आखिर क्यों बड़े बड़े पुलिस अफसर झुक गए एक संतरे बेचने वाले गरीब लड़का के सामने…
.
.
न्याय की गूंज: एक अनाथ और वर्दी का अहंकार
अध्याय 1: चौराहे का सन्नाटा और संघर्ष की धूप
शहर का वह मुख्य चौराहा हमेशा शोर-शराबे से भरा रहता था, लेकिन उस शोर के बीच भी एक खामोशी थी जो सात साल के समीर के जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। सुबह की पहली किरण के साथ, जब शहर अंगड़ाई ले रहा होता, समीर अपनी छोटी सी टोकरी में ताजे संतरे सजाकर सड़क के किनारे बैठ जाता।
समीर की उम्र अभी महज़ अठारह-उन्नीस साल रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में जो गहराई थी, वह किसी वृद्ध पुरुष की लगती थी। उसकी नीली शर्ट मैली हो चुकी थी और जगह-जगह से फटी हुई थी, जो उसके गरीबी की कहानी खुद-ब-खुद बयां कर रही थी। सात साल पहले आए उस विनाशकारी भूकंप ने न केवल उसके घर को मलबे में तब्दील कर दिया था, बल्कि उसके हँसते-खेलते परिवार को भी उससे छीन लिया था। तब से, यह चौराहा ही उसका घर था और ये संतरे ही उसका सहारा।

वह अक्सर आसमान की तरफ देखकर सोचता, “क्या भगवान ने मेरे नसीब में सिर्फ संघर्ष ही लिखा है?”
अध्याय 2: वर्दी का रौब और बेबसी का आंसू
एक दोपहर, जब सूरज आग उगल रहा था और समीर कुछ ग्राहकों के इंतजार में था, तभी धूल उड़ाती हुई पुलिस की एक जीप उसके पास आकर रुकी। जीप से सब इंस्पेक्टर दिग्विजय सिंह नीचे उतरा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी अकड़ थी और आँखों में सत्ता का नशा।
“ए लड़के! तुझे शर्म नहीं आती? सड़क तेरे बाप की है क्या जो यहाँ दुकान सजाकर बैठ गया?” दिग्विजय की आवाज़ में गरज थी।
समीर बुरी तरह कांपने लगा। उसने हाथ जोड़ लिए, “साहब, मैं बहुत गरीब हूँ। यहाँ से किसी को आने-जाने में दिक्कत नहीं होती। प्लीज मुझे बैठने दीजिए, वरना मैं भूखा मर जाऊँगा।”
लेकिन दिग्विजय के दिल में रहम नहीं था। उसने समीर को धमकाया और अंत में दो किलो संतरे मुफ्त में बांधने का हुक्म दिया। “सुन, अगर यहाँ बैठना है, तो रोज़ मुझे ऐसे ही फल देने होंगे। वरना हवालात की हवा खिलाऊँगा।”
समीर की आँखों से आँसू छलक आए। वह दिन भर में मुश्किल से 70-80 रुपये बचा पाता था। अगर वह मुफ्त में फल देता, तो उसकी लागत भी नहीं निकलती। लेकिन वर्दी के खौफ के आगे वह बेबस था।
अध्याय 3: नियति का अनपेक्षित मोड़
अगले दिन, दिग्विजय सिंह फिर आया। इस बार उसकी बदतमीजी और बढ़ गई थी। जब समीर ने हिम्मत जुटाकर पैसों की बात की, तो दिग्विजय ने बिना सोचे-समझे समीर के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। “तेरी ज़ुबान बहुत चलने लगी है!”
