एक परिवार की कहानी जो अधूरी रह गई
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एक अधूरी कहानी – लखनऊ के होटल की त्रासदी
आगरा का परिवार
टेढ़ी बगिया, आगरा का एक सामान्य सा इलाका। यहाँ मोहम्मद बदर अपने परिवार के साथ रहता था – पत्नी अस्मा, बेटा अरशद, और चार बेटियां – अलशिया, रहमीन, अक्सा और सबसे छोटी आलिया, उम्र सिर्फ 9 साल। देखने में यह परिवार आम था, लेकिन भीतर कुछ ऐसा पक रहा था, जिसकी भनक न पड़ोसियों को थी, न रिश्तेदारों को। मोहल्ले के लोग बताते हैं कि यह परिवार सबसे कटा-कटा रहता था। मोहम्मद बदर और उसका बेटा अरशद किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे, और अगर करते भी थे, तो अक्सर बहस या झगड़े की वजह से।
धीरे-धीरे इस परिवार में एक अजीब सा डर, एक अजीब सा शक घर कर गया था। मनोवैज्ञानिक इसे “सोशल आइसोलेशन” कहते हैं – जब इंसान खुद को दुनिया से काट लेता है, तो दिमाग में डर और भ्रम पनपने लगते हैं। बदर और अरशद के दिमाग में एक कहानी चल रही थी – एक ऐसी कहानी जो हकीकत से बहुत दूर थी, लेकिन उनके लिए वही परम सत्य थी। उन्हें लगता था कि पूरी दुनिया उनके खिलाफ है, एक माफिया उनके पीछे पड़ा है, पड़ोसी उनकी बहनों को दूर ले जाना चाहते हैं। अरशद को लगता था कि उनका घर छीन लिया गया है, वे बेघर हो गए हैं। जबकि पुलिस और पड़ोसियों का कहना था – ऐसा कुछ नहीं था, यह सब उनके दिमाग का फितूर था।
डर और पागलपन का जाल
जब डर दिमाग पर कब्जा कर लेता है, तो इंसान तर्कों को नहीं सुनता। बदर ने अपने बेटे अरशद के दिमाग में यह जहर भर दिया कि उनकी बहनों का भविष्य खतरे में है, और उन्हें बचाने के लिए एक बड़ा कदम उठाना जरूरी है। यह “पर्सक्यूशन कॉम्प्लेक्स” था – यानी हर कोई आपके खिलाफ साजिश कर रहा है। दोनों बाप-बेटे ने एक योजना बनाई – जिसे वे “मुक्ति” का नाम दे रहे थे।

आखिरी सफर – लखनऊ की ओर
30 दिसंबर 2025। जब दुनिया नए साल के जश्न की तैयारी कर रही थी, बदर और अरशद ने परिवार को साथ लिया और आगरा से लखनऊ के लिए निकल पड़े। मां और बहनों को लगा कि शायद नए साल पर घूमने जा रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगा।
लखनऊ पहुँचकर वे नाका हिंडोला इलाके के होटल शरणजीत में रुके – कमरा नंबर 109। पुलिस जांच के अनुसार, वे बाहर घूमे, खाना खाया, सब सामान्य लग रहा था। लेकिन अरशद और बदर की आंखों में नींद नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा जुनून था। वे खुद को “रक्षक” मान रहे थे, जिन्हें अपनी बहनों को समाज से बचाना था – हमेशा के लिए।
विनाश की रात
31 दिसंबर की रात ढल रही थी, 1 जनवरी की सुबह दस्तक दे रही थी। उस होटल के कमरे में, बदर ने खाने या पानी में नशीला पदार्थ मिला दिया। मां, अस्मा और चारों बेटियां – अलशिया, रहमीन, अक्सा और नन्ही आलिया – ने वह खाना या पानी पीया और गहरी नींद में चली गईं। उन्हें पता ही नहीं चला कि जिन पर वे सबसे ज्यादा भरोसा करती थीं, उन्हीं ने उनके साथ क्या किया।
