जूते पॉलिश करने वाले ने सुधारी डॉक्टर की गलती! बचाई मरीज की जान, डॉक्टर ने मानी हार

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जूते पॉलिश करने वाले ने सुधारी डॉक्टर की गलती! बचाई मरीज की जान, डॉक्टर ने मानी हार

1. एक दोपहर, एक सपना

शहर के सबसे व्यस्त अस्पताल ‘लाइफ लाइन हॉस्पिटल’ के बाहर, एक पुराने नीम के पेड़ की छांव में, एक बारह साल का लड़का बैठा था। उसका नाम था केशव। उसके हाथ काले रंग और पॉलिश से सने रहते थे, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी, जो किसी एक्सरे मशीन से भी तेज थी। उसके पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। बीमार माँ की देखभाल और घर की जिम्मेदारी, उस छोटे से कंधे पर आ गई थी। केशव जूते चमकाता था, लेकिन उसका सपना था कि एक दिन वह सफेद कोट पहनकर उसी अस्पताल के अंदर जाए, जहाँ आज वह बाहर बैठा है।

केशव की निरीक्षण शक्ति अद्भुत थी। वह जूतों की चाल देखकर बता सकता था कि आदमी थका है, बीमार है या घबराया हुआ। वह रोज़ डॉक्टरों और मरीजों को आते-जाते देखता, उनके हावभाव, चाल-ढाल, चेहरे का रंग, सब कुछ पढ़ता। जूते पॉलिश करते-करते उसने जीवन को बहुत नज़दीक से देखा था।

2. डॉक्टर समीर और एक कठिन केस

दोपहर के दो बजे थे। अस्पताल के ऑटोमेटिक दरवाजे खुले और शहर के सबसे वरिष्ठ सर्जन, डॉक्टर समीर बाहर निकले। उनका चेहरा तनाव से भरा हुआ था। माथे पर पसीना, हाथ में मोबाइल, और आवाज़ में झुंझलाहट। वे फोन पर किसी जूनियर डॉक्टर से चिल्ला रहे थे, “ओटी तैयार रखो, मिस्टर खन्ना का केस पेचीदा है, एनस्थीसिया का डोज़ तैयार करो। हमें तुरंत पेट की सर्जरी करनी है। शायद अपेंडिक्स फट गया है, ज्यादा वक्त नहीं है।”

डॉक्टर समीर का ध्यान केशव पर नहीं था। उन्होंने अपना महंगा चमड़े का जूता केशव के बॉक्स पर रखा। केशव ने कपड़ा उठाया और जूते साफ करने लगा। लेकिन उसके कान डॉक्टर की बातों पर टिके थे। अचानक उसका हाथ रुक गया। उसे याद आया कि आधे घंटे पहले एक मोटा सेठ, स्ट्रेचर पर अस्पताल ले जाया गया था। केशव ने उसे देखा था, जब वह कार से उतरा था। उसके दिमाग में एक दृश्य कौंध गया—सेठ के पैर का सूजन, नीले मोजे पर लाल निशान, और जूते के पास से भागता एक बिच्छू।

3. एक साहसी हस्तक्षेप

डॉक्टर समीर ने झल्लाकर कहा, “अरे छोटू, हाथ क्यों रोक दिया? जल्दी करो। मुझे एक जान बचानी है।” केशव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह जानता था कि उसकी बात कोई नहीं सुनेगा, लेकिन अगर वह चुप रहा तो अनर्थ हो सकता है। उसने सिर झुकाकर धीमे स्वर में कहा, “डॉक्टर साहब, गुस्ताखी माफ हो। क्या आप उसी सेठ जी का ऑपरेशन करने जा रहे हैं, जिन्होंने नीले रंग के मोजे पहने थे?”

