एक तस्वीर लगी है, जो हर बच्चे को यह याद दिलाती है कि सम्मान पद से नहीं, चरित्र से मिलता है।


अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का एक प्रीक्वल (Prequel) लिखूँ, जिसमें प्रताप के कारगिल युद्ध के पराक्रम का वर्णन हो? या फिर इस कहानी का अगला भाग, जिसमें आर्यन एक सुधरा हुआ इंसान बनकर देश की सेवा करता है?