अकेले मर जा गोवा में: जयश्री दत्ता की कहानी

दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 में एक बूढ़ी महिला अकेले खड़ी थी। उसका छोटा सा सूटकेस हाथ में था, और उसके चेहरे पर ग़म और दर्द साफ झलक रहा था। चारों तरफ लोग उसकी ओर देख रहे थे, कुछ सहानुभूति से, कुछ हैरानी से। तभी उसकी बहू सिमरन अपने फोन पर कुछ टाइप कर रही थी, शायद उसकी टिकट कैंसिल करने की कोशिश में। उस महिला के कानों में उसके बेटे रोहित की आवाज गूंज रही थी, “अकेले मर जा गोवा में। हम अभी तेरा टिकट कैंसिल कर रहे हैं।”

यह शब्द उस महिला के दिल में तीर की तरह चुभ गए। वह महिला थी जयश्री दत्ता, 67 साल की एक विधवा, जो अपने बेटे और बहू द्वारा त्याग दी गई थी। लेकिन उनके लिए यह समझना मुश्किल था कि वह कौन है। जयश्री दत्ता रोहिणी सेक्टर 11 में तीन और आधे करोड़ की संपत्ति की मालिक थीं, और कनॉट प्लेस में दो कमर्शियल प्रॉपर्टी भी। उनके पास 80 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट थी, और 25 साल का इंटीरियर डिजाइन का अनुभव। उनके हाथ में एक ब्राउन लिफाफा था, जिसमें वे दस्तावेज़ थे जो उनके बेटे रोहित को पता नहीं थे। यह प्रॉपर्टी के असली कागजात थे।

जब रोहित ने उस लिफाफे को देखा तो उसका चेहरा लाल हो गया। उसने कहा, “मां, वो लिफाफा मुझे दो।” लेकिन जयश्री ने साड़ी के पल्लू में उसे छुपा लिया। रोहित ने कहा, “तुम समझती क्यों नहीं? तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूं।” लेकिन वह चुप रही, क्योंकि उसने इतने सालों में सीखा था कि कब चुप रहना जरूरी होता है।

तभी एक सज्जन ने हस्तक्षेप किया। वह करीब 65-66 साल के थे, सफेद बालों वाले, साफ-सुथरी शर्ट में, और उनके पीछे एक ड्राइवर खड़ा था। उन्होंने कहा, “फैमिली मैटर है,” पर रोहित को नजरअंदाज करते हुए सीधे जयश्री से पूछा, “आप ठीक हैं?” फिर उन्होंने धीरे से फुसफुसाया, “दिखावा करो कि तुम मेरी पत्नी हो, मेरा ड्राइवर अभी गाड़ी लाएगा।” जयश्री हैरान रह गई कि यह अजनबी आदमी उसकी मदद क्यों कर रहा था। उन्होंने रोहित को चेतावनी दी, “बेटा, बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार करोगे तो पछताओगे। बहुत पछताओगे।” और फिर उन्होंने जयश्री का हाथ पकड़कर उसे अपनी गाड़ी में बैठा लिया।

जयश्री दत्ता की कहानी बहुत पुरानी थी। उनके पति रमेश दत्ता की मौत एक कंस्ट्रक्शन साइट पर हादसे में हुई थी। रमेश एक सिविल कॉन्ट्रक्टर थे जिन्होंने 30 साल की मेहनत से संपत्ति बनाई थी। जयश्री खुद एक इंटीरियर डिजाइनर थीं, जो घर से काम करती थीं। उन्होंने 25 साल तक छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स पर काम किया था। रमेश की मौत के बाद उन्हें अच्छी इंश्योरेंस रकम मिली थी, और उनके नाम कनॉट प्लेस में दो कमर्शियल प्रॉपर्टी थीं।

उनका बेटा रोहित 32 साल का था और एक आईटी कंपनी में काम करता था। तीन साल पहले उसने सिमरन से शादी की थी। शुरू में सब ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे रोहित और सिमरन का व्यवहार बदलने लगा। पहले रोहित रोज शाम को जयश्री के कमरे में आता था, उनसे बात करता था, पर अब महीनों तक बात नहीं करता था। वह उनकी इंटीरियर डिजाइनिंग की परियोजनाओं में रुचि नहीं लेता था और कहता था कि इस उम्र में आराम करना चाहिए। सिमरन भी शुरुआत से ही दूरी बनाए रखती थी।

रमेश की मौत के छह महीने बाद रोहित ने कहा कि वह रोहिणी वाला घर अपने नाम करना चाहता है। उसने कहा कि टैक्स के हिसाब से बेहतर रहेगा। जयश्री को टैक्स की ज्यादा जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने बेटे पर भरोसा किया। लेकिन जब उसने दस्तावेजों को देखा तो वह समझ नहीं पाई कि ये क्या हैं। रोहित ने उसे साइन करने के लिए दबाव डाला। सिमरन भी आई और कहा कि आजकल बच्चे अपने माता-पिता की फाइनेंशियल सिक्योरिटी का ख्याल रखते हैं। जयश्री को कुछ अटपटा लगा, लेकिन उसने मना किया और कुछ दिन सोचने को कहा।