डॉक्टर समीर ने हैरानी से नीचे देखा, “हाँ, तुम्हें कैसे पता?” केशव ने साहस जुटाकर कहा, “साहब, अगर आप उन्हें बेहोश करके पेट का ऑपरेशन करेंगे, तो शायद वे कभी नहीं जागेंगे।”

डॉक्टर समीर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? एक सड़क छाप मोची मुझे सिखाएगा कि सर्जरी कैसे करते हैं?” गार्ड्स उसकी तरफ बढ़ने लगे। लेकिन केशव अपनी जगह से नहीं हिला। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “मैं डॉक्टरी नहीं सिखा रहा। मैं तो बस जूतों की भाषा जानता हूँ। सेठ जी का सीधा पैर सूजा हुआ था, जूता फिट नहीं हो रहा था, और उनके मोजे पर दो छोटे लाल निशान थे।”

डॉक्टर समीर ने समय की कमी को देखते हुए कहा, “सूजन तो किडनी की समस्या से भी हो सकती है। उन्हें पेट में दर्द है, उल्टियाँ हो रही हैं, पसीना आ रहा है। यह अपेंडिसाइटिस के लक्षण हैं। हटो मेरे रास्ते से।”

केशव ने दौड़कर डॉक्टर समीर का लैब कोट पकड़ लिया। “साहब, सुनिए! जब सेठ जी कार से उतरे थे, उन्होंने पेट नहीं, अपना पैर झटका था। उनके मोजे पर टखने के पास दो छोटे गहरे लाल निशान थे, और जूते के सोल के पास से एक बिच्छू भागा था। उन्हें अपेंडिक्स का दर्द नहीं है, उन्हें बिच्छू ने काटा है।”

4. डॉक्टर की परीक्षा

डॉक्टर समीर ठिठक गए। उनके दिमाग में केशव की बात गूंज रही थी। बिच्छू का जहर, लाल निशान, सूजन—ये सब मेडिकल साइंस में गंभीर थे। अगर वाकई बिच्छू ने काटा है, तो एनस्थीसिया और सर्जरी जानलेवा साबित हो सकती है। उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा, “अगर तुम झूठ बोल रहे हो तो तुम्हें जेल भेज दूँगा। बस एक बार ऑपरेशन थिएटर ले जाने से पहले उनके मोजे उतार कर देख लूँगा।”

डॉक्टर समीर तेज़ी से अस्पताल के अंदर भागे। केशव बाहर खड़ा रहा, दिल में प्रार्थना करता हुआ। ओटी के अंदर माहौल युद्ध के मैदान जैसा था। मिस्टर खन्ना की हालत बिगड़ती जा रही थी। जूनियर डॉक्टर ने कहा, “सर, ब्लड प्रेशर गिर रहा है, पेट बहुत सख्त है। हमें तुरंत पेट खोलना होगा।”

लेकिन डॉक्टर समीर ने सबको रोक दिया। “कोई एनस्थीसिया नहीं देगा, कोई चीरा नहीं लगाएगा!” उन्होंने स्ट्रेचर के नीचे से मोजा उतारा। सबकी आँखें फटी रह गईं—टखने पर सूजन, गहरा नीला रंग, और दो छोटे लाल निशान। बिच्छू के काटने के निशान! यह अपेंडिसाइटिस नहीं था, यह बिच्छू के जहर का असर था।

5. एक जान बची, एक अहंकार टूटा

“हे भगवान!” डॉक्टर समीर के मुँह से निकला। “यह रेड स्कॉर्पियन का जहर है, सीधे नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। पेट की मांसपेशियों में ऐंठन होती है, लक्षण अपेंडिक्स जैसे लगते हैं। अगर सर्जरी करते तो एनस्थीसिया के साथ जहर मिलकर हार्ट फेल कर देता।”

उन्होंने तुरंत सर्जरी कैंसिल की, एंटीवेनम और इमरजेंसी दवा का इंतज़ाम किया। कुछ ही मिनटों में मरीज की हालत सुधरने लगी। मिस्टर खन्ना की जान बच गई। करोड़ों की मशीनें नहीं, बल्कि बाहर बैठे उस बारह साल के लड़के की नज़र ने जान बचाई थी।

डॉक्टर समीर कुर्सी पर गिर पड़े। उनका वर्षों का अनुभव, विदेशी डिग्रियाँ, अहंकार सब धराशायी हो गया था। आज असली डॉक्टर कोट पहनकर अंदर नहीं, फटे कपड़ों में बाहर बैठा था।

