एक अकेली गांव की महिला दरोगा पर भारी पड़ गई।।

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रामपुर की बेटी

रामपुर एक छोटा सा गांव था, जहां कच्ची मिट्टी की खुशबू और लोगों के दिलों की सादगी अब भी जिंदा थी। खेतों में लहलहाती फसलें, सुबह मंदिर की घंटियां और शाम को चौपाल की बातें—यही रामपुर की पहचान थी। लेकिन इस शांति के पीछे एक डर भी पल रहा था। गांव और शहर को जोड़ने वाली पक्की सड़क पर बनी पुलिस चौकी में तैनात दरोगा बलवंत सिंह लोगों के लिए आतंक बन चुका था।

बलवंत सिंह वर्दी में था, लेकिन उसके कर्म किसी गुंडे से कम नहीं थे। वह राह चलते किसानों को रोककर “चेकिंग” के नाम पर पैसे वसूलता, ट्रकों से अवैध वसूली करता और अकेली महिलाओं को देखकर भद्दी टिप्पणियां करता। गांव वाले जानते थे कि यह गलत है, लेकिन वर्दी और पिस्तौल के सामने उनकी आवाज दब जाती थी।

इसी गांव में जन्मी थी अदिति। बचपन से ही तेज-तर्रार, आत्मसम्मानी और न्यायप्रिय। उसके पिता स्कूल के शिक्षक थे और मां खेतों में मेहनत करती थीं। पिता अक्सर कहते, “बेटी, पढ़-लिखकर ऐसा काम करना कि तेरे फैसलों से लोगों की जिंदगी बदल जाए।” अदिति ने यह बात दिल में उतार ली।

समय बीता। अदिति ने कठिन परिश्रम किया, शहर जाकर पढ़ाई की और अंततः प्रशासनिक सेवा में चयनित हुई। कुछ वर्षों बाद संयोग ऐसा हुआ कि उसे उसी जिले में जिला अधिकारी (डीएम) के रूप में नियुक्ति मिली, जहां उसका गांव रामपुर पड़ता था।

एक दिन कंट्रोल रूम में एक फोन आया। एक किसान रो रहा था। उसने बताया कि उसकी बीमार पत्नी के इलाज के लिए जो पांच हजार रुपये उसने बड़ी मुश्किल से जोड़े थे, वे रास्ते में दरोगा बलवंत सिंह ने छीन लिए। किसान की आवाज कांप रही थी—“साहब, हम गरीब लोग हैं। किससे न्याय मांगें?”

यह शिकायत इंस्पेक्टर विक्रम ने तुरंत डीएम अदिति तक पहुंचाई। जैसे ही अदिति ने रामपुर और उस सड़क का नाम सुना, उसका चेहरा गंभीर हो गया। उसे अपने बचपन की वही सड़क याद आई, जहां वह साइकिल से स्कूल जाती थी।

“गाड़ी तैयार करवाइए,” अदिति ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के। मैं खुद देखना चाहती हूं कि वहां क्या हो रहा है।”

अगले दिन अदिति ने अपनी सरकारी पहचान छिपाकर साधारण कपड़े पहने। उसने अपनी निजी गाड़ी ली और सीधे रामपुर पहुंची। गांव में उसकी मां खेत में आलू खोद रही थीं। मां-बेटी का मिलन भावुक था। मां ने पूछा, “बेटी, अचानक कैसे आना हुआ?”

अदिति मुस्कुराई, “मां, तुम्हारी याद आ रही थी।”

कुछ देर खेत में काम करने के बाद अदिति ने कहा, “मां, चलो घर चलते हैं। उसी पक्की सड़क से चलते हैं, जल्दी पहुंचेंगे।”

मां का चेहरा उतर गया। “नहीं बेटी, उस रास्ते मत जाना। वहां का दरोगा बहुत बुरा है। लोगों से पैसे छीनता है, औरतों को परेशान करता है।”

अदिति ने मां की आंखों में डर देखा। वह समझ गई कि शिकायत झूठी नहीं थी।

“मां,” उसने हाथ थामते हुए कहा, “अगर हम डरकर रास्ता बदल लेंगे तो गलत करने वाले और ताकतवर हो जाएंगे।”

गाड़ी जैसे ही चौकी के पास पहुंची, दो सिपाही आगे आए। उनमें से एक ने मुस्कुराकर कहा, “मैडम, चेकिंग चल रही है। गाड़ी के कागज दिखाइए।”

अदिति ने कागज दिए। तभी दरोगा बलवंत सिंह बाहर आया। उसकी नजर अदिति और उसकी मां पर पड़ी। वह हंसते हुए बोला, “अरे, बड़ी गाड़ी है। पांच हजार रुपये निकालो, तभी आगे जाओगी। ये सड़क टैक्स लगता है।”

“कौन सा टैक्स?” अदिति ने शांत स्वर में पूछा।

“ज्यादा सवाल मत करो,” बलवंत ने रूखेपन से कहा, “यहां वही कानून चलता है जो मैं कहता हूं।”

