सफाई कर्मी पति के सामने झुक गई तलाक़शुदा DSP पत्नी… वजह जानकर हर कोई हैरान रह गया फिर जो हुआ…
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1) सड़क किनारे का वह चेहरा
सुबह का वक्त था। थाने के बाहर वाली सड़क पर रोज़ की तरह हलचल थी—चाय की केतली की सीटी, ऑटो वालों के हॉर्न, और लोगों के कदमों की लगातार आवाज़। सरकारी जीप आकर रुकी। गेट के पास खड़े संतरी ने सैल्यूट मारा। दरवाज़ा खुला और DSP अदिति राठौर नीचे उतरीं।
अदिति का नाम शहर में “सख्ती” का दूसरा नाम था। तेज़ नजर, कम शब्द, और फैसला तुरंत—यही उनकी पहचान थी। मगर आज उनके चेहरे पर वह स्थिरता नहीं थी। आंखों के भीतर कोई बेचैनी चल रही थी, जैसे कोई पुरानी बात भीतर से दरवाज़ा खटखटा रही हो।
वह थाने की ओर बढ़ीं ही थीं कि उनकी नजर सड़क के किनारे पड़ी।
एक आदमी—पुराने, धूल-सने कपड़ों में—फुटपाथ पर झाड़ू लगा रहा था। झाड़ू के साथ धूल उड़ती, फिर बैठती, फिर उड़ती। लोग पास से निकलते—कोई देखता नहीं, कोई टोकता नहीं। मगर अदिति के कदम वहीं रुक गए, जैसे जमीन ने उन्हें पकड़ लिया हो।
वह चेहरा…
झुकी गर्दन…
थकी आँखें…
और चेहरे पर फैला हुआ एक ऐसा सन्नाटा, जो वर्षों की हार से पैदा होता है।
अदिति के हाथ से फाइल फिसलते-फिसलते बची। होंठों से बस इतना निकला—
“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…”
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनकी आवाज़ हल्की थी, पर काँप रही थी।
“सुनिए…”
झाड़ू लगाता आदमी पलटा। एक पल के लिए दोनों की नजरें टकराईं। अदिति के भीतर सात साल पुराना अतीत एक साथ उमड़ पड़ा—एक शादी, एक घर, एक सपना, और फिर एक दस्तखत… जो सब कुछ खत्म कर देता है।
वही नाक। वही आंखें। वही चेहरा।
मगर उस आदमी की आंखों में पहचान नहीं थी—या शायद पहचान का इंकार था।
उसने नजरें झुका लीं और साधारण-सी आवाज़ में बोला,
“मैडम… रास्ता साफ कर रहा हूं। जरा साइड दे दीजिए।”
अदिति कुछ कह पातीं, उससे पहले ही वह आदमी झाड़ू उठाकर आगे बढ़ गया—बिना रुके, बिना पलटे, बिना किसी भाव के।
अदिति वहीं खड़ी रह गईं।
चारों तरफ शोर था—हॉर्न, आवाजें, चिल्लाहटें—मगर उनके कानों में बस एक सन्नाटा गूंज रहा था।
वो वही था?
या यह केवल उनका शक था?
अगर वह वही था… तो उसने अनजान क्यों बनने का नाटक किया?
और अगर वह नहीं था… तो दिल इतना भारी क्यों लग रहा था?