लेकिन दिग्विजय को यह अंदाज़ा नहीं था कि उस दिन किस्मत कुछ और ही खेल रच रही थी। सड़क के दूसरी ओर, जिले की नवनियुक्त डीसीपी किरण राव अपनी सिविल ड्रेस में इलाके का मुआयना कर रही थीं। उन्होंने यह सारा मंजर अपनी आँखों से देखा। एक पुलिस वाले को एक गरीब बच्चे पर हाथ उठाते देख उनका खून खौल उठा।
जब दिग्विजय अपनी जीप लेकर चला गया, तो किरण राव धीरे-धीरे समीर के पास पहुँचीं। समीर उन्हें देखकर डर गया, उसे लगा कि शायद एक और पुलिस अधिकारी उसे प्रताड़ित करने आया है।
“डरो मत बेटा, मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी,” किरण ने बहुत कोमलता से कहा। “वह पुलिस वाला तुम्हें क्यों मार रहा था?”
समीर ने सिसकते हुए अपनी पूरी व्यथा सुना दी। उसने बताया कि कैसे वह भूकंप में अनाथ हुआ और कैसे अब पुलिस उसे लूट रही है।
अध्याय 4: पहचान का वो भावुक क्षण
जब समीर अपनी कहानी सुना रहा था, तो किरण राव के पैरों तले जमीन खिसक गई। समीर ने बताया कि सात साल पहले भूकंप में उसका पूरा परिवार बिछड़ गया था। किरण को अपना बीता हुआ कल याद आने लगा।
“तुम्हारा नाम क्या है?” किरण ने कांपती आवाज़ में पूछा। “समीर…” उसने जवाब दिया।
किरण की आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। “समीर… क्या तुम्हें याद है तुम्हारी एक बड़ी बहन थी, जो तुम्हें ‘छोटू’ कहकर बुलाती थी?”
समीर चौंक गया। “हाँ मैडम, लेकिन वह तो शायद उस तबाही में…”
“नहीं समीर! मैं ही तुम्हारी बहन किरण हूँ!”
दोनों भाई-बहन बीच सड़क पर एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगे। सालों का दर्द, बिछड़न और गरीबी की दीवारें एक पल में ढह गईं। किरण जो एक बड़ी पुलिस अफसर बन चुकी थी, उसने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी कि उसका भाई जीवित होगा। आज वह उसके सामने था, एक संतरे बेचने वाले के रूप में।
अध्याय 5: भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यूह रचना
किरण ने समीर को अपने साथ घर ले जाने का फैसला किया, लेकिन उसके मन में एक और आग जल रही थी—न्याय की आग। वह चाहती थी कि दिग्विजय सिंह जैसे भ्रष्ट अधिकारियों को समाज के सामने बेनकाब किया जाए।
उसने समीर से कहा, “भाई, आज तुम्हें आखिरी बार उस चौराहे पर बैठना होगा। लेकिन इस बार तुम अकेले नहीं हो। तुम्हारी बहन तुम्हारे साथ है।”
अगले दिन, किरण ने समीर की शर्ट के बटन में एक छोटा सा ‘स्पाइ कैमरा’ लगा दिया। वह खुद सादे कपड़ों में पास की एक दुकान में छिप गई।
कुछ ही देर में दिग्विजय सिंह अपनी पुरानी आदत के अनुसार जीप लेकर पहुँचा। “ए छोकरे! आज फल तैयार हैं या फिर से मार खाने का इरादा है?”
