जिसे मामूली बुज़ुर्ग समझकर भगाया, वो सेना का ‘बाप’ निकला!

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लद्दाख की बर्फ़ीली ऊँचाइयों में अक्टूबर की आख़िरी हवा किसी तेज़ धार वाले चाकू जैसी चुभती है। रात भर की ठंड से पत्थर तक सिकुड़ जाते हैं, और सुबह की पहली रोशनी में इंसान के मुँह से निकलती भाप भी धुएँ की तरह लगती है। उसी मौसम की एक सुबह दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे के एक कोने में एक बुज़ुर्ग चुपचाप खड़े थे—पुरानी जैतूनी-हरी फौजी जैकेट, साधारण ऊनी टोपी, और हाथ में एक पुराना-सा टिफिन बैग।

देखने वाला उन्हें आम दादाजी समझता—किसी गाँव के, किसी शहर के, किसी भीड़ का हिस्सा। मगर उनका नाम विक्रम सिंह चौहान था। कभी उनके नाम से पहले “जनरल” लगा करता था। कभी वे सेना के सबसे ऊँचे पद तक पहुँचे थे। मगर रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपने पद, अपनी चमक और अपनी पहचान को ऐसे समेटकर रख दिया था जैसे कोई शेर अपने पंजों की नोक छुपाकर घास में चलने लगे—आवाज़ कम, पर असर वही।

टिफिन बैग में आज कोई साधारण खाना नहीं था। आज सुबह सूरज निकलने से पहले वे उठे थे। उन्होंने अपने हाथों से रोटियाँ बनाई थीं, और अपने पोते अर्जुन का पसंदीदा मटन कोरमा बहुत प्यार से पकाया था। मसालों की खुशबू उनके छोटे-से घर में फैल गई थी, तो उन्हें कुछ पल के लिए ऐसा लगा था जैसे उनकी पत्नी अभी भी रसोई में है, और उनका बेटा-बहू मेज़ पर बैठे हँस रहे हैं। लेकिन वह भ्रम जल्दी टूट गया—पत्नी गुज़रे जमाने की बात थी, और बेटा-बहू एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में बहुत पहले दुनिया छोड़ चुके थे।

अब उनके पास बस अर्जुन था—उनका आख़िरी सहारा, आख़िरी उम्मीद। वही अर्जुन, जो तीन महीने पहले देश की सेवा के लिए लद्दाख की एक अगली चौकी पर पहुँचा था। अर्जुन के संदेश छोटे होते थे, पर उनमें ठंड की चुभन भी होती थी और फौजी जीवन की कठोरता भी। “दादाजी, यहाँ हवा बहुत तेज़ है।” “दादाजी, दिन छोटे हैं।” “दादाजी, सब ठीक है—आप चिंता मत करना।”

विक्रम सिंह ने हर संदेश पढ़कर यही सोचा—‘सब ठीक’ लिखने वाला जवान अक्सर अपनी चोट भी छुपा लेता है। और पोता तो फिर भी उनका बच्चा था। इसी चिंता और प्यार के बीच उन्होंने तय किया कि वे बिना बताए अर्जुन के पास जाएँगे। न कोई शोर, न कोई पहचान। बस एक दादाजी अपने पोते के लिए खाना लेकर।

बस के स्पीकर पर घोषणा हुई—“लेह के लिए सुबह 6:30 बजे की बस रवाना होने वाली है।” विक्रम सिंह ने धीरे से अपने कंधे सीधा किए और बस में चढ़ गए। उनकी चाल अब जवान दिनों जैसी तेज़ नहीं थी, पर हर कदम में ठहराव था—वही ठहराव जो मैदान में “सावधान” खड़े सैनिक के भीतर होता है।

दिल्ली पीछे छूटने लगी। फिर हरियाणा, पंजाब, जम्मू—और धीरे-धीरे पहाड़ों की घुमावदार सड़कें। खिड़की के बाहर नज़ारे बदलते गए। पेड़ों के पत्ते झड़ चुके थे, और नंगे तने सर्द हवा में काँपते थे। कहीं-कहीं “बारूदी सुरंगों से सावधान” वाले बोर्ड दिखाई देते। सैन्य क्षेत्र के फाटक, चौकियाँ, और दूर-दूर तक फैली वह जमीन—जिसे विक्रम सिंह अपनी हथेली की लकीरों की तरह पहचानते थे।

