वर्दी का अहंकार और न्याय की हुंकार: डीएम पूजा सिंह की ‘गुप्त’ अग्निपरीक्षा

अध्याय 1: भेष बदलकर सत्य की खोज

पुणे जिले की जिला मजिस्ट्रेट (DM) पूजा सिंह अपनी ईमानदारी और कड़क कार्यशैली के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर थीं। लेकिन एक सवाल उन्हें हमेशा कचोटता था—क्या एक अधिकारी के रूप में उन्हें वही दिखता है जो ‘सिस्टम’ उन्हें दिखाना चाहता है? क्या आम जनता की आवाज़ वास्तव में उन तक पहुँचती है?

इन सवालों का जवाब पाने के लिए एक शनिवार की शाम पूजा ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी सरकारी गाड़ी, लाल बत्ती और सुरक्षा घेरे को घर पर ही छोड़ दिया। उन्होंने एक साधारण कॉटन का सूट पहना, पैरों में पुरानी चप्पलें डालीं और हाथ में एक थैला लेकर पैदल ही शहर के सबसे भीड़भाड़ वाले बाजार ‘कोथरुड’ की ओर निकल पड़ीं।

बाजार में लोगों का शोर था, कहीं मोल-भाव हो रहा था तो कहीं ठेलों पर भीड़ लगी थी। पूजा एक पानी-पूरी (गोलगप्पे) के ठेले के पास रुकीं। वहां शंभू नाम का एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बड़ी तेजी और सफाई से ग्राहकों को पानी-पूरी खिला रहा था। उसके माथे पर पसीना था, लेकिन उसकी मुस्कान में एक अजीब सा सुकून था।

पूजा ने एक प्लेट माँगी और तीखे पानी का स्वाद चखने लगीं। अभी उन्होंने दूसरी पूरी ही उठाई थी कि अचानक बाजार का शोर थम गया।

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अध्याय 2: इंस्पेक्टर विक्रम राणे का ‘आतंक’

दो काली बुलेट मोटरसाइकिलों पर सवार तीन सिपाही और इंस्पेक्टर विक्रम राणे वहां पहुँचे। राणे की वर्दी पर लगे सितारे चमक रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में क्रूरता थी। वह अपनी मूछों पर ताव देता हुआ शंभू के ठेले के पास आया।

“बे शंभू! तेरा ठेला आज फिर सड़क के बीचों-बीच आ गया? हफ्ते का पैसा कहाँ है?” राणे की आवाज़ में सत्ता का नशा था।

शंभू ने हाथ जोड़ लिए, “साहब, अभी तो बोहनी हुई है। बच्चों की स्कूल की फीस भरनी है, थोड़ा रहम कीजिए।”

लेकिन विक्रम राणे ‘रहम’ करना नहीं जानता था। उसने आव देखा न ताव, अपनी सरकारी बूट से शंभू के ठेले पर एक ज़ोरदार लात मारी। ठेला पलट गया। उबले हुए आलू, मटर, चटनी और सैकड़ों पानी-पूरियां कीचड़ भरे गंदे रास्ते पर बिखर गईं। शंभू की दिन भर की कमाई और उसकी मेहनत की कमाई मिट्टी में मिल गई। वह ज़मीन पर बैठकर रोने लगा।

अध्याय 3: थप्पड़ और अपमान की वह काली रात

बाजार में मौजूद दर्जनों लोग मूकदर्शक बने यह सब देख रहे थे। किसी की हिम्मत नहीं थी कि पुलिस के खिलाफ बोले। लेकिन पूजा सिंह से यह बर्दाश्त नहीं हुआ। वह एक कदम आगे बढ़ीं और उनकी आवाज़ बाजार में गूँजी, “यह क्या तरीका है इंस्पेक्टर? कानून की रक्षा करना आपका काम है, या किसी गरीब की रोजी-रोटी छीनना?”