समीर ने इस बार आत्मविश्वास के साथ कहा, “साहब, मैं मेहनत करता हूँ। आप मुझे मेरे हक के पैसे दे दीजिए।”
दिग्विजय आगबबूला हो गया। “पैसे मांगेगा मुझसे?” उसने फिर से हाथ उठाया, लेकिन इस बार उसका हाथ हवा में ही रुक गया। किरण राव दुकान से बाहर निकल आई थीं।
अध्याय 6: वर्दी की मर्यादा और कानून का डंडा
“सब इंस्पेक्टर दिग्विजय सिंह! रुक जाइए!” किरण की आवाज़ में वो दबदबा था कि दिग्विजय के पसीने छूट गए।
जब उसने देखा कि सामने सादे कपड़ों में जिले की डीसीपी खड़ी हैं, तो वह हकलाने लगा। “मैडम… आप यहाँ? मैं तो बस इस लड़के को हटा रहा था…”
“झूठ मत बोलो!” किरण ने अपना फोन निकाला और रिकॉर्डिंग दिखाई। “तुम्हारी हर हरकत इस कैमरे में कैद है। तुमने न केवल एक गरीब को लूटा, बल्कि पुलिस की वर्दी को भी दागदार किया है।”
किरण ने मौके पर ही उसे निलंबित (Suspend) करने का आदेश दिया। “दिग्विजय सिंह, कानून सबके लिए बराबर है। तुम जैसे लोग समाज के लिए नासूर हैं।”
अध्याय 7: अदालत का इंसाफ
यह मामला शहर में आग की तरह फैल गया। कुछ दिनों बाद, मामला अदालत में पहुँचा। कोर्ट रूम में भारी भीड़ थी। एक तरफ वर्दी का अहंकार था और दूसरी तरफ एक गरीब लड़के की सच्चाई।
जज साहब के सामने जब वह वीडियो फुटेज दिखाई गई, जिसमें दिग्विजय समीर को थप्पड़ मार रहा था और मुफ्त में फल छीन रहा था, तो पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया।
जज ने कड़े लहजे में कहा, “एक रक्षक जब भक्षक बन जाए, तो समाज का विश्वास टूट जाता है। दिग्विजय सिंह को उनके पद से बर्खास्त किया जाता है और उन्हें दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई जाती है।”
अदालत में मौजूद बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी, जो अब तक दिग्विजय के पक्ष में सोच रहे थे, वे भी समीर की ईमानदारी और किरण के साहस के सामने झुक गए।
अध्याय 8: एक नई शुरुआत
समीर अब संतरे नहीं बेचता था। किरण ने उसे वापस स्कूल और कॉलेज भेजा। वह अब अपनी बहन के साथ एक बड़े बंगले में रहता था, लेकिन उसने कभी अपनी जड़ों को नहीं भुलाया।
किरण और समीर ने मिलकर ‘भूकंप पीड़ित सहायता केंद्र’ खोला, ताकि कोई और बच्चा उनकी तरह अपनों से न बिछड़े और न ही किसी भ्रष्टाचार का शिकार बने।
उपसंहार
यह कहानी हमें सिखाती है कि वक्त कितना भी कठिन क्यों न हो, सच्चाई की हमेशा जीत होती है। जहाँ अहंकार झुकता है, वहीं से न्याय का उदय होता है। समीर की छोटी सी संतरे की टोकरी आज एक बड़े बदलाव का प्रतीक बन चुकी थी।
News
पुलिस दरोगा की गलती की वजह से हुआ बहुत बड़ा हादसा/S.P साहब भी रो पड़े/
पुलिस दरोगा की गलती की वजह से हुआ बहुत बड़ा हादसा/S.P साहब भी रो पड़े/ . . अध्याय 1: विधवा…
12 साल के लडके ने रच दिया इतिहास/जिसको देख कर पुलिस और गांव के लोग दंग रह गए/
12 साल के लडके ने रच दिया इतिहास/जिसको देख कर पुलिस और गांव के लोग दंग रह गए/ . ….
मामा की गलती की वजह से हुआ बड़ा हादसा/S.P साहब के होश उड़ गए/लोग भी सोचने पर मजबूर हो गए/
मामा की गलती की वजह से हुआ बड़ा हादसा/S.P साहब के होश उड़ गए/लोग भी सोचने पर मजबूर हो गए/…
पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/
पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/ . ….
HALA! PINAY DH sa HONGKONG NAHULOG sa BUILDING | AKSIDENTE nga ba o may TUMULAK?
HALA! PINAY DH sa HONGKONG NAHULOG sa BUILDING | AKSIDENTE nga ba o may TUMULAK? . . Part 1: Ang…
GRABE, HALANG ANG KALULUWA NG MGA TAONG ITO
GRABE, HALANG ANG KALULUWA NG MGA TAONG ITO . . Part 1: Ang Huling Gabi ni Erwin Sa ilalim ng…
End of content
No more pages to load






