पत्थर तोड़ रही महिला के सामने क्यों झुक गया करोड़पति? | Emotional Story | Storyvibe_Explain
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पत्थर तोड़ रही महिला के सामने क्यों झुक गया करोड़पति?
कहते हैं भूख से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती। भूख आदमी से उसकी हँसी छीन लेती है, उसकी नींद चुरा लेती है, और उसके आत्मसम्मान को भी रोज़-रोज़ कटघरे में खड़ा कर देती है। लेकिन उस दिन—मसूरी की उसी तपती दोपहर में—भूख की सज़ा किसी गरीब पर नहीं, एक करोड़पति के सीने पर बरसी थी।
और वजह… एक सूखी, बेस्वाद, नमक वाली रोटी थी।
वो रोटी जिसे रजनी ने अपने फटे आटे के थैले से आखिरी दो मुट्ठी निकालकर बनाई थी। वो रोटी जिसे उसने अपने बच्चों की आँखों की तरफ देखे बिना, काँपते हाथों से एक अनजान आदमी के सामने रख दिया था। और वही रोटी खाकर—दिल्ली का रईस, करोड़पति अभिमन्यु राठौर—ऐसे रो पड़ा, जैसे किसी ने उसकी रूह का दरवाज़ा अचानक खोल दिया हो।
उसने रजनी से एक वाक्य कहा था, जो रजनी की जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल बन गया—
“तुम्हें मुझे पहचानना चाहिए था…”
1. मसूरी की तपती दोपहर और रजनी की टूटती साँसें
मसूरी की पहाड़ी हवा अक्सर राहत देती है, पर उस दिन हवा भी गर्म थी—जैसे सूरज ने अपनी सारी आग पत्थरों में भर दी हो। सड़कें तप रही थीं, और उस तपती सड़क के किनारे एक टूटी-सी कुटिया के बाहर बैठी थी रजनी।
रजनी के हाथों में एक हथौड़ा था। सामने पत्थरों का ढेर। वह पत्थर तोड़ रही थी—एक-एक वार में जैसे अपनी मजबूरी की आवाज़ दबा रही थी। हथेली पर छाले थे, उंगलियों के जोड़ सूज चुके थे, पर फिर भी वह पत्थर तोड़ रही थी, क्योंकि उसके पास विकल्प नहीं था।
कुटिया के अंदर—उसकी पूरी दुनिया—दो बच्चे पड़े थे।
आठ साल का कृष और पाँच साल की तान्या।
कृष की आवाज़ बुझी हुई थी, जैसे उसका गला सूख गया हो।
“माँ… कुछ खाने को दे दो…”
तान्या तो रो भी नहीं पा रही थी। बस उसकी आँखें खुली थीं—खाली, थकी, भूखी। उसका रोना शायद दो दिन पहले ही खत्म हो चुका था। भूख रोना भी छीन लेती है।
रजनी ने हथौड़ा नीचे रखा, पसीने से भीगी साड़ी का पल्लू चेहरे पर रखा और अंदर गई। उसने बच्चों को देखा—और उसकी आँखें भर आईं। लेकिन वह रो नहीं सकती थी। रोने का वक्त भी पेट मांगता है।
वह झुकी, कृष के सिर पर हाथ फेरा।
“बेटा… शाम को मजदूरी मिलेगी तो दूध ले आऊँगी। अभी थोड़ा सब्र कर लो।”
लेकिन उसके अपने शब्दों में झूठ का काँटा था। क्योंकि वह जानती थी—आज भी मजदूरी मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। पिछले दो दिनों से बच्चों ने कुछ नहीं खाया था। सिर्फ पानी पीकर सोए थे। घर में आटा भी बस दो मुट्ठी बचा था।
वह बाहर आई और फिर पत्थर तोड़ने लगी—क्योंकि पत्थर तोड़ने से कम से कम यह भ्रम तो बना रहता था कि वह कुछ कर रही है।

2. काली कार और अमीर आदमी का अचानक आना
