Boyfriend ने महबूबा के पति का सांस थमने तक मुंह दबाया,बीवी ने Acting कर हादसा दिखाया,ऐसे पलटी कहानी

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मासूमियत की मौत

1. शिवपुर का सन्नाटा

मध्य प्रदेश के शिवपुर जिले में दिसंबर की ठंडी सुबह थी। सड़कें खाली थीं, कोहरे की चादर में लिपटी हुई। इसी सन्नाटे में एक बाइक खाई के किनारे गिरी पड़ी थी। पुलिस की जीप वहाँ रुकी, इंस्पेक्टर विनोद सिंह ने अपने जवानों को इशारा किया—”पूरी जगह अच्छे से देखो, कोई सबूत छूटना नहीं चाहिए।”

खाई के नीचे, टीचर रमाकांत पाठक की लाश पड़ी थी। शरीर पर चोटों के निशान थे, लेकिन सबसे गहरा निशान था उसकी मासूमियत का, जो अब हमेशा के लिए खो चुकी थी।

2. हादसा या हत्या?

शुरुआती जांच में पुलिस को लगा कि यह एक साधारण सड़क दुर्घटना है। बाइक फिसली, टीचर खाई में गिरा और उसकी जान चली गई। रमाकांत की पत्नी साधना शर्मा अस्पताल में रो रही थी। हर कोई यही सोच रहा था—बेचारी साधना, पति के जाने से टूट गई है।

लेकिन इंस्पेक्टर विनोद को कुछ ठीक नहीं लगा। शरीर पर चोटें असामान्य थीं। बाइक की स्थिति अजीब थी। खाई के पास टायर के निशान, लेकिन रुकने के कोई संकेत नहीं। “कुछ गड़बड़ है,” विनोद ने बुदबुदाया।

3. साधना—एक अधूरी कहानी

रमाकांत और साधना की शादी को सात साल हुए थे। रमाकांत एक सरकारी स्कूल में टीचर था, साधना आंगनबाड़ी में काम करती थी। घर में एक बेटा था, पांच साल का। साधना का चेहरा हमेशा शांत रहता, लेकिन उसकी आँखों में कोई भूली हुई बेचैनी थी।

पेट्रोल पंप के पास उनका घर था। साधना रोज़ पंप से होकर जाती थी। वहाँ मनीष जाटव नाम का युवक काम करता था, उम्र चौबीस साल। साधना और मनीष की मुलाकातें बढ़ती गईं। शुरुआत में बस मुस्कान थी, फिर बातें, फिर दोस्ती और फिर एक ऐसा रिश्ता, जिसने साधना की दुनिया बदल दी।

4. शक की दीवार

रमाकांत को पत्नी पर शक था, लेकिन सबूत नहीं। वह कई बार साधना से पूछता, “किससे बातें करती हो?” साधना टाल जाती। घर में झगड़े बढ़ने लगे। बेटा अक्सर माँ की गोद में रोता, पिता की आँखों में सवाल होते।

साधना को लगने लगा कि उसका पति उसके प्रेम के बीच दीवार बन गया है। उसने मनीष से कहा, “अगर रमाकांत नहीं रहेगा, तो हम आज़ाद हो जाएंगे।”

मनीष ने हामी भरी, लेकिन उसे डर था। “ऐसा करना आसान नहीं है,” उसने कहा। “अगर पकड़े गए तो…”

“पकड़े नहीं जाएंगे,” साधना ने विश्वास दिलाया। “सबकुछ एक्सीडेंट जैसा लगेगा।”

5. साजिश का ताना-बाना

साधना, मनीष और उसके दोस्त सतनाम ने मिलकर एक योजना बनाई। सतनाम को चार लाख रुपए का लालच दिया गया। पैसा रमाकांत के ही बैंक खाते से निकालने का वादा हुआ। सबकुछ तय था।

मनीष ने रमाकांत से दोस्ती बढ़ाई। पेट्रोल पंप पर अक्सर उससे मिलता, चाय पीता, छोटी-छोटी बातें करता। रमाकांत को लगा, मनीष अच्छा लड़का है। “कभी घूमने चलना चाहिए,” मनीष ने एक दिन कहा।

“ठीक है,” रमाकांत ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

6. मौत की रात

26 दिसंबर की शाम थी। मौसम साफ था, हल्की सी ठंडक। मनीष, सतनाम और रमाकांत एक कार में बैठे। “नॉनपुरा घाटी चलते हैं,” मनीष ने कहा। रमाकांत राजी हो गया। तीनों घाटी की तरफ निकल पड़े।

रास्ते में मनीष ने कार रोकी—”टॉयलेट जाना है।” सतनाम भी बाहर निकला। रमाकांत बेखबर था। जैसे ही वह घाटी के किनारे पहुँचा, सतनाम ने पीछे से उसके सिर पर कुल्हाड़ी से वार किया। रमाकांत लड़खड़ा गया। मनीष ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया, तब तक दबाए रखा जब तक उसकी सांसें बंद नहीं हो गईं।

तीनों ने मिलकर उसकी लाश को खाई में फेंक दिया। फिर पेट्रोल पंप लौटे, रमाकांत की बाइक उठाई और उसे भी उसी खाई में फेंक दिया। सब कुछ एक्सीडेंट जैसा दिखाने की कोशिश की गई।