विक्रम राणे चौंका। उसने मुड़कर एक ‘साधारण’ दिखने वाली लड़की को देखा। “ओ मैडम! समाज सुधारक बनने का शौक चढ़ा है क्या? जाओ अपना काम करो वरना थाने में ले जाकर सारी नेतागिरी निकाल दूंगा,” उसने बदतमीजी से कहा।

पूजा पीछे नहीं हटीं। उन्होंने भ्रष्टाचार और पुलिस के जुल्म पर सवाल उठाना जारी रखा। विक्रम राणे का अहंकार पूरी भीड़ के सामने लहूलुहान हो रहा था। उसे लगा कि एक मामूली लड़की उसकी सत्ता को चुनौती दे रही है। अचानक, अपना आपा खोकर उसने हाथ उठाया और पूजा सिंह के गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया

थप्पड़ की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि एक पल के लिए पूरा बाजार शांत हो गया। पूजा का सिर चकरा गया, उनके गाल पर लाल निशान उभर आए। इंस्पेक्टर ने दहाड़ते हुए कहा, “इसे गिरफ्तार करो! सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिस के साथ बदतमीजी करने के जुर्म में इसे थाने ले चलो।”

अध्याय 4: थाने का नर्क और पूजा का गुप्त संकल्प

पूजा को जबरन घसीटते हुए कोथरुड पुलिस स्टेशन लाया गया। वहां उन्हें एक गंदी कालकोठरी (लॉकअप) में डाल दिया गया। कोठरी के भीतर का माहौल नर्क जैसा था। वहां पहले से दो और महिलाएँ—लक्ष्मी और रीना बंद थीं। लक्ष्मी ने सिसकते हुए बताया कि उसे बिना किसी जुर्म के केवल इसलिए बंद किया गया है क्योंकि उसके पास रिश्वत देने के पैसे नहीं थे।

रात के करीब 12 बजे, विक्रम राणे लॉकअप के पास आया। वह नशे में था और उसके हाथ में एक कोरा कागज था। “सुन लड़की, इस कागज पर साइन कर दे कि तूने नशे में हंगामा किया और पुलिस पर हमला किया। साइन कर दे और अभी घर चली जा, वरना पूरी रात यहाँ मच्छर तुझे काटेंगे,” उसने गंदी मुस्कान के साथ कहा।

पूजा ने ठंडे स्वर में कहा, “मैं साइन नहीं करूंगी। मैं इस सिस्टम की गंदगी को आखिर तक देखना चाहती हूँ।”

गुस्से में राणे ने सिपाही को आदेश दिया, “इसे बाहर निकालो!” पूजा को एक अँधेरे कमरे में ले जाया गया। वहां कोई महिला कांस्टेबल नहीं थी, जो कि सरासर गैरकानूनी था। राणे ने डंडा उठाया और उन्हें डराने की कोशिश की। लेकिन पूजा की आँखों में डर नहीं, बल्कि एक ऐसा संकल्प था जो विक्रम राणे की बर्बादी का कारण बनने वाला था।

अध्याय 5: वह एक फोन कॉल जिसने हिला दिया पूरा जिला

अगली सुबह जब सूरज की किरणें लॉकअप की खिड़की से अंदर आईं, तो पूजा का चेहरा शांत था। इंस्पेक्टर विक्रम राणे को लगा कि लड़की टूट गई होगी। उसने मज़ाक में कहा, “तेरी जमानत हो गई है, निकल यहाँ से।”

लेकिन पूजा बाहर नहीं निकलीं। उन्होंने इंस्पेक्टर की आँखों में आँखें डालकर कहा, “अब मैं अपनी मर्जी से जाऊंगी, तुम्हारी मर्जी से नहीं।”

उन्होंने अपने थैले में छुपाया हुआ अपना निजी ‘अनऑफिशियल’ मोबाइल फोन निकाला। उन्होंने सीधे पुणे के पुलिस कमिश्नर को फोन लगाया।

“कमिश्नर साहब, पूजा सिंह बोल रही हूँ। मैं पिछले 15 घंटों से कोथरुड थाने के लॉकअप में हूँ। आपके इंस्पेक्टर विक्रम राणे ने मुझ पर हाथ उठाया है और कानून की धज्जियाँ उड़ाई हैं। मैं चाहती हूँ कि आप 10 मिनट के अंदर अपनी इंटरनल अफेयर्स टीम, एसएसपी और एसीपी के साथ यहाँ पहुँचें।”

फोन के दूसरी तरफ कमिश्नर के होश उड़ गए। “मैडम… आप… लॉकअप में? हम अभी आ रहे हैं!”

