करोड़पति मां का खोया हुआ बेटा 8 साल बाद भिखारी के रूप में मिला| सच्ची घटना पर आधारित कहानी

“लौटा हुआ बेटा: एक मां का चमत्कार”

भूमिका

यह कहानी है एक मां मीरा वर्मा की, जिसका दिल आठ साल से टूटा हुआ है, और एक बच्चे अर्जुन की, जो अपनी पहचान भूल चुका है। यह प्रेम, बिछड़न, तड़प और चमत्कारिक मिलन की कहानी है। जब किस्मत अपना जादू चलाती है, तो रेड लाइट भी किसी के लिए हरी बत्ती बन जाती है। यह यात्रा आपकी आंखों को नम और दिल को छू जाएगी।

अध्याय 1: खोया हुआ बचपन

दिल्ली की तपती दोपहर में कनॉट प्लेस के पास, ट्रैफिक सिग्नल पर एक 11 साल का लड़का दौड़ता फिर रहा था। नंगे पैर, फटे कपड़े, धूल भरा चेहरा और हाथों में मुरझाए गुलाब। उसका नाम कोई नहीं जानता था, बस सब उसे “छोटू” कहते थे। उसका असली नाम क्या है, उसे खुद भी याद नहीं था। बस इतना याद था कि वह बहुत छोटा था, जब भीड़ में खो गया था। उसकी धुंधली यादों में एक हाथ का स्पर्श, किसी की खुशबू, किसी की आवाज गूंजती थी—”अर्जुन, अर्जुन!” लेकिन सब कुछ धुंधला था।

फुटपाथ पर रहने वाले बच्चे उसे छोटू कहते, पुलिसवाले “ए लड़के”, दुकानदार “भाग यहां से”। प्यार से कोई उसका नाम नहीं पुकारता था। रात को फुटपाथ पर सिर रखकर वो आसमान के तारों को देखता और सोचता—काश कोई मुझे प्यार से नाम लेकर बुलाए, काश कोई मेरा अपना हो।

छोटू के गले में काले धागे से बंधा एक सोने का लॉकेट था। उसमें गणेश जी की तस्वीर थी और पीछे कुछ अंक खुदे थे, जिन्हें वह पढ़ नहीं सकता था। उसे लगता था कि उसकी मां ने पहनाया होगा। यही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी। रात को सपने में एक औरत उसे गोद में लेकर लोरी गाती थी। सुबह होते ही वह फिर से छोटू बन जाता।

अध्याय 2: एक मां का इंतजार

दिल्ली के वसंत विहार में एक आलीशान कोठी की मालकिन मीरा वर्मा, करोड़ों की संपत्ति की मालिक, लेकिन दिल से टूटी हुई मां थी। आज भी वह अपने कमरे में बेटे अर्जुन की तीन साल की फोटो देख रही थी। आठ साल पहले प्रगति मैदान के मेले में अर्जुन का हाथ उसके हाथ से छूट गया था। भीड़ ने उसे निगल लिया था। मीरा चीखती रही, “अर्जुन! अर्जुन!” लेकिन उसकी आवाज भीड़ के शोर में खो गई थी।

आठ साल से मीरा ने हर जगह अर्जुन को ढूंढा—पुलिस स्टेशन, अनाथालय, एनजीओ, अखबार, टीवी अपील, प्राइवेट डिटेक्टिव। लेकिन अर्जुन जैसे हवा में विलीन हो गया था। हर रात वह सोचती—क्या मेरा अर्जुन अब 11 साल का हो गया होगा? क्या वह मुझे पहचानेगा भी? कहीं भूख-प्यास से तो नहीं मर गया? किसी ने अपनाया या वह भटक रहा है?

उसका कमरा, खिलौने, कपड़े, किताबें सब वैसे ही रखे थे। उसकी उम्मीद टूटी नहीं थी। दोस्त कहते—”मीरा, दूसरा बच्चा अडॉप्ट कर लो।” लेकिन मां का दिल सिर्फ अपने बच्चे के लिए ही धड़कता है।

