अंहकार मे डूबी पत्नी ने पति को नौकर समझकर अपमानित किया….सच सामने आते ही सब दंग रह गए
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अहंकार का पतन: आरव और आरोही की कहानी
एक बेमेल शुरुआत
मल्होत्रा हवेली में आज सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा शांति का नहीं, बल्कि तनाव का था। आरोही मल्होत्रा, जो शहर की सबसे सफल बिजनेसवुमन मानी जाती थी, अपनी शादी से बेहद नाखुश थी। उसके पिता ने अपनी वसीयत की एक शर्त के कारण उसकी शादी आरव नाम के एक साधारण दिखने वाले लड़के से कर दी थी।
आरोही को लगता था कि आरव सिर्फ एक “गंवार” और “खेती करने वाला” लड़का है। शादी के पहले ही दिन से आरोही और उसकी मां ने आरव को दामाद नहीं, बल्कि घर का एक मुफ्त नौकर समझ लिया था।
“तुम्हें हल चलाने के अलावा आता क्या है? जाओ, जाकर झाड़ू लगाओ और रसोई संभालो,” आरोही ने शादी की पहली सुबह आरव पर चिल्लाते हुए कहा था।
आरव ने बस मुस्कुराकर जवाब दिया, “जी, कोशिश करूँगा कि आपको शिकायत का मौका न दूँ।” वह शांत था, जैसे किसी गहरे समंदर का पानी।
अपमान की पराकाष्ठा
दिन बीतते गए और आरव पर होने वाले अत्याचार बढ़ते गए। आरोही की मां उसे कप में चाय की एक-एक बूंद के लिए टोकती थी। आरोही अपनी सहेलियों से फोन पर हंसकर कहती, “मेरे पापा ने पति नहीं, घर के लिए एक मल्टीपर्पस नौकर रखा है।”
एक शाम, आरोही को एक हाई-प्रोफाइल बिजनेस पार्टी में जाना था। उसकी सहेली कियारा ने जिद की कि उसे अपने पति के साथ आना होगा। आरोही शर्मिंदा थी, लेकिन समाज के डर से उसने आरव को साथ चलने को कहा।
पार्टी का दृश्य: पार्टी में आरव साधारण कपड़ों में एक कोने में खड़ा था। तभी आरोही का बिजनेस प्रतिद्वंद्वी वहां आया और आरव का मजाक उड़ाते हुए बोला, “आरोही, बिजनेस में तो तुम्हारी हालत खराब है ही, लेकिन लगता है तुम्हारे पति को कपड़े पहनने की तमीज भी नहीं है। क्या यह तुम्हारा पति है या तुम्हारा ड्राइवर?”
पूरी महफिल हंस पड़ी। आरोही ने गुस्से में आरव का हाथ झटक दिया और कहा, “मुझे मत छुओ! अपनी औकात में रहा करो।” आरव खामोश रहा, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक थी—जैसे वह सही समय का इंतजार कर रहा हो।
किस्मत का पलटवार
अहंकार की इमारत जितनी ऊंची होती है, उसके गिरने की गूंज उतनी ही तेज होती है। अचानक मल्होत्रा ग्रुप की किस्मत पलट गई। उनके सबसे बड़े प्रोजेक्ट हाथ से निकलने लगे। रॉयल ग्लोबल और आरआर होल्डिंग्स जैसी बड़ी कंपनियों ने मल्होत्रा ग्रुप को बाजार से बाहर कर दिया।
सात दिनों के भीतर आरोही को 500 करोड़ रुपये की जरूरत थी, वरना उसका घर और कंपनी नीलाम होने वाली थी। बैंक के अधिकारी नोटिस लेकर घर पहुंच गए। आरोही और उसकी मां टूट चुकी थीं। वे आरव को “मनहूस” कह रही थीं।
तभी एक खबर आई जिसने सबके होश उड़ा दिए। आरआर होल्डिंग्स नाम की एक दिग्गज कंपनी ने चुपचाप मल्होत्रा ग्रुप के सारे कर्ज चुका दिए और उनके अकाउंट में 600 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए।
मुखौटा उतरा और सच सामने आया
अगली शाम, आरआर होल्डिंग्स के चेयरमैन मल्होत्रा हवेली आने वाले थे। आरोही ने आरव को सख्त हिदायत दी, “आज बड़े लोग आ रहे हैं, तुम रसोई में छिपे रहना। अपनी परछाई भी मत दिखाना।”
शाम 7:00 बजे, काले रंग की महंगी गाड़ियों का काफिला हवेली के बाहर रुका। आरआर होल्डिंग्स के मुख्य प्रबंधक मिस्टर खन्ना अंदर आए। आरोही ने उत्सुकता से पूछा, “मिस्टर खन्ना, आपके चेयरमैन साहब कहां हैं? मैं उन्हें धन्यवाद कहना चाहती हूं।”
मिस्टर खन्ना ने सम्मान से झुककर कहा, “मैम, मेरे बॉस तो इसी घर में हैं।”
तभी आरव, जो अब तक रसोई में काम कर रहा था, धीरे-धीरे चलकर हॉल के बीच में आया। उसने अपनी एप्रन उतारी और मिस्टर खन्ना के पास खड़ा हो गया। मिस्टर खन्ना ने झुककर कहा, “गुड इवनिंग सर! आपके आदेशानुसार सारा निवेश पूरा हो चुका है।”
हॉल में सन्नाटा पसर गया। आरोही के हाथ से पानी का गिलास गिर गया। उसकी मां के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“यह… यह क्या मजाक है?” आरोही हकलाते हुए बोली।
मिस्टर खन्ना ने गर्व से कहा, “यह कोई मजाक नहीं है। ये हैं आरव वीर राजपूत, आरआर होल्डिंग्स के मालिक और चेयरमैन।”

अंतिम सबक
आरव ने ठंडी आवाज़ में कहा, “आरोही, इंसान की इज्जत उसकी दौलत से नहीं, उसके वजूद से होती है। तुम्हारे पिता चाहते थे कि मैं तुम्हारी परीक्षा लूँ, और मुझे अफसोस है कि तुम इस परीक्षा में पूरी तरह फेल हो गई।”
आरोही की मां गिड़गिड़ाने लगी, “दामाद जी, हम तो बस मजाक कर रहे थे…”
आरव ने उन्हें टोकते हुए कहा, “गलती गरीबी से नहीं, इंसान को इंसान न समझने से हुई। मैंने बदला लेने के लिए यह सब नहीं किया, बल्कि इसलिए किया ताकि तुम्हें वह सबक मिल सके जो पैसा कभी नहीं सिखा सकता।”
आरव ने मल्होत्रा ग्रुप के 51% शेयर और घर के कागजात आरोही के नाम कर दिए और वहां से हमेशा के लिए जाने लगा। आरोही पीछे से चिल्लाती रही, माफी मांगती रही, लेकिन आरव नहीं रुका। उसने साबित कर दिया था कि अहंकार आंखों पर पट्टी बांध देता है, और जब वह पट्टी खुलती है, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।
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