उसने अपने पिता के इलाज के लिए अपनी किडनी बेच दी, जब डॉक्टर को यह पता चला, तो उसने जो किया वह कल्पना से परे था।

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कानपुर शहर की भीड़भाड़ और चमड़ा उद्योग की गलियों में, रावतपुर नामक एक पुराने मोहल्ले में रवि का छोटा सा परिवार रहता था। दो कमरों का किराए का मकान ही उनकी पूरी दुनिया थी। परिवार में उसके पिता मोहनलाल, मां शारदा और छोटी बहन सीमा थी। मोहनलाल कभी फैक्ट्री में मजदूरी करते थे, लेकिन अब उनकी दुनिया एक पुरानी चारपाई तक सिमट गई थी। शारदा सिलाई का काम करके घर का खर्च चलाती थीं और सीमा कॉलेज में पढ़ती थी, उसके सपनों में भाई का संघर्ष साफ झलकता था।

रवि, 24 साल का नौजवान, एक छोटी लेदर फैक्ट्री में काम करता था। दिनभर केमिकल की गंध और मशीनों के शोर के बीच 12 घंटे काम करने के बाद उसे महीने के कुछ हजार रुपये मिलते थे। इन पैसों से घर का किराया, मां की दवाइयां, सीमा की फीस और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना किसी सर्कस में रस्सी पर चलने जैसा था। लेकिन रवि ने कभी हार नहीं मानी। उसका परिवार ही उसकी हिम्मत था।

पिछले एक साल से उनके घर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। मोहनलाल जी की दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। डॉक्टरों ने कहा था कि अगर जिंदा रहना है तो हर हफ्ते दो बार डायलिसिस करवाना होगा और जिंदगी बचाने का एकमात्र रास्ता किडनी ट्रांसप्लांट ही है। डायलिसिस का खर्चा ही उनकी कमर तोड़ रहा था। रवि ने अपनी छोटी-मोटी बचत, मां के गहने, सब कुछ बेच दिया। वह फैक्ट्री से आने के बाद रात में एक ढाबे पर बर्तन भी मांझने लगा। लेकिन ट्रांसप्लांट के लिए जो 15 लाख रुपये चाहिए थे, वह उसके लिए एक असंभव सपना था।

सरकारी अस्पताल में ट्रांसप्लांट की लिस्ट इतनी लंबी थी कि उनका नंबर आने तक शायद बहुत देर हो जाती। परिवार में किसी की किडनी मोहनलाल जी से मैच नहीं हुई। रवि हर रोज अपने पिता को कमजोर होते देखता, उनका चेहरा पीला पड़ गया था, शरीर सूखकर कांटा हो गया था। वह अपनी आंखों के सामने अपने पिता को तिल-तिल कर मरते हुए देख रहा था और कुछ नहीं कर पा रहा था। यह बेबसी उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। वह मंदिरों में जाता, मन्नतें मांगता, लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

एक दिन जब वह हताश होकर फैक्ट्री के बाहर बैठा था, तो उसके एक साथी मजदूर ने उसे एक खतरनाक और गैर कानूनी रास्ते के बारे में बताया। उसने कहा कि दिल्ली और बड़े शहरों में ऐसे लोग हैं जो पैसों के बदले इंसानी अंग खरीदते हैं। उसने बताया कि एक किडनी बेचकर कई लाख रुपये मिल सकते हैं। यह सुनकर रवि का दिमाग सुन्न हो गया। अपनी किडनी बेचना, यह ख्याल ही उसकी रूह को कंपा देने के लिए काफी था। यह गैर कानूनी था, खतरनाक था और इसका असर उसकी अपनी जिंदगी पर हमेशा के लिए पड़ सकता था।

लेकिन उसके सामने अपने पिता का दर्द से कराहता चेहरा घूम गया। वह सोचने लगा, मेरे इस शरीर का क्या फायदा, अगर मैं अपने पिता को ही न बचा सकूं। जिस पिता ने मुझे पाल-पोसकर इतना बड़ा किया, उनकी जिंदगी के लिए क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता? उसके अंदर एक भयानक जंग छिड़ गई। उसका दिमाग उसे रोक रहा था, लेकिन उसका दिल उसे अपने पिता के लिए कुछ भी कर गुजरने को कह रहा था।