अध्याय 3: किस्मत का मोड़

एक दिन मीरा को ऑफिस जाना था। उसने अर्जुन की फोटो को चूमा, पर्स में रखा और घर से निकली। उसे नहीं पता था कि आज का दिन उसकी जिंदगी बदल देगा। ट्रैफिक में फंसी मीरा की गाड़ी कनॉट प्लेस के सिग्नल पर रुकी। उसका दिल बेचैन था, आंखें सूजी हुई थीं। उसी सिग्नल पर छोटू अपने गुलाब लेकर खड़ा था। आज उसके पास सिर्फ पांच गुलाब थे, पेट में भूख थी लेकिन उम्मीद थी—शायद आज कुछ अच्छा होगा।

लाल बत्ती हुई। छोटू एक-एक गाड़ी के पास गया। किसी ने झिड़की दी, किसी ने शीशा चढ़ा लिया, किसी ने पैसे नहीं दिए। छोटू निराश नहीं हुआ। उसकी नजर मीरा की BMW पर पड़ी। वह धीरे-धीरे गाड़ी के पास गया, हल्की सी दस्तक दी। मीरा ने खिड़की थोड़ी नीचे की। गर्म हवा का झोंका अंदर आया। मीरा ने देखा—एक छोटा लड़का, धूल भरा चेहरा, बिखरे बाल, लेकिन उसकी आंखें… मीरा का दिल जोर से धड़का। वे आंखें बिल्कुल वैसी ही थीं, जैसी अर्जुन की थीं।

“मैडम गुलाब ले लो ना,” छोटू बोला। मीरा को लगा जैसे कोई करंट लग गया हो। “तुम्हारा नाम क्या है?” मीरा ने कांपती आवाज में पूछा।

“मेरा कोई नाम नहीं है मैडम। सब मुझे छोटू कहते हैं।”

“तुम्हारे माता-पिता?”

छोटू की आंखों की चमक फीकी पड़ गई। “पता नहीं मैडम। बहुत छोटा था जब खो गया था। तब से यही सड़क मेरा घर है।”

मीरा के हाथ कांपने लगे। कब से? “11 साल।” अर्जुन भी अब 11 साल का होता। मीरा के आंसू बहने लगे। तभी उसने छोटू के गले में लॉकेट देखा। वही सोने का लॉकेट, वही काले धागे में बंधा। मीरा की सांस अटक गई।

“यह लॉकेट…?” मीरा ने धीरे से पूछा।

“यह मेरे पास बचपन से है मैडम। शायद मेरी मां ने पहनाया होगा। मुझे बस इतना याद है कि कोई कहता था—इसे कभी मत उतारना।”

मीरा का गला रुंध गया। उसे याद आया—आठ साल पहले उसने अर्जुन को कहा था, “बेटा, यह लॉकेट हमारे कुल देवता गणेश जी का है। इसे कभी मत उतारना। यह तुम्हारी रक्षा करेगा। और जब भी तुम मुसीबत में होगे, मैं तुम्हें ढूंढ लूंगी।”

“क्या मैं तुम्हारा लॉकेट देख सकती हूं?” मीरा ने कांपती आवाज में पूछा।

छोटू थोड़ा डरा, “मैडम, यह चोरी का नहीं है। मेरा अपना है।” मीरा ने गाड़ी का दरवाजा खोला, बाहर आ गई। “मुझे लगता है कि यह लॉकेट मैंने कहीं देखा है।”

छोटू ने अपनी शर्ट का बटन खोला। सोने का लॉकेट बाहर आया। उसमें गणेश जी की तस्वीर थी, नीचे एक छोटा सा हीरा जड़ा था। मीरा की सांस फूलने लगी। “इसे पलट कर दिखाओ।”

छोटू ने लॉकेट पलटा। पीछे की तरफ खुदा था—”15 अगस्त 2013″। अर्जुन की जन्मतिथि। मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। “अर्जुन…” वह फुसफुसाई।

“क्या मैडम?” छोटू ने पूछा।

मीरा ने छोटू का चेहरा अपने हाथों में लिया, धूल साफ की। नाक, आंखें, होंठ, माथा—सब कुछ वैसा ही था। “बड़ा हुआ अर्जुन, तुम अर्जुन हो। तुम मेरे बेटे हो।” मीरा रो पड़ी।

छोटू सन रह गया। “मैडम आप…”

“मैं तुम्हारी मां हूं। मीरा हूं। आठ साल पहले तुम मेले में खो गए थे। मैंने तुम्हें कितना ढूंढा है।”