अचानक बाहर एक तेज़ आवाज़ गूँजी—ब्रेक की चीख जैसी। रजनी ने चौंककर सिर उठाया।
कुटिया के सामने एक काली चमचमाती कार खड़ी थी। इतनी महंगी कार इस रास्ते पर? इस बस्ती में? रजनी को लगा जैसे कोई फिल्म का दृश्य उसकी गरीबी के बीच आ गिरा हो।
कार का दरवाज़ा खुला। एक आदमी उतरा।
महंगा सूट, चमकते जूते, कलाई पर घड़ी… जिसकी कीमत रजनी की पूरी जिंदगी की कमाई से भी ज्यादा हो सकती थी। चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अजीब-सी सख्ती—और साथ ही कुछ दबा हुआ दर्द भी।
वह आदमी सीधे रजनी की तरफ आया।
“माफ कीजिए… मेरी गाड़ी में कुछ खराबी आ गई है। मैकेनिक आने में वक्त लगेगा। क्या मैं… थोड़ी देर आपके यहाँ बैठ सकता हूँ? बहुत गर्मी है।”
रजनी सकपका गई। ऐसे लोग उसके यहाँ कभी नहीं आते थे। लेकिन वह क्या कहती? मना करती तो? कहीं यह आदमी उल्टा झगड़ा कर दे? और फिर… रजनी के मन में एक पुरानी आदत भी थी—मेहमान को खाली हाथ लौटाना पाप है। चाहे मेहमान कौन हो।
“आ जाइए,” उसने धीमे से कहा।
वह आदमी अंदर आया। कुटिया की दीवारें टूटी थीं। छत से मिट्टी झरती थी। फटी चटाई, एक पुराना मटका, कुछ बर्तन—और कोने में बैठे दो बच्चे, डरे हुए।
उस आदमी की नज़र बच्चों पर पड़ी। फिर अचानक उसकी आँखें कृष पर अटक गईं। वह एक पल को जैसे ठहर गया। जैसे कोई याद उसके अंदर से उछलकर सामने खड़ी हो गई हो।
रजनी ने एक टूटे गिलास में पानी दिया।
“पानी पी लीजिए…”
वह आदमी पानी पीता रहा, मगर उसकी आँखें बार-बार कृष को देखती रहीं—और फिर रजनी को। जैसे वह किसी तस्वीर की तुलना कर रहा हो।
कुछ देर बाद उसने पूछा, “आपका नाम?”
“रजनी…” रजनी की आवाज़ बहुत धीमी थी। “और आप?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अभिमन्यु राठौर। दिल्ली से हूँ। यहाँ… प्रॉपर्टी डील के सिलसिले में आया था।”
रजनी ने नाम सुना, लेकिन उसके लिए नाम का मतलब कुछ नहीं था। उसके लिए बस यह आदमी एक “अमीर” था—और अमीरों से गरीब को हमेशा डर लगता है, चाहे अमीर सामने बैठकर मुस्कुराए भी।
अभिमन्यु ने बच्चों की तरफ देखा।
“आपके बच्चे… बीमार लगते हैं।”
रजनी की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने जल्दी से पल्लू से पोंछ लिए।
“बीमार नहीं… भूखे हैं साहब। दो दिन से कुछ नहीं खाया।”
अभिमन्यु के चेहरे का रंग जैसे बदल गया।
“दो दिन…?”
उसने तुरंत अपना बैग खोला, कुछ नोट निकाले और आगे बढ़ाए।
“ये लीजिए… बाजार से कुछ ले आइए। बच्चों के लिए।”
रजनी ने तुरंत हाथ पीछे कर लिए।
“नहीं साहब… मैं भीख नहीं लेती। गरीब हूँ, पर इज्जत से जीती हूँ।”
ये शब्द रजनी के नहीं थे—ये उसकी माँ की सीख की तरह थे, जो माँ-बाप के बिना भी उसकी रगों में बची हुई थी।
अभिमन्यु के हाथ रुक गए। उसके चेहरे पर एक झटका सा आया।
“माफ कीजिए… मेरा मतलब—”
उसने नोट वापस रख दिए। फिर कुछ सोचकर बोला,
“अगर आप इजाजत दें तो… क्या मैं बच्चों के लिए कुछ खाना मंगवा सकता हूँ?”
