त्याग और विधि का विधान: एक साधु की अनकही दास्तां

भूमिका: हरिद्वार के घाट और एक जिज्ञासु पत्रकार

हरिद्वार, जहाँ गंगा की शीतल धारा पत्थरों से टकराकर एक मधुर संगीत उत्पन्न करती है। यहाँ की हवाओं में शंखों की ध्वनि और अगरबत्तियों की खुशबू घुली रहती है। इसी पावन नगरी के घाटों पर एक युवा पत्रकार, जिसका नाम विकास था, अपनी किस्मत आजमाने पहुँचा था। विकास नया-नया पत्रकार बना था और उसके सिर पर ‘खोजी पत्रकारिता’ का भूत सवार था। वह चाहता था कि वह कुछ ऐसा सनसनीखेज करे, जिससे वह रातों-रात मशहूर हो जाए।

उसका इरादा था कि वह हरिद्वार के घाटों पर रहने वाले ढोंगी साधुओं का पर्दाफाश करेगा। उसे लगता था कि अधिकांश साधु केवल दिखावा करते हैं। लेकिन जब वह वहाँ पहुँचा, तो दृश्य कुछ और ही था। उसने देखा कि कड़ाके की ठंड में, जब आम इंसान रजाई से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता, कुछ साधु भोर के चार बजे गंगा की बर्फीली धारा में खड़े होकर घंटों तपस्या करते हैं।

इन्हीं साधुओं के बीच उसकी नज़र एक दिव्य व्यक्तित्व वाले वृद्ध साधु पर पड़ी। वह साधु हर मौसम में, चाहे कड़ाके की धूप हो या हड्डियों को कपा देने वाली ठंड, सुबह चार बजे उठते, गंगा स्नान करते और फिर घंटों मौन साधना में लीन रहते। उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी—ऐसी शांति जो केवल बहुत कुछ खोने के बाद ही प्राप्त होती है।

संवाद की शुरुआत

विकास ने कई दिनों तक उन साधु का पीछा किया। पहले तो साधु ने उसे नज़रअंदाज़ किया, लेकिन विकास की ज़िद के आगे अंततः वे पसीज गए। एक सुबह, जब साधु स्नान करके घाट की सीढ़ियों पर बैठे थे, विकास उनके पास पहुँचा और हाथ जोड़कर पूछा, “बाबा, क्या आपको ठंड नहीं लगती? हम जैसे लोग तो कांप जाते हैं, और आप इस उम्र में भी घंटों जल में खड़े रहते हैं। क्या आपको अपनी जान का डर नहीं लगता?”

साधु मंद-मंद मुस्कुराए। उनकी मुस्कुराहट में एक गहरा दर्द और उतनी ही गहरी शांति थी। उन्होंने कहा, “बेटा, डर तब लगता है जब खोने के लिए कुछ बचा हो। मैं तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और डर—इन सब बाधाओं को बहुत पीछे छोड़ आया हूँ। अब ये सांसारिक कष्ट मुझे प्रभावित नहीं करते।”

विकास को उनकी बातों में रहस्य महसूस हुआ। उसने विनती की, “बाबा, ऐसा वैराग्य कैसे संभव है? मुझे भी बताइए कि आपने यह शांति कैसे पाई?”

साधु ने आकाश की ओर देखा और बोले, “ठीक है, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। यह कहानी दो भाइयों और एक ऐसी स्त्री की है जिसने रिश्तों की मर्यादा को बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया। कहानी के अंत में तुम्हें स्वयं पता लगाना होगा कि वह व्यक्ति कौन था।”

मध्य प्रदेश का वो शांत गाँव

साधु ने अपनी कहानी शुरू की। बहुत साल पहले, मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में दो भाई रहा करते थे। बड़े भाई का नाम सतवीर था और छोटा भाई अमित। दोनों के बीच सात साल का अंतर था। उनके पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ चुका था। माँ ने बहुत संघर्ष करके दोनों को पाला था।

जब सतवीर अठारह वर्ष का हुआ, तो माँ की तबीयत बिगड़ने लगी। अपनी अंतिम इच्छा के रूप में माँ ने सतवीर का विवाह सुनीता नाम की एक समझदार और सुशील लड़की से करवा दिया। विवाह के कुछ ही दिनों बाद माँ का देहांत हो गया। अब अठारह साल के सतवीर के कंधों पर पूरे घर की और अपने ग्यारह साल के छोटे भाई अमित की ज़िम्मेदारी आ गई।

कर्तव्य की राह पर सतवीर

सतवीर स्वभाव से बहुत ही मेहनती और कर्तव्यपरायण था। उसने पढ़ाई छोड़ दी ताकि वह कमा सके। उसका सपना था कि उसका छोटा भाई अमित पढ़-लिखकर एक बड़ा अफसर बने और उनकी गरीबी दूर करे। कुछ समय गाँव में काम करने के बाद उसे एहसास हुआ कि यहाँ की कमाई से घर भी मुश्किल से चलेगा और अमित की पढ़ाई भी नहीं हो पाएगी।

एक रात उसने सुनीता से कहा, “सुनीता, मुझे शहर जाकर काम करना होगा। यहाँ रहकर मैं अमित का भविष्य नहीं बना पाऊंगा। मैं तुम्हें और अमित को यहाँ छोड़कर जा रहा हूँ, क्या तुम संभाल लोगी?”