विभा, जो उनकी पुरानी सहेली और रिटायर्ड बैंक कर्मचारी थीं, ने सलाह दी कि किसी अच्छे प्रॉपर्टी वकील से मिलो और दस्तावेजों को जांचवाओ। जयश्री ने अदिति सेन नाम की एक वकील से संपर्क किया। अदिति ने बताया कि अगर जयश्री ने दस्तावेजों पर साइन कर दिया होता तो उनकी संपत्ति रोहित के नाम हो जाती और वापस लेना मुश्किल होता।

इस बीच घर का माहौल खराब होता गया। सिमरन ने जयश्री के ऑफिस रूम को जिम में बदलने की बात कही और उनकी पुरानी डायरी को फेंक दिया, जिसमें 25 सालों के क्लाइंट्स के नंबर और पते थे। जयश्री ने समझा कि यह सिर्फ जिम की बात नहीं थी, बल्कि उनकी पहचान मिटाने की कोशिश थी। वह चुप रही, लेकिन अपनी जरूरी फाइलें और कागजात छुपा ली।

अदिति ने सुझाव दिया कि जयश्री अपनी सारी संपत्ति एक इररिवोकेबल ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दें, ताकि रोहित संपत्ति पर कब्जा न कर सके। ट्रस्ट का ट्रस्टी जयश्री की बेटी पूजा हो सकती थी, जो अमेरिका में रहती थी। पूजा डॉक्टर थी और उसने जयश्री से माफी मांगी थी। पूजा ने पावर ऑफ अटॉर्नी दी, और जयश्री ने संपत्ति ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दी।

घर में अत्याचार बढ़ते गए। रोहित ने पैसे मांगे, लेकिन जयश्री ने मना कर दिया। फिर रोहित और सिमरन ने जयश्री को गोवा ट्रिप पर ले जाने का फैसला किया, लेकिन अदिति ने चेतावनी दी कि सतर्क रहना चाहिए क्योंकि बुजुर्गों को दूर ले जाकर छोड़ दिया जाता है और प्रॉपर्टी पर कब्जा कर लिया जाता है।

गोवा जाने से पहले जयश्री ने सारे जरूरी दस्तावेज़ ब्राउन लिफाफे में रख लिए। एयरपोर्ट पर रोहित ने उनका सूटकेस चेक किया और लिफाफा देखा। उसने चिल्लाया और कहा कि जयश्री गोवा नहीं जा रही हैं। “अकेले मर जा गोवा में,” रोहित ने कहा और उनकी टिकट कैंसिल कर दी।

तभी रणवीर सिंघानिया नाम के एक सज्जन आए, जिन्होंने जयश्री को अपने साथ गाड़ी में बैठाया और अपने घर ले गए। उनकी पत्नी सुमन ने जयश्री की देखभाल की। तीन दिन बाद रणवीर ने कहा कि अब जयश्री घर जा सकती हैं, लेकिन पहले पुलिस केस दर्ज कराएं और घर का ताला बदलवाएं।

अदिति सेन की मदद से जयश्री ने रोहित और सिमरन के खिलाफ धोखाधड़ी, बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, और प्रॉपर्टी हड़पने की कोशिश का केस दर्ज करवाया। रोहित पछताने आया, लेकिन उसके पास अब कोई अधिकार नहीं था। कोर्ट ने रोहित और सिमरन को दोषी पाया और उन्हें जेल की सजा और जुर्माना सुनाया।

जयश्री ने अपने पुराने ऑफिस रूम को साफ किया, अपने काम को फिर से शुरू किया और अपने पुराने क्लाइंट्स वापस पाए। पूजा, रणवीर और सुमन उनके साथ थे। जयश्री ने बुजुर्ग महिलाओं की मदद करना शुरू किया और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।

रोहित की नौकरी चली गई, सिमरन ने तलाक की अर्जी दी, और दोनों की जिंदगी बर्बाद हो गई। लेकिन जयश्री ने अपनी जिंदगी फिर से जीना शुरू कर दिया। उन्होंने सीखा कि उम्र कमजोरी नहीं है, बल्कि ताकत है। उन्होंने खुद के लिए लड़ना सीखा और अपनी इज्जत वापस पाई।

जयश्री दत्ता की कहानी एक प्रेरणा है उन सभी बुजुर्गों के लिए जो अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। यह कहानी बताती है कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, हिम्मत और समझदारी से हर लड़ाई जीती जा सकती है।