बस की सीट पर बैठे-बैठे उनकी आँखें कुछ देर के लिए बंद हो गईं, और यादें चलने लगीं। यही इलाके… वही ठंड… वही तनाव। लेफ्टिनेंट के दिनों में एक ऑपरेशन के दौरान उनके पैरों की उँगलियाँ लगभग जम गई थीं। कैप्टन के रूप में एक बार एक जवान की गलती से चली गोली ने पूरी रात उनकी छाती में आग भर दी थी। कमांडिंग ऑफिसर बनने पर उन्होंने पहली बार महसूस किया था कि कमान का मतलब सिर्फ आदेश देना नहीं होता—कमान का मतलब है दूसरों की जान अपने कंधों पर रखना।

और फिर—सितारे। कंधे पर सितारे लगना आसान नहीं होता, पर उनसे बड़ा होता है उन सितारों का बोझ। उस बोझ से बड़ा होता है जवानों के घरों का भरोसा। बहुत साल पहले अर्जुन ने उनसे पूछा था—“दादाजी, फौजी बनना कैसा लगता है?”

विक्रम सिंह ने तब मुस्कुरा कर कहा था—“बेटा, फौजी बनना मतलब अपने नाम के आगे ‘मैं’ की जगह ‘हम’ लिखना सीखना। मतलब ये समझना कि तुम अकेले नहीं हो। तुम्हारे पीछे देश की उम्मीद है। और तुम्हारे साथियों की साँसें तुम्हारे फैसलों पर टिकती हैं। यह रास्ता मुश्किल है, कभी-कभी अन्यायपूर्ण भी लगेगा। मगर जब तुम इस वजन को उठा लोगे, तब तुम फौजी नहीं—एक जिम्मेदार इंसान बनोगे।”

अब वही अर्जुन उस बर्फ़ीली धरती पर तैनात था, और विक्रम सिंह उसका मन हल्का करने के लिए उसके बचपन का स्वाद लेकर जा रहे थे।

कई घंटे की यात्रा के बाद बस लेह पहुँची। यहाँ की हवा अलग थी—ठंडी, साफ़, और फेफड़ों में उतरकर भीतर तक काटने वाली। विक्रम सिंह ने टैक्सी पकड़ी और कहा—“लद्दाख स्काउट्स की सातवीं बटालियन के मेन गेट तक।”

ड्राइवर ने एक बार उनके चेहरे को देखा, फिर टिफिन बैग को। मुस्कुरा कर बोला—“बाऊजी, बेटे से मिलने जा रहे हो?”

“पोते से,” विक्रम सिंह ने कहा। उनके जवाब में गर्व भी था और खालीपन भी।

टैक्सी सुनसान रास्तों से गुज़री। दूर पहाड़ विशाल दीवारों की तरह खड़े थे। खेत कट चुके थे, मिट्टी सूनी थी। फिर एक भव्य गेट दिखाई दिया। उस पर रेजीमेंट का नारा लिखा था—पहाड़ों के शेर, मौत से निडर। विक्रम सिंह का दिल हल्का-सा काँपा। यही जगह कभी उनके लिए घर जैसी थी। आज वे यहाँ एक आम नागरिक की तरह खड़े थे।

गेट के पास संतरी पोस्ट थी। बैरियर के पास दो जवान राइफल लिए खड़े थे। उनके सामने एक युवा अफसर—कड़क वर्दी, सीधे कंधे, और चेहरा ऐसा जैसे अभी-अभी अकादमी से निकला हो। नेमप्लेट पर लिखा था: लेफ्टिनेंट विवेक शर्मा।

विक्रम सिंह ने आदर से कहा—“जय हिंद।”

विवेक ने ऊपर से नीचे तक देख लिया, जैसे पहचान नहीं—खतरा जाँच रहा हो। “किस काम से आए हैं?”