सुनीता, जो केवल एक पत्नी ही नहीं बल्कि अमित के लिए माँ के समान थी, उसने हिम्मत दिखाई और कहा, “आप बेझिझक जाइए। मैं घर और अमित की पढ़ाई का पूरा ध्यान रखूँगी।”

सतवीर शहर चला गया। वह वहां दिन-रात मेहनत करता और पैसे गाँव भेजता। सुनीता उन पैसों से अमित की पढ़ाई और घर का खर्च चलाती। अमित भी अपनी भाभी का संघर्ष देख रहा था और वह भी जी-तोड़ मेहनत करने लगा।

अनिश्चितता का काला बादल

दो-तीन साल तक सब ठीक चला। फिर अचानक एक दिन सतवीर का खत आना बंद हो गया। महीने बीते, साल बीतने लगे, लेकिन सतवीर की कोई खबर नहीं आई। न पैसे आए, न कोई चिट्ठी। सुनीता ने शहर जाकर पता करने की कोशिश की, कई खत भेजे, पर कोई जवाब नहीं मिला।

घर की स्थिति बिगड़ने लगी। जमापूँजी खत्म हो गई। लेकिन सुनीता ने हिम्मत नहीं हारी। उसने सतवीर के कहे शब्दों को याद रखा कि ‘अमित की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए’। सुनीता ने खेतों में मजदूरी करना शुरू किया। वह सुबह से शाम तक दूसरों के खेतों में पसीना बहाती ताकि वह अमित की कॉलेज की फीस भर सके। गाँव वाले उसे ताने देते, कोई कहता सतवीर ने दूसरी शादी कर ली होगी, तो कोई कहता वह मर गया होगा। पर सुनीता अडिग रही।

उसकी मेहनत रंग लाई। अमित पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी पा गया। वह अब एक प्रतिष्ठित अधिकारी बन चुका था। लेकिन सतवीर को गए अब बारह-तेरह साल हो चुके थे। गाँव की पंचायत ने अंततः सतवीर को ‘मृत’ घोषित कर दिया और सुनीता को विधवा मान लिया गया।

रिश्तों की नई परीक्षा: भाभी का मायका और पिता का लालच

चूंकि सतवीर और सुनीता की कोई संतान नहीं थी, इसलिए सामाजिक रिवाजों के अनुसार सुनीता को उसके पीहर (मायके) भेज दिया गया। अमित अपनी भाभी को जाने नहीं देना चाहता था क्योंकि उसने उसे माँ की तरह पाला था, पर समाज के नियमों के आगे वह बेबस था।

सुनीता के पिता शराबी और लालची स्वभाव के थे। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी अभी भी युवा है, तो उनके मन में पाप आ गया। एक दिन उन्होंने शराब के कर्ज और लालच में आकर एक अमीर बूढ़े सेठ के साथ सुनीता का सौदा कर दिया। सुनीता ने जब घर में उस सेठ को देखा और अपने पिता की नीयत समझी, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

पुनर्विवाह का प्रस्ताव और देवर का संकोच

सुनीता जानती थी कि अगर वह यहाँ रही, तो उसका जीवन नर्क बन जाएगा। उस रात, भोर के तीन बजे वह चुपके से मायके से निकली और सीधे अपने ससुराल पहुँची, जहाँ अमित रहता था।

सुबह जब अमित ने अपनी भाभी को दरवाजे पर देखा, तो वह हैरान रह गया। सुनीता रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी और बोली, “अमित, मुझे बचा लो। मेरे पिता मुझे बेचना चाहते हैं। तुम मुझसे शादी कर लो, तभी मुझे सुरक्षा मिल पाएगी।”

अमित स्तब्ध रह गया। उसने कहा, “भाभी, आप ये क्या कह रही हैं? आपने मुझे माँ की तरह पाला है। मैं आपको उस नज़र से कैसे देख सकता हूँ?”

