परदेस की कमाई, अपनों की कीमत
क्या आपने कभी सोचा है कि जो इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी अपनों की खुशियों के लिए जला देता है, उसे आख़िर में क्या मिलता है?
यह कहानी है सुलेमान की।
सुलेमान ने अपने जीवन के बीस साल ओमान की तपती धूप में गुज़ार दिए। सीमेंट की बोरियां उठाते हुए, लोहे की छड़ें मोड़ते हुए, उसने हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा खत्म किया—सिर्फ इसलिए ताकि नूरपुर गांव में उसका परिवार सुकून की ज़िंदगी जी सके।
मस्कट इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जब वह अपना पुराना, घिसा हुआ सूटकेस लिए खड़ा था, उसके हाथ कांप रहे थे। यह वही सुलेमान नहीं था जो बीस साल पहले चौड़ा सीना और सपनों से भरी आंखें लेकर परदेस गया था। अब उसकी पीठ झुक चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियां थीं और शरीर बीमारियों से टूटा हुआ था।
उसने अपनी जवानी परिवार के नाम लिख दी थी।
हर महीने की पहली तारीख को वह अपनी पूरी तनख्वाह घर भेज देता। खुद के लिए सिर्फ उतना रखता जितना ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी हो। कभी बहन की शादी, कभी भाई की पढ़ाई, कभी घर की छत—हर ज़रूरत पर सुलेमान चुपचाप और ज़्यादा काम करने लगता।
वह सोचता था,
“जब लौटूंगा तो ये सब मेरी ढाल बनेंगे।”

लेकिन जब वह बीमार, थका और खाली हाथ अपने गांव लौटा, तो स्वागत में फूल नहीं—सन्नाटा था।
नूरपुर की गलियों में वही धूल उड़ रही थी, मगर अब सुलेमान की सांसें भारी थीं। जिस घर की एक-एक ईंट उसने अपने खून-पसीने से खड़ी की थी, वहां उसके लिए सिर्फ एक पुरानी खटिया बची थी—बरामदे के कोने में।
भाई बासित की नजरों में सवाल था—
“क्या लाए हो?”
सुलेमान कुछ नहीं लाया था।
ना सोने की चेन, ना विदेशी घड़ियां।
वह लाया था तो सिर्फ एक बीमार शरीर और उम्मीदों का बोझ।
मां बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। बहनें जिनकी शादियों में उसने अपनी नींदें बेच दी थीं, अब उससे दूरी रखने लगीं। जो भाई उसकी कमाई पर पला, वही अब उसे बोझ समझने लगा।
उसे खाना तब मिलता जब सब खा चुके होते।
डॉक्टर के पैसे नहीं थे, मगर भाई के पास नई मोटरसाइकिल थी।
तब सुलेमान को समझ आया—
उसने दूसरों के महलों के लिए अपनी झोपड़ी भी गिरवी रख दी थी।
एक रात वह चांद को देखता रहा और सोचता रहा—
परदेस में अकेला था, मगर आत्मसम्मान था।
यहां अपनों के बीच रहकर भी वह सबसे ज़्यादा अकेला था।
फिर एक दिन बासित ने कह दिया—
“भाई, घर में जगह कम है। किसी आश्रम चले जाइए।”
यहीं कहानी ने मोड़ लिया।
सुलेमान को याद आया—
घर और ज़मीन के कागज़ आज भी उसके नाम थे।
सरपंच के सामने जब सच्चाई खुली, तो वही लोग जो उसे बोझ समझते थे, अचानक झुकने लगे। प्यार लौट आया—लेकिन वह प्यार नहीं था, वह डर था।
सुलेमान ने घर किसी के नाम नहीं किया।
पर उसने खुद को भीख पर जीने से बचा लिया।
आज वह उसी आलीशान घर के एक कोने में रहता है।
परिवार उसके पास है,
मगर सुकून नहीं।
वह नूरपुर का सबसे अमीर गरीब इंसान है—
जिसने सब कुछ कमाया,
सिवाय अपनापन के।
सुलेमान की कहानी सिर्फ उसकी नहीं है।
यह उन लाखों परदेशी मजदूरों की सच्चाई है जो सोचते हैं कि पैसा सब कुछ है।
घर बन सकते हैं,
लेकिन दिलों की गारंटी कोई नहीं देता।
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