“मैं यहाँ हेडक्वार्टर कंपनी में तैनात सिपाही अर्जुन सिंह चौहान से मिलने आया हूँ,” विक्रम सिंह ने नरम आवाज़ में कहा। “उसका दादाजी।”

विवेक ने कलाई घड़ी देखी। “अभी मुलाकात का समय नहीं है। और आज यूनिट में जरूरी काम है, इसलिए मुलाकात और बाहर जाना बंद है। आप वापस जाइए।”

विक्रम सिंह ने क्षण भर के लिए शब्द चुने। नियम वे भी जानते थे। ऑपरेशन, सुरक्षा, दौरा—बहुत कारण हो सकते हैं। लेकिन विवेक की आवाज़ में शिष्टाचार नहीं था। वह नियम नहीं बता रहा था—वह किसी को हटाकर खुद को सही साबित कर रहा था।

“क्या मैं कारण जान सकता हूँ?” विक्रम सिंह ने फिर पूछा। “मैं दूर से आया हूँ। अगर इंतजार करना पड़े तो…”

विवेक का चेहरा चिढ़ से तना। “यह सेना की गोपनीय जानकारी है। आपको बताने की जरूरत नहीं। मैंने कह दिया—नियमों के अनुसार नहीं हो सकता। अब और बाधा मत डालिए। आप सिविलियन हैं।”

‘सिविलियन’ शब्द विक्रम सिंह के कान में चुभा। वे अपने भीतर हँसे भी और टूटे भी। जीवन भर वर्दी पहनी, वर्दी के लिए जिए—और आज वही वर्दी उन्हें बाहर खड़ा कर रही थी। मगर उन्हें गुस्सा नहीं आया। उन्हें निराशा हुई—क्योंकि यह सख्ती नहीं थी, यह घमंड था।

“ठीक है,” विक्रम सिंह ने शांत स्वर में कहा। “क्या मैं किसी जेसीओ या कंपनी कमांडर से एक मिनट बात कर सकता हूँ? मैं बस खाना दे दूँ, ठंडा होने से पहले…”

“नहीं हो सकता,” विवेक ने बात काट दी। “आज डिवीजन कमांडर साहब के दौरे की तैयारी है। एक सिपाही के लिए मैं अनुशासन नहीं तोड़ सकता। अंकल जी, फौज वैसी नहीं है जैसा आप सोचते हैं। अब जाइए।”

वह अंतिम वाक्य जैसे पत्थर बनकर विक्रम सिंह की छाती में बैठ गया। फौज वैसी नहीं है जैसा आप सोचते हैं—यह कहने वाला नौजवान क्या जानता था कि सामने वाला इसी फौज की सांस रहा है, इसकी हड्डियों का हिस्सा रहा है।

विक्रम सिंह कुछ बोले नहीं। वे चुपचाप मुड़े, पर वापस भी नहीं गए। गेट से थोड़ी दूर बस स्टॉप की सीमेंट की बेंच पर बैठ गए। टिफिन बैग उनके हाथ में था। कोरमा की गर्माहट धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।

उधर विवेक ने अपनी ‘विजय’ महसूस की—नियम बच गए, अनुशासन बच गया। उसे विश्वास था कि भावनाओं का “वायरस” फौज को कमजोर करता है। वह अपने दफ्तर लौट गया, फाइलें खोलीं, दौरे की तैयारी में डूब गया। उसे पता ही नहीं था कि जिस बुजुर्ग को उसने “अंकल जी” कहकर हटाया है, वह एक फोन कॉल से पूरा मुख्यालय हिला सकता है।

बेंच पर बैठे विक्रम सिंह के भीतर यादों की एक और परत खुली। उन्हें तीस साल पुराना एक लेफ्टिनेंट याद आया—बहुत जोशीला, बहुत नियमप्रिय। उसने एक ट्रेनिंग में जवानों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाला था। एक जवान थककर फिसल गया, टखना टूट गया। उस दिन विक्रम सिंह ने लेफ्टिनेंट को डांटा नहीं था। उन्होंने बस कहा था—“किताब में नियम लिखे हैं, लेकिन किताब में यह नहीं लिखा कि ठंड में कांपते जवान की माँ का दिल कैसे काँपता है। एक कमांडर को वह भी पढ़ना चाहिए जो किताब में नहीं लिखा।”

उन्हें लगा—विवेक भी वही गलती कर रहा है। फर्क इतना है कि उसे अभी किसी ने रोका नहीं। और अगर ऐसे अफसर बढ़ते गए तो फौज के भीतर अनुशासन तो होगा, पर दिल नहीं होगा। और बिना दिल के संगठन कठोर तो हो सकता है, महान नहीं बन सकता।