उस रात जब मोहनलाल जी की हालत अचानक बहुत बिगड़ गई और उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा, तो रवि ने फैसला कर लिया। अब और कोई रास्ता नहीं बचा था। उसने अपनी मां और बहन से झूठ कहा कि फैक्ट्री के मालिक ने उसकी मदद करने का वादा किया है और वह इलाज के लिए कर्ज दे रहे हैं। उसने उन्हें कानपुर में ही एक रिश्तेदार के घर भेज दिया, यह कहकर कि शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भागदौड़ करनी पड़ेगी।

फिर उसने वह कदम उठाया जिसने उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलना था। उसने उस साथी मजदूर के जरिए दिल्ली के उन दलालों से संपर्क किया। वह दिल्ली पहुंचा। एक अनजान शहर में, एक पुरानी सी गंदी गली में बनी अवैध क्लीनिक में उसकी मुलाकात उन लोगों से हुई जिनकी आंखों में इंसानियत नहीं, सिर्फ पैसा था। रवि डरा हुआ था, लेकिन उसके सामने अपने पिता का चेहरा था। उससे कई कागजों पर दस्तखत करवाए गए। उसे समझाया गया कि यह बात अगर बाहर निकली तो वह भी जेल जाएगा।

फिर एक अंधेरे से ऑपरेशन थिएटर में कुछ घंटों के लिए रवि बेहोश हो गया। जब उसे होश आया, तो उसके पेट के एक हिस्से में तेज दर्द था और उसके हाथ में नोटों की एक मोटी गड्डी थी। पूरे एक लाख रुपये। उसे यह रकम अपनी जिंदगी की कीमत पर मिली थी। उसके शरीर का एक हिस्सा अब हमेशा के लिए जा चुका था। उसे दर्द हो रहा था, कमजोरी महसूस हो रही थी, लेकिन उसके दिल में एक सुकून था कि अब वह अपने पिता को बचा लेगा।

वह उन पैसों को लेकर वापस कानपुर लौटा। उसने अपनी मां को बताया कि मालिक से पैसे मिल गए हैं। किसी को उस पर शक नहीं हुआ। सब बस इस बात से खुश थे कि अब मोहनलाल जी का इलाज हो सकेगा। रवि अपने पिता को लेकर शहर के सबसे बड़े और सबसे महंगे प्राइवेट अस्पताल लाइफ केयर हॉस्पिटल पहुंचा। वहां के नेफ्रोलॉजी विभाग के हेड थे डॉक्टर आलोक वर्मा। डॉक्टर वर्मा अपने क्षेत्र के सबसे बड़े और सम्मानित सर्जनों में से एक थे। वह अपने उसूलों के पक्के और बेहद अनुशासित माने जाते थे, लेकिन उनके सख्त चेहरे के पीछे एक बेहद संवेदनशील दिल था जिसे बहुत कम लोग जानते थे।

रवि ने अस्पताल में पैसे जमा करवाए और मोहनलाल जी भर्ती हो गए। डॉक्टर वर्मा ने केस की जांच की और ट्रांसप्लांट के लिए हामी भर दी। अस्पताल को एक डोनर मिल गया और ट्रांसप्लांट की तारीख तय हो गई। ऑपरेशन सफल रहा। मोहनलाल जी की हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। रवि दिन-रात अपने पिता की सेवा में लगा रहता।

पर डॉक्टर आलोक वर्मा की तेज नजरें रवि में कुछ अजीब बातें नोटिस करने लगीं। उन्होंने देखा कि रवि हमेशा थका-थका और कमजोर सा लगता है। वह अक्सर अपने पेट के एक हिस्से को पकड़कर बैठ जाता, जैसे उसे दर्द हो रहा हो। वह हमेशा ढीले-ढाले कपड़े पहनता था। जब भी डॉक्टर वर्मा उससे पैसों के इंतजाम के बारे में पूछते तो वह घबरा जाता और गोलमोल जवाब देता। डॉक्टर वर्मा का शक गहराने लगा। उन्हें अपने अनुभव से लग रहा था कि दाल में कुछ काला है।