जब सब अचेत हो गईं, तब शुरू हुआ वह खौफनाक खेल। अरशद और बदर ने अपना असली रूप दिखाया। उन्होंने पहले उनकी सांसें रोकीं, फिर सुनिश्चित किया कि कोई बचने की गुंजाइश न रहे। उन्होंने अपने ही हाथों से उन पांचों की जिंदगी की डोर काट दी। पूरा कमरा एक भयानक मंजर में बदल गया – बिस्तर, चादरें, फर्श – हर तरफ तबाही के निशान थे। और बीच में खड़े थे बाप और बेटा – न उनके हाथ कांपे, न आंखों में आंसू आए।
वीडियो – डरावना सबूत
इस वारदात के बाद अरशद ने जो किया, वह और भी खौफनाक था। उसने अपना मोबाइल निकाला और एक वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू किया। उस वीडियो में अरशद ने एक-एक करके अपनी मां और बहनों के बेसुद शव दिखाए। उनके चेहरों से कंबल हटाया, और दुनिया को दिखाया कि उसने क्या किया है। वीडियो में उसका पिता मोहम्मद बदर भी एक बेटी के पास बैठा था, शायद वह बेटी आखिरी सांसे ले रही थी। अरशद बहुत शांत आवाज में बोलता है – “हमने अपनी बहनों और मां को आजाद कर दिया। बस्ती वाले हमें जीने नहीं दे रहे थे। वे मेरी बहनों को दूर ले जाना चाहते थे।”
अरशद खुद को मुजरिम नहीं, बल्कि शहीद, मसीहा मान रहा था। मनोविज्ञान में इसे “अल्ट्रिस्टिक फिलिसाइड” कहते हैं – यानी भलाई के नाम पर हत्या। वह चाहता था कि उसके घर की जगह मंदिर बने। यह पागलपन अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका था।
पुलिस की जांच और गिरफ्तारी
वारदात के बाद, 1 जनवरी की सुबह अरशद अपने पिता को लेकर चारबाग रेलवे स्टेशन गया। पिता को छोड़ दिया, ताकि वह भाग सके। शायद यह उनकी प्लानिंग का हिस्सा था कि पिता बच जाए और बेटा सब कुछ अपने सिर ले ले। पिता के जाने के बाद अरशद ने पुलिस को खबर कर दी। जब पुलिस होटल के कमरे में पहुँची, तो वहां का नजारा देखकर उनके भी होश उड़ गए। पांच लोग पूरी तरह खामोश, और एक 24 साल का लड़का जिसके चेहरे पर अजीब सा सुकून था।
पुलिस ने अरशद को गिरफ्तार किया, पूछताछ शुरू हुई। अरशद बार-बार यही कहता रहा – “मैंने उन्हें इज्जत के लिए मुक्त किया।” वह माफिया और बस्ती वालों की बात करता रहा। लेकिन पुलिस जांच में पता चला – ऐसा कोई माफिया नहीं था, न कोई उनकी जमीन छीन रहा था, न कोई उनकी बहनों को ले जाना चाहता था। यह सब सिर्फ और सिर्फ बदर और अरशद के दिमाग का फितूर था।
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
मनोवैज्ञानिक इसे “फोली अ ड्यूक्स” कहते हैं – साझा भ्रम। इसमें एक व्यक्ति (यहाँ पिता) डोमिनेंट होता है, जो अपना भ्रम दूसरे व्यक्ति (यहाँ बेटा) पर थोप देता है। दोनों समाज से कटे हुए थे, अरशद के पास जांचने का कोई जरिया नहीं था कि उसके पिता सच कह रहे हैं या झूठ। पिता ने कहा – “वे दुश्मन हैं,” बेटे ने मान लिया। पिता ने कहा – “यही रास्ता है,” बेटे ने कदम उठा लिया। यह बाप-बेटे का रिश्ता एक इको चेंबर बन गया था, जहाँ पागलपन की आवाज गूंजती रही और अंत में पांच बेगुनाह जानों को निगल गई।