उसने सिपाही को इशारा किया। सिपाही ने गाड़ी की डिक्की खोली और आलू की बोरियां सड़क पर फेंक दीं। मां घबरा गईं—“बेटा, छोड़ दे, पैसे दे देते हैं।”

अदिति की आंखों में आग थी, लेकिन उसने खुद को संयत रखा। “मैं एक पैसा नहीं दूंगी,” उसने स्पष्ट कहा।

बलवंत गुस्से में बोला, “अच्छा! बड़ी कानून की बात करती है? चलो, थाने में बैठकर समझाता हूं कानून।”

सिपाहियों ने मां-बेटी को जबरन जीप में बैठा लिया और थाने ले गए। उन्हें लॉकअप में बंद कर दिया गया। मां डर से कांप रही थीं। अदिति ने उनका हाथ थामा—“मां, बस थोड़ी देर और। सच सामने आएगा।”

रात गहरी हो रही थी। बलवंत हंसते हुए बोला, “सुबह कोर्ट में पेशी होगी। सरकारी काम में बाधा डालने का केस बनाऊंगा।”

अदिति ने जेब से मोबाइल निकाला, जो उसने छिपाकर रखा था। उसने एक नंबर डायल किया।

“हेलो, एसपी साहब?” उसने शांत स्वर में कहा, “रामपुर थाना। दरोगा बलवंत सिंह ने मुझे और मेरी मां को अवैध रूप से हिरासत में लिया है।”

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। कुछ ही मिनटों में थाने के बाहर पुलिस की कई गाड़ियां आकर रुकीं। एसपी खुद पहुंचे।

बलवंत हक्का-बक्का रह गया जब उसने देखा कि एसपी सीधे लॉकअप की ओर जा रहे हैं।

“तुम जानते हो, जिसे तुमने बंद किया है, वह कौन है?” एसपी गरजे।

लॉकअप का ताला खुला। अदिति बाहर आई। एसपी ने सलाम ठोका—“जय हिंद, मैडम।”

बलवंत के पैरों तले जमीन खिसक गई। “डी… डीएम साहब?”

अदिति ने दृढ़ स्वर में कहा, “बलवंत सिंह, यह गलती नहीं, अपराध है। तुमने गरीबों से पैसे वसूले, महिलाओं को परेशान किया और कानून का दुरुपयोग किया।”

एसपी ने तुरंत आदेश दिया, “इनकी वर्दी उतारो। निलंबित करो। और भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और अवैध हिरासत की धाराओं में मामला दर्ज करो।”

बलवंत गिड़गिड़ाने लगा—“मैडम, माफ कर दीजिए। परिवार है।”

अदिति ने शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा, “जब तुम गरीब किसान से पैसे छीन रहे थे, तब तुम्हें उसका परिवार याद नहीं आया?”

अगले दिन जिले में यह खबर फैल गई। लोगों में चर्चा थी कि डीएम ने खुद जाकर भ्रष्ट दरोगा को पकड़ा। कई पीड़ित सामने आए। किसी ने बताया कि उससे ट्रैक्टर छुड़ाने के नाम पर पैसे लिए गए थे, किसी ने कहा कि उसकी बहन को रास्ते में परेशान किया गया था।

अदिति ने विशेष जांच टीम बनाई। चौकी पर लगे सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। बैंक खातों की जांच हुई। बलवंत के खिलाफ ठोस सबूत मिले।

कुछ ही हफ्तों में अदालत में चार्जशीट दाखिल हुई। बलवंत को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। विभागीय जांच में उसे बर्खास्त कर दिया गया।

रामपुर के लोग अब उस सड़क से बिना डर के गुजरने लगे। चौकी पर नया, ईमानदार अधिकारी तैनात हुआ।

एक दिन वही किसान, रामदीन, डीएम कार्यालय आया। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार खुशी के। “मैडम, मेरी पत्नी का इलाज हो गया। आपने हमें इंसाफ दिलाया।”

अदिति मुस्कुराई, “नहीं रामदीन, इंसाफ आपके हक का था। हमने बस अपना कर्तव्य निभाया।”

शाम को अदिति अपनी मां के साथ आंगन में बैठी थी। मां ने कहा, “बेटी, आज मुझे गर्व है। तू सिर्फ मेरी बेटी नहीं, पूरे रामपुर की बेटी है।”

अदिति ने मां के कंधे पर सिर रख दिया। आसमान में तारे चमक रहे थे। हवा में सुकून था।

रामपुर की उस सड़क पर अब डर नहीं, भरोसा चलता था। लोगों ने सीखा कि वर्दी का सम्मान जरूरी है, लेकिन वर्दी में छिपे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

और अदिति ने यह साबित कर दिया कि जब सत्ता में संवेदनशीलता और साहस हो, तो न्याय दूर नहीं रहता।