सड़क के बीचोंबीच, ट्रैफिक के शोर में एक मां अपने खोए हुए बेटे से मिल रही थी। आसपास के लोग देखने लगे। कुछ की आंखें भी नम हो गईं। छोटू को कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन इस औरत के गले लगने में जो सुकून था, वही प्यार था जो उसके दिल में कहीं दबी थी।

“मां…” यह शब्द उसके मुंह से अपने आप निकला। मीरा रो-रोकर बेहाल हो गई। पीछे से ट्रैफिक पुलिस की सीटी बजी। “मैडम, गाड़ी हटाइए। जाम लग रहा है।” लेकिन मीरा को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। वह अपने अर्जुन को पाकर पागल हो गई थी।

अध्याय 4: घर वापसी

“चलो बेटा, घर चलते हैं,” मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ा।

“लेकिन मैडम, मेरे गुलाब?” अर्जुन ने फूलों की तरफ देखा।

“छोड़ दो उन्हें। अब तुम्हें गुलाब बेचने की जरूरत नहीं।” मीरा ने उसे गाड़ी की तरफ ले जाना शुरू किया।

“अगर मैं गलत हूं, अगर मैं आपका बेटा नहीं हूं तो…”

मीरा अर्जुन के सामने झुकी। “बचपन की कोई बात याद है? कोई गाना, कोई खिलौना?”

अर्जुन ने आंखें बंद की। “मुझे याद है कोई गोद में लेकर गाना गाता था। एक बड़ा सा घर था। बहुत सारे फूल थे।”

“क्या गाना?” अर्जुन ने धीमी आवाज में गुनगुनाया—”चंदा है तू, सूरज है तू, मेरी आंखों का तारा है तू।” वही लोरी जो मीरा रोज गाती थी।

“और कुछ?”

“एक आंटी थी—कमला आंटी। वो मुझे लड्डू देती थी।” मीरा रो पड़ी। कमला उनकी रसोइया थी।

“और एक काला कुत्ता था।”

“काली!” मीरा चीखी। “हां, काली हमारा कुत्ता था।”

अब अर्जुन को भी यकीन होने लगा। मां, उसने फिर कहा। मीरा ने उसे गले लगाया। “हां बेटा, मैं तुम्हारी मां हूं। अब कभी तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।”

रमेश ड्राइवर भी रो रहा था। उसने देखा था कि मैडम कैसे अपने बेटे को ढूंढते-ढूंढते टूट गई थी। “मैडम, घर चलें?”

मीरा ने अर्जुन को गाड़ी की अगली सीट पर बिठाया। जिस सीट पर आठ सालों से कोई नहीं बैठा था।

गाड़ी स्टार्ट हुई, अर्जुन घबरा गया। “मां, मेरा डिब्बा, मेरे पैसे…”

“कौन सा डिब्बा?”

“वहां फुटपाथ पर मेरी सारी कमाई छुपा रखी है। ₹347।”

मीरा का गला भर आया। उसका छोटा बेटा इतनी मुसीबत में भी मेहनत से पैसे बचाता था। रमेश गाड़ी रोको। वे वापस उस जगह गए। अर्जुन ने पेड़ के नीचे अपना डिब्बा निकाला। उसमें सिक्के और नोट थे। “मां, यह मेरी पूरी जमा पूंजी है।”

“बहुत काम आएगी बेटा। यह तुम्हारी मेहनत है।”

अध्याय 5: घर की दहलीज पर

वसंत विहार के गेट पर गार्ड ने मीरा को सलाम किया। अर्जुन को देखकर चौंका। “यह कौन है मैडम?”

“मेरा बेटा। मेरा अर्जुन।”

गार्ड की आंखें फटी रह गईं। पूरी सोसाइटी जानती थी कि मीरा मैडम का बेटा खो गया था।

बंगले के गेट पर कमला काकी इंतजार कर रही थी। मीरा मैडम के साथ एक छोटा लड़का—लेकिन वे आंखें, वह चेहरा। “अरे राम!” कमला काकी के हाथ से चाय का गिलास गिर गया। “यह… यह तो…”

“हां काकी, यह अर्जुन है। हमारा अर्जुन।”

कमला काकी दौड़कर अर्जुन के पास आई। “अरे बाबू, मेरा राजा बेटा!” वह गले लगाकर रोने लगी। “कितना दुबला हो गया है रे? कहां थे इतने दिन?”