7. एक्टिंग और आंसू

अगली सुबह साधना ने खूब रोना-धोना किया। अस्पताल में पति की लाश के पास बैठकर बिलखती रही। पड़ोसियों ने सहारा दिया, “बहुत बड़ी विपत्ति है।” पुलिस ने मर्ग कायम किया, जांच शुरू की।

साधना ने हर सवाल का जवाब दिया, “पति रात को घूमने गए थे, फिर लौटे ही नहीं।”

मनीष और सतनाम ने भी यही बयान दिया—”हमने रमाकांत को आखिरी बार पेट्रोल पंप पर देखा था।”

8. जांच की परतें

इंस्पेक्टर विनोद ने सीसीटीवी फुटेज खंगाली। उसमें रमाकांत मनीष और सतनाम के साथ देखा गया। कॉल डिटेल्स निकलवाई गईं। साधना के नंबर से मनीष को बार-बार कॉल हुई थी। पैसे की ट्रांजेक्शन भी मिली।

इंस्पेक्टर ने तीनों को हिरासत में लिया। शुरू में साधना ने बहाने बनाए, “मुझे कुछ नहीं पता।” लेकिन जब पुलिस ने सबूत दिखाए, तो साधना टूट गई। उसने सबकुछ कबूल कर लिया।

“मैंने ही अपने प्रेमी मनीष के साथ मिलकर रमाकांत की हत्या की साजिश रची थी। सतनाम को पैसे देने का वादा किया था।”

9. अदालत का दरवाजा

तीनों आरोपी कोर्ट में पेश किए गए। जज ने पूछा—”तुमने ऐसा क्यों किया?”

साधना ने सिर झुका लिया, “मुझे लगता था कि मेरा पति मेरी आज़ादी का दुश्मन है। मैंने गलती की।”

मनीष ने कहा, “मैंने लालच में आकर अपराध किया।”

सतनाम ने कहा, “पैसे की जरूरत थी।”

अदालत ने तीनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। केस की सुनवाई शुरू हुई।

10. गाँव की प्रतिक्रिया

गाँव में हलचल थी। लोग बंट गए—कुछ ने साधना को दोषी ठहराया, कुछ ने उसकी मजबूरी समझी। “औरत पर ज़ुल्म होता है तो वो आवाज़ उठाती है,” किसी ने कहा। “लेकिन हत्या कभी सही नहीं,” किसी ने विरोध किया।

रमाकांत के माता-पिता ने बेटे की तस्वीर पर फूल चढ़ाए। बेटे के लिए न्याय की मांग की। बेटा—पांच साल का—माँ की गोद में बैठा, चुपचाप सब देखता रहा।

11. पुलिस की सीख

इंस्पेक्टर विनोद ने टीम को संबोधित किया—”हर केस में सतर्क रहना जरूरी है। एक्सीडेंट और हत्या में फर्क समझना पड़ता है। अगर हमने सीसीटीवी न देखा होता, तो अपराधी बच जाते।”

जांच टीम को इनाम मिला। केस की मिसाल पूरे जिले में दी जाने लगी।

12. जेल की दीवारों के पीछे

साधना ने जेल की कोठरी में कई रातें काटीं। उसे अफसोस था, लेकिन पछतावा कम था। “अगर समाज ने मुझे समझा होता, तो शायद मैं ये रास्ता नहीं चुनती,” उसने एक महिला कॉन्स्टेबल से कहा।

मनीष और सतनाम भी जेल में थे। पैसे का लालच, एक पल की गलती, अब उम्र भर की सजा बन गई थी।

13. मीडिया की हलचल

अखबारों में हेडलाइन छपी—”प्रेमी ने पत्नी के कहने पर पति की हत्या की।” टीवी चैनलों पर बहस हुई—”क्या प्रेम में अपराध जायज है?” सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी राय दी। कुछ ने सहानुभूति जताई, कुछ ने कड़ी निंदा की।

14. बेटा—मासूम सवाल

रमाकांत का बेटा अब अपने नाना-नानी के पास था। एक दिन उसने पूछा, “माँ कब आएगी?” नानी ने आँसू पोंछे, “माँ से गलती हो गई है बेटा, भगवान से दुआ करो कि उसे माफ़ कर दे।”

15. समाज और सवाल

गाँव में पंचायत बैठी। “औरत की आज़ादी जरूरी है, लेकिन कानून का डर भी जरूरी है।” प्रधानजी ने कहा। “हर रिश्ते में विश्वास होना चाहिए, शक और लालच रिश्तों को मार देते हैं।”

16. अंतिम फैसला

छह महीने बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया—साधना शर्मा को उम्रकैद, मनीष और सतनाम को भी कड़ी सजा। जज ने कहा, “प्रेम में अपराध कभी जायज नहीं। कानून सबके लिए बराबर है।”

17. नई सुबह

गाँव में सूरज फिर निकला। रमाकांत की तस्वीर अब भी घर की दीवार पर थी। बेटा स्कूल जाने लगा। नानी ने उसे समझाया, “गलत रास्ता कभी मत चुनना।”

साधना ने जेल में किताबें पढ़नी शुरू कीं। उसने एक पत्र लिखा—”अगर फिर मौका मिले, तो मैं सच बोलूंगी, झूठ नहीं।”

समाप्त

यह कहानी दिखाती है कि अपराध चाहे जितना भी छुपाया जाए, सच सामने आ ही जाता है। रिश्तों में भरोसा, समाज में न्याय, और इंसानियत की बुनियाद कभी कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।