पागल मास्टर: कचरे से निकले हीरों और एक गुरु के बलिदान की अमर गाथा

प्रस्तावना: एक अनजाना मसीहा और समाज की नफरत कहते हैं कि शिक्षक साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं। यह कहानी रामपुर गाँव के उस ‘पागल मास्टर’ की है, जिसे दुनिया ने पत्थर मारे, जिसे समाज ने दुत्कारा, लेकिन जिसकी जिद ने इस देश का भविष्य बदल दिया। जब वह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था, तब उसकी टूटी झोपड़ी के सामने जो हुआ, उसने पूरी दुनिया की आँखों में आँसू ला दिए।

अध्याय 1: स्ट्रीट लाइट के नीचे का वह ‘पागल’ स्कूल

रामपुर गाँव के बाहर, कूड़े के ढेर के पास एक टिमटिमाती स्ट्रीट लाइट के नीचे एक बूढ़ा आदमी रहता था। फटे कपड़े, बिखरे बाल और गले में लटकी एक टूटी हुई स्लेट—यही उसकी पहचान थी। गाँव वाले उसे ‘पागल मास्टर’ कहते थे। उसका काम था—कचरा बिनने वाले अनाथ बच्चों को जबरदस्ती पकड़कर पढ़ाना।

लोग उस पर हँसते थे। दुकानदार उसे भगा देते थे। “कचरा बिनने वालों के नसीब में कलम नहीं, कट्टा लिखा है,” गाँव वाले कहते थे। लेकिन मास्टर का बस एक ही सपना था—इन बच्चों को इंसान बनाना। वह अपनी जेब से टॉफी और बिस्कुट निकालकर बच्चों को पढ़ने के लिए लालच देता था।

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अध्याय 2: अपमान का कीचड़ और गुरु का संकल्प

एक दिन गाँव के सरपंच के बेटे ने अपनी जीप से मास्टर को कीचड़ में धक्का दे दिया। “बड़ा आया कलेक्टर बनाने वाला!” वह हँसते हुए बोला। मास्टर कीचड़ में लथपथ था, घुटने से खून बह रहा था, लेकिन उसने अपने दर्द की परवाह नहीं की। उसने नाली में गिरी अपनी चौक ढूँढी और भागते बच्चों को पुकारा— “शिक्षा से बड़ा कोई नहीं है, वापस आ जाओ!”

वह रात मास्टर ने भूखे-प्यासे बिताई, लेकिन उसकी आँखों में उन बच्चों के लिए आँसू थे जिनका भविष्य अंधेरे में था। धीरे-धीरे बच्चों को उस ‘पागल’ के अंदर एक ‘पिता’ दिखने लगा।

अध्याय 3: प्रोफेसर दीनानाथ का गुप्त अतीत

गाँव वाले नहीं जानते थे कि वह ‘पागल’ असल में शहर की एक बड़ी यूनिवर्सिटी का ‘प्रोफेसर दीनानाथ’ था। एक सड़क हादसे में अपनी पत्नी और बच्चे को खोने के बाद, उसने सब कुछ छोड़ दिया था। उसने कसम खाई थी कि वह उन बच्चों को पढ़ाएगा जिन्हें दुनिया जानवर समझती है। उसने अपनी पूरी जमा-पूंजी उन अनाथ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दी।

अध्याय 4: 20 साल का इंतजार और वह ऐतिहासिक काफिला

समय बीता, मास्टर ने बच्चों को शहर भेज दिया। गाँव वालों ने ताना मारा, “वो कभी वापस नहीं आएँगे।” मास्टर बूढ़ा हो गया, खाट पर पड़ गया, उसके शरीर में कीड़े पड़ने लगे। सरपंच ने उसे गाँव से बाहर फेंकने का फैसला किया। लोग उसे घसीट रहे थे, तभी गाँव की जमीन एक गड़गड़ाहट से हिलने लगी।

सायरन की आवाजों से पूरा गाँव गूंज उठा। एक-दो नहीं, पूरी 50 लाल बत्ती वाली गाड़ियों का काफिला मास्टर की झोपड़ी के सामने आकर रुका। ब्लैक कैट कमांडो ने घेरा बना लिया। गाँव वाले फटी आँखों से देख रहे थे।

अध्याय 5: जब सत्ता गुरु के चरणों में झुक गई

पहली गाड़ी से जिले का एसएसपी (SSP) उतरा। दूसरी से कलेक्टर, तीसरी से शिक्षा मंत्री और फिर कई डॉक्टर और अधिकारी। एसएसपी ने अपनी टोपी उतारकर मास्टर के पैरों में रख दी और फूट-फूट कर रोने लगा— “मास्टर जी, पहचानिए! मैं कालिया हूँ, आपका कालिया!”

कलेक्टर ने उनके हाथ चूमते हुए कहा, “गुरु जी, मैं मुन्नी हूँ। देखिए, आज पूरा प्रशासन आपके कदमों में है।” शिक्षा मंत्री ने दहाड़कर गाँव वालों से कहा, “तुमने जिसे पत्थर मारे, वह हम अनाथों का भगवान है!”

अध्याय 6: गुरु की अंतिम विदाई

मास्टर की तपस्या सफल हो चुकी थी। उनकी झोपड़ी के बाहर ही आईसीयू (ICU) बनाया गया। एसएसपी ने खुद अपने हाथों से उन्हें नहलाया। मास्टर ने अपनी आखिरी सांसों में बस इतना कहा, “बेटा, कभी अपनी कुर्सी का घमंड मत करना। जैसे मैंने तुम्हारा हाथ थामा, तुम भी किसी गरीब का हाथ थामना।”

उस ‘पागल मास्टर’ ने एक राजा की तरह विदाई ली। उनकी अंतिम यात्रा में 50 लाल बत्ती वाली गाड़ियों ने सायरन बजाकर सलामी दी। पुलिस के जवानों ने बंदूकें झुकाकर शोक प्रकट किया।

निष्कर्ष: ‘पागल मास्टर विद्या मंदिर’

आज उस गाँव में एक भव्य कॉलेज है— ‘पागल मास्टर विद्या मंदिर’। मुख्य द्वार पर मास्टर की मूर्ति है, हाथ में छड़ी और गले में स्लेट। नीचे लिखा है— “एक पागल, जिसने भविष्य लिख दिया।”

कहानी की सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षक कभी साधारण नहीं होता। वह समाज के सबसे निचले स्तर से उठाकर बच्चों को आसमान का सितारा बना सकता है। शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा।