तलाक के बाद पति टैक्सी चला रहा था… एक दिन उसी में बैठी उसकी पत्नी 

अहंकार, अवशेष और अंतिम सत्य: एक प्रेम कथा का पतन और पुनर्जन्म

यह कहानी केवल दो इंसानों के बिछड़ने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस सूक्ष्म अहंकार की जो रिश्तों की जड़ों में दीमक की तरह लग जाता है। इंदौर की गलियों से शुरू हुआ यह सफर, सिंगापुर की ऊंचाइयों और फिर टैक्सी की स्टयरिंग के बीच के संघर्ष की दास्तां है।

अध्याय 1: कॉलेज के वो सुनहरे दिन

राहुल और प्रिया की पहली मुलाकात इंदौर के एक कॉलेज के सांस्कृतिक उत्सव में हुई थी। राहुल अपनी इंजीनियरिंग की किताबों और कोडिंग की दुनिया में खोया रहने वाला लड़का था, जबकि प्रिया कॉमर्स विभाग की सबसे प्रतिभाशाली और स्वतंत्र विचारधारा वाली लड़की थी।

“क्या तुम कॉमर्स से हो?” राहुल ने पहली बार लाइब्रेरी में प्रिया से बात करने की हिम्मत जुटाई थी। प्रिया ने अपनी चश्मा ठीक करते हुए जवाब दिया था, “हाँ, और मुझे लगता है कि इंजीनियरिंग वालों को लाइब्रेरी का रास्ता कम ही पता होता है।”

वह मजाक उनके प्यार की पहली सीढ़ी बना। वे घंटों कैंटीन में चाय की चुस्कियों के साथ अपने सपनों की बातें करते थे। प्रिया हमेशा कहती थी, “राहुल, मुझे अपनी पहचान खुद बनानी है। मैं किसी की परछाई बनकर नहीं रहना चाहती।” राहुल उस समय उसकी इस बात पर गर्व करता था, उसे पता नहीं था कि यही स्वाभिमान एक दिन उसके पुरुष अहंकार को चुभेगा।

अध्याय 2: शादी का सपना और हकीकत का सामना

दोनों को अच्छी नौकरियां मिलीं। राहुल एक बड़ी आईटी कंपनी में और प्रिया एक मल्टीनेशनल फर्म में। शादी धूमधाम से हुई। पहले छह महीने किसी परियों की कहानी जैसे थे। लेकिन जैसे ही ‘हनीमून पीरियड’ खत्म हुआ, घर की जिम्मेदारियां सामने आने लगीं।

झगड़े छोटे थे—”प्रिया, तुमने खाना क्यों नहीं बनाया?” या “राहुल, क्या तुम बर्तन नहीं धो सकते?” लेकिन इन छोटे झगड़ों के पीछे एक बड़ा युद्ध चल रहा था। राहुल के भीतर का पारंपरिक पुरुष यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी उससे ज्यादा सफल हो रही है और देर रात तक ऑफिस में काम करती है।

“घर औरतों से चलता है, करियर से नहीं!” राहुल का यह एक वाक्य उनके रिश्ते की पहली बड़ी दरार बन गया।

अध्याय 3: दरारें जो खाई बन गईं

जब प्रिया को सिंगापुर का प्रोजेक्ट मिला, तो वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी। लेकिन राहुल के लिए यह उसके ‘अधिकार’ पर हमला था। “तुम मुझे छोड़कर 6 महीने के लिए बाहर जाओगी? लोग क्या कहेंगे कि पति घर पर अकेला है और पत्नी विदेश में मजे कर रही है?”

प्रिया ने जवाब दिया था, “यह मजे नहीं, मेरा करियर है राहुल। तुम भी तो जा सकते थे, मैं तुम्हें सपोर्ट करती।” लेकिन राहुल का अहंकार उसे ‘सपोर्ट’ लेने की इजाजत नहीं दे रहा था। अंततः, कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि जो हाथ कभी एक-दूसरे को थामने के लिए बने थे, उन्होंने तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए।

अध्याय 4: सफलता की ऊंचाई और पतन की गहराई

तलाक के बाद प्रिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह सिंगापुर गई, फिर लंदन और अंततः भारत लौटकर एक रीजनल हेड बनी। उसने अपने अकेलेपन को अपनी ताकत बना लिया। लेकिन राहुल?