रजनी कुछ कह पाती, उससे पहले ही कृष ने कमजोर आवाज़ में कहा,
“माँ… प्लीज…”
रजनी की आँखें भर आईं। भूख बच्चों से भी माँ की इज्जत की दीवार गिरवा देती है। उसने सिर हिला दिया।
अभिमन्यु ने ड्राइवर को कॉल किया, पर ड्राइवर शहर गया हुआ था—और आसपास कोई होटल नहीं। नेटवर्क भी कमजोर।
अभिमन्यु ने फोन काटा और रजनी की तरफ देखा।
“क्या आप… कुछ बना सकती हैं?”
रजनी ने धीरे से कहा, “साहब… घर में कुछ नहीं है। बस… दो मुट्ठी आटा बचा है।”
अभिमन्यु का गला जैसे भर आया।
“तो उसी से… कुछ बना दीजिए। मैं भी सुबह से कुछ नहीं खाया… और बच्चों को भी दे देना।”
रजनी हैरान रह गई। इतना बड़ा आदमी… उसकी बनाई रोटी खाएगा?
3. दो मुट्ठी आटे की रोटी और करोड़पति का टूटना
रजनी ने चूल्हा जलाया। आटे में थोड़ा नमक मिलाया। दो रोटियाँ बनाई—बस दो। घर में प्याज तक नहीं था। न अचार, न सब्जी, न दूध।
उसने एक टूटी प्लेट में रोटियाँ रखीं और अभिमन्यु के सामने रख दीं।
“माफी साहब… इससे ज्यादा कुछ नहीं…”
अभिमन्यु ने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा। मुंह में रखा।
सूखी, बेस्वाद, सिर्फ नमक का स्वाद।
पर अचानक… उसकी आँखें भर आईं।
उसने दूसरा कौर नहीं लिया। रोटी हाथ में ही रुक गई।
रजनी घबरा गई। “साहब… पसंद नहीं आई क्या? मैं—”
अभिमन्यु ने रजनी की तरफ देखा, और उसकी आवाज़ काँप गई।
“आप… ये खाकर कैसे जीती हैं?”
रजनी ने आँखें झुका लीं।
“मजबूरी है साहब। जब पेट में आग लगती है… तो पत्थर भी खा लेते हैं।”
अभिमन्यु ने गहरी सांस ली—जैसे वह अपने भीतर कुछ दबा रहा हो। फिर उसने अचानक पूछा,
“रजनी… आपके पति कहाँ हैं?”
रजनी की आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं हैं… छोड़कर चले गए। तान्या के पैदा होते ही…”
“मायके वाले?” अभिमन्यु ने पूछा।
रजनी ने हँसने की कोशिश की, पर हँसी रोने में बदल गई।
“कोई नहीं… माँ-बाप बचपन में चले गए। मैं… अनाथालय में पली।”
अभिमन्यु एकदम चुप हो गया। जैसे उसके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा खुल गया हो।
कुछ देर बाद उसने अपना बैग खोला और एक पुरानी तस्वीर निकाली।
“रजनी… ये देखिए।”
रजनी ने तस्वीर देखी—और उसके हाथ से तस्वीर छूटकर गिर गई।
तस्वीर में एक जवान लड़की थी…
और वह लड़की रजनी जैसी लगती थी। वही आँखें, वही नाक, वही माथा, और माथे पर वैसा ही छोटा सा तिल।
रजनी की आवाज़ काँप गई।
“ये… ये कौन है?”
अभिमन्यु की आँखों में आँसू थे।
“मेरी… बहन। प्रिया। पंद्रह साल पहले घर से भाग गई थी। फिर कभी नहीं मिली। आज आपको देखा… तो लगा जैसे प्रिया सामने खड़ी है।”
रजनी के होश उड़ गए।
“मेरा नाम प्रिया नहीं… मैं रजनी हूँ…”
अभिमन्यु ने तस्वीर उठा कर फिर दिखायी।
“मुझे पता है। लेकिन… आप बिल्कुल वैसी हैं। और ये आपका बेटा—कृष—ये भी… किसी अपने जैसा लगता है।”
रजनी का दिल धक-धक करने लगा।
“आप क्या कह रहे हैं?”
अभिमन्यु ने उसकी आँखों में देखा।
“मुझे लगता है… हमारे बीच कोई रिश्ता है। जिसे मैं जानना चाहता हूँ।”
रजनी डर गई। गरीब का डर सिर्फ भूख नहीं होता—उसके डर का दूसरा नाम “अनिश्चितता” होता है।
“साहब… आप गलत समझ रहे हैं…”
अभिमन्यु ने एक सवाल और किया,
“आपको बचपन की कोई याद है?”
