जिस माँ ने IAS बनाया, उसी माँ को बेटे ने घर से निकाल दिया… लेकिन फिर माँ ने जो किया…

माँ का त्याग और आईएएस का अहंकार: एक सबक
अध्याय 1: संघर्ष की तपती धूप
सुबह का समय था। गांव की हवा में हल्की सी ठंडक थी, लेकिन सूरज की किरणें धीरे-धीरे मिट्टी की दीवारों को छूकर उन्हें गर्म करने लगी थीं। गांव के एक पुराने मगर साफ-सुथरे घर के आंगन में शारदा देवी चुपचाप बैठी थीं। उनके चेहरे पर उम्र की गहरी रेखाएं थीं, पर आँखों में अब भी वही चमक थी जो कभी सपनों को सींचती थी।
शारदा देवी का जीवन कभी आसान नहीं रहा। कम उम्र में ही विधवा हो जाने के बाद समाज ने उन्हें “बेचारी” और “कमजोर” मान लिया था। लोग कहते थे, “अब इसका क्या होगा?” लेकिन किसी को नहीं पता था कि इस साधारण सी औरत के भीतर हिम्मत का एक विशाल पहाड़ छिपा है। उन्होंने अपने आँसुओं को पोंछा और एक ही संकल्प लिया—अपने बेटे रवि को वह सब कुछ बनाकर दिखाना जिसे दुनिया ने उसके पिता के बिना असंभव मान लिया था।
अध्याय 2: माँ का आंचल और रवि का बचपन
रवि ही शारदा देवी का संसार था। उन्होंने अपने जीवन की हर सांस उसी के नाम कर दी। खेतों में मजदूरी करना, दूसरों के घरों में बर्तन माँजना और खुद फटी साड़ी पहनना—यह सब उन्होंने हंसकर सह लिया। रवि पढ़ाई में तेज था। स्कूल के मास्टर भी कहते थे, “शारदा, इस लड़के में कुछ खास है।”
बरसात की उन रातों में जब छत टपकती थी, शारदा देवी रवि को अपनी गोद में लेकर पूरी रात बैठी रहती थीं ताकि उसकी किताबें और बस्ता भीग न जाए। सर्दियों में जब घर में कंबल एक ही होता, तो वे खुद को ठंड में छोड़ देतीं और बेटे को उस पुराने ऊनी कंबल में लपेट देतीं। उनका एक ही सपना था—”मेरा बेटा बड़ा अफसर बनेगा, तब मेरी सारी थकान उतर जाएगी।”
अध्याय 3: शहर की चमक और बदलता व्यवहार
रवि शहर गया, बड़ी पढ़ाई के लिए। शहर की चमक-धमक और नए लोगों के बीच रवि के भीतर एक नया संसार रचने लगा। माँ गांव में अकेली रह गईं, लेकिन हर महीने रवि का पत्र आता था जिसे वे अपनी सबसे बड़ी दौलत समझकर सीने से लगाकर रखती थीं।
वर्षों की कड़ी मेहनत रंग लाई और रवि ने देश की सबसे कठिन ‘आईएएस’ (IAS) परीक्षा पास कर ली। गांव में ढोल-नगाड़े बजे। वही लोग जो कभी ताना मारते थे, आज शारदा देवी के चरण छू रहे थे। शारदा देवी की आँखों से बहते आँसू दुख के नहीं, गर्व के थे। उन्हें लगा कि उनका तप सफल हो गया।
रवि अफसर बनकर लौटा। गाड़ी, लाल बत्ती, वर्दी और सम्मान—सब कुछ चमकदार था। लेकिन इसी चमक के नीचे रवि का अहंकार भी बढ़ने लगा।
अध्याय 4: जब माँ बोझ बन गई
शादी के बाद रवि का व्यवहार तेजी से बदलने लगा। उसकी पत्नी, जो ऊंचे खानदान से थी, उसे शारदा देवी का देहातीपन और सादगी पसंद नहीं थी। रवि, जो कभी माँ के आंचल के बिना सोता नहीं था, अब समाज के दबाव और अपने अहंकार के कारण माँ से दूर होने लगा।
एक दिन घर में छोटी सी बात पर बहस हुई। बहू के शब्द तीर की तरह लगे, लेकिन रवि खामोश रहा। शारदा देवी अंदर से टूट गईं। फिर वह भयावह पल आया जब रवि ने ठंडे स्वर में कहा, “माँ, अब आपका यहाँ रहना ठीक नहीं है। हमारे सामाजिक जीवन में आपके रहने से मुश्किल होती है।”
