मासूम बच्चे ने || ठेले पर चाय बेचने वाले से कहा आप मेरी मम्मी से शादी कर लो
राजू और सुनीता की कहानी – आगरा के एक चाय वाले की इंसानियत
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के एक छोटे से कस्बे में, एक व्यस्त चौराहे पर राजू नाम का युवक अपनी चाय की दुकान चलाया करता था। उसका छोटा सा ठेला, जिसमें एक स्टोव, कुछ बर्तन और चाय की पत्तियों का डिब्बा था, कस्बे के लोगों के लिए सुबह की शुरुआत और शाम की सुस्ती का ठिकाना बन चुका था। राजू की चाय की खुशबू और उसका मिलनसार स्वभाव हर किसी को अपनी ओर खींचता था। मेहनत और ईमानदारी से उसने कई नियमित ग्राहक बना लिए थे। वह अपने छोटे कारोबार से संतुष्ट था और जीवन में कोई बड़ी परेशानी नहीं थी।
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एक दिन दोपहर का समय था। सूरज आसमान में चमक रहा था और चौराहे पर भीड़ थोड़ी कम थी। राजू अपने ठेले पर चाय का पानी चढ़ा रहा था, तभी उसे एक छोटी सी आवाज सुनाई दी, “भैया, क्या मुझे एक कप चाय मिल सकती है?” नीचे देखा तो एक छोटा सा लड़का, जिसकी उम्र मुश्किल से छह साल होगी, उसकी ओर देख रहा था। कपड़े मैले, चेहरा धूल से सना और आंखों में भूख की चमक। राजू ने पूछा, “बेटा, चाय तो बच्चों के लिए नहीं होती, लेकिन कुछ और चाहिए? बिस्किट खाओगे?” लड़का थोड़ा झिझका और बोला, “भैया, मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
यह सुनकर राजू का दिल पिघल गया। उसने देखा लड़के की हालत ऐसी है जैसे उसने कई दिन से कुछ नहीं खाया हो। राजू ने मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं बेटा, तुम बैठो। मैं तुम्हारे लिए चाय और बिस्किट लाता हूं।” उसने पुराने अखबार पर दो बिस्किट रखे और एक छोटे कप में चाय डालकर लड़के को दे दी। लड़का खुशी-खुशी खाने लगा।
तभी एक महिला की तेज आवाज आई, “हम भिखारी नहीं हैं! तुम अपना सामान वापस ले लो। यह बच्चा है, भूखा था इसलिए मांग लिया।” राजू ने देखा, महिला करीब तीस साल की थी, कपड़े गंदे और फटे हुए, लेकिन चेहरे पर अजीब सा गर्व। राजू ने शांत स्वर में पूछा, “आप कौन हैं? और यह बच्चा दो दिन से भूखा क्यों है?” महिला ने पहले जवाब देने से हिचकिचाई, लेकिन फिर अपने बेटे को पास बुलाया और डांटते हुए कहा, “मैंने तुझे मना किया था ना कि किसी से कुछ मांगना नहीं है। हम मेहनत करके खाएंगे।” बच्चा चुपचाप अपनी मां के पास खड़ा हो गया, उसकी आंखें बिस्किटों पर टिकी रहीं।
राजू का मन भर आया। उसने कहा, “देखिए, आप बुरा मत मानिए। बच्चा भूखा है और मैं इसे खाना देना चाहता हूं। अगर आप चाहें तो मेरा एक छोटा सा काम कर दीजिए, इसके बदले में मैं आपको और आपके बेटे को खाना दूंगा।” महिला ने पूछा, “कैसा काम?” राजू ने कहा, “मेरी चाय की दुकान पर कुछ छोटे-मोटे काम हैं, जैसे बर्तन साफ करना, चाय की पत्ती छानना, सामान व्यवस्थित करना। आप यह कर दीजिए, मैं आपको खाना दूंगा।”
महिला को राजू की बात में सच्चाई नजर आई। उसने हामी भरी, “ठीक है, मैं आपका काम करूंगी।” राजू ने दो कप चाय और कुछ बिस्किट निकाले और दोनों मां-बेटे को बैठकर खाने को कहा। दो दिन बाद उनके पेट में कुछ गया था, उनकी आंखों में राहत थी। खाना खाने के बाद महिला, जिसका नाम सुनीता था, ने पूछा, “बताइए क्या काम करना है?” राजू ने उसे कुछ गंदे बर्तन दिए और पास के नल पर धोने को कहा। सुनीता अपने बेटे रवि के साथ बर्तनों को धोकर वापस लाई। उसने फिर पूछा, “कोई और काम हो तो बता दीजिए, हम मेहनत करने को तैयार हैं।”
राजू ने उसे कुछ और काम दिए, जैसे चाय की पत्ती छानना, बर्तन सुखाना। इस दौरान राजू ने सुनीता से बात शुरू की। उसे लगा कि सुनीता पहले अच्छे घर से थी, लेकिन अब हालत खराब थी। उसने धीरे से पूछा, “अगर बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं? आपकी हालत ऐसी कैसे हो गई?”