रजनी ठिठक गई। सच यह था—उसे बहुत कम याद था। बस एक धुंधला-सा बचपन… अनाथालय के कमरे… और एक नाम—सेवा सदन।
“मैं… देहरादून के सेवा सदन अनाथालय में रही हूँ…”
अभिमन्यु के चेहरे पर जैसे बिजली चमक गई। उसने फोन निकाला, कुछ खोजा, फिर एक पुरानी खबर की कटिंग दिखायी।
“रजनी… ये देखिए। पंद्रह साल पुरानी खबर। देहरादून में सड़क हादसा हुआ था। एक लड़की और उसका साथी मारे गए… लेकिन साथ में एक छोटा बच्चा बच गया। उसे सेवा सदन भेज दिया गया था।”
रजनी की सांसें रुकने लगीं।
“आप… ये मुझे क्यों दिखा रहे हैं?”
अभिमन्यु की आवाज़ भारी थी।
“क्योंकि वो लड़की… मेरी बहन प्रिया थी। और जो बच्चा बचा… मुझे लगता है… वो आप हैं।”
रजनी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“नहीं! ये झूठ है! आप मुझे डरा रहे हैं!”
अभिमन्यु ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं झूठ नहीं बोल रहा। प्रिया जब घर से भागी थी… वो प्रेग्नेंट थी। बाद में पता चला उसने बच्ची को जन्म दिया। और फिर हादसा… प्रिया की डायरी में लिखा था कि वो अपनी बेटी का नाम ‘रजनी’ रखेगी…”
रजनी रोने लगी। उसे लगा जैसे उसकी पूरी जिंदगी कोई गलत पन्ना थी।
“अगर ये सच है… तो आप पंद्रह साल में मुझे ढूंढ क्यों नहीं पाए?”
अभिमन्यु ने धीमे से कहा,
“हमने ढूंढा। बहुत ढूंढा। लेकिन अनाथालय ने कहा बच्ची गोद चली गई। किसे—कभी नहीं बताया। हमने केस किया… पर कुछ नहीं हुआ। धीरे-धीरे उम्मीद मर गई।”
रजनी के भीतर एक सवाल चीखने लगा—अगर मैं किसी अमीर घर की बेटी होती, तो मेरा जीवन इतना टूटा हुआ क्यों होता?
अभिमन्यु बोला,
“रजनी… हमें डीएनए टेस्ट कराना होगा। सच सामने आएगा।”
रजनी ने डरते हुए सिर हिलाया।
“अगर टेस्ट गलत निकला तो?”
अभिमन्यु ने पहली बार हल्की-सी नरमी से मुस्कुराकर कहा,
“तो भी मैं आपकी मदद करूंगा। लेकिन मुझे… बहुत यकीन है कि आप… मेरे अपने खून की हैं।”
4. चार दिन की प्रतीक्षा और सच का पहला झटका
अगले दिन अभिमन्यु रजनी और दोनों बच्चों को देहरादून के बड़े अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने सैंपल लिए—रजनी के, और अभिमन्यु के भी। रिपोर्ट चार दिन में आने वाली थी।
अभिमन्यु ने रजनी को वापस मसूरी छोड़ा। राशन, कपड़े, कुछ पैसे—सब दे गया।
रजनी रो पड़ी। “आप इतना क्यों कर रहे हैं मेरे लिए?”
अभिमन्यु ने कहा,
“क्योंकि शायद… तुम मेरी हो। और अगर नहीं भी हो… तो भी तुम इंसान हो।”
चार दिन रजनी के लिए सदियों जैसे थे। कभी उसे लगता—हाँ, मैं किसी बड़े घर से हूँ… फिर याद आता—मैंने पत्थर तोड़े, भूख देखी, तिरस्कार देखा… क्या वो सब सिर्फ किस्मत थी?
चौथे दिन अभिमन्यु आया। हाथ में एक लिफाफा।
रजनी बाहर खड़ी थी, काँपती हुई।
अभिमन्यु ने लिफाफा खोला। रिपोर्ट देखी।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
रजनी की सांसें टूटने लगीं।
“क्या हुआ साहब?”
