दो औरतों ने मजदूर के साथ किया करनामा/पोल खुली तो पुलिस के भी होश उड़ गए/

.
.

शिवराजपुर का खुशहाल परिवार और अकेलेपन की शुरुआत

मेरठ के पास बसा शिवराजपुर गाँव अपनी उपजाऊ भूमि के लिए जाना जाता था। इसी गाँव में रविंद्र सिंह नाम के एक प्रतिष्ठित किसान रहते थे। रविंद्र सिंह के पास 14 एकड़ उपजाऊ जमीन थी, जहाँ वे जी-तोड़ मेहनत करते थे। उनकी ईमानदारी और मेहनत की मिसाल पूरे गाँव में दी जाती थी। रविंद्र सिंह का एक ही बेटा था, पवन

पवन की शादी चार साल पहले अलका नाम की युवती से हुई थी। अलका सुंदर थी और शुरुआत में घर के कामों में हाथ बटाती थी। लेकिन पवन अपनी आर्थिक स्थिति को और बेहतर करने के लिए छह महीने पहले विदेश चला गया। पवन के जाने के बाद घर में केवल रविंद्र सिंह और अलका ही रह गए। रविंद्र सिंह दिन भर खेतों में व्यस्त रहते, और अलका घर में बिल्कुल अकेली पड़ जाती।

यही अकेलापन अलका के मन में नकारात्मक विचार पैदा करने लगा। उसे अपने पति की कमी खलने लगी और वह किसी ऐसे साथी की तलाश करने लगी जो उसके अकेलेपन को दूर कर सके।


फ्रिज का बहाना और बृजपाल की एंट्री

अलका की नजर अक्सर पड़ोस में रहने वाले एक मजदूर राहुल पर पड़ती थी। राहुल एक कारखाने में काम करता था और काफी मेहनती था। अलका चाहती थी कि राहुल उसके करीब आए, लेकिन रविंद्र सिंह ने कभी किसी बाहरी मजदूर को घर में टिकने नहीं दिया।

एक दिन अलका ने एक चाल चली। उसने अपने ससुर रविंद्र से कहा कि घर का फ्रिज खराब हो गया है। रविंद्र ने तुरंत गाँव के ही एक नौजवान मिस्त्री बृजपाल को फोन किया। बृजपाल दिखने में आकर्षक था और उसका स्वभाव थोड़ा रंगीन मिजाज का था।

जब बृजपाल फ्रिज ठीक करने आया, तो रविंद्र खेतों पर थे। अलका ने फ्रिज ठीक होने के बाद बृजपाल को तय मजदूरी से कहीं ज्यादा पैसे दिए। जब बृजपाल ने पूछा कि ये पैसे ज्यादा क्यों हैं, तो अलका ने अपनी मंशा साफ कर दी। उसने बृजपाल को अपने अकेलेपन के बारे में बताया और उसे रात के समय घर आने का न्यौता दिया। बृजपाल, जो पहले से ही ऐसी मौकों की तलाश में रहता था, तुरंत राजी हो गया।


दो औरतों का गठबंधन: अलका और निर्मला

अलका और बृजपाल का मेल-जोल बढ़ने लगा। लेकिन यह राज ज्यादा समय तक अलका तक ही सीमित नहीं रहा। उसकी एक पड़ोसन, निर्मला, जो एक विधवा थी, उसे अलका की गतिविधियों पर शक हुआ। एक दिन निर्मला ने अलका को रंगे हाथों पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अलका ने चतुराई से निर्मला को भी अपनी इस गुप्त दुनिया का हिस्सा बना लिया।

निर्मला ने स्वीकार किया कि वह भी अकेली है और उसे भी एक साथी की जरूरत है। अब ये दोनों औरतें मिलकर बृजपाल के साथ वक्त गुजारने लगीं। वे बृजपाल को पैसे देती थीं और बदले में वह उनकी इच्छाएं पूरी करता था। यह सिलसिला कुछ समय तक चुपचाप चलता रहा।


