धर्मेंद्र के अंतिम 24 घंटे: अस्पताल के उस सन्नाटे और उन अनकहे शब्दों की कहानी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया
मुंबई। 25 दिसंबर 2025 की वो तारीख, जब भारतीय सिनेमा के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र की ज़िंदगी की ढलती शाम ने एक पूरे दौर के अंत की मुनादी कर दी। अस्पताल के सफ़ेद गलियारों में मशीनों की ‘बीप’ और परिवार के भारी सन्नाटे के बीच धर्मेंद्र के आखिरी 24 घंटे कैसे गुज़रे? क्या थे उनके वो अंतिम शब्द जिन्हें सुनकर सनी और बॉबी देओल फूट-फूट कर रो पड़े? आइए जानते हैं उस रात की वो भावुक दास्तां, जो कैमरे की चकाचौंध से दूर सिर्फ दर्द और स्मृतियों से बनी थी।
रात 3:00 बजे: आत्मा और शरीर का अनकहा संवाद
अस्पताल के आईसीयू (ICU) के बिस्तर पर लेटे धर्मेंद्र का शरीर थक चुका था, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अब भी सांसों की डोरी को थामे हुए थी। नर्स के अनुसार, रात करीब 3:00 बजे उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वे अतीत के किसी खूबसूरत दृश्य में लौट गए हों।
बेहद धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में उन्होंने नर्स से पूछा— “कितने बजे हैं?” नर्स ने जवाब दिया— “साढ़े तीन।” धर्मेंद्र ने बस इतना कहा— “ठीक है।” मानो उन्हें आभास हो गया था कि अब घड़ियाँ कम बची हैं। वे बार-बार एक ही वाक्य बुदबुदा रहे थे— “सब ठीक हो जाए।” यह दुआ किसके लिए थी? शायद उन दो परिवारों के लिए, जिन्हें उन्होंने ताउम्र अपने मज़बूत कंधों पर संभाला था।
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इंतज़ार की घड़ियाँ और सनी देओल का आगमन
सुबह होते-होते धर्मेंद्र की बेचैनी बढ़ने लगी। वे बार-बार हाथ हिलाकर किसी को पास बुलाना चाहते थे। उनके होंठों पर सिर्फ एक ही नाम था— “सनी आया?” सनी देओल, जो रास्ते में थे, जैसे ही अस्पताल पहुँचे, पूरे माहौल का बोझ बढ़ गया। सालों तक दुनिया के सामने ‘मज़बूत’ दिखने वाला बेटा आज पिता के बिस्तर के पास डगमगाते क़दमों से खड़ा था।
सनी ने पिता का हाथ थामा और कहा— “पापा, मैं यहीं हूँ।” यह सुनते ही धर्मेंद्र के चेहरे पर एक राहत की लकीर उभर आई। उन्होंने अपनी बची-कुची ताक़त से बेटे का हाथ दबाया। उस एक स्पर्श में पूरी उम्र की यादें, प्यार और शायद एक अधूरी माफ़ी भी समाई हुई थी।
दो परिवार, एक सन्नाटा और हेमा मालिनी का दर्द
अस्पताल के बाहर की दुनिया दो हिस्सों में बँटी थी। एक तरफ जूहू का घर था जहाँ सनी और बॉबी थे, तो दूसरी तरफ ओशिवारा में हेमा मालिनी अपने घर की खिड़की पर खड़ी चाँद को देख रही थीं। वह जानती थीं कि धर्मेंद्र के इन आखिरी पलों में वे वहाँ मौजूद नहीं हो सकतीं। उनके हिस्से में सिर्फ इंतज़ार और प्रार्थना थी।
रिश्तों के इस पेचीदा ताने-बाने ने धर्मेंद्र को जीवन भर मानसिक संघर्ष में रखा था। आखिरी 24 घंटों में भी उनके चेहरे पर वह ‘गिल्ट’ (पछतावा) साफ दिख रहा था कि वे शायद किसी को पूरी तरह खुश नहीं रख पाए।

दोपहर का वो आख़िरी संदेश: “ख्याल रखना”
दोपहर के समय डॉक्टरों ने इशारा कर दिया कि समय बहुत कम बचा है। सनी और बॉबी दोनों पिता के पास बैठ गए। धर्मेंद्र ने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं, अपने दोनों बेटों को देखा और बस दो शब्द कहे— “ख्याल रखना।”
यह एक पिता की वसीयत थी, एक ज़िम्मेदारी थी, जो उन्होंने अपने बेटों को सौंपी थी। इसके बाद वे धीरे-धीरे गहरी धुंध में खोने लगे। मशीनों पर बदलते आंकड़े अब स्थिर होने लगे थे।
शाम की विदाई: “ही इज़ गॉन”
शाम ढलते-ढलते धर्मेंद्र की सांसें भारी हो गईं। सनी ने पिता का एक हाथ थामा था और बॉबी ने दूसरा। मशीनों की ‘बीप’ अचानक एक लंबी आवाज़ में बदल गई। डॉक्टर ने नब्ज़ टटोली और बेहद शांत आवाज़ में कहा— “ही इज़ गॉन।” उस पल, भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा चमकता सितारा हमेशा के लिए बुझ गया। जूहू से लेकर पंजाब के साहनेवाल तक, हर आँख नम थी।
अंतिम यात्रा: जब बेटियाँ बनीं संबल
धर्मेंद्र की अंतिम यात्रा में एक ऐसा दृश्य दिखा जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। जहाँ समाज बेटों की बात करता है, वहीं धर्मेंद्र की विदाई में उनकी बेटियों— ईशा और अहाना—ने आगे बढ़कर ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। यह दृश्य उस प्यार की मिसाल था जो रस्मों और रिवाजों से बड़ा होता है।
अंतिम संस्कार के समय अमित शाह जैसी हस्तियाँ भी मौजूद रहीं, जिन्होंने कहा कि “धर्मेंद्र सिर्फ कलाकार नहीं, भारत की मिट्टी की खुशबू थे।”
निष्कर्ष: एक युग का समापन
धर्मेंद्र के आखिरी 24 घंटे उनकी पूरी ज़िंदगी का एक छोटा सा सारांश थे—प्यार, संघर्ष, परिवार की एकजुटता की तड़प और अंत में एक गहरा सुकून। उन्होंने अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी और जाते-जाते भी अपने बेटों के हाथ थामकर यह यकीन दिलाया कि ‘गरम धरम’ की विरासत अब सुरक्षित हाथों में है।
(नोट: यह कहानी रचनात्मक प्रस्तुति और भावनात्मक कथानक पर आधारित है, इसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।)
मैं आपके लिए आगे क्या कर सकता हूँ? क्या आप धर्मेंद्र के फिल्मी सफर के सबसे यादगार लम्हों या उनके द्वारा लिखे गए कुछ अनकहे पत्रों पर आधारित एक विशेष लेख चाहेंगे?
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