ममता का सिंहासन: एक ज़िलाधिकारी की घर वापसी

अध्याय 1: समय की मार और झोपड़ी का सन्नाटा

गाँव के आखिरी छोर पर, जहाँ इंसानी बस्तियाँ खत्म होती हैं और वीरान खेत शुरू होते हैं, वहाँ एक टूटी-फूटी झोपड़ी खड़ी थी। यह झोपड़ी नहीं, बल्कि समय द्वारा भुला दिया गया एक स्मारक थी। इसकी दीवारें मिट्टी छोड़ चुकी थीं और छत से बारिश का पानी सीधा बूढ़ी कस्तूरी देवी के जीवन में टपकता था।

70 साल की कस्तूरी देवी, जिसकी कमर झुककर आधी हो चुकी थी, रोज़ सुबह अपनी झोपड़ी के बाहर एक पुरानी खाट पर बैठती थी। उसकी आँखों में धुंधलापन था, लेकिन उस धुंधलेपन में भी वह हर रोज़ उसी कच्चे रास्ते को निहारती थी। उसे उम्मीद थी कि 10 साल पहले जो बेटा एक रात गुस्से में घर छोड़कर गया था, वह आज लौट आएगा। गाँव वाले उसे पागल समझते थे, पर माँ का दिल गणित नहीं, केवल विश्वास जानता था।

अध्याय 2: संघर्षों की आग में तपता बचपन

कस्तूरी देवी का जीवन हमेशा से ऐसा नहीं था। एक समय था जब उसका पति रामधन मेहनत-मज़दूरी कर घर चलाता था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। रामधन की असामयिक मृत्यु के बाद, कस्तूरी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसका बेटा मोहन उस समय केवल 6 साल का था।

कस्तूरी ने कसम खाई थी कि वह मोहन को कभी भूखा नहीं सोने देगी। उसने दूसरों के बर्तन माँझे, ईंट भट्ठों पर तपती धूप में काम किया, और खेतों में मज़दूरी की। वह अपनी थाली की आधी रोटी छिपाकर मोहन के लिए रखती थी। मोहन बड़ा होने लगा, लेकिन गरीबी ने उसके अंदर एक आक्रोश भर दिया था। उसे अपनी माँ की सख्ती बुरी लगती थी। वह यह नहीं समझ पाया कि माँ की सख्ती दरअसल उसे बुरी संगत से बचाने की एक ढाल थी।

अध्याय 3: वह काली रात और बिछड़न

जब मोहन 16 साल का हुआ, तो विद्रोह की आग भड़क उठी। एक रात वह शराब के नशे में धुत होकर लौटा। कस्तूरी देवी का धैर्य टूट गया। उन्होंने मोहन को थप्पड़ मार दिया और गुस्से में कह दिया, “तू मेरा बेटा कहलाने लायक नहीं है!”

वे शब्द मोहन के सीने में तीर की तरह चुभ गए। उसी रात, जब माँ सो रही थी, मोहन ने अपनी छोटी सी पोटली बाँधी और अंधेरे में गुम हो गया। अगली सुबह कस्तूरी के लिए एक अनंत प्रतीक्षा की शुरुआत थी। उसने मोहन को हर जगह ढूँढा—थानों में, अस्पतालों में, रिश्तेदारों के यहाँ—पर मोहन कहीं नहीं मिला।

अध्याय 4: शहर की भट्टी और सफलता का शिखर

मोहन शहर पहुँच चुका था। शुरुआत में उसने ढाबों पर बर्तन धोए, लोगों के बोझ उठाए। लेकिन उसके अंदर एक ज़िद थी—कुछ बनकर दिखाने की। उसने रात के सन्नाटे में सड़क की लाइट के नीचे पढ़ाई की। मेहनत रंग लाई और मोहन ने लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की। साल बीतते गए और वह मोहन, जो कभी भूखा सोता था, आज ज़िले का सबसे शक्तिशाली अधिकारी—डीएम (District Magistrate) मोहन सिंह बन चुका था।

लेकिन सफलता की इस ऊँचाई पर भी उसके मन के एक कोने में माँ की वह डाँट और वह झोपड़ी आज भी जीवित थी।

अध्याय 5: फाइलों के बीच छिपा एक नाम

एक शाम, डीएम मोहन सिंह के सामने ‘वृद्ध सहायता योजना’ की एक फाइल आई। फाइलों के ढेर में एक रिपोर्ट थी—ग्राम पंचायत की ओर से एक असहाय वृद्धा की मदद की गुहार। जैसे ही मोहन की नज़र नाम पर पड़ी—“कस्तूरी देवी, पति स्व. रामधन”—उसके हाथ काँप गए। पेन हाथ से छूटकर गिर गया। 10 साल की सारी यादें एक फिल्म की तरह आँखों के सामने घूमने लगीं।

