“कर्मों की सजा”
रामपुर जिले का एक शांतिपूर्ण गांव था, जहां हर कोई अपनी दिनचर्या में व्यस्त था। गांव में एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे सब आदर से “श्याम बाबू” के नाम से जानते थे। वह एक किसान था और हमेशा खुश रहता था। उनका जीवन बहुत साधारण था, लेकिन उनका दिल बहुत बड़ा था। श्याम बाबू का मानना था कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ इंसानियत और परिवार है। अपने बेटे और बहू को लेकर वह हमेशा खुश रहते थे, लेकिन कभी-कभी मन में एक अजीब सा खलल भी महसूस करते थे।
श्याम बाबू का बेटा रवि एक होशियार और मेहनती युवक था। उसे सरकारी नौकरी में सब इंस्पेक्टर की पोस्ट मिली थी और वह बहुत गर्व महसूस करता था कि वह कानून की रक्षा करने में अपनी भूमिका निभा सकता है। रवि को हमेशा अपने परिवार और अपनी जिम्मेदारियों को लेकर चिंता रहती थी, लेकिन उसने कभी अपने माता-पिता की भलाई के बारे में ज्यादा नहीं सोचा था। वह अपने करियर में इतना व्यस्त था कि उसे यह भी नहीं पता था कि उसके माता-पिता का जीवन कितना कठिन हो रहा था।
परिवार की स्थिति
रवि के माता-पिता, श्याम बाबू और वसुधा, शहर में अकेले रहते थे। कुछ साल पहले गाँव में एक बड़ी कंपनी आई थी, जिसने उनकी ज़मीन अधिग्रहित कर ली थी और बदले में उन्हें एक अच्छा मुआवजा मिला था। रवि के माता-पिता, जिनकी उम्र बढ़ रही थी, अब बहुत अकेले हो गए थे। उनका बेटा दिल्ली में अपनी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था और उन्होंने अपने माता-पिता को बताया कि उन्हें घर में अकेला छोड़कर शहर में अपने पास रखना मुश्किल हो जाएगा। श्याम बाबू और वसुधा ने भी सोचा कि शायद यह उनके बेटे का सही निर्णय है और उन्होंने उसे समझाने की कोशिश नहीं की।
वह अपनी ज़िंदगी को एक नई शुरुआत देने के लिए अपने बेटे की मदद करने के बजाय उसे ही खुश रखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनके दिल में अकेलेपन की भावना घर करने लगी। वसुधा ने कई बार सोचा था कि वह अपने बुजुर्ग पिता को वृद्धाश्रम भेज दें, लेकिन रवि ने उन्हें हमेशा यह कहा था कि वह अब अकेले हैं और उनके पास कोई मदद करने वाला नहीं है। इससे पहले कि वह कुछ करें, उनके बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम भेजने का फैसला किया था।
वृद्धाश्रम की कहानी
कुछ महीनों बाद, रवि ने अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेज दिया। यह वृद्धाश्रम शहर से दूर एक सुनसान इलाके में था। श्याम बाबू और वसुधा को यह बहुत कष्टपूर्ण और दुखद अनुभव था। वे हमेशा उम्मीद करते थे कि उनका बेटा उन्हें घर पर देखेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रवि के माता-पिता ने कभी उसकी बातों का विरोध नहीं किया, लेकिन उनके दिल में हमेशा एक सवाल था कि क्या उनका बेटा उन्हें कभी समझेगा?
एक दिन रवि को अपने कार्यालय से एक सूचना मिली कि एक वृद्धाश्रम में कुछ बुजुर्गों को बहुत बुरी हालत में रखा गया है। यह सूचना उसके लिए एक धक्का थी, क्योंकि वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि वृद्धाश्रम में किसी को इस तरह की दुर्दशा में रखा जा सकता है। रवि ने तुरंत अपने दल को तैयार किया और वृद्धाश्रम में छापा मारा। जब वह वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बुजुर्गों को बहुत खराब स्थिति में रखा गया था। कुछ बुजुर्गों की हालत तो इतनी खराब थी कि वे लगभग जीवित नहीं लग रहे थे।
रिवर्स इमोशन
रवि और उसकी टीम ने तुरंत कार्रवाई की और वृद्धाश्रम के कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन जब वह एक कमरे में गए, तो उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग आदमी पड़ी हुई है, उसकी हालत बहुत खराब थी। जब रवि ने उसके पास जाकर देखा तो वह पहचान नहीं पाया, लेकिन जैसे ही उसने उसका चेहरा देखा, उसकी धड़कन रुक गई। यह श्याम बाबू थे, उसके दादा जी। वह आदमी जिसे वह वर्षों से भूल चुका था, वह वहीं पड़ा था। श्याम बाबू के चेहरे पर जीवन की कोई हलचल नहीं थी, उनकी आंखों में कोई उम्मीद नहीं थी।
रवि की आँखों से आंसू छलक पड़े और वह चिल्लाया, “दादा जी!” वह तुरंत उनके पास गया और उन्हें ठीक से उठाकर अस्पताल ले जाने का प्रयास किया। लेकिन इस दृश्य ने रवि को पूरी तरह से हिला दिया। उसे समझ में नहीं आया कि वह कैसे इस स्थिति में आया था। उसने अपने माता-पिता से कभी यह नहीं पूछा था कि वे वृद्धाश्रम क्यों गए, लेकिन आज उसे सब कुछ साफ़ हो गया।
माता-पिता का धोखा
रवि ने जब श्याम बाबू से पूछा कि वह वृद्धाश्रम में क्यों गए थे, तो उन्होंने धीरे-धीरे अपनी कहानी बताई। श्याम बाबू ने बताया कि कई साल पहले, जब वह ज़मीन का मुआवजा ले रहे थे, तब रवि के माता-पिता ने उन्हें घर में रखने के बजाय यह कह दिया था कि वे वृद्धाश्रम में चले जाएं। रवि के माता-पिता ने उन्हें किसी तरह इस स्थान पर भेज दिया था, यह सोचकर कि उन्हें बोझ नहीं बनना चाहिए।
श्याम बाबू की बातों को सुनकर रवि के दिल में गुस्सा और शर्म दोनों पैदा हुए। वह महसूस कर रहा था कि उसने अपने माता-पिता को कभी समझा नहीं और न ही उनकी मदद की। श्याम बाबू ने कहा, “बेटा, माता-पिता चाहे जैसे भी हों, वह हमेशा अपने बच्चों के लिए होते हैं। वह हर हालत में उनकी परवाह करते हैं, लेकिन कभी बच्चे यह नहीं समझ पाते।” रवि ने कसम खाई कि वह अब अपने माता-पिता से यह सबक नहीं जाने देगा।
रवि का फैसला
रवि ने श्याम बाबू को अपनी गोदी में उठाया और उन्हें अपने घर ले आया। उसने अपनी पत्नी सौम्या से कहा कि वह अब अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं रख सकता। उसने अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने का फैसला लिया और उन्हें सजा दिलवाने की कसम खाई। कुछ ही समय बाद, रवि ने अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम से निकाल लिया और उनकी जगह खुद अपने माता-पिता के साथ रहने का फैसला किया।
निष्कर्ष
रवि की कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी भी अपने माता-पिता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। किसी भी स्थिति में हमें उनका सम्मान करना चाहिए, चाहे वे हमें समझ में आ रहे हों या नहीं। यह कहानी हमें यह भी बताती है कि हमें अपने कर्मों का फल हमेशा मिलता है, और जीवन में कभी देर नहीं होती है जब तक हम अपने गलतियों से सीखने का अवसर प्राप्त करते हैं।
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