रीमा और अमन की प्रेरणादायक कहानी
एक छोटे से कस्बे के हलचल भरे बाजार में, एक कोने में रीमा की पुरानी सब्जी की दुकान थी। मुश्किल से 16-17 साल की रीमा, सुबह 5 बजे से ही ताजी सब्जियां अपनी टोकरी में सजाने लगती थी। उसकी आंखें, जो स्कूल की किताबों में होनी चाहिए थीं, सब्जियों के ढेर और ग्राहकों की भीड़ पर टिकी रहती थीं। हाथ, जो पेंसिल और कलम पकड़ने के लिए बने थे, सब्जियों का वजन उठाने और पैसे गिनने में व्यस्त रहते थे।
रीमा की कहानी सिर्फ उसकी नहीं थी, बल्कि उन लाखों बच्चों की थी जिनके सपने गरीबी की दीवारों से टकराकर टूट जाते हैं। उसके पिता राम प्रसाद एक दिहाड़ी मजदूर थे, लेकिन बीमारी से उनका शरीर कमजोर हो गया था। कई बार काम नहीं मिलता, और मिलता भी था तो शरीर साथ नहीं देता। मां कमला पास के घरों में चौका-बर्तन करती थी, लेकिन उनकी कमाई से बस घर का किराया और दो वक्त की रोटी ही चल पाती थी।
ऐसे में रीमा का सब्जी बेचना परिवार के लिए सहारा था। रीमा का दिल पढ़ने का था। वह अपनी पुरानी किताबें, जो उसने किसी से मांग कर ली थीं, हमेशा साथ रखती थी। जब थोड़ा समय मिलता, वह अपनी टोकरी के पीछे बैठकर पढ़ती थी। गणित उसका पसंदीदा विषय था। वह पेंसिल से स्लेट पर समीकरण हल करती, और ग्राहक आते ही जल्दी से मिटा देती, जैसे कोई अपराध कर रही हो।
रीमा का सपना था – पढ़ना, स्कूल जाना और एक दिन टीचर बनना। वह सोचती थी, अगर वह पढ़ जाएगी तो अपने जैसे बच्चों को भी पढ़ाएगी, ताकि किसी को अपने सपनों को सब्जियों के ढेर में दफन न करना पड़े।
इसी बाजार से अमन रोज गुजरता था। अमन भी गरीब था, लेकिन उसकी दुनिया थोड़ी अलग थी। उसके पिता सुखदेव रिक्शा चलाते थे, मां सरला घर पर सिलाई करती थीं। उनके पास दौलत नहीं थी, लेकिन सपना था – बेटे को डॉक्टर बनाना। अमन होशियार और मेहनती छात्र था, 12वीं में था और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था। उसके कंधों पर माता-पिता के सपनों का बोझ था।
अमन रोज रिक्शा से स्कूल जाता, वापसी में पैदल आता, ताकि पैसे बचा सके। इसी रास्ते में उसे रीमा की दुकान दिखती थी। उसने रीमा को मेहनत करते देखा, और एक दिन किताब पढ़ते हुए भी। अमन को हैरानी हुई – इतनी मेहनती लड़की, दिल पढ़ने का! उसके मन में रीमा के लिए सम्मान पैदा हो गया।

एक दिन अमन ने देखा – रीमा की दुकान पर एक बुजुर्ग ग्राहक आया। वह सब्जियां खरीद रहा था, लेकिन उसे लगा रीमा ने कम वजन दिया है। वह रीमा पर चिल्लाने लगा – “तुम बेईमान हो, चोरी करती हो!” रीमा चुपचाप सुन रही थी, आंखों में आंसू थे, लेकिन कुछ नहीं बोली।
अमन यह सब देख रहा था, उसे गुस्सा आया। वह बुजुर्ग से बोला, “बाबा जी, यह लड़की बहुत ईमानदार है। आप वजन देख लीजिए।” अमन ने वजन देखा, रीमा ने सही वजन दिया था। बुजुर्ग को अपनी गलती का एहसास हुआ, वह शर्मिंदा होकर चला गया।
रीमा ने अमन को धन्यवाद दिया। अमन ने कहा, “धन्यवाद की कोई जरूरत नहीं, मैंने तो सच का साथ दिया है।” फिर पूछा, “तुम पढ़ती हो?” रीमा थोड़ी घबरा गई – “हां भैया, पढ़ती हूं।” अमन ने पूछा, “किताबें हैं?” रीमा बोली, “कुछ पुरानी किताबें हैं।” अमन ने कहा, “मैं तुम्हें और किताबें दूंगा।” रीमा को यकीन नहीं हुआ – “सच्ची भैया?” अमन मुस्कुराया – “हां, सच्ची।”
अगले दिन अमन स्कूल से लौटा और रीमा को कुछ पुरानी किताबें दी। रीमा बहुत खुश हुई – “भैया, मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी।” अमन बोला – “हम तो दोस्त हैं, इसमें एहसान की क्या बात!”