विक्रम सिंह ने अपनी जैकेट की भीतरी जेब से पुराना-सा फोल्डर फोन निकाला। उसमें ज्यादा नंबर नहीं थे—कुछ पुराने साथी, कुछ शिष्य, और एक नंबर: “मेरा शिष्य राजवीर।”

मेजर जनरल राजवीर सिंह राठौर—इस समय उसी डिवीजन के कमांडर, जिनका दौरा अगले हफ्ते था। राजवीर कभी विक्रम सिंह के अधीन रहे थे। जोशीले, तेज, कभी-कभी गुस्सैल—लेकिन भीतर से सच्चे। विक्रम सिंह ने उन्हें इंसानियत और अनुशासन के बीच संतुलन का पाठ पढ़ाया था।

अंगूठा कॉल बटन पर रुका। विक्रम सिंह जानते थे कि यह कॉल “तूफान” बन सकती है। किसी युवा अफसर का करियर हिल सकता है। पूरी यूनिट काँप सकती है। लेकिन कभी-कभी विकास के लिए तूफान जरूरी होता है। उन्होंने कॉल दबा दी।

दूसरी तरफ, डिवीजन मुख्यालय में मीटिंग चल रही थी। मेजर जनरल राजवीर सिंह नक्शे के सामने खड़े स्टाफ को डांट रहे थे—तोपखाने की योजना, समन्वय, तैयारी—सब पर उनकी नजर थी। तभी उनका निजी फोन बजा। मीटिंग के दौरान वे निजी कॉल नहीं उठाते थे, लेकिन स्क्रीन पर नाम देखकर उनकी देह जैसे जम गई: “विक्रम सिंह चौहान जी।”

उनके चेहरे से गुस्सा गायब हो गया। उन्होंने तुरंत कहा—“मीटिंग रोको।” और फोन उठा लिया। आवाज़ अपने आप विनम्र हो गई। “जय हिंद, सर। आप ठीक हैं? इस समय…?”

फोन पर शांत आवाज़ आई—“राजवीर, व्यस्त हो क्या? मैं अभी तुम्हारी सातवीं बटालियन के गेट के बाहर खड़ा हूँ।”

राजवीर को लगा जैसे किसी ने सिर पर हथौड़ा मारा। “सर… गेट पर? आप वहाँ कैसे…?”

“पोते से मिलने आया था। लेकिन आजकल तुम्हारी फौज का अनुशासन बहुत सख्त है। एक युवा लेफ्टिनेंट ने रोक दिया। कहा, डिवीजन कमांडर के दौरे की वजह से मुलाकात मना है।” एक क्षण की चुप्पी। फिर उसी शांत स्वर में—“बहुत बढ़िया फौजी है। नियमों का एकदम पक्का।”

राजवीर समझ गए—यह तारीफ नहीं, यह आईना है। यह वही आईना, जिसमें उन्हें अपनी कमान की कमी दिख रही थी। उनके गुरु गेट के बाहर ठंड में बैठे थे और उनकी यूनिट का एक लेफ्टिनेंट उन्हें ‘सिविलियन’ कहकर भेज चुका था।

राजवीर के अंदर शर्म और गुस्सा एक साथ उठे। “सर, मैं अभी… मैं तुरंत…”

“रहने दो,” विक्रम सिंह ने कहा। “मैं अब सिविलियन हूँ। नियमों का पालन करना चाहिए। बस तुम्हारी आवाज सुननी थी। अगले हफ्ते दौरे की तैयारी अच्छे से करना। तुम्हारी यूनिट है। मुझे तुम पर भरोसा है।”

कॉल कट गई।

राजवीर कुछ पल फोन पकड़े शून्य में देखते रहे। “मुझे तुम पर भरोसा है”—इस वाक्य में जितना प्यार था, उतनी ही बड़ी चोट भी। यह भरोसा टूटने की चेतावनी थी।

उन्होंने एक झटके में आदेश दिए। “गाड़ी तैयार करो। अभी। सातवीं बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर, डिप्टी, सूबेदार मेजर, कंपनी कमांडर—सब पाँच मिनट में मेन गेट पर। और हेडक्वार्टर कंपनी का लेफ्टिनेंट विवेक शर्मा—उसको भी वहीं बुलाओ। मैं उसका चेहरा खुद देखूँगा।”

मुख्यालय एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह हिल गया। वायरलेस पर आवाजें दौड़ने लगीं, जीपें तैयार होने लगीं। राजवीर तूफान की तरह बाहर निकले।

उधर विवेक शर्मा अपने दफ्तर में फाइलों को देख रहा था। उसे लग रहा था सब कुछ नियंत्रण में है। तभी कंपनी कमांडर का फोन आया। आवाज घबराई हुई—“विवेक, तुमने गेट पर क्या किया?”