भंडाफोड़ और ससुर की चेतावनी

गाँव छोटा था और बातें छिपती नहीं हैं। रविंद्र सिंह को धीरे-धीरे गाँव वालों की कानाफूसी से पता चला कि उनके घर में किसी गैर मर्द का आना-जाना है। एक शाम रविंद्र ने बृजपाल को अपने घर के आसपास मंडराते देखा। रविंद्र ने आव देखा न ताव, बृजपाल को पकड़ लिया और उसे जान से मारने की धमकी दी।

रविंद्र ने गरजते हुए कहा, “अगर दोबारा मेरे घर के आसपास दिखे, तो जिंदा नहीं बचोगे!” बृजपाल डर के मारे कांपने लगा और उसने अलका और निर्मला के फोन उठाना बंद कर दिए।


मजदूर राहुल: एक नया निशाना

बृजपाल के जाने के बाद अलका और निर्मला बेचैन हो गईं। उन्होंने अब राहुल (मजदूर) को अपना शिकार बनाने की योजना बनाई। निर्मला ने राहुल को लालच दिया कि वह उसे अपने खेतों में मजदूरी के लिए ज्यादा पैसे देगी। राहुल, जो गरीब था और कारखाने में कम कमाता था, निर्मला की बातों में आ गया।

करीब 15 दिनों तक राहुल ने निर्मला के खेतों में काम किया। 15 जनवरी 2026 की रात, निर्मला ने राहुल को एक जरूरी काम के बहाने अपने घर बुलाया। राहुल जैसे ही पहुँचा, निर्मला ने उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। उसने धमकी दी कि अगर वह उसकी बात नहीं मानेगा, तो वह चिल्लाकर शोर मचा देगी और गाँव वालों को बताएगी कि राहुल ने उसके साथ बदतमीजी की है।

डरा हुआ राहुल बेबस हो गया। उसी समय निर्मला ने अलका को भी फोन करके बुला लिया।


खूनी रात और पुलिस का छापा

उधर, रविंद्र सिंह को अपनी बहू अलका पर पहले से ही शक था। उस रात जब उन्होंने अलका को चुपके से घर से निकलते देखा, तो उनका खून खौल उठा। रविंद्र ने अपनी बैठक से एक गंडासी (तेजधार हथियार) उठाई और चुपके से अलका के पीछे चल दिए।

रविंद्र ने देखा कि अलका, निर्मला के घर के अंदर गई है। उन्होंने खिड़की से अंदर जो देखा, उसे देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। अलका, निर्मला और वह मजदूर राहुल आपत्तिजनक स्थिति में थे। गुस्से से पागल रविंद्र ने दरवाजा तोड़ दिया और अंदर घुस गए।

रविंद्र ने सीधे राहुल पर गंडासी से हमला कर दिया। राहुल को संभलने का मौका भी नहीं मिला और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। दोनों औरतें चीखती-चिल्लाती घर से बाहर भागीं। शोर सुनकर गाँव वाले इकट्ठा हो गए और पुलिस को सूचना दी गई।

मेरठ पुलिस जब मौके पर पहुँची, तो राहुल की लाश खून से लथपथ पड़ी थी और रविंद्र हाथ में हथियार लिए शांत बैठे थे।


पुलिस के होश उड़ गए

जब पुलिस ने रविंद्र सिंह, अलका और निर्मला को गिरफ्तार कर पूछताछ की, तो परतें खुलने लगीं। पुलिस यह जानकर हैरान थी कि कैसे दो महिलाओं ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए एक निर्दोष मजदूर को फंसाया और अंत में एक ससुर ने गुस्से में आकर कानून अपने हाथ में ले लिया।

जांच में पता चला कि राहुल बिल्कुल निर्दोष था; उसे तो जबरदस्ती और ब्लैकमेल करके उस स्थिति में लाया गया था। रविंद्र सिंह को हत्या के आरोप में और दोनों महिलाओं को उकसाने और अनैतिक गतिविधियों के आरोप में जेल भेज दिया गया।


निष्कर्ष और सामाजिक संदेश

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे अकेलापन और नैतिकता का पतन किसी का जीवन तबाह कर सकता है। रविंद्र सिंह का गुस्सा शायद जायज था, लेकिन कानून हाथ में लेने से एक निर्दोष की जान गई और उनका अपना परिवार बिखर गया।

क्या आपको लगता है कि रविंद्र सिंह को उस समय पुलिस को बुलाना चाहिए था बजाय खुद सजा देने के?