एक दिन राउंड्स के दौरान मोहनलाल जी का चेकअप करते हुए, बातों-बातों में डॉक्टर वर्मा ने रवि से पूछा, “रवि, तुम इतने कमजोर क्यों लग रहे हो? कोई दिक्कत है क्या?”
रवि सकपका गया, “नहीं-नहीं डॉक्टर साहब, बस भागदौड़ की वजह से थोड़ी थकान है।”
उसकी घबराहट डॉक्टर वर्मा की अनुभवी आंखों से छिपी नहीं रह सकी। उन्होंने फैसला किया कि वह इस मामले की तह तक जाएंगे।

उन्होंने अपने एक जूनियर डॉक्टर को चुपके से रवि के कुछ ब्लड टेस्ट करवाने के लिए कहा, यह कहकर कि अस्पताल के नियमों के अनुसार मरीज के करीबी रिश्तेदार का भी रूटीन चेक जरूरी है। जब टेस्ट की रिपोर्ट आई तो डॉक्टर वर्मा का शक यकीन में बदल गया। रिपोर्ट साफ बता रही थी कि रवि का क्रिएटिनिन लेवल सामान्य नहीं था और उसके शरीर में सिर्फ एक ही किडनी काम कर रही थी। डॉक्टर वर्मा समझ गए कि रवि ने क्या किया है।

उनका दिल इस लड़के के त्याग और हिम्मत को देखकर कांप उठा, पर साथ ही उन्हें गुस्सा भी आया कि उसने अपनी जान को इतने बड़े खतरे में डाल दिया। अगले दिन उन्होंने रवि को अपने ऑफिस में बुलाया। ऑफिस में सन्नाटा था। डॉक्टर वर्मा अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उनके चेहरे पर एक गहरी गंभीरता थी।

“रवि, मुझे सच बताओ। तुम्हारे पिता के ट्रांसप्लांट के लिए पैसे कहां से आए?”
रवि का चेहरा सफेद पड़ गया। वह चुप रहा।
डॉक्टर वर्मा ने अपनी मेज पर रखी रवि की मेडिकल रिपोर्ट उसकी ओर खिसकाई।
“मुझे झूठ मत बोलो। मैं सब जानता हूं। मैं जानता हूं कि तुमने अपनी एक किडनी बेच दी है।”

यह सुनकर रवि टूट गया। वह और हिम्मत नहीं रख सका। वह बच्चों की तरह रोते हुए डॉक्टर वर्मा के पैरों पर गिर पड़ा, “हां साहब, मैंने अपनी किडनी बेच दी। मैं और क्या करता? मैं अपने पिता को अपनी आंखों के सामने मरते हुए नहीं देख सकता था। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मुझे माफ कर दीजिए साहब।”

डॉक्टर वर्मा ने उसे उठाकर कुर्सी पर बिठाया। उनकी अपनी आंखें भी नम हो गई थीं। वह कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने एक गहरी सांस ली। उनकी आवाज में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी पीड़ा थी।

“रवि, आज तुमने मुझे मेरा अतीत याद दिला दिया। शायद तुम नहीं जानते, पर मैं भी तुम्हारी ही तरह एक गरीब परिवार से था। मेरे पिता एक मामूली किसान थे। जब मैं तुम्हारी उम्र का था, उन्हें भी ऐसी ही बीमारी हो गई थी जिसका इलाज पैसों के बिना संभव नहीं था। मैं भी तुम्हारी तरह ही हताश था, बेबस था। पर मेरे पास तुम्हारी जितनी हिम्मत नहीं थी। मैं उनके लिए कुछ नहीं कर सका और वह मुझे छोड़कर चले गए।”