अध्याय 6: न्याय का तांडव और ‘सफाई’ अभियान

10 मिनट के भीतर कोथरुड थाने के बाहर सायरन का शोर मच गया। एक के बाद एक दर्जन भर सरकारी गाड़ियाँ रुकीं। कमिश्नर और एसएसपी लगभग दौड़ते हुए थाने के अंदर आए। उन्होंने देखा कि उनकी जिला मजिस्ट्रेट धूल भरे कपड़ों में, एक सूजे हुए गाल के साथ एक पत्थर की बेंच पर बैठी थीं।

कमिश्नर ने तुरंत सैल्यूट किया। पूरी फोर्स अटेंशन की मुद्रा में आ गई। थाने में मौजूद हर सिपाही का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रम राणे के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कांपते हुए ज़मीन पर गिर पड़ा, “मैडम… गलती हो गई… हमें लगा आप कोई आम लड़की हैं…”

पूजा गरजीं, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है! अगर मैं सच में एक आम लड़की होती, तो क्या तुम उसे रात भर यहाँ जलील करते? क्या तुम उसे अपनी हवस और ताकत का शिकार बनाते? क्या तुम उसे झूठे केस में फँसाकर उसकी जिंदगी तबाह कर देते? बोलो विक्रम राणे!”

पूजा ने बिना वक्त गँवाए कमिश्नर को आदेश दिया:

इंस्पेक्टर विक्रम राणे, कांस्टेबल पाटिल और ड्यूटी पर मौजूद अन्य दो सिपाहियों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त (Dismiss) किया जाए।

इन सभी पर एक महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने, गैरकानूनी हिरासत और मारपीट के लिए संगीन धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाए।

लॉकअप में बंद लक्ष्मी और रीना को तुरंत सम्मान के साथ रिहा किया जाए और उनकी जाँच मैं खुद करूँगी।

शंभू चाट वाले के पूरे नुकसान की भरपाई इंस्पेक्टर राणे की निजी सैलरी से की जाए।

अध्याय 7: एक नई उम्मीद की सुबह

पूजा सिंह थाने से बाहर निकलीं। बाहर अब मीडिया और आम जनता का हुजूम जमा हो चुका था। वहां शंभू भी खड़ा था, उसकी आँखों में कृतज्ञता के आंसू थे। पूजा उसके पास गईं और कहा, “शंभू भैया, आज से आपको कोई हफ्ता नहीं माँगेगा। प्रशासन आपको सम्मान के साथ लाइसेंस देगा।”

इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। ‘वर्दी’ जो सुरक्षा के लिए थी, जब भक्षक बनी, तो एक ‘कलम’ की ताकत ने उसे धूल चटा दी। पूजा सिंह ने साबित कर दिया कि एक सच्चा अधिकारी वही है जो केवल दफ्तर में नहीं बैठता, बल्कि ज़मीन पर उतरकर जनता के दर्द को महसूस करता है।

पूजा अपनी सरकारी गाड़ी में बैठने से पहले मुड़ीं और मीडिया के कैमरों की ओर देखकर बोलीं, “आज की रात ने मुझे सिखाया है कि हमें अभी बहुत काम करना बाकी है। कानून सिर्फ कागजों में नहीं, हर नागरिक के दिल में सुरक्षित महसूस होना चाहिए।”

उपसंहार

कोथरुड थाने की वह रात एक दाग नहीं, बल्कि बदलाव की एक मशाल बन गई। विक्रम राणे और उसके साथी सलाखों के पीछे पहुँच गए। पुणे जिले के हर थाने में सीसीटीवी कैमरे और महिला डेस्क को अनिवार्य कर दिया गया। शंभू का ठेला आज फिर उसी मोड़ पर लगता है, लेकिन अब वहां पुलिस डंडा नहीं मारती, बल्कि उसे सम्मान देती है।

पूजा सिंह के गाल का वह निशान तो कुछ दिनों में चला गया, लेकिन सिस्टम की जो सफाई उन्होंने की, उसकी गूँज आज भी रणनगर की गलियों में सुनाई देती है।