बेटा DM बनकर लौटा, तो सड़क किनारे भीख मांग रहे थे बूढ़े माँ-बाप: एक ऐसी कहानी जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया

प्रस्तावना: सफलता की चमक और रिश्तों का अंधेरा कहते हैं कि वक्त के पास हर सवाल का जवाब होता है, लेकिन कभी-कभी वक्त ऐसे जवाब देता है कि सुनने वाले की रूह कांप जाती है। यह कहानी आकाश की है, जो एक गरीब किसान का बेटा था। उसने अपनी मेहनत और माँ-बाप के पसीने की कमाई से विदेश में पढ़ाई की और भारत का एक प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी (DM) बनकर लौटा। लेकिन जब वह अपने शहर पहुँचा, तो उसे जो दिखा, उसने “सफलता” शब्द के मायने ही बदल दिए।

अध्याय 1: 4 साल की तपस्या और वह सुनहरी सुबह

आकाश के लिए पिछले 4 साल किसी युद्ध से कम नहीं थे। विदेश की धरती पर दिन-रात पढ़ाई करना और एक ही सपना देखना—कि एक दिन वह अपने माँ-बाप को गरीबी के दलदल से बाहर निकालेगा। उसके पिता, मोहन सिंह ने फटे कपड़ों में रहकर बेटे की फीस भरी थी। माँ, मीना देवी ने अपनी आखिरी सोने की चूड़ी तक बेच दी थी ताकि बेटा बड़ा अफसर बन सके।

जब आकाश ने डीएम (District Magistrate) की कुर्सी हासिल की, तो उसकी पहली इच्छा थी कि वह बिना बताए अपने गाँव जाए और अपने माँ-बाप को वह सरप्राइज दे, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। वह सरकारी तामझाम के बिना, एक साधारण टैक्सी में बैठकर अपने गाँव की ओर निकल पड़ा।.

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अध्याय 2: मंदिर की सीढ़ियाँ और वह कांपता हुआ हाथ

रास्ते में एक पुराने मंदिर के पास टैक्सी रुकी। आकाश खिड़की से बाहर देख रहा था। मंदिर की सीढ़ियों पर लाचार और बुजुर्गों की एक कतार बैठी थी। तभी उसकी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, कपड़े चिथड़े थे और वह हाथ फैलाकर आने-जाने वालों से एक-एक सिक्के की भीख मांग रहा था।

आकाश का दिल अचानक जोर से धड़कने लगा। कुछ तो था उस चेहरे में… वह टैक्सी से उतरा और कांपते कदमों से उस बुजुर्ग की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे दूरी कम हुई, आकाश की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह भिखारी कोई और नहीं, उसके अपने पिता मोहन सिंह थे।

“पिताजी?” आकाश की आवाज गले में ही फंस गई। जब मोहन सिंह ने अपनी धुंधली आँखों से अपने बेटे को देखा, तो उनके हाथ से वह भीख का कटोरा गिर गया। आसपास के लोग हैरान थे कि एक सूट-बूट में सजे साहब एक भिखारी के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रो रहे थे।

अध्याय 3: “बेटा, अब वह घर हमारा नहीं रहा”

आकाश ने जब अपने पिता को संभाला और माँ के बारे में पूछा, तो पिता की खामोशी ने उसे अंदर तक चीर दिया। मोहन सिंह ने रोते हुए बताया, “बेटा, तेरे जाने के बाद सब बदल गया। बहू ने हमें बोझ समझ लिया। पहले हमें बरामदे में सुलाया गया, फिर दो वक्त की रोटी के लिए ताने दिए गए और एक दिन… हमें घर से बाहर निकाल दिया गया।”

आकाश के लिए यह विश्वासघात असहनीय था। वह जिसे अपनी पत्नी और जीवनसाथी मानता था, उसने उसके उन माँ-बाप को सड़क पर छोड़ दिया था जिन्होंने इस घर की एक-एक ईंट अपने खून से सींची थी।

अध्याय 4: झुग्गी की वह बदबू और माँ की ममता

आकाश अपने पिता के साथ शहर के एक कोने में बनी एक छोटी सी झुग्गी में पहुँचा। वहाँ एक फटी हुई त्रिपाल के नीचे उसकी माँ लेटी हुई थी। गरीबी और बीमारी ने उन्हें इतना कमजोर कर दिया था कि वे ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थीं।

जब मीना देवी ने अपने बेटे को देखा, तो उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, तू आ गया, बस अब मुझे कोई गम नहीं।” माँ की इस सादगी और ममता ने आकाश को अंदर से तोड़ दिया। उसने महसूस किया कि वह दुनिया के लिए एक बड़ा अफसर हो सकता है, लेकिन एक बेटे के रूप में वह पूरी तरह असफल रहा था।

अध्याय 5: एक डीएम का इंसाफ और कानून का प्रहार

आकाश ने अब अपने आँसू पोंछ लिए थे। अब वह केवल एक बेटा नहीं था, वह एक “प्रशासक” था। उसने अपने माँ-बाप को एक सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया और फिर अपने उसी घर पहुँचा जहाँ उसकी पत्नी और ससुराल वाले चैन की जिंदगी जी रहे थे।

आकाश ने सीधे टकराव के बजाय कानून का सहारा लिया। उसने अपनी पत्नी के झूठ का पर्दाफाश किया। जब उसकी पत्नी ने माफी मांगी और माँ-बाप को वापस लाने का वादा किया, तो आकाश ने बहुत ही शांत लहजे में कहा:

“रिश्ते माफी से नहीं, भरोसे से चलते हैं। तुमने सिर्फ मेरे माँ-बाप को नहीं निकाला, तुमने मेरी इंसानियत का कत्ल किया है। अब यह घर तुम्हारा नहीं, उनका है जिन्हें तुमने फुटपाथ पर छोड़ दिया था।”

मामला अदालत पहुँचा। आकाश ने अपनी पावर का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि सच को सामने रखा। कोर्ट ने भी माना कि बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार “अमानवीय” है। आकाश ने अपनी पत्नी से तलाक लिया और अपने माँ-बाप के लिए एक नया आशियाना बनाया।

अध्याय 6: निष्कर्ष – सफलता की असली परिभाषा क्या है?

आकाश की यह कहानी आज के आधुनिक समाज के लिए एक आईना है। हम ऊंचे पदों पर पहुँच जाते हैं, बड़ी गाड़ियाँ खरीद लेते हैं, लेकिन अगर हमारे घर के बुजुर्ग खुश नहीं हैं, तो वह सारी सफलता मिट्टी के समान है।

लेखक का संदेश: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि माँ-बाप खुदा का दूसरा रूप होते हैं। उन्हें वृद्धाश्रम या सड़कों पर छोड़ना सबसे बड़ा पाप है। अगर आपके माँ-बाप आपके पास हैं, तो उनकी कद्र कीजिए। दुनिया का हर पद और पैसा वापस मिल सकता है, लेकिन माँ-बाप की दुआएं और उनका साया दोबारा नहीं मिलता।

आकाश अब एक सफल डीएम है, लेकिन वह खुद को सबसे बड़ा सौभाग्यशाली तब मानता है जब वह शाम को घर लौटता है और अपनी माँ के हाथों की बनी चाय पीता है।


संपादन नोट: यह लेख समाज में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता के खिलाफ एक आवाज है।