प्रेमिका ने प्रेमी को खेत में बुलाया और कर दिया कां#ड/पुलिस के भी होश उड़ गए/

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प्रयागराज के आराकला गांव में दोहरी हत्या: शोषण, प्रतिशोध और कानून के कटघरे में दो बहनें

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। संगम नगरी के नाम से प्रसिद्ध प्रयागराज के एक छोटे से गांव आराकला में घटी एक दर्दनाक और सनसनीखेज घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। यह मामला केवल दो युवकों की हत्या का नहीं है, बल्कि यह विश्वासघात, शोषण, सामाजिक दबाव, महिलाओं की असुरक्षा और कानून के दायरे में न्याय की जटिलताओं से जुड़ा हुआ है। इस घटना के केंद्र में हैं दो सगी बहनें—निशा और किरण—और गांव का एक युवक आकाश, जिसके साथ जुड़ी घटनाओं ने अंततः एक खूनी अंजाम ले लिया।

गरीब परिवार, बड़ी जिम्मेदारियां

आराकला गांव में रहने वाले कर्नल सिंह (बदला हुआ नाम) एक मेहनतकश मजदूर हैं। वर्षों पहले पत्नी के निधन के बाद उन्होंने अपनी दो बेटियों—निशा (22) और किरण (20)—को अकेले पाला। खेतों में मजदूरी कर वे किसी तरह परिवार का गुजारा चलाते थे। उनकी सबसे बड़ी चिंता थी बेटियों की पढ़ाई और भविष्य में उनकी शादी।

गांव के लोग बताते हैं कि कर्नल सिंह ईमानदार और स्वाभिमानी व्यक्ति हैं। वे अक्सर अपनी बेटियों से कहते थे, “मेरी पगड़ी की लाज रखना।” बेटियां भी पढ़ाई में ठीक थीं और रोजाना कॉलेज जाया करती थीं। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, और यही कमजोरी आगे चलकर एक बड़ी त्रासदी की पृष्ठभूमि बनी।

आकाश की एंट्री और विश्वास का जाल

गांव का ही रहने वाला 24 वर्षीय आकाश (बदला हुआ नाम) अपेक्षाकृत संपन्न परिवार से था। स्थानीय लोगों के अनुसार उसका चरित्र पहले से विवादित रहा है। कई बार उस पर लड़कियों से छेड़छाड़ और अनुचित व्यवहार के आरोप भी लगे, लेकिन कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई।

24 दिसंबर 2025 की सुबह, जब निशा कॉलेज जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थी, तभी आकाश वहां पहुंचा। उसने कॉलेज छोड़ने की पेशकश की। शुरुआत में झिझक के बावजूद निशा उसकी बाइक पर बैठ गई। रास्ते भर हुई बातचीत ने एक नए रिश्ते की नींव रखी। मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हुआ और कुछ ही दिनों में दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं।

परिचितों के अनुसार, आकाश मीठी बातों और भरोसे का माहौल बनाने में माहिर था। उसने धीरे-धीरे निशा को भावनात्मक रूप से अपने प्रभाव में ले लिया। जनवरी के पहले सप्ताह तक दोनों गुप्त रूप से मिलने लगे। गांव के बाहर एक सुनसान खंडहर उनकी मुलाकातों का ठिकाना बन गया।

संबंध, दबाव और कथित शोषण

कुछ मुलाकातों के बाद स्थिति बदलने लगी। निशा के अनुसार, आकाश ने निजी पलों के वीडियो बना लिए थे। शुरुआत में यह सब “आपसी सहमति” का हिस्सा बताया गया, लेकिन बाद में इन्हीं वीडियो के जरिए कथित ब्लैकमेल शुरू हुआ।

10 जनवरी 2026 को घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। उसी दिन आकाश कर्नल सिंह के घर पहुंचा। पिता खेत में थे, घर पर केवल किरण मौजूद थी। बातचीत के दौरान उसने किरण से भी नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की और उसका मोबाइल नंबर ले लिया।

कुछ ही दिनों में किरण को भी वह अपने प्रभाव में ले आया। 10 फरवरी को किरण के जन्मदिन पर सोने की अंगूठी देने का वादा किया गया। शाम को उसे उसी खंडहर में बुलाया गया। वहां आकाश अपने दोस्त प्रदीप (25) के साथ मौजूद था।

किरण के बयान के अनुसार, दोनों युवक नशे में थे। उसने आरोप लगाया कि उसके साथ जबरदस्ती की गई और जान से मारने की धमकी दी गई। इतना ही नहीं, आकाश ने उसे निशा के आपत्तिजनक वीडियो दिखाकर कहा कि वह दोनों बहनों को नियंत्रित कर सकता है।

मानसिक आघात और प्रतिशोध की योजना

इस घटना के बाद किरण ने घर लौटकर सारी बात अपनी बहन निशा को बताई। दोनों सदमे में थीं। उन्हें लगा कि वे धोखे और शोषण का शिकार हुई हैं। सामाजिक बदनामी, पिता की इज्जत और वीडियो के जरिए ब्लैकमेल—इन सबने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया।