अदिति ने एक गहरी सांस ली और थाने के भीतर चली गईं। लेकिन उनका मन वहीं सड़क पर अटका रह गया—उसी झाड़ू, उसी धूल, और उसी चेहरे पर।

2) थाने की दीवारों के भीतर—एक नाम की चोट
थाने के अंदर फाइलें खुलीं। फोन बजे। स्टाफ रिपोर्ट देने आया। मगर अदिति जैसे किसी की बात सुन ही नहीं पा रहीं थीं। उनके सामने बार-बार वही चेहरा घूम रहा था।
अचानक वह कुर्सी से उठ खड़ी हुईं। आवाज़ अब सख्त थी—वह सख्ती जो वर्दी में धीरे-धीरे रच जाती है।
“थाने के बाहर जो सफाई करता है, उसकी पूरी जानकारी चाहिए। अभी।”
स्टाफ चौंक गया। अदिति ने दोहराया,
“नाम, पता, कब से काम कर रहा है—सब कुछ।”
थाने में हलचल मच गई। कुछ मिनटों में रिपोर्ट आ गई।
“मैडम, वो सफाई कर्मी नगर निगम से अटैच है। नाम… अमर कुमार। पिछले कुछ महीनों से यही ड्यूटी कर रहा है।”
अदिति का दिल जोर से धड़का।
अमर।
यह नाम उनके भीतर किसी बंद कमरे की चाबी की तरह घुस गया।
“उसका पता?” उन्होंने पूछा।
“पास की झुग्गी बस्ती में रहता है, मैडम। अकेला नहीं… उसके साथ उसके पिता भी हैं।”
अदिति की आंखें झुक गईं। पिता… उन्हें याद आया—एक सीधा-सादा बुजुर्ग, जो हमेशा बेटे की खुशी में अपनी दुनिया ढूंढता था।
“आज ड्यूटी पर क्यों नहीं आया?” अदिति ने पूछा।
स्टाफ बोला, “मैडम, किसी ने बताया… उसके पिता की तबीयत ठीक नहीं है।”
अदिति की सांस जैसे बीच में अटक गई। उनके चेहरे से अफसर वाली कठोरता एक पल के लिए उतर गई—उसकी जगह चिंता आ गई, एक ऐसी चिंता जो पद नहीं देखती।
उन्होंने धीरे से कहा,
“इंस्पेक्टर… दो सिपाही भेजिए। अमर को ढूंढिए। शांति से। बिना डराए।”
आज अदिति अफसर नहीं—बस एक औरत थीं, जो अपने ही फैसले की छाया में खड़ी थी।
3) झुग्गी का सच—टपकती छत और बुझा हुआ आदमी
झुग्गी बस्ती में टूटी हुई छतें थीं। टीन की चादरें जगह-जगह से उखड़ी थीं। नालियों की गंध हवा में मिली थी। एक कोने में एक छोटी-सी झुग्गी थी—अंदर एक खाट, एक पुराना पंखा, और दीवार पर टंगा एक धुंधला-सा कैलेंडर।
अमर जमीन पर बैठा था। हाथ में पानी का गिलास। सामने खाट पर लेटा उसका बूढ़ा पिता, हांफता हुआ।
पिता की आवाज़ कमजोर थी,
“बेटा… आज फिर काम पर नहीं गया?”
अमर ने सिर झुका लिया।
“बाबूजी… आज मन नहीं लगा।”
बूढ़े ने उसे देखा। उनकी आंखों में वह ताकत थी जो उम्र के साथ नहीं जाती—जो दुख के साथ आती है।
“तू अब भी… उसी को सोचता है ना?”
अमर चुप रहा। सात साल पहले का तलाक उसके लिए सिर्फ कागज नहीं था। वह उसकी पूरी जिंदगी का टूटना था।
घर बिक गया।
छोटा-सा कारोबार बंद हो गया।
दोस्त छूट गए।
और जिस औरत से उसने सबसे ज्यादा प्यार किया—वह उसे पीछे छोड़कर बहुत आगे निकल गई।
पिता ने कांपते हाथ से उसके सिर पर हाथ रखा।
“तू कमजोर नहीं है, अमर… बस दिल बहुत सच्चा है।”
अमर की आंखें भर आईं।
“बाबूजी… अगर मैंने उस दिन जिद न की होती तो शायद…”
वाक्य पूरा नहीं हुआ। पिता ने धीरे से कहा,
“भगवान सब देखता है… पर कभी-कभी देर कर देता है।”
अमर ने हल्की-सी हंसी हँसी—वह हँसी, जिसमें रोने से ज्यादा दर्द होता है।
“देर नहीं बाबूजी… कुछ बातें बस… वापस नहीं आतीं।”
उसी वक्त झुग्गी के बाहर पुलिस का सायरन हल्का-सा सुनाई दिया।
4) थाने में बुजुर्ग की दस्तक
उधर थाने में अदिति खिड़की के पास खड़ी थीं। वही सड़क दिख रही थी। वही जगह, वही धूल—पर आज वहां झाड़ू नहीं थी। उनके मन में सवाल उठते जा रहे थे। अगर वह वही अमर था तो उसने पहचानकर अनजान क्यों बनाया? और अगर नहीं था, तो नाम और चेहरा इतना मेल क्यों खाते?