काकी की खुशबू, वही प्यार, वही स्नेह। “काकी…” अर्जुन ने धीरे से कहा।

घर में घुसते ही अर्जुन चकित रह गया—बड़ा सा हॉल, चमकती संगमरमर की फर्श, खूबसूरत सोफा, दीवारों पर उसकी ही तस्वीरें। “मां, यह सब मेरी तस्वीरें हैं?”

“हां बेटा, सब यहीं रखी थी। रोज देखती थी, तुम्हें याद करती थी।”

तस्वीरों में वह अपनी मां की गोद में, केक काटते हुए, साइकिल पर बैठा था। “मुझे याद है, यह साइकिल लाल रंग की।”

“हां, तुम्हारे तीसरे जन्मदिन पर दी थी। अभी भी गैरेज में है।”

तभी काली कुत्ता दौड़ता हुआ आया। अर्जुन को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया। “काली!” अर्जुन चीखा। जानवरों की याददाश्त इंसानों से तेज होती है। काली अर्जुन के चारों तरफ घूमने लगा।

मीरा रो रही थी। “देखा, काली भी तुम्हें पहचान गया। चलो बेटा, अपना कमरा देखते हैं।”

अध्याय 6: बचपन की यादें

पहली मंजिल पर अर्जुन का कमरा बिल्कुल वैसा ही था—छोटा सा बेड, रंग-बिरंगे कार्टून कैरेक्टर्स की चादर, दीवारों पर पेंटिंग्स, शेल्फ में खिलौने, किताबें। “मां, तुमने सब कुछ वैसा ही रखा था?”

“हां बेटा, रोज सफाई करवाती थी। रोज आकर बैठती थी। लगता था कि तुम कभी भी वापस आ जाओगे।”

अर्जुन ने अपने पुराने खिलौने उठाए—टेडी बियर, कार, रोबोट। “मुझे याद है, उस दिन मैं टेडी लेकर मेले में गया था।”

“हां बेटा, लेकिन भीड़ में वह भी खो गया था।”

कमला काकी लड्डू लेकर आई। “लो बाबू, खाओ। कितने भूखे होंगे।” अर्जुन ने लड्डू का स्वाद चखा। “वाह, बिल्कुल वैसा ही जैसा मुझे याद था।”

शाम तक पूरे घर में जश्न था। मीरा ने अपनी बहन रीता को फोन किया। “अर्जुन मिल गया! मेरा बेटा वापस आ गया!”

रीता, डॉक्टर, वकील, दोस्त सब आए। सभी को यकीन नहीं हो रहा था।

रात के खाने के समय अर्जुन ने कहा, “मां, मुझे डर लग रहा है। कहीं यह सब सपना तो नहीं? कहीं सुबह उठकर फिर फुटपाथ पर तो नहीं होऊंगा?”

मीरा ने गले लगाया। “नहीं बेटा, यह सच है। अब कभी तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।”

रात को मीरा ने अर्जुन को वही लोरी गाकर सुनाई—”चंदा है तू, सूरज है तू, मेरी आंखों का तारा है तू।” अर्जुन की आंखें बंद हो गईं। आठ साल बाद वह अपनी मां के पास, अपने घर के बिस्तर पर सो रहा था।

अध्याय 7: नई जिंदगी की शुरुआत

अगली सुबह अर्जुन की आंख खुली तो वह थोड़ा कंफ्यूज था। मुलायम बिस्तर, साफ चादर, एसी की आवाज। फिर याद आया—वह घर आ गया था। “मां…” मीरा दौड़ी आई। “कुछ नहीं, बस लगा सपना था।”

नाश्ते पर कमला काकी ने अर्जुन की पसंद की चीजें बनाई—पराठे, दही, आम का अचार। अर्जुन का पेट जल्दी भर गया। आठ सालों से वह कम खाने का आदी हो गया था।

दोपहर में मीरा की बहन रीता अपने परिवार के साथ आई। “अरे, तू तो बिल्कुल अपनी मां पर गया है।” अर्जुन को अजीब लग रहा था—इतने लोग उसे घूर रहे थे। मीरा ने हाथ पकड़ा, “यह सब आपके अपने हैं।”

शाम को डॉक्टर आया। “बच्चा बिल्कुल ठीक है, सिर्फ कुपोषण के कारण थोड़ा कमजोर है। अच्छा खाना मिलेगा तो जल्दी ठीक हो जाएगा।”