विवेक ने ठंडे स्वर में कहा—“सर, मैंने नियमों के अनुसार कार्रवाई की। मुलाकात का समय नहीं था।”

दूसरी तरफ चीख सी निकली—“तुम्हें पता है वो कौन थे? अभी के अभी गेट पर पहुँcho!”

फिर कमांडिंग ऑफिसर का फोन—“विवेक, तुम खत्म हो गए हो। जीओसी साहब खुद आ रहे हैं। उन्होंने तुम्हारा नाम लिया है। अभी गेट पर!”

विवेक का खून जैसे सूख गया। जीओसी? मेरा नाम? उसने दौड़ लगाई। गलियारे में अफसर भाग रहे थे। जवान कानाफूसी कर रहे थे। गेट की ओर जाते हुए विवेक ने पहली बार अपने भीतर डर के साथ-साथ एक अजीब पछतावा महसूस किया—वह बुजुर्ग की आँखें याद आईं। शांत, गहरी, बिना शिकायत के। जैसे कह रही हों—“बच्चे, तुम अभी नहीं जानते।”

गेट पर पहुँचकर उसने जो दृश्य देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। कर्नल साहब की गाड़ी, कमांडिंग ऑफिसर, कंपनी कमांडर—सब मौजूद थे। सबके चेहरे सफेद। सब की नजर सड़क के मोड़ पर।

और फिर काली जीपों का काफिला आया। सबसे आगे डिवीजन कमांडर का झंडा। जीप ने तेज ब्रेक लिया। धूल उड़ी। मेजर जनरल राजवीर सिंह राठौर गाड़ी से उतरे—शेर की तरह, आँखों में आग।

विवेक ने खुद को ‘सावधान’ में खड़ा किया, पर उसके घुटने काँप रहे थे। राजवीर ने एक बार सब अफसरों को देखा और बिना रुके सीधे बैरियर पार करके बाहर की ओर चल दिए—बस स्टॉप की बेंच की ओर।

सबकी नजरें वहीं गईं। बेंच पर वही बुजुर्ग—पुरानी जैकेट, हाथ में टिफिन, और चेहरे पर वही शांत ठहराव। राजवीर उनके सामने रुके। एक पल का सन्नाटा—सिर्फ हवा की सीटी सुनाई दी।

अगले ही क्षण राजवीर ने एड़ियाँ जोड़ीं और एक परफेक्ट सैल्यूट किया—ऐसा सैल्यूट जो सम्मान के आगे झुकता है, दिखावे के आगे नहीं। फिर उन्होंने सिर झुका दिया, इतना गहरा कि कमर लगभग 90 डिग्री पर आ गई।

उनकी आवाज काँप रही थी—“जय हिंद, सर। मेजर जनरल राजवीर सिंह राठौर आपको लेने आया हूँ। मैं अपने अफसर को सही तालीम नहीं दे सका। इसके लिए मैं… मैं शर्मिंदा हूँ, सर।”

“सर…?” विवेक के दिमाग में विस्फोट हुआ। राजवीर किसे ‘सर’ कह रहे हैं?

रेजिमेंटल सूबेदार मेजर के मुँह से फुसफुसाहट निकली—“बूढ़ा शेर… जनरल विक्रम सिंह चौहान।”

विवेक की साँस रुक गई। यह नाम उसने अकादमी में सुना था—किंवदंती की तरह। युद्धों के नायक, आधुनिकीकरण के अग्रदूत, सेना के शीर्ष पद तक पहुँचे “जीवित इतिहास”। लेकिन उन्होंने उनकी शक्ल कभी नहीं देखी थी। और आज… आज उसने उसी व्यक्ति को “अंकल जी” कहकर भगा दिया था।

विवेक की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। वह लड़खड़ाया। कंपनी कमांडर ने उसे पकड़ लिया।