यह कहते हुए डॉक्टर वर्मा की आवाज भर आई।
“उस दिन मैंने कसम खाई थी कि मैं एक डॉक्टर बनूंगा, जो कभी किसी मरीज का इलाज पैसे की वजह से नहीं रोकेगा। मैं आज जो कुछ भी हूं उसी दिन के दर्द की वजह से हूं और आज तुम्हारे इस त्याग ने मुझे उस दर्द को फिर से महसूस करा दिया है।”

रवि हैरान होकर उन्हें देख रहा था। डॉक्टर वर्मा ने अपनी दराज से वह सारे बिल निकाले जो रवि ने अस्पताल में जमा किए थे। उन्होंने उन बिलों पर कैंसिल्ड की मोहर लगा दी।
“तुम्हारे पिता का इलाज आज से इस अस्पताल की जिम्मेदारी है। उनका एक भी पैसा नहीं लगेगा।”

फिर उन्होंने रवि को वह चेक दिया, “यह लो तुम्हारे एक लाख रुपये। यह तुम्हारी अमानत है। इसे अपने ऊपर खर्च करो। अपनी सेहत पर ध्यान दो। तुमने अपने पिता को एक नई जिंदगी दी है, पर अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर यह मंजूर नहीं।”

रवि कांपते हाथों से बोला, “नहीं डॉक्टर साहब, मैं यह कैसे ले सकता हूं? आपने मेरे पिता की जान बचा ली। यही मेरे लिए बहुत है।”

डॉक्टर वर्मा मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में एक पिता जैसा स्नेह था।
“यह तो बस शुरुआत है रवि। एक इंसान जो अपने परिवार के लिए अपने शरीर का अंग बेच सकता है, उसके दिल में एक सच्चा मरहम लगाने वाले की आत्मा बसती है। पर तुमने मजबूरी में गलत रास्ता चुना। अब मैं तुम्हें एक मौका दूंगा कि तुम उसी चाकू को एक सर्जन के स्केलपेल के रूप में इज्जत और सम्मान के साथ उठा सको।”

रवि समझ नहीं पाया।
डॉक्टर वर्मा ने कहा, “मैं तुम्हारी आगे की पढ़ाई का सारा खर्चा उठाऊंगा। तुम एक डॉक्टर बनोगे। जिस हिम्मत से तुमने यह त्याग किया है, अगर वही हिम्मत तुमने पढ़ाई में लगा दी, तो तुम मुझसे भी बड़े डॉक्टर बनोगे। मैं अपना एक पिता खो चुका हूं। तुमने अपने पिता को और खुद को लगभग खो ही दिया था। अब हम दोनों मिलकर हजारों पिताओं और बेटों की जिंदगी बचाएंगे।”

यह सुनकर रवि को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह रोते हुए डॉक्टर वर्मा से लिपट गया।

उस दिन के बाद रवि की जिंदगी की कहानी फिर से लिखी गई। उसके पिता मोहनलाल जी बिल्कुल स्वस्थ हो गए। डॉक्टर वर्मा ने जो कहा, वह किया। रवि ने दिन-रात मेहनत करके पढ़ाई की और एक काबिल डॉक्टर बना। आज कई सालों बाद डॉक्टर रवि अपने मेंटर डॉक्टर आलोक वर्मा के साथ उसी लाइफ केयर हॉस्पिटल में काम करता है। उन्होंने मिलकर अस्पताल में एक चैरिटेबल विंग शुरू की है जिसका नाम है “मोहनलाल विंग”। यहां गरीब और बेसहारा लोगों का मुफ्त इलाज होता है।

रवि का त्याग व्यर्थ नहीं गया। उसने ना सिर्फ अपने पिता को बचाया, बल्कि सेवा और इंसानियत की एक ऐसी विरासत बना दी जो हजारों लोगों को नई जिंदगी दे रही है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार और त्याग में इतनी ताकत होती है कि वह नामुमकिन को भी मुमकिन बना सकती है। जब एक इंसान दूसरे इंसान के दर्द को महसूस करता है, तो चमत्कार होते हैं। अगर रवि के इस त्याग और डॉक्टर वर्मा की इंसानियत ने आपके दिल को छुआ हो, तो इस कहानी को लाइक करें और अपने दोस्तों व परिवार के साथ शेयर करें।