सरकारी कागज़ों में उसकी माँ ‘असहाय’ घोषित की जा चुकी थी। अधिकारी बता रहे थे कि वह महिला भूख और बीमारी से जूझ रही है। मोहन का हृदय ग्लानि से भर गया। उसे लगा कि उसकी सारी पावर, उसकी गाड़ी, उसका बंगला सब मिट्टी है, यदि उसकी माँ उस टूटी झोपड़ी में तड़प रही है।

अध्याय 6: डीएम नहीं, बेटे की वापसी

मोहन ने बिना किसी लाव-लश्कर के, साधारण कपड़ों में गाँव जाने का फैसला किया। शाम ढलते ही वह गाँव की उन्हीं गलियों में था जहाँ वह कभी नंगे पैर दौड़ता था। जैसे ही वह झोपड़ी के पास पहुँचा, उसका गला रुँध गया। झोपड़ी अब गिरने ही वाली थी।

अंदर झाँका तो देखा कि कस्तूरी देवी चूल्हे पर कुछ उबालने की कोशिश कर रही थीं। मोहन की आवाज़ नहीं निकली। उसने काँपते हुए कहा, “माँ, पानी मिलेगा?”

कस्तूरी ने पानी का लोटा बढ़ाया, पर वह अपने बेटे को पहचान नहीं पाई। मोहन वहीं ज़मीन पर बैठ गया और माँ के पैरों को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा। “माँ, मैं आ गया हूँ… तुम्हारा मोहन!”

अध्याय 7: प्रायश्चित और नया संकल्प

जब माँ-बेटे का मिलन हुआ, तो पूरा गाँव गवाह बना। कस्तूरी देवी को विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका बेटा अब इतना बड़ा साहब बन गया है। मोहन ने उसी रात माँ के चरणों में बैठकर कसम खाई कि वह केवल अपनी माँ का ही नहीं, बल्कि इस गाँव की हर उस माँ का बेटा बनेगा जिसका हक सिस्टम ने छीन लिया है।

अगले दिन मोहन डीएम के रूप में गाँव में उतरा। उसने चौपाल लगवाई। जो फाइलें सालों से अटकी थीं, उन्हें मौके पर ही निपटाया। उसने इंजीनियरों को निर्देश दिया कि कस्तूरी देवी की झोपड़ी की जगह एक पक्का घर बनेगा, जो गाँव की अन्य असहाय माताओं के लिए एक ‘आश्रय केंद्र’ का भी काम करेगा।

अध्याय 8: जटाएँ और ज़मीन का मोह

मोहन चाहता था कि माँ उसके साथ शहर के आलीशान बंगले में चले। लेकिन कस्तूरी देवी ने शांति से कहा, “बेटा, मेरी जड़ें इसी मिट्टी में हैं। तेरे पिता की यादें इसी झोपड़ी की धूल में हैं। तू शहर जा, अपना फर्ज़ निभा, पर इस गाँव को मत भूलना।”

मोहन ने माँ की बात मानी। उसने गाँव का कायाकल्प कर दिया। स्कूल, अस्पताल और सड़कों का जाल बिछा दिया। वह हर महीने गाँव आता, डीएम की कुर्सी का अहंकार उतारकर माँ के हाथों की बनी सूखी रोटी खाता।

अध्याय 9: विदाई और विरासत (नया भाग)

साल बीतते गए। कस्तूरी देवी ने अपने जीवन के आखिरी वर्ष बहुत ही सुकून और सम्मान के साथ बिताए। एक दिन शांति से उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। मोहन ने अपनी माँ का अंतिम संस्कार उसी गाँव में किया।

उसने माँ की याद में उसी स्थान पर एक विशाल “कस्तूरी देवी मातृत्व पुस्तकालय और कौशल केंद्र” बनवाया। मोहन का तबादला दूसरे ज़िले में हो गया, लेकिन आज भी उस गाँव के हर बच्चे की जुबाँ पर एक ही कहानी है—उस बेटे की, जिसने अपनी माँ को ढूँढने के लिए पूरे तंत्र को ही बदल दिया।


कहानी का संदेश

सफलता की सबसे ऊँची मंज़िल भी तब छोटी लगने लगती है जब माँ की आँखों में आँसू हों। जीवन की सबसे बड़ी जीत वही है जब माँ के चेहरे पर आपके कारण सुकून की मुस्कान हो।