राहुल का अहंकार उसे ले डूबा। उसे लगा कि वह प्रिया के बिना ज्यादा बेहतर करेगा। लेकिन उसका ध्यान काम से हट गया। ऑफिस में चिड़चिड़ापन और ईर्ष्या ने उसकी छवि खराब कर दी। पहले उसकी तरक्की रुकी, फिर मंदी के बहाने उसे नौकरी से निकाल दिया गया।

अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि वह आपको अपनों से दूर कर देता है। जब राहुल के पास पैसे खत्म होने लगे, तो उसके ‘दोस्त’ भी गायब हो गए। अंततः, सर्वाइवल के लिए उसे टैक्सी चलानी पड़ी।

अध्याय 5: वो नियति का मोड़—टैक्सी में पुरानी यादें

तीन साल बाद, एक शाम राहुल की टैक्सी में जो सवारी बैठी, उसने उसका पूरा ब्रह्मांड हिला दिया। प्रिया! राहुल ने टोपी नीची कर ली, चश्मा लगा लिया। वह नहीं चाहता था कि उसकी सफलता की मिसाल रही पत्नी उसे इस हाल में देखे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

ट्रैफिक जाम में जब प्रिया की नजर राहुल की उंगली की उस अंगूठी पर पड़ी जो उसने शादी में पहनाई थी, तो उसकी चीख निकल गई। “राहुल? तुम… तुम यहाँ?”

राहुल की खामोशी में हजार शब्द थे। वह हार चुका था। उसकी आँखों से गिरे आँसू उसकी टैक्सी की सीट पर नहीं, बल्कि उसके टूटे हुए अहंकार पर गिर रहे थे।

अध्याय 6: प्रायश्चित का आंसू

प्रिया उस रात सो नहीं सकी। उसने राहुल को इस हाल में देखा था जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। राहुल ने घर जाकर अपनी पुरानी फोटो एलबम निकाली। उसे एहसास हुआ कि जिस करियर और स्टेटस के पीछे उसने अपनी पत्नी को खोया, आज न उसके पास वो करियर है और न ही वो गौरव।

अगले दिन प्रिया ने राहुल को एक कैफे में बुलाया। “राहुल, तुम वापस कोडिंग क्यों नहीं शुरू करते? तुम बहुत अच्छे थे उसमें।” प्रिया ने सहजता से पूछा। राहुल ने सिर झुकाकर कहा, “प्रिया, मैं अपनी नजरों में गिर चुका हूँ। मुझे लगता था कि मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं ‘पुरुष’ हूँ। आज समझ आया कि इंसान छोटा या बड़ा अपनी मेहनत और व्यवहार से होता है, लिंग से नहीं।”

अध्याय 7: एक नई शुरुआत (नया सवेरा)

कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। प्रिया ने राहुल को अपनी कंपनी में नहीं, बल्कि एक दोस्त की स्टार्टअप में सिफारिश की। उसने राहुल से कहा, “मैं तुम्हें पैसे नहीं दे रही, बस एक मौका दे रही हूँ अपना सम्मान वापस पाने का।”

राहुल ने दिन-रात एक कर दिया। वह टैक्सी चलाने के बाद रात भर कोडिंग सीखता। धीरे-धीरे उसने अपनी स्किल्स अपडेट कीं। एक साल बाद, उसे एक अच्छी सॉफ्टवेयर फर्म में सीनियर डेवलपर की नौकरी मिल गई।

क्या वे फिर से एक हुए? शायद हाँ, शायद नहीं। लेकिन राहुल अब बदल चुका था। अब वह किसी को ‘छोटा’ नहीं समझता था। उसने समझ लिया था कि प्यार का मतलब साथ चलना है, एक-दूसरे के आगे निकलने पर टांग खींचना नहीं।

निष्कर्ष और जीवन की सीख

राहुल और प्रिया की यह कहानी हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:

    अहंकार रिश्तों का कातिल है: यदि आप अपने जीवनसाथी की सफलता में अपनी जीत नहीं देख सकते, तो आप कभी खुश नहीं रह पाएंगे।
    समय का पहिया: आज आप ऊपर हैं, कल नीचे हो सकते हैं। इसलिए कभी भी अपनी सफलता पर घमंड न करें और दूसरों को नीचा न दिखाएं।
    सम्मान प्यार से बड़ा है: एक छत के नीचे रहने के लिए केवल प्यार काफी नहीं है, एक-दूसरे के काम और सपनों का सम्मान करना अनिवार्य है।

अंतिम संदेश: यदि आप भी अपने पार्टनर के सपनों को सिर्फ इसलिए दबा रहे हैं क्योंकि वह आपसे आगे निकल रहे हैं, तो रुकिए! कहीं ऐसा न हो कि एक दिन आपके पास सिर्फ आपकी जीत हो और उसे साझा करने के लिए कोई अपना न बचे।

लेखक की टिप्पणी: जिंदगी हमें कई मौके देती है, लेकिन कुछ मौके हम अपनी जिद में खो देते हैं। राहुल को अपनी गलती सुधारने का मौका मिला, लेकिन सबको नहीं मिलता। अपने रिश्तों की कद्र करें।