अभिमन्यु ने रिपोर्ट आगे बढ़ाई। उसकी आँखों में आँसू थे।
“रजनी… तुम मेरी भतीजी नहीं हो।”
रजनी के हाथ से रिपोर्ट गिर गई।
“तो… सब झूठ… मैं कोई नहीं…”
वह अंदर जाने लगी, खुद को छिपाने, खुद को समेटने।
“माफ कीजिए… आपने इतना किया मेरे लिए… मैं… आपकी नहीं हूँ… अब आप जाइए…”
तभी अभिमन्यु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको, रजनी। मैंने पूरी बात नहीं कही।”
रजनी पलटी।
“और क्या बचा है?”
अभिमन्यु रो रहा था। सचमुच रो रहा था।
“तुम मेरी भतीजी नहीं हो, रजनी… तुम मेरी बेटी हो।”
रजनी को लगा उसके कान सुन नहीं रहे।
“क्या…?”
अभिमन्यु ने रिपोर्ट उठाई।
“देखो… यहाँ लिखा है—Parent-Child Relationship. तुम मेरी बेटी हो। मेरी… बेटी।”
रजनी सन्न रह गई।
“लेकिन… आपने कहा था प्रिया आपकी बहन है…”
अभिमन्यु ने सांस खींची—जैसे अब उसे अपने गुनाह के शब्द बोलने थे।
“प्रिया… मेरी बहन नहीं थी, रजनी। वो मेरी पत्नी थी।”
रजनी की आँखें फैल गईं।
“पत्नी…?”
अभिमन्यु की आवाज टूट गई।
“और कृष… जो तुम्हारा बेटा है… वो मेरा पोता है।”
5. अभिमन्यु का सच: प्यार, बिछड़ना और एक पिता का अपराध
रजनी को लगा जैसे जमीन हिल रही हो।
“ये… ये कैसे हो सकता है? आपने मुझसे सच क्यों नहीं कहा पहले?”
अभिमन्यु ने सिर झुकाया।
“क्योंकि मुझे डर था। अगर मैं पहले दिन कह देता कि मैं तुम्हारा पिता हूँ… तो तुम मुझे क्या समझती? एक अमीर आदमी, जो गरीब औरत को फंसाने आया है? मैं चाहता था कि तुम पहले मुझे इंसान समझो, फिर पिता।”
उसने कहना शुरू किया—धीमे, भारी, जैसे हर शब्द पर सालों का बोझ पड़ा हो।
“पंद्रह साल पहले… प्रिया से मेरी शादी हुई थी। मेरा परिवार बहुत बड़ा, बहुत अमीर था। उन्हें प्रिया पसंद नहीं थी। वे चाहते थे मैं किसी बड़े घर की लड़की से शादी करूँ। लेकिन मैंने प्रिया से प्यार किया… और उससे शादी कर ली।”
“मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया। हम देहरादून में किराए के छोटे घर में रहने लगे। प्रिया प्रेग्नेंट थी। हम खुश थे… मैं पहली बार पिता बनने वाला था।”
अभिमन्यु की आँखों में आंसू गिरने लगे।
“फिर एक दिन मुझे काम से दिल्ली जाना पड़ा। दो दिन बाद जब लौटा… तो पता चला… सड़क हादसा हुआ है।”
उसका गला भर गया।
“प्रिया… मर गई। लेकिन बच्ची बच गई।”
रजनी के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“और… वो बच्ची…”
“तुम,” अभिमन्यु ने कहा। “तुम।”
“मैं भागा अस्पताल। तुम बहुत छोटी थीं। मैंने तुम्हें गोद में लिया… लेकिन उसी वक्त सोशल वेलफेयर की टीम ने तुम्हें ले लिया। कहा—‘माँ नहीं, पिता का नाम स्पष्ट नहीं, परिवार विवादित है।’”
अभिमन्यु की आवाज में गुस्सा और बेबसी घुली थी।
“मैंने तुम्हें वापस पाने की कोशिश की। केस किया। वकील लगाए। लेकिन मेरे पिता… उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। उन्होंने रिकॉर्ड बदलवा दिए। उन्होंने कहा—‘ये बच्ची हमारे घर पर धब्बा है।’”
अभिमन्यु ने रजनी की तरफ देखा—आँखों में अपराधबोध।
“मैं हार गया, रजनी। मैं टूट गया। मुझे लगा तुम किसी अच्छे घर में होगी। लेकिन मैं रोज़ सोचता था… मेरी बेटी कहाँ है? कैसी है? क्या खाती है? क्या रोती है?”