इसी बीच रिसेप्शन से आवाज़ आई,
“मैडम… एक बुजुर्ग आपसे मिलना चाहते हैं।”
अदिति पलटीं। दरवाज़े पर एक झुका हुआ बूढ़ा आदमी खड़ा था—कांपते हाथ, आंखों में डर और उम्मीद साथ-साथ। वह धीमी आवाज़ में बोला,
“बिटिया… ये DSP क्या होता है?”
अदिति का कलेजा कांप गया। वह आवाज़… वही लहजा…
अब उन्हें यकीन होने लगा था कि सच बहुत पास है।
“आइए, बाबूजी। बैठिए।” अदिति ने कुर्सी की ओर इशारा किया।
बूढ़ा हिचकिचाता हुआ बैठ गया। अदिति ने पानी आगे बढ़ाया।
“किससे मिलना है?”
बूढ़े ने गहरी सांस ली।
“बिटिया… मेरा बेटा यहीं सफाई करता है।”
अदिति का दिल जोर से धड़क उठा, पर चेहरे पर अफसर की सख्ती बनी रही।
“नाम?”
“अमर…” कहते-कहते बूढ़े की आवाज़ भर्रा गई।
अदिति की उंगलियां कुर्सी की पकड़ में कस गईं।
“अमर आज ड्यूटी पर नहीं आया। क्यों?”
बूढ़ा सिर झुका कर बोला,
“मैं बीमार हूं बिटिया… वो मुझे अकेला छोड़कर नहीं जा पाया।”
कुछ पल की चुप्पी के बाद बूढ़ा जैसे टूट गया—
“बिटिया… मेरा बेटा पहले ऐसा नहीं था। वो हंसता था। बात करता था। मेहनत करता था।”
अदिति ध्यान से सुनती रहीं। जैसे हर शब्द उनके भीतर की परतों को खोल रहा हो।
“सात साल पहले उसकी शादी टूट गई…” बूढ़ा बोला।
अदिति की आंखों में हलचल हुई। मगर वह कुछ बोली नहीं।
“तलाक के बाद,” बूढ़ा आगे बोला, “वो जैसे खत्म हो गया। छोटा सा व्यापार था, घर था, सामान था… सब चला गया। जिस औरत से वो सबसे ज्यादा प्यार करता था… वो बहुत आगे निकल गई।”
अदिति का सिर धीरे-धीरे झुकता गया। बूढ़ा रोने लगा।
“मेरा बेटा किसी से नफरत नहीं करता बिटिया… पर खुद से करता है। रात को सोता नहीं, दिन में हंसता नहीं… बस काम करता है। झाड़ू लगाता है।”
अदिति अब कुर्सी पर बैठ नहीं पा रही थीं। वह खड़ी हो गईं।
“आपको पता है DSP क्या होता है?” उन्होंने भारी आवाज़ में पूछा।
“बड़ी अफसर होती है ना?” बूढ़ा बोला।
अदिति के गले में गांठ पड़ गई।
“और अगर वही अफसर… किसी की जिंदगी उजाड़ दे तो?”