अगले दिन से मीरा ने अर्जुन के लिए ट्यूटर की व्यवस्था की। आठ साल की पढ़ाई का नुकसान था, लेकिन अर्जुन तेज था। जल्दी सीखने लगा।

अध्याय 8: समाज के लिए नया सफर

कुछ दिन बाद मीरा ने अर्जुन को शॉपिंग के लिए मॉल ले गई। “बेटा, तुम्हें अच्छे कपड़े चाहिए। स्कूल भी जाना है।”

“मां, इतने महंगे कपड़े! मैं तो ₹50 की शर्ट पहनता था।”

“अब तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होगी।”

घर लौटे तो ढेर सारे कपड़े, जूते, किताबें, खिलौने थे। अर्जुन ने पूछा, “मां, हमारे पास इतना पैसा कहां से आया?”

“मैं कंपनी चलाती हूं। तुम्हारे पापा नहीं हैं, लेकिन मैंने बहुत मेहनत कर के यह सब कमाया है।”

“मेरे पापा कहां हैं?”

“वह तुम्हारे पैदा होने से पहले ही चले गए थे। एक एक्सीडेंट में।”

“कोई बात नहीं मां, अब मैं हूं ना। मैं तुम्हारा ख्याल रखूंगा।”

कुछ महीने बाद अर्जुन स्कूल जाने लगा। पहले दिन घबराया था। “मां, क्या बच्चे मुझे अजीब नहीं समझेंगे? मैं तो आठ साल पीछे हूं।”

“नहीं बेटा, तुम बहुत तेज हो। जल्दी सब सीख जाओगे।”

स्कूल में टीचर्स और बच्चों ने अर्जुन का स्वागत किया। धीरे-धीरे अर्जुन ने अपनी नई जिंदगी में ढलना शुरू किया। अच्छे नंबर लाता, दोस्त बनाता, खेलता। लेकिन कभी-कभी फुटपाथ के दिन याद आते। उन बच्चों की याद आती जो अभी भी सड़कों पर भटक रहे थे।

एक दिन अर्जुन ने मीरा से कहा, “मां, क्या हम उन बच्चों की मदद कर सकते हैं जो सड़क पर रहते हैं?”

मीरा खुश हो गई। “हां बेटा, हम एक एनजीओ शुरू करेंगे।”

अध्याय 9: “दूसरा घर”—नई उम्मीद

कुछ महीने बाद मीरा और अर्जुन ने “दूसरा घर” नाम की संस्था शुरू की। मकसद था—सड़क पर रहने वाले बच्चों को घर, शिक्षा और प्यार देना। अर्जुन अक्सर उस रेड लाइट पर जाता, जहां उसकी मां से मुलाकात हुई थी। वहां वह बच्चों को खाना बांटता, समझाता कि वे भी स्कूल जा सकते हैं।

एक साल बाद अर्जुन के 12वें जन्मदिन पर मीरा ने एक खास उपहार दिया—फोटो फ्रेम जिसमें मीरा, अर्जुन और 25 और बच्चे थे। वे सभी बच्चे जिन्हें उन्होंने अपनी संस्था में शरण दी थी।

“मां, यह तो हमारा बड़ा परिवार है।”

“हां बेटा, अब हम सिर्फ दो नहीं हैं। हम एक बड़ा, खुशहाल परिवार हैं।”

रात को अर्जुन ने कहा, “मां, मुझे खुशी है कि मैं खो गया था। क्योंकि अगर मैं नहीं खोता तो मुझे पता नहीं चलता कि कितने बच्चे अकेले हैं। अब हम उनकी मदद कर रहे हैं।”

मीरा की आंखें भर आईं। उसका बेटा सिर्फ वापस नहीं आया था, वह एक हीरो बनकर आया था।

अंतिम शब्द: एक नई शुरुआत

आज भी वह रेड लाइट वहीं है, लेकिन अब वहां कोई बच्चा भूखा नहीं सोता। अर्जुन और मीरा रोज वहां जाते हैं, खाना बांटते हैं, हर खोए हुए बच्चे को एक नया घर देते हैं।

कहानी का अंत नहीं है—यह एक नई शुरुआत है। प्यार, उम्मीद और इंसानियत की।

कभी-कभी हम खो जाते हैं, सिर्फ इसलिए कि हमें अपना असली रास्ता मिल सके। और जब हमें वह रास्ता मिलता है, तो हम सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी मिसाल बन जाते हैं।

समाप्त