कई दिनों तक दोनों ने चुप्पी साधे रखी। लेकिन 13 फरवरी 2026 को उन्होंने प्रतिशोध की योजना बनाई। निशा ने आकाश को फोन कर मिलने के लिए बुलाया और झूठ बोला कि घर पर कोई नहीं है।

खंडहर में खूनी अंजाम

शाम करीब 4 बजे दोनों बहनें चाकू लेकर खंडहर पहुंचीं। वहां आकाश और उसका दोस्त प्रदीप नशे की हालत में थे। पुलिस के अनुसार, इसी दौरान दोनों बहनों ने हमला कर दिया।

प्राथमिक जांच में सामने आया कि आकाश की गर्दन पर गहरा वार किया गया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। प्रदीप पर भी कई वार किए गए और उसने भी दम तोड़ दिया। घटना के बाद दोनों बहनें सीधे थाने पहुंचीं और आत्मसमर्पण कर दिया।

पुलिस जांच और कानूनी पहलू

मामले की जांच स्थानीय पुलिस द्वारा की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तेजधार हथियार से हमले की पुष्टि हुई है। पुलिस ने हत्या (IPC की संबंधित धाराएं) और अन्य प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है।

हालांकि, बचाव पक्ष का तर्क है कि यह मामला “आत्मरक्षा” और “लगातार शोषण के खिलाफ प्रतिक्रिया” का है। यदि यह साबित होता है कि दोनों बहनें लंबे समय से ब्लैकमेल और यौन उत्पीड़न का शिकार थीं, तो अदालत में सजा की प्रकृति प्रभावित हो सकती है।

भारतीय दंड संहिता में आत्मरक्षा का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार परिस्थितियों और खतरे की तात्कालिकता पर निर्भर करता है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या घटना के समय तत्काल खतरा था, या यह पूर्व नियोजित हमला था? यही बिंदु अदालत में निर्णायक होगा।

सामाजिक प्रतिक्रिया

गांव दो हिस्सों में बंट गया है। एक पक्ष का कहना है कि लड़कियों ने कानून हाथ में लेकर गलत किया। यदि वे पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करातीं, तो शायद यह नौबत न आती।

दूसरा पक्ष मानता है कि ग्रामीण समाज में बदनामी का डर इतना गहरा होता है कि लड़कियां शिकायत करने से कतराती हैं। यदि सचमुच ब्लैकमेल और शोषण हुआ, तो यह घटना व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है।

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता का उदाहरण है—जहां पीड़िताएं न्याय के लिए कानूनी रास्ते पर भरोसा नहीं कर पाईं।

विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि हत्या पूर्व नियोजित थी—जैसे कि हथियार साथ ले जाना, फोन कर बुलाना—तो यह धारा 302 के तहत गंभीर अपराध माना जाएगा।

वहीं, यदि बचाव पक्ष यह स्थापित करता है कि बहनें निरंतर धमकी और मानसिक उत्पीड़न से गुजर रही थीं और उन्हें अपनी इज्जत व सुरक्षा का भय था, तो अदालत सहानुभूति दिखा सकती है।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार ब्लैकमेल और यौन शोषण का डर व्यक्ति को चरम कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकता है। विशेषकर जब सामाजिक समर्थन और कानूनी सहायता की कमी हो।

परिवार की स्थिति

कर्नल सिंह इस घटना से टूट चुके हैं। एक ओर उनकी बेटियां जेल में हैं, दूसरी ओर गांव में चर्चा और बदनामी का माहौल है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्हें अपनी बेटियों पर भरोसा है, लेकिन वे चाहते थे कि मामला कानून के जरिए सुलझता।

आगे क्या?

अब नजर अदालत की कार्यवाही पर है। पुलिस चार्जशीट तैयार कर रही है। मोबाइल फोन, कथित वीडियो, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और फॉरेंसिक साक्ष्य अहम भूमिका निभाएंगे।

यह मामला कई सवाल छोड़ता है—

क्या बदनामी के डर ने कानून से पहले प्रतिशोध को जन्म दिया?

क्या ग्रामीण समाज में महिलाओं की सुरक्षा पर्याप्त है?

क्या आत्मरक्षा और प्रतिशोध के बीच की रेखा स्पष्ट है?

निष्कर्ष

आराकला गांव की यह घटना केवल एक आपराधिक कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी है। यह बताती है कि विश्वास का दुरुपयोग, डिजिटल ब्लैकमेल और महिलाओं के खिलाफ हिंसा कितनी खतरनाक परिणति तक पहुंच सकती है।

साथ ही यह भी स्पष्ट है कि न्याय का मार्ग अदालत से होकर जाता है, न कि व्यक्तिगत बदले से। अब यह न्यायपालिका पर निर्भर करेगा कि वह उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर क्या निर्णय देती है।

जब तक फैसला नहीं आता, यह मामला समाज, कानून और नैतिकता—तीनों के लिए एक कठिन परीक्षा बना रहेगा।