बूढ़ा चौंक गया।
“ऐसा कौन करेगा बिटिया? अफसर तो भगवान जैसे होते हैं…”
अदिति की आंखें भर आईं। उन्होंने चेहरा दूसरी ओर कर लिया, ताकि बूढ़ा उनके टूटने को न देखे।
“आप जाइए, बाबूजी,” उन्होंने खुद को संभालते हुए कहा। “आपके बेटे को कोई नुकसान नहीं होगा।”
बूढ़ा हाथ जोड़कर उठा।
“भगवान आपको खुश रखे बिटिया…”
जैसे ही वह बाहर गया, अदिति के भीतर की दीवार टूट गई।
वह कुर्सी पर बैठीं, आंखें बंद कीं।
सात साल पहले का वह फैसला…
वह दस्तखत…
वह घमंड…
क्या वही आज अमर को झाड़ू पकड़ने पर मजबूर कर गया था?
फोन की घंटी बजी। अदिति ने आंखें खोलीं।
“मैडम,” इंस्पेक्टर की आवाज़ आई, “अमर मिल गया है।”
अदिति ने पल भर आंखें बंद कर लीं।
“उसे थाने ले आइए… सम्मान के साथ। आज अफसर नहीं—एक इंसान उसे मिलना चाहता है।”
5) आमने-सामने: वर्दी बनाम खामोशी
थाने के बाहर पुलिस जीप रुकी। दरवाज़ा खुला। अमर नीचे उतरा। आज उसके हाथ में झाड़ू नहीं थी, पर झुका हुआ आत्मसम्मान साथ था। साधारण कपड़े, थका चेहरा, और आंखों में वह सन्नाटा जो बरसों की हार से पैदा होता है।
दो सिपाही उसे भीतर ले आए। थाने में कदम रखते ही कई नजरें उस पर टिक गईं, मगर अमर की नजर जमीन पर ही थी।
“मैडम, अमर आ गया है,” इंस्पेक्टर ने कहा।
अदिति अपनी कुर्सी से नहीं उठीं। बस उनकी पकड़ फाइल पर और कस गई।
“उसे अकेले भेजो।”
दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में अब सिर्फ दो लोग थे—एक वर्दी में बैठी अफसर, और एक आदमी जिसकी जिंदगी वर्दी से हार चुकी थी।
अमर सिर झुकाए खड़ा रहा।
“बैठ जाइए,” अदिति ने औपचारिक लहजे में कहा।
अमर नहीं बैठा।
कुछ सेकंड की खामोशी। फिर अदिति बोलीं,
“आज सुबह थाने के बाहर…”
अमर की पलकों में हल्की हरकत हुई, पर चेहरा शांत रहा।
अदिति ने भारी सवाल पूछा—
“आप मुझे पहचानते हैं?”
अमर ने सिर हल्का सा हिलाया।
“नहीं, मैडम।”
उसके जवाब में ऐसा अभ्यास था—जैसे उसने यह लाइन कई रातों में तैयार की हो।
अदिति का दिल कांप गया, मगर चेहरे पर भाव नहीं आने दिया।
“अजीब है… कुछ चेहरे इंसान जिंदगी भर नहीं भूलता।”
अमर चुप रहा।
“आप यहां कब से काम कर रहे हैं?” अदिति ने पूछा।
“कुछ महीने, मैडम।”
“इससे पहले?”
“जो काम मिला… कर लिया।”
अदिति कुर्सी से उठीं और धीरे-धीरे चलकर उसके सामने आ खड़ी हुईं। इतनी पास कि अमर उनकी सांसें महसूस कर सके।
“मेरी तरफ देखिए,” उन्होंने कहा।
अमर ने सिर उठाया।
एक पल को समय थम गया।
आंखें वही थीं, चेहरा वही… पर उनमें अब कोई शिकायत नहीं थी। सिर्फ खालीपन।
अदिति का गला भर आया। उनके भीतर कुछ टूटकर गिरा। उन्होंने अचानक सिर झुका लिया—एक पल के लिए।
वह झुकना “माफी” नहीं था, पर अहंकार का टूटना जरूर था।
अमर घबरा गया।
“मैडम… ये आप क्या कर रही हैं?”