रजनी रो रही थी।
“तो… मेरी जिंदगी… अनाथालय… फिर शादी… फिर छोड़ दिया जाना…”
अभिमन्यु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।
“क्योंकि मैं तुम्हें बचा नहीं पाया। बेटी… मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया। लेकिन अब… अब मैं सब ठीक करूंगा।”
रजनी की आवाज टूटी हुई थी।
“लेकिन पापा… मैं छोड़ी हुई औरत हूँ। समाज…”
अभिमन्यु ने दृढ़ स्वर में कहा,
“समाज को जो कहना है कहने दो। तुम मेरी बेटी हो। तुम्हारी इज्जत मेरी इज्जत है। जिसने तुम्हें छोड़ा—गलती उसकी है, तुम्हारी नहीं।”
6. एक नया घर, पर पुरानी चोटों की मरहम-पट्टी
उस दिन रजनी पहली बार “पापा” शब्द बोल पाई।
“पापा…”
और अभिमन्यु ऐसे काँपा जैसे उसे अपना खोया हुआ जीवन मिल गया हो। कृष और तान्या भी पास आए। अभिमन्यु ने उन्हें भी गले लगा लिया—जैसे उसके भीतर का खालीपन भरता जा रहा हो।
दो महीने बाद रजनी दिल्ली के एक बड़े घर में रहने लगी।
वहाँ कमरों की दीवारें मजबूत थीं, लेकिन रजनी के भीतर की दीवारें अभी भी टूटती थीं। कभी रात में वह चौंककर उठती—जैसे भूख उसे फिर बुला रही हो। कभी वह किचन में जाकर रोटी छूती—जैसे यकीन करना चाहती हो कि अब आटा खत्म नहीं होगा।
अभिमन्यु ने उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। बच्चों को अच्छे स्कूल में डाला। और रजनी—जिसने जीवन भर बस “सहना” सीखा था—धीरे-धीरे “जीना” सीखने लगी।
एक दिन अभिमन्यु ने कहा,
“बेटी… तुमने इतना दर्द झेला, फिर भी तुम टूटी नहीं। मुझे तुम पर गर्व है।”
रजनी ने हल्की मुस्कान से जवाब दिया,
“पापा… अगर वो दर्द न होता तो मैं मजबूत न बनती। और शायद… हम कभी न मिलते।”
अभिमन्यु की आँखें भर आईं।
“हाँ बेटी… अब हम साथ हैं। और हमेशा साथ रहेंगे।”
7. लौटती रोशनी: रजनी का बदला हुआ रास्ता
कुछ महीनों बाद रजनी ने एक एनजीओ में काम शुरू किया—गरीब औरतों के लिए। वह उन्हें सिर्फ पैसे नहीं देती थी, बल्कि उन्हें इज्जत देती थी। क्योंकि उसने भूख देखी थी, अपमान देखा था, और फिर एक रोटी में छिपी हुई सच्चाई भी देखी थी।
कभी-कभी वह मसूरी को याद करती। पत्थर, हथौड़ा, छाले, और वो सूखी रोटी। उस रोटी का स्वाद आज भी उसकी जीभ पर नहीं—उसकी आत्मा पर था।
और अभिमन्यु?
वह अब भी वही करोड़पति था, पर अंदर से बदल चुका था। वह जान गया था कि पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है, लेकिन भूख के सामने पैसा भी शर्मिंदा हो जाता है।
उस दिन जब उसने रजनी की सूखी रोटी खाई थी, उसने सिर्फ नमक नहीं चखा था—उसने अपनी बेटी की बर्बाद होती जिंदगी का स्वाद चखा था। इसलिए उसकी आँखें भर आई थीं। इसलिए वह झुक गया था।
क्योंकि वह झुका पैसे के सामने नहीं,
वह झुका माँ के हाथ की उस रोटी के सामने,
जो भूख के बावजूद… इज्जत से बनाई गई थी।
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