सुनीता की आंखें नम हो गईं। उसने कहा, “दरअसल मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ हुआ है कि जब भी सोचती हूं तो आंखें भर आती हैं।” सुनीता ने अपनी कहानी शुरू की। वह पास के गांव की रहने वाली थी, पति छोटी सी दुकान चलाता था। थोड़ी सी जमीन थी, रवि के जन्म के बाद परिवार पूरा हो गया था। लेकिन एक दिन पति की तबीयत खराब हुई और कुछ ही दिनों में वह चल बसे। पति के जाने के बाद सास और देवरों ने जमीन अपने नाम कर ली, सुनीता को घर से निकाल दिया। बोले, “अगर चाहो तो रवि को हमारे पास छोड़ जाओ, हम उसका ख्याल रखेंगे, लेकिन तुम यहां नहीं रह सकती।”
सुनीता ने बेटे को छोड़ने से इंकार किया और उसे लेकर मायके चली गई, लेकिन वहां भी कोई सहारा नहीं था। मां पहले ही गुजर चुकी थी और भाई-भाभी ने जगह देने से मना कर दिया। सुनीता ने कुछ दिन रिश्तेदार के यहां गुजारे, लेकिन वहां भी ताने सुनने पड़े। आखिरकार वह रवि को लेकर इधर-उधर भटकने लगी। दो दिन से दोनों ने कुछ नहीं खाया था, आज रवि की भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो वह राजू की दुकान पर आ गया।
यह कहानी सुनकर राजू की आंखें भी नम हो गईं। उसने सुनीता को हौसला दिया, “चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।” उसने अपनी दुकान के पीछे छोटी सी झोपड़ी दिखाई, “यह झोपड़ी मेरी है, मैं इसमें कभी-कभी रुकता हूं। तुम और रवि इसमें रह सकते हो, जब तक तुम्हें कोई काम नहीं मिलता, मेरी दुकान पर मदद कर सकती हो, मैं खाना दूंगा।” सुनीता ने पहले मना किया लेकिन राजू ने समझाया कि सड़कों पर भटकना सुरक्षित नहीं है, खासकर जवान औरत और छोटे बच्चे के लिए। आखिरकार सुनीता मान गई।
वो और रवि झोपड़ी में रहने लगे, उसे साफ किया, पास के नल से पानी लाकर नहाया। राजू ने उन्हें खाने को दिया और दुकान बंद करके अपने गांव चला गया। अगले दिन सुबह राजू दुकान पर आया तो सुनीता पहले से ही वहां थी, उसने मदद शुरू कर दी – चाय बनाना, बर्तन साफ करना, ग्राहकों को चाय परोसना। रवि भी छोटे-मोटे काम करने लगा। राजू को सुनीता की मेहनत देखकर अच्छा लगा। उसने पूछा, “क्या तुम्हें कुछ और बनाना आता है? जैसे पकोड़े या कोई और नाश्ता?” सुनीता ने कहा, “हां, मुझे पकोड़े और कचौड़ी बनाना आता है।”
राजू ने तुरंत सामान खरीदा, सुनीता ने पकोड़े बनाना शुरू किया। पकोड़ों की खुशबू दूर-दूर तक फैल गई, ग्राहक चाय के साथ पकोड़े भी खरीदने लगे। उस दिन राजू की दुकान पर चाय से ज्यादा पकोड़ों की बिक्री हुई। शाम को राजू ने पकोड़ों की कमाई सुनीता को दे दी। सुनीता ने मना किया, लेकिन राजू ने कहा, “यह तुम्हारी मेहनत की कमाई है, इसे रखो। तुम्हें और रवि को नए कपड़े चाहिए, घर चलाने के लिए पैसे चाहिए।”