अदिति ने सिर उठाया, खुद को संभाला।
“कुछ नहीं… बस आज इंसान बनकर खड़ी हूं।”
अमर एक कदम पीछे हटा। उसकी आवाज़ शांत थी।
“अगर कोई काम हो तो बताइए, मैडम… वरना मुझे जाना है।”
अदिति ने धीमे पूछा,
“इतनी जल्दी?”
अमर की आंखें फिर झुक गईं।
“कुछ जगहों पर रुकना ठीक नहीं होता… मैडम।”
अदिति समझ गईं।
वह उन्हें पहचानता है।
बस पहचानना नहीं चाहता।
और यही चुप्पी—सबसे बड़ी सजा थी।
“जा सकते हैं,” उन्होंने धीमे कहा।
अमर मुड़ा। दरवाज़े तक पहुंचा। एक पल को रुका—जैसे कुछ कहना चाहता हो—फिर बिना पीछे देखे बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
अदिति वहीं खड़ी रह गईं—खाली कमरे में, और अपने ही फैसले के सामने।
6) रात का सच: दस्तखत की कीमत
रात हो चुकी थी। थाने की लाइटें एक-एक करके बंद हो रही थीं। मगर अदिति अब भी ऑफिस में थीं। टेबल पर एक पुरानी फाइल खुली थी—सात साल पुराने तलाक के कागज़ात। उसमें वही दस्तखत था, जो तब बहुत आसान लगा था।
दस्तखत आज भी वैसा ही था, पर उसे करने वाला हाथ आज कांप रहा था।
अदिति ने फाइल बंद कर दी। खिड़की से बाहर देखा—वही सड़क, जहां सुबह अमर झाड़ू लगा रहा था।
उन्होंने खुद से कहा,
“मैंने रिश्ते को कमजोरी समझ लिया… और ताकत को सब कुछ।”
तभी फोन की स्क्रीन जली। एक मैसेज था—
“मैडम, अमर कल से दूसरी जगह ड्यूटी करेगा।”
अदिति की सांस रुक गई।
“नहीं…” उनके मुंह से बस यही निकला।
आज वह उसे रोक भी नहीं सकती थीं, और जाने भी नहीं देना चाहती थीं। उन्हें एहसास हुआ कि पद उन्हें बहुत कुछ दे सकता है—लेकिन वक्त वापस नहीं दे सकता।
फिर भी… शायद सच बोलकर कुछ बोझ हल्का हो जाए। शायद एक अधूरी बात पूरी हो जाए।
उन्होंने निर्णय लिया:
अमर से एक बार “इंसान की तरह” बात करनी है—बिना धमकी, बिना अधिकार, बिना पद।
7) सुबह का सामना: जब सच बोलना जरूरी हो जाता है
अगली सुबह हल्की रोशनी थी। अदिति फिर उसी सड़क पर खड़ी थीं, जहां कल अमर झाड़ू लगा रहा था। आज सड़क साफ थी, पर उनका मन नहीं।
उन्होंने इंस्पेक्टर से कहा,
“उसे यही बुलाओ।”
कुछ देर बाद अमर आया। आज उसके हाथ में झाड़ू नहीं थी। चेहरे पर वही शांति थी, जो सब कुछ खोने के बाद आती है।
अदिति ने पहली बार उसे नाम से बुलाया—
“अमर…”
वह रुक गया। अब अनजान बनने का कोई मतलब नहीं था।
अदिति की आवाज़ भारी थी, पर साफ।
“अब अभिनय मत करो। सच से भागना और खुद से भागना—दोनों अलग बातें हैं।”
अमर ने आंखें बंद कर लीं।
“आप क्या सुनना चाहती हैं?” उसने पूछा।
अदिति ने सिर झुका लिया।
“वो दिन… जिस दिन सब खत्म हुआ।”
अमर कुछ पल चुप रहा। फिर बोला—
“आप अफसर बन रही थीं… और मैं…”
वह रुका, जैसे शब्द ढूंढ रहा हो।
“मैं वहीं था, जहां से ऊपर जाना… आपको मंजूर नहीं था।”
अदिति की आंखें भर आईं।