विक्रम सिंह ने राजवीर के कंधे पर हल्का हाथ रखा—“राजवीर, बस करो। सिर उठाओ। गलती मेरी भी है कि मैं बिना बताए आ गया। चलो, अंदर चलकर बात करते हैं। जवानों के सामने तुम्हारी इज्जत का सवाल है।”

विक्रम सिंह धीरे-धीरे गेट की ओर बढ़े। रास्ता अपने आप बनता गया। कर्नल से लेकर संतरी तक—सब सावधान, सिर झुका। विवेक ने सिर नहीं उठाया। उसे लग रहा था जैसे उसका घमंड उसी हवा में उड़ गया, जिस पर वह रोज़ “अनुशासन” का भाषण देता था।

कुछ देर में तीन लोग कमरे में थे—विक्रम सिंह, मेजर जनरल राजवीर, और लेफ्टिनेंट विवेक। बाहर बाक़ी अफसर प्रतीक्षा में थे। कमरे में चाय आई। विक्रम सिंह ने कप उठाया, एक घूँट लिया, फिर विवेक की ओर देखा।

“लेफ्टिनेंट विवेक शर्मा,” उन्होंने शांत आवाज़ में कहा।

“जी… सर,” विवेक की आवाज काँप रही थी।

“नियमों का पालन करने की तुम्हारी इच्छा गलत नहीं है,” विक्रम सिंह बोले। “फौज नियम और अनुशासन पर ही चलती है। इसलिए मैं तुम्हें सीधे अपराधी कहकर खत्म नहीं करना चाहता।”

विवेक ने अनजाने में थोड़ा सिर उठाया। उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी हस्ती उससे नरमी से बात करेगी।

लेकिन अगले ही पल विक्रम सिंह का स्वर थोड़ा भारी हुआ—गुस्से से नहीं, जिम्मेदारी से। “वर्दी का वजन सिर्फ सितारों से नहीं आता, बेटा। वर्दी का वजन इस बात से आता है कि तुम इस वर्दी में इंसान से कैसे बात करते हो। नागरिकों के लिए नियम बने हैं—नागरिकों के खिलाफ नहीं। अगर तुम नियमों के नाम पर इंसानियत को कुचल दोगे, तो तुम अनुशासित नहीं—निर्दयी बन जाओगे। और फौज को निर्दय नहीं, मजबूत और न्यायपूर्ण बनना चाहिए।”

विवेक की आँखों से आँसू निकल आए। वह भीतर से टूट गया। “सर… माफ कर दीजिए। मैं… मैं समझ नहीं पाया। मैंने घमंड किया। मैंने आपको… मैं…”

“उठो,” विक्रम सिंह ने कहा। उन्होंने विवेक के कंधे पर हाथ रखा—वही हाथ, जिसने कभी हजारों जवानों को शाबाशी भी दी थी और समझ भी। “तुम्हारा करियर खत्म करने से देश को क्या मिलेगा? गलती का इलाज सजा नहीं—सुधार है। आज की शर्म को अपनी हड्डियों में रखो। ऐसा कमांडर बनो जो नियम भी जानता हो और दिल भी।”

फिर वे राजवीर की ओर मुड़े—“राजवीर, मैं तुम्हें कभी यह सिखाकर नहीं गया था कि अनुशासन का मतलब ठंडा दिल है। अनुशासन का मतलब है सही समय पर सही फैसला—और उसमें इंसानियत भी शामिल है। अपने अफसरों को यह पाठ दोबारा पढ़ाओ।”

राजवीर ने सिर झुका लिया। “जी, सर।”

कुछ पल बाद विक्रम सिंह की आवाज में हल्की-सी मुस्कान आ गई—“अब मुझे मेरे पोते का चेहरा देखने दो। यह मटन कोरमा ठंडा हो गया होगा।”

उसी समय अर्जुन को बुलाया गया। वह घबराया हुआ अंदर आया—उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने कमरे में देखा—उसका प्लाटून कमांडर विवेक पीला पड़ा खड़ा था, मेजर जनरल खुद चाय परोस रहे थे, और बीच में उसके दादाजी शांत बैठे थे।

“अर्जुन,” दादाजी ने कहा, “इधर आ, बैठ।”

अर्जुन के होंठ काँपे—“दादाजी… आप यहाँ…?”