इस केस की तुलना दिल्ली के बुराड़ी केस से की जा रही है। लेकिन बुराड़ी में लोग जाना नहीं चाहते थे, उन्हें लगा था कोई अनुष्ठान है और वे वापस आ जाएंगे। यहाँ अरशद और बदर का इरादा साफ था – वापसी का कोई रास्ता नहीं था। वहाँ अंधविश्वास था, यहाँ अहंकार और डर का कॉकेटेल।
अधूरी कहानी – न्याय और समाज की जिम्मेदारी
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है – मोहम्मद बदर को पकड़ना। अरशद जेल में है, लेकिन मास्टरमाइंड पिता अभी भी आजाद है। पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है, मोबाइल की लोकेशन ट्रेस की जा रही है, कॉल डिटेल्स खंगाली जा रही हैं। पुलिस को शक है कि वह राजस्थान की तरफ भागा है।
भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ है। यह मामला “रेस्ट ऑफ रेयर” माना जा सकता है। कानून के जानकारों का मानना है कि इसमें कड़ी से कड़ी सजा की मांग की जा सकती है। लेकिन सजा चाहे जो भी हो, क्या वह उन पांच जिंदगियों को वापस ला सकती है? क्या वह उस 9 साल की मासूम आलिया को वापस ला सकती है, जिसने दुनिया देखी भी नहीं थी?
यह घटना हमें एक समाज के तौर पर सोचने पर मजबूर करती है। हम अक्सर अपने पड़ोसियों से अनजान रहते हैं। कोई परिवार अलग-थलग है, अजीब व्यवहार कर रहा है, तो हम नजरअंदाज कर देते हैं। अगर आगरा में पड़ोसियों या रिश्तेदारों ने बदर और अरशद के व्यवहार को समय रहते भांप लिया होता, अगर किसी ने हस्तक्षेप किया होता, तो शायद आज वह पांच महिलाएं हमारे बीच होतीं।
यह “ऑनर” या सम्मान की जो झूठी अवधारणा हमारे समाज में है, उसने न जाने कितने ही घरों को उजाड़ा है। अरशद को लगा कि अपनी बहनों को खत्म कर देना उन्हें बचाना है। यह सोच कहाँ से आई? यह उसी सोच का विकृत रूप है, जो परिवार के सदस्यों को अपनी जागीर समझती है।
समाज के लिए संदेश
आज अरशद जेल की काल कोठरी में है। शायद उसे अब भी लगता हो कि उसने सही किया, या जैसे-जैसे वक्त बीतेगा, वह अपने पिता के प्रभाव से बाहर आएगा, तो उसे अपनी करनी का एहसास होगा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। वह वीडियो जिसमें वह अपनी खोई हुई बहनों को दिखा रहा है, हमेशा इंटरनेट पर एक डरावनी याद बनकर रहेगा।
इस केस की जांच अभी जारी है। फॉरेंसिक रिपोर्ट्स का इंतजार है, पुलिस बदर की तलाश में जुटी है। लेकिन इस कहानी का मकसद आपको डराना नहीं, बल्कि सच से रूबरू कराना है – ताकि हम समझ सकें कि खतरा सिर्फ बाहर सड़कों पर नहीं, कई बार अपने घरों के अंदर बंद दरवाजों के पीछे भी पनप रहा होता है।
अपने आसपास नजर रखिए। मानसिक स्वास्थ्य को हल्के में मत लीजिए। अगर आपको लगता है कि कोई व्यक्ति भ्रम में जी रहा है या बहुत ज्यादा शककी हो गया है, तो उसे मदद की जरूरत है। आपकी थोड़ी सी जागरूकता किसी की जिंदगी बचा सकती है।
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