6. सम्मान और वादा

सर्जरी रूम से बाहर आते ही डॉक्टर समीर मुख्य द्वार की तरफ भागे। केशव अभी भी अस्पताल के बाहर बैठा था, डरा-सहमा, सोचता कि शायद उसे पुलिस बुलाकर भगा दिया जाएगा। लेकिन डॉक्टर समीर उसके सामने घुटनों पर बैठ गए। उन्होंने केशव के गंदे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। “माफ कर दो बेटा। तुमने आज सिर्फ एक मरीज की जान नहीं बचाई, बल्कि एक डॉक्टर को भी मरने से बचा लिया। अगर सर्जरी हो जाती तो मरीज मर जाता, और मेरा डॉक्टर होने का धर्म भी मर जाता।”

केशव हक्का-बक्का रह गया। “साहब, आप भगवान हैं, मैं तो बस एक मोची हूँ।” डॉक्टर समीर ने सिर हिलाया, “भगवान वो नहीं जो बड़ी कुर्सी पर बैठता है, भगवान वो है जो सही समय पर सही रास्ता दिखाता है। आज तुम मेरे गुरु हो। तुम्हारे निरीक्षण ने वह कर दिखाया जो मेरी सारी मशीनें नहीं कर पाई।”

उन्होंने अपना महंगा पेन केशव की जेब में डालते हुए कहा, “तुम्हारी जगह यहाँ सड़क पर नहीं, उस अस्पताल के अंदर है। तुम्हारे अंदर एक डॉक्टर की सबसे बड़ी खूबी है—संवेदना और निरीक्षण। मैं तुम्हें ऐसे बर्बाद नहीं होने दूँगा। कल से तुम्हारी पढ़ाई, घर का खर्च, माँ की बीमारी सब मैं देखूँगा। जिस दिन तुम डॉक्टर बनोगे, उस दिन मैं अपनी कुर्सी तुम्हारे लिए छोड़ दूँगा।”

7. संघर्ष और सफलता

केशव की दुनिया बदल गई। अब सड़क की धूल और पॉलिश की जगह किताबों की खुशबू, स्कूल की वर्दी थी। शुरुआत आसान नहीं थी। अंग्रेजी के शब्द पहेली जैसे थे, अमीर बच्चों की ताने थीं। कई बार केशव का मन हुआ सब छोड़ दे, लेकिन माँ का आशीर्वाद और डॉक्टर समीर का विश्वास उसकी ताकत थे।

जब भी हारने लगता, डॉक्टर समीर उसे बुलाते, चाय पिलाते, और कहते, “हीरा कोयले की खान में ही बनता है। अपनी नज़र मत खोना, वही तुम्हारी ताकत है।”

समय बीता। बारह साल गुजर गए। वही लाइफ लाइन हॉस्पिटल अब भी शान से खड़ा था, लेकिन आज मेडिकल कॉलेज का दीक्षांत समारोह था। पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। मंच पर गोल्ड मेडल देने के लिए चीफ गेस्ट का इंतजार हो रहा था। माइक पर अनाउंसमेंट हुई—”इस साल का बेस्ट स्टूडेंट ऑफ द ईयर और गोल्ड मेडलिस्ट है डॉक्टर केशव!”

तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा। केशव मंच पर गया, गोल्ड मेडल लिया, और सीधे पहली पंक्ति में बैठे बूढ़े डॉक्टर समीर के पास गया। उसने गोल्ड मेडल डॉक्टर समीर के गले में पहनाया और उनके पैरों में झुक गया। “यह मेरा नहीं, आपका है सर। अगर उस दिन आपने मेरी बात ना सुनी होती, तो आज मैं जूतों पर ब्रश चला रहा होता।”

डॉक्टर समीर ने उसे गले लगा लिया। “मैंने तो बस एक बीज में पानी डाला था, पेड़ तो तुमने अपनी मेहनत से बनाया है।”

8. कर्म का चक्र

समारोह के बाद, जब केशव और डॉक्टर समीर बाहर निकले, एक काली लग्जरी कार रुकी। उसमें से शहर के सबसे अमीर बिल्डर, मिस्टर दीनाना उतरे। “डॉक्टर साहब, मेरा बेटा एक्सीडेंट में घायल है, गले में कांच का टुकड़ा है, कोई डॉक्टर रिस्क नहीं ले रहा। कृपया उसे बचा लीजिए।”

डॉक्टर समीर ने अफसोस से सिर हिलाया, “अब मैं सर्जरी नहीं कर सकता, मेरे हाथ कांपते हैं।” दीनाना पैरों में गिर गया, “तो कौन बचाएगा?”