अमर बोलता गया—धीमे, मगर भीतर जमा सालों के साथ।
“मुझसे कहा गया था… अगर साथ रहना है, तो मुझे पीछे रहना होगा। आपकी वर्दी, आपकी पोस्टिंग, आपकी पहचान… और मेरा प्यार—सब आपके करियर के लिए बोझ बन गया था।”
अदिति ने आंखें बंद कर लीं। उन्हें याद आया—वे दिन, जब उन्होंने प्रेम को “कमजोरी” और समझौते को “हार” मान लिया था।
अमर की आवाज़ भर्रा गई—
“मैंने आपसे कहा था… थोड़ा रुक जाओ। पर आपने कहा—रुकने वाले लोग अफसर नहीं बनते।”
अदिति का सिर और झुक गया।
“मैंने तलाक मांगा,” अदिति ने टूटे स्वर में कहा, “क्योंकि मुझे लगा… अगर कमजोरी छोड़ दूंगी, तो मजबूत बन जाऊंगी।”
अमर ने हल्की मुस्कान दी—वह मुस्कान जिसमें तंज नहीं था, सिर्फ सच था।
“आप मजबूत बन गईं… मैडम। लेकिन मैं टूट गया।”
अदिति के आंसू बह निकले।
“मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम इस हाल में पहुंच जाओगे,” अदिति ने कहा।
अमर ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“तलाक के बाद घर बिक गया। काम बंद हो गया। दोस्त चले गए। और जब आदमी खुद से नजर नहीं मिला पाता… तो झाड़ू उठाना सबसे आसान लगता है। कम से कम झाड़ू सवाल नहीं पूछती।”
अदिति अचानक उसके सामने झुक गईं। सच में—एक DSP, एक सफाई कर्मी के सामने।
“मुझे माफ कर दो…” उनकी आवाज़ फूट गई।
अमर पीछे हट गया।
“माफी… देर से मांगी जाती है, मैडम। और कुछ कीमतों के बाद।”
अदिति ने रोते हुए कहा—
“अगर वक्त वापस मिल जाए तो…”
अमर ने सिर हिला दिया।
“वक्त वापस नहीं आता। बस सिखा जाता है।”
कुछ पल की खामोशी रही। फिर अदिति उठीं। सीधे खड़ी हुईं। उनकी पीठ सीधी थी, पर उसमें घमंड नहीं था।
“अमर,” उन्होंने कहा, “तुम आज भी मुझसे ऊंचे हो।”
अमर ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
“क्योंकि मैंने सब खोकर भी… खुद को नहीं खोया।”
अदिति ने थाने की ओर देखा—वर्दी की तरफ—और धीरे से कहा,
“पद बड़ा नहीं होता… इंसान बड़ा होता है।”
अमर मुड़ा और चला गया।
लेकिन इस बार पीछे कुछ टूटा नहीं—कुछ सीखा गया।
8) अंत नहीं—एक सीख जो देर से आती है
अदिति देर तक वहीं खड़ी रहीं। उन्हें पता था—जो खो गया, वह लौट नहीं सकता। मगर यह भी सच था कि किसी की जिंदगी में चोट देकर भी इंसान अगर अपने भीतर की कठोरता तोड़ ले, तो शायद आगे किसी और का घर टूटने से बच जाए।
वह थाने के गेट की तरफ लौटीं। संतरी ने सैल्यूट किया। अदिति ने पहली बार उसे केवल औपचारिकता की तरह नहीं, इंसान की तरह देखा।
और मन ही मन तय किया—अब वह सिर्फ “DSP” नहीं रहेंगी। अब वह वर्दी में भी इंसान रहेंगी।
क्योंकि रिश्तों को करियर से छोटा समझ लेने का नुकसान सिर्फ घर नहीं—आत्मा भी भुगतती है।
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