सुनीता ने उसे समझाया कि यह केवल एक सामाजिक सुरक्षा का कवच होगा। गाँव के लोग और पंचायत इकट्ठा हुई। पंचायत ने भी यही सुझाव दिया कि यदि अमित और सुनीता विवाह कर लेते हैं, तो सुनीता को उसके पिता के चंगुल से बचाया जा सकता है और वह इसी घर की मर्यादा बनी रहेगी। अमित ने भारी मन से, केवल अपनी भाभी के सम्मान की रक्षा के लिए हामी भर दी।

धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा। अमित और सुनीता का रिश्ता अब पति-पत्नी के रूप में स्वीकार्य हो गया। उनके जीवन में एक बेटा भी आया। वे एक सुखी परिवार की तरह रहने लगे।

नियति का क्रूर खेल: सतवीर की वापसी

तीन साल और बीत गए। अमित और सुनीता का बेटा अब तीन साल का था। तभी एक दिन अचानक गाँव में एक व्यक्ति दाखिल हुआ। उसके पास बहुत धन था, वह अच्छे कपड़े पहने हुए था। वह कोई और नहीं, बल्कि सतवीर था।

गाँव में हड़कंप मच गया। सतवीर ने बताया कि शहर में एक हादसे के बाद उसकी याददाश्त चली गई थी और वह वर्षों तक एक आश्रम में रहा। जब याददाश्त वापस आई और उसने पैसे कमाए, तो वह तुरंत अपनी पत्नी और भाई के पास लौट आया।

लेकिन जब उसने घर में कदम रखा, तो उसकी दुनिया उजड़ गई। उसने देखा कि उसकी पत्नी अब उसके छोटे भाई की पत्नी है और उनका एक बच्चा भी है।

त्याग की पराकाष्ठा

गाँव वाले सतवीर को दोष देने लगे कि उसने इतने साल खबर क्यों नहीं ली। सुनीता फूट-फूटकर रोने लगी। वह न सतवीर की रही, न अमित की। अमित अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ा था। सतवीर ने सब कुछ शांत होकर सुना। उसने सुनीता की कोई गलती नहीं मानी। उसने देखा कि सुनीता और अमित की अपनी एक दुनिया बस चुकी है।

सतवीर ने एक गहरा सांस लिया। उसने सोचा—यदि वह यहाँ रहता है, तो दो भाइयों के बीच नफरत पैदा होगी, सुनीता का जीवन फिर से दुविधा में पड़ जाएगा और उस निर्दोष बच्चे का भविष्य खराब होगा।

सतवीर ने उसी रात अपनी सारी संपत्ति, जो वह शहर से कमाकर लाया था, अमित और सुनीता के नाम कर दी। उसने अमित के सिर पर हाथ रखा और सुनीता से कहा, “तुमने मेरा वचन निभाया, अमित को कामयाब बनाया। अब इस घर की खुशियां बनाए रखना ही तुम्हारा धर्म है।”

अगली सुबह जब गाँव वाले जागे, तो सतवीर गायब था। वह सब कुछ छोड़कर—अपनी पत्नी, अपना भाई, अपना घर और अपनी संपत्ति—हमेशा के लिए चला गया।

कहानी का अंत और पत्रकार का बोध

साधु ने कहानी समाप्त की और चुप हो गए। विकास की आँखों में आँसू थे। उसने साधु के पैरों को छुआ और धीरे से पूछा, “बाबा, क्या वह सतवीर आप ही हैं?”

साधु मुस्कुराए, पर कुछ बोले नहीं। वे उठे और धीरे-धीरे गंगा की धारा की ओर बढ़ने लगे। विकास को अपना जवाब मिल गया था। उसे समझ आ गया था कि क्यों उस साधु को न ठंड लगती थी, न डर। जिसने अपना सब कुछ—अपना संसार और अपना अस्तित्व ही त्याग दिया हो, उसे ये सांसारिक कष्ट भला क्या डराएंगे।

निष्कर्ष

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं। कभी-कभी सही और गलत के बीच का अंतर मिट जाता है और केवल ‘त्याग’ ही एकमात्र मार्ग बचता है। सतवीर ने भागकर अपनी ज़िम्मेदारी से पीछा नहीं छुड़ाया था, बल्कि उसने एक बड़े परिवार की सुख-शांति के लिए खुद को मिटा दिया। अमित और सुनीता ने भी एक-दूसरे का साथ मजबूरी में दिया था, लेकिन उन्होंने रिश्तों की गरिमा को बनाए रखा।

शिक्षा: रिश्तों में कभी-कभी ऐसी स्थितियां आती हैं जहाँ कोई भी गलत नहीं होता, केवल समय और परिस्थितियां कठिन होती हैं। ऐसे में ‘त्याग’ और ‘क्षमा’ ही मनुष्य को महान बनाते हैं।

समाप्त