पुलिस वाले ने की आर्मी ऑफिसर के साथ बदतमीजी! फिर DM ने बीच सड़क पर जो किया…

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पुलिस वाले ने आर्मी ऑफिसर से की बदतमीज़ी… फिर DM ने बीच सड़क पर जो किया, वो इतिहास बन गया

उत्तर प्रदेश के उस पिछड़े इलाके में सूरज जैसे आग उगल रहा था।
हवा में धूल तैर रही थी और सड़क इतनी सुनसान थी कि अगर कोई चीख भी दे, तो उसकी आवाज़ खुद उसी के कानों में लौट आए।

उसी वीरान सड़क के बीचों-बीच एक पुलिस चेक पोस्ट खड़ी थी।

पर सच कहें तो वो चेक पोस्ट नहीं थी—
वो लूट का अड्डा था।


अध्याय 1: वर्दी के पीछे छिपा दरिंदा

इंस्पेक्टर पवार सिंह अपनी जीप के बोनट पर पैर रखे बैठा था।
हाथ में मोटा डंडा।
आंखों में लालच।
चेहरे पर घमंड।

वो हर गुजरने वाले को ऐसे देखता था जैसे शिकारी अपने शिकार को देखता है।

रिक्शेवाले, सब्जीवाले, मजदूर—
सब उसके लिए सिर्फ़ पैसे की मशीन थे।

“ए बुड्ढे!”
उसने एक बुज़ुर्ग सब्जीवाले को लात मारते हुए कहा,
“100 का नोट निकाल… वरना तेरी रेहड़ी यहीं ज़ब्त कर लूंगा!”

बूढ़े की आंखों में आंसू थे।

“साहब… आज तो बोहनी भी नहीं हुई…”

पवार सिंह हंसा।
“यहाँ पवार का राज चलता है।”


अध्याय 2: बुलेट की गूंज

दूर से अचानक एक आवाज़ गूंजी—

डुक… डुक… डुक…

रॉयल एनफील्ड बुलेट।

पवार सिंह सीधा बैठ गया।

“आज कोई बड़ा शिकार आ रहा है,”
उसने अपने हवलदार से कहा।

बैरिकेड लगा दिया गया।


अध्याय 3: मेजर काव्या सिंह

बुलेट पर सवार थी—

मेजर काव्या सिंह।

भारतीय सेना की जांबाज़ ऑफिसर।

कंधों पर सितारे।
चेहरे पर फौजी सख़्ती।
आंखों में डर नहीं—पर आज दिल में बेचैनी थी।

अभी-अभी उसे फोन आया था—

मां को हार्ट अटैक।
गांव में अकेली।
एम्बुलेंस आने में घंटों।

काव्या को अपनी मां को खुद अस्पताल ले जाना था।

उसने सोचा—
आर्मी यूनिफॉर्म में हूं, रास्ता मिल जाएगा।

वो गलत थी।


अध्याय 4: पहली बदतमीज़ी

पवार सिंह ने डंडा दिखाया।

“रुको!”

काव्या ने बुलेट रोकी।

“जय हिंद, इंस्पेक्टर साहब,”
उसने अदब से कहा,
“इमरजेंसी है, जाने दीजिए।”

पवार सिंह की निगाह बदल गई।

उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा—
और उसकी नीयत डोल गई।

“कहाँ उड़ रही हो मैडम?”
“हेलमेट कहाँ है?”
“ये सड़क तेरे बाप की है?”

काव्या ने संयम रखा।

“मैं आर्मी ऑफिसर हूं।
मेरी मां गंभीर है।”


अध्याय 5: हवस का ज़हर

पवार सिंह हंसा।

“आर्मी ऑफिसर?
यहाँ सिर्फ पवार का कानून चलता है।”

उसने आईडी कार्ड छीना, बिना देखे जेब में डाल लिया।

“तलाशी होगी…
गाड़ी की भी…
और तुम्हारी भी।”

उस शब्द में गंदगी थी।

काव्या समझ गई—
ये आदमी वर्दी में दरिंदा है।


अध्याय 6: वो थप्पड़

काव्या टूट गई।

“पैसे चाहिए?”
उसने पर्स निकाला।

पवार सिंह और करीब आया।

“पैसे नहीं चाहिए…”
“कुछ और चाहिए…”

उसने जो कहा—
वो किसी भी औरत की रूह कंपा दे।

और तभी—

चटाक!

काव्या का थप्पड़।

सन्नाटा।


अध्याय 7: बदला

पवार सिंह की आंखों में अब हवस नहीं—
दरिंदगी थी।

“अब तू यहीं रहेगी।”

उसने पिस्तौल निकाल ली।

फिर पेट्रोल।

और—

बुलेट आग में जल गई।

काव्या की चीख निकल गई।

वो बुलेट नहीं थी—
उसका भरोसा था।


अध्याय 8: आखिरी उम्मीद

घुटनों पर बैठी काव्या ने चुपचाप फोन निकाला।

डायल किया—

DM राघवेंद्र प्रताप सिंह।

“मेरी मां…
मेरी गाड़ी जला दी गई…
मुझे छेड़ा गया…”

फोन कट गया।


अध्याय 9: सत्ता का आगमन

दस मिनट।

सायरन।

सरकारी काफिला।

DM।
DSP।

पवार सिंह कांप गया।


अध्याय 10: सड़क पर इंसाफ

DSP ने देखा—
जली हुई बुलेट।
कालिख लगी वर्दी।

और—

तमाचा।

“शर्म आती है।”

“ये गलती नहीं—
देशद्रोह है।”


अध्याय 11: वर्दी उतर गई

सबके सामने—

पवार सिंह की वर्दी उतरवाई गई।

हथकड़ी।

गिरफ्तारी।


अध्याय 12: सम्मान की वापसी

DM ने कहा—

“आपकी मां सुरक्षित हैं।”

काव्या की आंखों से आंसू गिरे।


अंतिम संदेश

उस सड़क ने दो वर्दियां देखीं—

एक जिसने शर्मसार किया।
एक जिसने देश का मान बढ़ाया।

न्याय देर से आता है—
लेकिन आता ज़रूर है।