कुछ दिन बाद सुनीता ने अपने और रवि के लिए नए कपड़े खरीदे। धीरे-धीरे उसका पकोड़ों का काम चल निकला, वह राजू की दुकान पर नियमित काम करने लगी। रवि पास के स्कूल में दाखिल हो गया, जिसका खर्च राजू ने उठाया।
लेकिन जैसे ही सुनीता की जिंदगी पटरी पर आने लगी, आसपास के कुछ लोग जलने लगे। वे कहने लगे, “देखो, यह विधवा औरत इस लड़के के साथ दुकान चला रही है, ना जाने क्या-क्या चल रहा होगा।” यह बातें फैलने लगीं। एक दिन जब सुनीता बाजार गई थी, रवि खेलते-खेलते राजू के पास आया और बोला, “भैया, क्या आप मेरी मम्मी से शादी करोगे?” राजू चौक गया, “बेटा, तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?” रवि ने मासूमियत से कहा, “आप मम्मी को हंसाते हो, पहले पापा भी मम्मी को हंसाया करते थे, लेकिन अब आप ही मम्मी का ख्याल रखते हो।”
यह सुनकर राजू का दिल भर आया। उसने रवि को प्यार से समझाया, “ठीक है, मैं तुम्हारी मम्मी से बात करूंगा।” उस दिन के बाद राजू सुनीता से इस बारे में बात करने की हिम्मत जुटाने लगा, लेकिन डर था कि सुनीता क्या सोचेगी। एक दिन जब दुकान खाली थी, सुनीता ने पूछा, “आप कुछ परेशान लग रहे हो, क्या बात है?” राजू ने हिम्मत करके कहा, “सुनीता, रवि ने मुझसे कहा कि मैं तुमसे शादी कर लूं। मैं जानता हूं यह बात अचानक है, लेकिन मैं तुम्हारा और रवि का ख्याल रखना चाहता हूं।”
सुनीता चुप हो गई। उसने कहा, “आपने हमारे लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन लोग क्या कहेंगे? पहले से ही इतनी बातें हो रही हैं।” राजू ने कहा, “लोग तो हमेशा बातें करते हैं, लेकिन अगर हम एक-दूसरे का साथ दे सकते हैं तो क्या बुरा है? मैं तुम्हें और रवि को खुश देखना चाहता हूं।” सुनीता ने कुछ देर सोचा और हामी भर दी।
राजू ने अपनी मां से बात की, उसकी मां ने सुनीता को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। कुछ ही दिनों बाद राजू और सुनीता की शादी सादे समारोह में हो गई। शादी के बाद लोगों के मुंह बंद हो गए। दोनों ने मिलकर अपनी दुकान को और बड़ा किया। सुनीता अब पकोड़ों के साथ-साथ कचौड़ी और जलेबी भी बेचने लगी। राजू की चाय की डिमांड पहले से ज्यादा हो गई। रवि स्कूल में अच्छा पढ़ रहा था। कुछ साल बाद सुनीता और राजू को एक बेटी हुई। परिवार अब पूरा था।
सुनीता अब ज्यादातर घर पर रहती थी और राजू की मां की देखभाल करती थी। दुकान पर वह तभी आती थी जब कोई खास मौका होता था। दोनों मिलकर अपने परिवार को खुशहाल बनाए रखते थे, और उनका छोटा सा ठेला अब कस्बे की शान बन चुका था।
तो दोस्तों, यह थी राजू और सुनीता की कहानी। आपको कैसी लगी जरूर बताएं। अगर कहानी अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हमें सपोर्ट करें। मिलते हैं अगली कहानी में, तब तक के लिए जय हिंद, जय भारत!
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