ये शब्द नहीं, शारदा देवी के जीवन भर के त्याग पर एक गहरा प्रहार था। उन्होंने बिना एक शब्द कहे, अपनी छोटी सी पोटली उठाई और उसी दरवाजे से बाहर निकल आईं जहाँ कभी वे बेटे को गोद में लेकर सुखद भविष्य के सपने देखती थीं।
अध्याय 5: धर्मशाला का बसेरा और आत्मसम्मान
शारदा देवी गांव की एक पुरानी धर्मशाला में रहने लगीं। गांव के लोग हैरान थे—”जिसका बेटा आईएएस है, उसकी माँ यहाँ?” लेकिन शारदा देवी ने किसी से शिकायत नहीं की। उन्होंने मंदिर में झाड़ू लगाना शुरू किया और अपने स्वाभिमान के साथ जीने लगीं।
वे दूसरों के दुख सुनतीं, महिलाओं को सलाह देतीं, लेकिन अपना दर्द कभी जुबान पर नहीं लाती थीं। धीरे-धीरे वे गांव की “माँ शारदा” बन गईं। उधर रवि शहर में फाइलों और बैठकों में व्यस्त था, लेकिन उसके भीतर एक खालीपन था। हर बार जब वह किसी गरीब माँ-बेटे को देखता, उसे अपनी माँ की याद आती, पर अहंकार उसे झुकने नहीं देता था।
अध्याय 6: प्रायश्चित का उदय
एक दिन रवि के दफ्तर में एक बुजुर्ग महिला अपने बेटे के साथ आई। उस महिला की आँखों में वही ममता थी जो कभी शारदा देवी की आँखों में हुआ करती थी। उस दृश्य ने रवि के भीतर सोए हुए बेटे को जगा दिया। वह घर लौटा, अपनी पत्नी की बातों को दरकिनार किया और रात भर सो नहीं सका।
उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ ने भूखे रहकर उसे खिलाया था। उसे अपनी वर्दी पर शर्म आने लगी। सुबह होते ही वह बिना किसी लाव-लश्कर के गांव की ओर भागा। धर्मशाला के उस छोटे से कमरे में उसने अपनी माँ को देखा—कमजोर, सफेद बाल, लेकिन चेहरे पर वही दैवीय शांति।
अध्याय 7: अंतिम मिलन और विदाई
रवि माँ के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोया। “माँ, मुझे माफ कर दो। मैं अफसर तो बन गया, लेकिन इंसान बनना भूल गया।” शारदा देवी ने उसके सिर पर वही पुराना ममता भरा हाथ रखा। उन्होंने कहा, “रवि, मैं उस घर में कभी नहीं लौटूंगी जहाँ से मुझे निकाला गया था। अगर सच में प्रायश्चित करना है, तो उन माँओं की सेवा करो जिन्हें उनके बेटों ने ठुकरा दिया है।”
रवि ने माँ की बात मानी। उसने गांव में ‘शारदा देवी सहायता केंद्र’ और वृद्धाश्रम बनवाया। वह खुद अब एक सेवक की तरह काम करने लगा। कुछ समय बाद, एक शांत सुबह, मंदिर की घंटियों के बीच शारदा देवी ने दुनिया से विदा ली। उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी—यह मुस्कान इस बात की गवाही थी कि उन्होंने न केवल एक अफसर बनाया, बल्कि अंत में अपने बेटे को एक अच्छा इंसान भी बना दिया।
अध्याय 8: एक अमर सीख
आज भी उस गांव में शारदा देवी की प्रतिमा के सामने दीया जलता है। लोग कहते हैं कि वह माँ केवल रवि की नहीं, पूरे गांव की माँ थी। रवि अब हर बुजुर्ग में अपनी माँ की छवि ढूंढता है।
कहानी की सीख: सफलता और ओहदा अस्थायी हैं, लेकिन माता-पिता का आशीर्वाद और उनके प्रति हमारा कर्तव्य ही हमारे चरित्र की असली पहचान है। जिस माँ ने अपना सब कुछ खोकर आपको बनाया है, उसे खोना सबसे बड़ी असफलता है।
नोट: अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया है, तो आज ही अपनी माँ के पास जाकर उनके चरणों का आशीर्वाद लें। माँ का कर्ज कोई नहीं उतार सकता, बस उन्हें सम्मान देकर हम अपनी इंसानियत बचा सकते हैं।
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