स्टेशन की भीड़ में गूंजती उम्मीद
कानपुर रेलवे स्टेशन की भीड़ में हर रोज हजारों चेहरे आते-जाते हैं। उसी भीड़ में एक टूटी कुर्सी पर बैठी अनामिका अपनी सुरीली आवाज में गाना गाती थी। उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन होठों पर मुस्कान। लोग रुकते, सुनते, कुछ सिक्के डालते और आगे बढ़ जाते। कोई जानता नहीं था कि यह औरत कभी शहर की सबसे खूबसूरत दुल्हन मानी जाती थी, जिसके सपनों में संगीत बसता था और जिसकी हंसी से पूरा घर रोशन हो जाता था।
सालों पहले अनामिका की मुलाकात अर्नव से एक संगीत कार्यक्रम में हुई थी। अर्नव उस वक्त एक महत्वाकांक्षी युवक था, जो अपने कारोबार के सपनों में खोया रहता था। दोनों की मुलाकातें बढ़ीं, प्यार हुआ और फिर शादी। शादी के शुरुआती सालों में सब कुछ खूबसूरत था। अर्नव का व्यापार बढ़ रहा था, अनामिका का साथ उसकी जिंदगी को संपूर्ण बना रहा था। लेकिन वक्त के साथ अर्नव की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं। वह अपने कारोबार में इतना डूब गया कि अनामिका के सपनों को नजरअंदाज करने लगा। अनामिका चाहती थी कि वह अपना पहला एल्बम रिकॉर्ड करे, अपनी कला को मंच मिले। लेकिन अर्नव का जवाब था—”मेरा नाम, मेरा बिजनेस ही हमारी पहचान है। तुम्हें सिर्फ मेरे साथ खड़ा होना है।”
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धीरे-धीरे उनके रिश्ते में दरारें आ गईं। झगड़े बढ़ने लगे, अनामिका की चुप्पी उसके दिल को खाती रही। एक रात, जब बारिश हो रही थी, दोनों के बीच भयंकर बहस हुई। अर्नव ने गुस्से में कह दिया—”अगर तुम्हें अपने गानों से इतना ही प्यार है तो जाओ गाओ। मेरे घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।” अनामिका टूट गई। वह भीगी साड़ी में आंसुओं के साथ उस घर से चली गई, जिसे उसने अपना संसार माना था।

समाज ने उसे दोषी ठहराया, दोस्तों ने किनारा कर लिया। पेट भरने के लिए उसने स्टेशन, मंदिर, मेलों में गाना शुरू किया। जिंदगी इतनी बेरहम हो गई थी कि हर दिन दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता था। उसका ठिकाना बन गया रेलवे स्टेशन। भीड़ उसे ताली देती, सिक्के डालती और वह उन सिक्कों से अपनी भूख और इज्जत दोनों का सौदा करती।
एक दिन, प्लेटफार्म नंबर पांच पर भीड़ असामान्य रूप से ज्यादा थी। एक चमकदार गाड़ी स्टेशन के बाहर रुकी। सुरक्षाकर्मी और नौकर पीछे-पीछे चल रहे थे। अर्नव, अब शहर का करोड़पति कारोबारी, अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर अनामिका पर पड़ी। वह सन्न रह गया। वही चेहरा, जिसे कभी अपने सपनों की रानी कहा था, आज धूल और आंसुओं से ढका हुआ था। उसकी आवाज में वही दर्द था, वही उम्मीद थी।
अर्नव वहीं खड़ा रह गया, उसकी आंखों में पछतावे के आंसू थे। उसकी सांसें तेज हो गईं। अनामिका ने उसे देखा नहीं, उसके लिए तो हर शख्स आज बस भीड़ का हिस्सा था। लेकिन अर्नव के लिए यह पल उसकी रूह को झकझोर देने वाला था। अतीत की यादें तूफान बनकर उमड़ आईं। शादी का मंडप, अनामिका की मुस्कान, और फिर टूटता रिश्ता।
गाते-गाते अनामिका की आवाज रुक गई। पानी की बोतल उठाई तो बोतल लगभग खाली थी। उसने गहरी सांस ली और लोगों की तरफ देखा। तभी उसकी नजर अर्नव से टकराई। पल भर के लिए समय थम गया। भीड़, आवाजें, गाड़ियों की सीटी सब गायब हो गई। बस दो जोड़ी आंखें थीं, जो अतीत की राख में झांक रही थीं। अनामिका की आंखों में हैरानी थी, अर्नव की आंखों में पछतावा।
अचानक एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ अनामिका के पास आया—”मां, भूख लगी है।” अर्नव का दिल कांप गया। क्या यह मेरा बेटा है? अनामिका ने बच्चे को गोद में लिया और आंचल से उसका चेहरा पोछा। अर्नव ने धीरे से पूछा—”क्या यह मेरा बेटा है?” अनामिका की आंखों से आंसू छलक पड़े—”पिता वह होता है जो अपने बच्चे का हाथ थामे, उसे भूख से बचाए। तुम कहां थे जब यह बच्चा भूख से रोता था?”
अर्नव वहीं जमीन पर बैठ गया। “मुझे माफ कर दो, अनामिका। मैं अंधा था, अपनी महत्वाकांक्षाओं में डूबा हुआ। मैंने सिर्फ तुम्हें नहीं, अपने बेटे को भी खो दिया।” अनामिका की आंखों में वर्षों का दर्द था। “कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते।”
बेटा मासूमियत से बोला—”मम्मा, पापा को माफ कर दो ना। मुझे पापा चाहिए।” अनामिका का दिल एक पल को पिघल गया। अगले कुछ दिनों तक अर्नव स्टेशन पर छोटे-छोटे काम करने लगा। अनामिका बीमार पड़ी तो अर्नव ने अपनी घड़ी, अंगूठी और जेब की आखिरी रकम इलाज के लिए दे दी। अस्पताल के बाहर बेटे ने कहा—”पापा, आप मम्मा को छोड़कर मत जाना।” अर्नव ने वादा किया—”अब कभी नहीं।”
कुछ दिनों बाद अनामिका फिर स्टेशन पहुंची, लेकिन इस बार अकेली नहीं थी। उसके साथ अर्नव और बेटा भी था। भीड़ इकट्ठी हो गई। किसी ने ताना मारा, किसी ने तारीफ की। लेकिन अर्नव मुस्कुराकर बोला—”पहले मैंने इस औरत की कदर नहीं की थी। अब पूरी दुनिया के सामने इसके साथ खड़ा रहूंगा।”
उस शाम अनामिका गाने लगी, अर्नव उसकी संगत में बैठा और बेटा तालियां बजाने लगा। संगीत में अब दर्द कम और उम्मीद ज्यादा थी। तीनों ने मिलकर नए जीवन की शुरुआत की। उनकी कहानी यह साबित करती है कि प्यार कभी हारता नहीं, अगर इंसान अपने कर्म से उसे जी ले।
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