अब अमन और रीमा की दोस्ती हो गई। अमन रोज रीमा के पास आता, उसे पढ़ाता। रीमा बहुत लगन से पढ़ती थी – गणित, विज्ञान, अंग्रेजी। अमन को रीमा की मेहनत देखकर बहुत अच्छा लगता था।
लेकिन चुनौतियां भी थीं। रीमा के माता-पिता कहते – “पढ़ाई अमीरों का शौक है, हमारे लिए मेहनत ही सब कुछ है।” वे रीमा को डांटते थे – “दुकान पर ध्यान दो, पढ़ाई छोड़ दो।” रीमा चुपचाप सुनती, लेकिन हार नहीं मानती थी।
अमन के माता-पिता भी चिंतित थे – “अमन, रीमा को पढ़ाने में समय मत बर्बाद करो, अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।” अमन ने मां से कहा – “मां, रीमा बहुत होशियार है। अगर उसे मौका मिले तो बहुत कुछ कर सकती है।” मां को अमन की बात पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन अमन ने समझाया – “मैं रीमा को पढ़ाता हूं, उससे खुद भी बहुत कुछ सीखता हूं। उसकी मेहनत देखकर मुझे भी और मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है।” मां ने मान लिया, अमन को मना नहीं किया।
एक दिन रीमा के पिता की तबीयत बहुत खराब हो गई। अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टर ने कहा – महंगी दवा चाहिए, बहुत पैसे लगेंगे। परिवार के पास पैसे नहीं थे। रिश्तेदारों और दोस्तों से मदद मांगी, किसी ने मदद नहीं की। रीमा का दिल टूट गया।
अमन ने यह देखा, उसे बहुत दुख हुआ। उसने अपने माता-पिता से बात की – “रीमा के पिता को पैसों की जरूरत है।” सुखदेव बोले – “बेटा, हमारे पास तो पैसे नहीं हैं।” अमन ने कहा – “हम सब मिलकर कुछ कर सकते हैं।” सुखदेव और सरला ने जितने पैसे थे, दे दिए। अमन ने दोस्तों और शिक्षकों से भी मदद मांगी। सबने मदद की। अमन ने पैसे जमा किए और रीमा को दे दिए।
रीमा की आंखों में आंसू थे – “भैया, मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूंगी।” अमन बोला – “हम दोस्त हैं, इसमें एहसान की क्या बात!” रीमा ने पिता को अस्पताल में भर्ती कराया, इलाज शुरू हुआ। पिता धीरे-धीरे ठीक होने लगे। अब रीमा को नई उम्मीद मिली।
रीमा ने अमन से कहा – “अब मैं पढ़ाई पर ध्यान दूंगी।” अमन बहुत खुश था। दोनों दिन-रात मेहनत करने लगे। रीमा सब्जी बेचती, रात को अमन के साथ पढ़ती। अमन भी अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता, रात को रीमा को पढ़ाता, सुबह खुद पढ़ता। दोनों का रिश्ता अब सिर्फ दोस्ती का नहीं, भाई-बहन जैसा था।
एक दिन अमन ने कहा – “रीमा, तुम 12वीं की परीक्षा दे सकती हो। तुम बहुत होशियार हो।” रीमा को यकीन नहीं हुआ – “सच्ची भैया?” अमन बोला – “हां, सच्ची।” रीमा ने फॉर्म भर दिया।
परीक्षा का समय आ गया। दोनों बहुत मेहनत करते, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करते। परीक्षा खत्म हुई, अब परिणाम का इंतजार था। दोनों बेचैन थे – अगर सफल नहीं हुए तो माता-पिता के सपने टूट जाएंगे। लेकिन एक-दूसरे पर पूरा भरोसा था।
परिणाम आया – अमन ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में शानदार अंक प्राप्त किए, सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया। माता-पिता की आंखों में खुशी के आंसू थे। रीमा ने भी 12वीं में टॉप किया। उसके माता-पिता को यकीन नहीं हुआ, बेटी ने बड़ा काम किया।
शहर में उनकी कहानी फैल गई। अखबारों, टीवी में खबर आई। वे दोनों शहर के हीरो बन गए।
अब अमन ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया, खूब मेहनत करता, अपने सपनों को पूरा करने में लगा था। रीमा ने स्कूल में दाखिला लिया, अब सामान्य छात्र की तरह पढ़ाई करती थी। उनकी दोस्ती कभी खत्म नहीं हुई। वे एक-दूसरे से मिलते, बात करते, खुशियां बांटते।
साल बीत गए – अमन एक सफल डॉक्टर बन गया, गरीबों के लिए अस्पताल खोला, मुफ्त इलाज करता था। रीमा सफल शिक्षिका बन गई, गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोला, मुफ्त में पढ़ाती थी।
उनकी कहानी ने पूरे शहर में नई उम्मीद जगाई। लोगों को सिखाया – अगर आप ईमानदार और मेहनती हैं, तो कुछ भी कर सकते हैं।
दौलत ही सब कुछ नहीं, खुशी और इंसानियत सबसे बड़ी है।
हमें किसी को कम नहीं समझना चाहिए।
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