डॉक्टर समीर ने मुस्कराते हुए केशव के कंधे पर हाथ रखा, “अब इस शहर में सिर्फ एक ही सर्जन है जो यह नामुमकिन सर्जरी कर सकता है—डॉक्टर केशव।”

दीनाना ने केशव को देखा, उसे याद नहीं था कि यही वह लड़का है जिसकी झुग्गी उसने तुड़वाई थी। केशव के पास बदला लेने का मौका था, लेकिन उसने डॉक्टर समीर की बात याद की—”माफ करना और जीवन देना वीरों का काम है।”

केशव ने कहा, “मरीज को ओटी नंबर तीन में शिफ्ट कीजिए। मैं अभी आता हूँ।”

9. परीक्षा की घड़ी

ऑपरेशन थिएटर में दीनाना के बेटे के गले में कांच का टुकड़ा जुगुलर वेन से बाल बराबर दूरी पर था। केशव को अपने बचपन के वो दिन याद आए, जब वह फटे जूतों पर बारीक सिलाई करता था। वही एकाग्रता आज जान बचाने में काम आ रही थी।

तीन घंटे चले ऑपरेशन के बाद, केशव ने बड़ी सावधानी से कांच का टुकड़ा निकाला, नसों को सुई-धागे से सिला। “बधाई हो डॉक्टर, ब्लीडिंग रुक गई है, पल्स नॉर्मल है।” केशव ने मास्क नीचे किया, फीकी मुस्कान दी। उसने सिर्फ एक मरीज को नहीं, अपने अतीत के राक्षस को भी हरा दिया था।

10. माफ़ी और सच्चाई

बाहर आकर दीनाना उसके पैरों में गिर पड़ा, “आप इंसान नहीं, फरिश्ते हैं। मांगिए क्या चाहिए?” केशव ने कहा, “मुझे पैसे नहीं चाहिए, बस एक पुराना हिसाब बराबर करना है।”

“हिसाब?” दीनाना हैरान था। केशव ने कहा, “याद कीजिए, 12 साल पहले आपने कृष्णा नगर की मेरी झुग्गी तुड़वाई थी। मेरी माँ का अपमान किया था। आज मेरे पास पूरा मौका था, लेकिन मेरे गुरु ने मुझे रूह को साफ रखना सिखाया है। डॉक्टर का धर्म जीवन देना है, छीनना नहीं।”

दीनाना फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो बेटा। मैं दौलत के नशे में अंधा हो गया था। बताओ, इस पाप का प्रायश्चित कैसे करूँ?”

केशव ने कहा, “अगर सच में प्रायश्चित करना चाहते हैं, तो कृष्णा नगर की उसी जमीन पर गरीबों के लिए एक धर्मार्थ अस्पताल बनाइए, जहां किसी माँ को अपने बच्चे के इलाज के लिए भीख न मांगनी पड़े।”

दीनाना ने कसम खाई, “वादा करता हूँ डॉक्टर साहब, उस जमीन पर शहर का सबसे बड़ा मुफ्त अस्पताल बनेगा और उसका नाम आपकी माँ के नाम पर रखा जाएगा।”

डॉक्टर समीर ने गर्व से मुस्कुराकर कहा, “केशव, आज तुमने इंसानियत का गोल्ड मेडल जीता है। एक मोची फटे जूते सिलता है, लेकिन एक महान इंसान टूटे दिलों और समाज को सिलता है।”

11. कहानी का अंत, एक नई शुरुआत

केशव ने झुककर डॉक्टर समीर के पैर छुए, दीनाना को गले लगाया। नफरत की दीवार, जो 12 साल पहले खड़ी हुई थी, आज आंसुओं और माफी के सैलाब में बह गई। अस्पताल के बाहर वही पुराना नीम का पेड़ खड़ा था, उसकी पत्तियाँ हवा में सरसराती थीं, मानो वह भी इस अद्भुत कहानी की गवाही दे रहा हो।

एक कहानी, जो जूते पॉलिश करने वाले बॉक्स से शुरू हुई और दिलों को रोशन करने वाली मशाल बन गई। सच ही कहा गया है—वक्त सबका बदलता है। और कभी-कभी, सबसे बड़ा डॉक्टर वही होता है, जिसकी आँखों में इंसानियत की चमक हो, चाहे उसके हाथों में पॉलिश की कालिख ही क्यों न लगी हो।