विक्रम सिंह ने टिफिन खोला। रोटी ठंडी थी, कोरमा भी। लेकिन मसालों की खुशबू अब भी उसमें फँसी थी। “ठंडा हो गया बेटा, पर खा ले। घर का स्वाद है।”

अर्जुन ने पहला कौर लिया। मांस ठंडा था, पर उसे लगा जैसे उसकी छाती में गर्मी उतर रही हो। उसकी आँखें भर आईं। उसे समझ आ गया था—आज किसी ने सिर्फ उसके दादाजी को नहीं रोका, आज किसी ने उसके दादाजी के भीतर छुपे उस इतिहास को न पहचानकर फौज के सबसे बड़े सबक को ललकार दिया था। और फिर उसी इतिहास ने बिना चीखे, बिना अपमान किए—सबको सही जगह खड़ा कर दिया था।

मुलाकात ज्यादा देर नहीं चली। जाते समय विक्रम सिंह ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा—“अपना ध्यान रखना। साथियों का ध्यान रखना। फौज का मतलब सिर्फ सीमा नहीं—साथी भी हैं।”

अर्जुन बस इतना कह सका—“जी, दादाजी।”

विक्रम सिंह चले गए। उनके जाने के बाद भी उनके आने से उठी लहरें यूनिट में लंबे समय तक गूंजती रहीं। मेजर जनरल राजवीर ने कर्नल और अफसरों से कहा—“आज याद रखो—फौज का असली मालिक जनता है। वर्दी हमें हुकूमत करने के लिए नहीं, सेवा करने के लिए मिली है।”

विवेक पर कोई बड़ी औपचारिक कार्रवाई नहीं हुई—यह खुद विक्रम सिंह की इच्छा थी। लेकिन विवेक के लिए असली सजा भीतर थी। उस शाम वह अकेला बैठा रहा। फाइलों के ढेर को देखता रहा—जो अब उसे रद्दी लग रहे थे। उसके कानों में वही शब्द बज रहे थे—“वर्दी का वजन…”

कुछ देर बाद सूबेदार मेजर आए और कॉफी रख गए। बोले—“साहब, गिरना सब गिरते हैं। सवाल ये है कि गिरकर इंसान बनते हो या पत्थर।”

विवेक ने पहली बार सच में सिर हिलाया। “मैं… मैं बदलने की कोशिश करूँगा।”

और वह बदला—धीरे-धीरे। अगले दिन उसने जवानों की वर्दी की सिलवटें देखने से पहले उनके चेहरे देखे। उसने अभी भी अनुशासन रखा, लेकिन उसकी सख्ती अब दिखावे के लिए नहीं—सुरक्षा के लिए थी। उसने अर्जुन से एक दिन बस इतना पूछा—“कल दादाजी का खाना खाया?” अर्जुन ने कहा—“जी, सर।” विवेक ने धीमे कहा—“अच्छा।”

यह छोटा-सा “अच्छा” एक अधूरी माफी जैसा था—और शायद एक नई शुरुआत भी।

हफ्ते बीते। सर्दी और गहरी हुई। दिल्ली में विक्रम सिंह के घर एक फौजी लिफाफा आया—अर्जुन की लिखावट।

“प्रिय दादाजी, यहाँ सर्दी जल्दी आ गई है। ठंड बहुत है, पर साथियों के साथ सहने लायक है। उस दिन के बाद मैं बहुत सोचता हूँ। अब समझ रहा हूँ कि फौजी का वजन क्या होता है—सिर्फ देश की सीमा नहीं, लोगों के दिलों की रक्षा भी। मैं एक दिन आपकी बातों के लायक बनूँगा। जय हिंद।”

विक्रम सिंह ने चिट्ठी सीने से लगा ली। बाहर बगीचे में ठंडी मिट्टी सोई हुई थी, मगर उसके नीचे वसंत की तैयारी चल रही थी। उन्होंने उत्तर की ओर देखा—उसी दिशा में, जहाँ लद्दाख था। सूरज ढल रहा था, लेकिन उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी।

उन्होंने कोई युद्ध नहीं लड़ा था उस दिन। कोई पद नहीं दिखाया था। उन्होंने बस एक बात फिर से साबित की थी—कि असली ताकत आवाज़ में नहीं, ठहराव में होती है। और असली “सेना का बाप” वह नहीं जो डर पैदा करे, बल्कि वह है जो अनुशासन के साथ इंसानियत को भी बचाए।

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