Bude Sasur Par Kiya Uski Zalim Bahu Ne Zulm Aur Bahu Per Aaya Allah ka Dardnak Azaab

“नेक बुजुर्ग की इबादत और जालिम बहू – एक इबरतनाक दास्तान”

भूमिका:

यह कहानी एक छोटे से गांव के नेक बुजुर्ग अब्दुल्ला की है, जिसकी पूरी उम्र अल्लाह की इबादत और मेहनत में गुजर गई। बचपन में ही मां-बाप का साया सिर से उठ गया, लेकिन अल्लाह ने उसे अपनी रहमत से नवाजा। अब्दुल्ला ने मेहनत करके फलों का बाग लगाया, खुद अपने हाथों से काम किया और अपने घर को सुन्नत के मुताबिक संभाला। उसकी जिंदगी में खुशियां थीं, मगर वक्त ने ऐसा खेल खेला कि बुढ़ापे में उसे अपनी ही बहू के हाथों जिल्लत और जुल्म सहना पड़ा।

अब्दुल्ला का संघर्ष और शादी:

अब्दुल्ला अपनी मेहनत और इबादत से खुश रहता था। लोगों ने सलाह दी कि शादी कर लो, घर में बरकत आएगी। उसने एक नेक लड़की से शादी की, दोनों मिलकर अल्लाह की इबादत करते, खुश रहते। दो साल बाद अल्लाह ने उन्हें बेटे की नेमत दी। मगर शादी के कुछ साल बाद बीवी बीमार पड़ गई और अल्लाह को प्यारी हो गई। अब्दुल्ला ने बेटे की परवरिश खुद की, उसे मां की कमी कभी महसूस नहीं होने दी।

बेटे की शादी और बहू का असली चेहरा:

समय बीता, बेटा जवान हुआ। अब्दुल्ला ने उसकी शादी कर दी और खुद इबादत में लग गया। बेटा बाहर खेतों में काम करता, बहू घर संभालती। कुछ दिन सब ठीक चला, मगर बहू का असली चेहरा जल्दी ही सामने आ गया। वह अब्दुल्ला से घर के सारे काम करवाती, बर्तन धुलवाती, झाड़ू-पोछा करवाती, दिन-रात गालियां देती। इबादत करने पर ताने मारती, तस्बीह और जाए नमाज छीनकर फेंक देती।

अब्दुल्ला सब चुपचाप सहता रहा, बेटे को कुछ नहीं बताया ताकि उसका घर बर्बाद न हो। बहू हर दिन जुल्म करती, बीमारी में भी काम करवाती, दवाइयां फेंक देती। बुढ़ापे और कमजोरी के बावजूद वह अल्लाह की इबादत करता रहा।

जुल्म की इंतहा और घर छोड़ना:

एक दिन बहू ने हद कर दी। अब्दुल्ला को काम करते-करते चक्कर आया, वह बर्तन के ऊपर गिर गया। बहू ने जूते से ठोकर मारी, मगर वह उठ नहीं सके। बेटा आया तो बहू ने झूठ बोल दिया। हकीम ने आराम की सलाह दी, मगर बहू फिर भी जुल्म करती रही।

अब्दुल्ला ने अल्लाह से फरियाद की, रात भर रोता रहा। अंत में घर छोड़ने का फैसला किया। तस्बीह, कुरान लेकर जंगल की तरफ निकल पड़ा। वहां एक बच्चे को सांप ने काट लिया था। अब्दुल्ला ने अल्लाह का नाम लेकर इलाज किया, बच्चा ठीक हो गया। उसके इल्म और नेकदिली की वजह से एक आदमी ने अपने घर में रहने की दावत दी।

नई जगह पर इज्जत और बरकत:

अब्दुल्ला ने उस आदमी के घर में इबादत शुरू की। उसकी बहन भी बहुत नेक थी, अल्लाह की तालीम सीखने लगी। अब्दुल्ला के आने से घर और बाग में बरकत आ गई। लोग इलाज के लिए आने लगे, उसकी इज्जत हर जगह होने लगी। मगर उसे अपने बेटे की याद आती थी।

उधर, बेटे की जिंदगी मुश्किल हो गई। बहू ने असली रंग दिखाना शुरू कर दिया, ताने मारती, खाना ठीक से नहीं देती। घर में रौनक खत्म हो गई, फसलें बर्बाद हो गईं। बेटे को एहसास हुआ कि बाप की इबादत से ही घर में बरकत थी।

बाप-बेटे का मिलन:

एक दिन बेटे ने फलों का व्यापार करते हुए उस इलाके में अब्दुल्ला को देख लिया। दोनों गले लगकर खूब रोए। बेटे ने कहा कि घर आपके बिना कब्रिस्तान जैसा है। अब्दुल्ला बेटे के साथ घर लौट आया। बहू खुश नहीं थी, मगर बेटा जिद पर था कि बाप को साथ रखेगा।

शुरू में बहू ने दिखावे के लिए अच्छा व्यवहार किया, मगर कुछ ही दिन में फिर जुल्म शुरू कर दिया। अब्दुल्ला को फिर से काम पर लगा दिया, इबादत करने नहीं देती थी। ठंड में बर्तन धुलवाती, कपड़े साफ करवाती, तस्बीह छीनती, कुरान पाक फेंक देती।

इबरतनाक अंजाम:

एक दिन बहू ने हद पार कर दी। कुरान पाक को घर से बाहर फेंकने लगी। तभी उसके हाथ-पांव टेढ़े हो गए, चेहरा बिगड़ गया और वह कुतिया बन गई। बेटे ने सब देखा, बहू को घर से निकाल दिया। लोग उस पर लानत करने लगे, जंगल में जानवरों ने उसे नोच डाला। वह औरत पूरे इलाके के लिए इबरत बन गई।

नई शुरुआत और बरकत:

अब्दुल्ला ने उस नेक लड़की से बेटे का निकाह करवा दिया। बहू ने घर में जामिया खोल लिया, बच्चे कुरान पढ़ने लगे। अब्दुल्ला को बहू के रूप में बेटी मिल गई थी। घर फिर से बरकत और खुशियों से भर गया।

सबक और संदेश:

इस कहानी से हमें यह सबक मिलता है कि बुजुर्गों की इज्जत करो, अल्लाह की इबादत से कभी चिढ़ मत करो। जुल्म करने वालों का अंजाम हमेशा बुरा होता है। नेकदिली, इबादत और बुजुर्गों की दुआओं से ही घर में बरकत आती है।

प्यारे दोस्तों, यह इबरतनाक कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो जरूर शेयर करें। अपनी राय कमेंट में लिखें और लाइक करें ताकि हर घर में बुजुर्गों की इज्जत हो, और जालिम बहुओं को इबरत मिले।

जय हिंद, सलाम, और अल्लाह की रहमत सब पर बरसे।