एक ही घर में खुशी और गम का मंजर | Satara के इस परिवार पर क्या गुज़री?

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एक ही घर में खुशी और गम का मंजर: सतारा के जाधव परिवार की भावुक कहानी

प्रस्तावना

महाराष्ट्र के सतारा जिले के आरदरे गाँव में घटी यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि भावनाओं, दर्द और किस्मत के क्रूर मजाक का दस्तावेज है। जहाँ एक ही घर की दहलीज पर एक साथ खुशियों की किलकारी और मातम की चीखें गूंजी। यह कहानी है जीवन और मृत्यु के उस संगम की, जहाँ एक पिता अपनी औलाद का चेहरा देखने के लिए सरहद से छुट्टी लेकर घर आया था, और उसी औलाद के जन्म के कुछ घंटों बाद उसकी अंतिम यात्रा निकली।

भाग 1: वीरता की जड़ें

सतारा का आरदरे गाँव वीरों की धरती रहा है। यहाँ के लगभग हर दूसरे घर से कोई न कोई बेटा भारतीय सेना में सेवा देता है। प्रमोद जाधव भी इसी मिट्टी के लाल थे। बचपन से ही उनके दिल में देश सेवा का जज्बा था। गाँव के स्कूल में पढ़ते हुए ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें वर्दी पहननी है और तिरंगे की शान बढ़ानी है। परिवार वाले भी गर्व करते थे।

प्रमोद ने कड़ी मेहनत की, दौड़ लगाई, पसीना बहाया और आखिरकार उनका सपना पूरा हुआ। वह भारतीय सेना का हिस्सा बन गए। उनकी बहादुरी और समर्पण के किस्से गाँव में सुनाए जाते थे। लेकिन फौज की नौकरी जितनी गौरवशाली होती है उतनी ही कठिन भी होती है—महीनों तक परिवार से दूर रहना, त्योहारों पर घर न आ पाना और हमेशा मौत के साए में जीना।

भाग 2: परिवार में खुशियाँ

कुछ साल पहले प्रमोद की शादी हुई थी। पत्नी के आने से घर में खुशियाँ दोगुनी हो गई थीं। माता-पिता को लगा कि अब उनका बेटा सेटल हो गया है। जल्द ही घर का आंगन बच्चों की किलकारियों से गूंजेगा। और वह वक्त भी आया। प्रमोद को पता चला कि वह पिता बनने वाले हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

हर फौजी की तरह उन्होंने भी सपना देखा कि जब उनका बच्चा दुनिया में आएगा तो वे अपनी पत्नी के पास होंगे। फोन पर पत्नी से घंटों बातें होती थीं। आने वाले मेहमान के लिए नाम, कपड़े, खिलौने और भविष्य के सपने बुने जा रहे थे। प्रमोद ने अपनी यूनिट में छुट्टी की अर्जी लगाई और अधिकारियों ने उनकी भावनाओं को समझकर छुट्टी मंजूर कर दी।

भाग 3: इंतजार और अनहोनी

प्रमोद जब छुट्टी लेकर गाँव आए तो घर में उत्सव जैसा माहौल था। पत्नी गर्भवती थी और अपने पति को पास पाकर बेहद खुश थी। प्रमोद ने उसकी पूरी देखभाल की—डॉक्टर के पास ले जाना, दवाइयाँ देना और उसे हर पल हिम्मत देना। पूरा परिवार उस घड़ी का इंतजार कर रहा था जब नन्हा मेहमान आएगा।

शुक्रवार की रात थी। प्रमोद ने पत्नी को डिलीवरी के लिए सतारा के एक अस्पताल में भर्ती करवाया था। डॉक्टरों ने बताया था कि अब किसी भी वक्त डिलीवरी हो सकती है। प्रमोद की बेचैनी और खुशी दोनों चरम पर थीं। वह अस्पताल और घर के बीच दौड़-भाग कर रहे थे ताकि किसी चीज की कमी न रह जाए।

रात करीब 1:30 बजे प्रमोद किसी काम से अपनी बाइक पर सवार होकर सतारा की तरफ जा रहे थे। सड़कें खाली थीं लेकिन सन्नाटा गहरा था। अचानक एक तेज रफ्तार ट्रक ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मारी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि प्रमोद बाइक समेत सड़क पर दूर जा गिरे। हेलमेट और सुरक्षा के बावजूद मौत के आगे सब बेबस था। प्रमोद को गंभीर चोटें आईं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। प्रमोद अस्पताल पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ चुके थे।

भाग 4: खुशी और गम का संगम

एक तरफ प्रमोद का पार्थिव शरीर मुर्दाघर में रखा था, दूसरी तरफ उसी शहर के दूसरे अस्पताल में उनकी पत्नी प्रसव पीड़ा से गुजर रही थी। कुदरत का खेल देखिए—जिस वक्त प्रमोद ने आखिरी सांस ली, उसके कुछ ही घंटों बाद उनकी पत्नी ने एक बेटी को जन्म दिया।

एक तरफ पिता की मौत की खबर थी, जिसे परिवार वाले छिपाने की कोशिश कर रहे थे, दूसरी तरफ बेटी के जन्म की खुशखबरी। परिवार वाले बधाई देने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन मातम मनाने पर मजबूर थे। प्रमोद के माता-पिता के लिए तो यह वज्रपात जैसा था—बेटा चला गया और पोती आ गई। समझ नहीं आ रहा था कि रोएं या खुश हों।

पत्नी को अभी तक पूरी सच्चाई नहीं बताई गई थी। उसे बस इतना पता था कि एक्सीडेंट हुआ है, लेकिन यह नहीं बताया गया था कि प्रमोद अब इस दुनिया में नहीं हैं। डॉक्टरों ने सलाह दी थी कि मां बहुत कमजोर है, उसे इतना बड़ा सदमा देना जानलेवा हो सकता है। लेकिन सच कब तक छिपाया जा सकता है?

गाँव में खबर आग की तरह फैल गई। आरदरे गाँव जो कल तक प्रमोद के पिता बनने की खबर का इंतजार कर रहा था, आज प्रमोद के शहीद होने की खबर सुन रहा था। हर घर में चूल्हा नहीं जला। हर आंख नम थी। लोग विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि जो लड़का अभी कुछ दिन पहले हंसते-खेलते गाँव की गलियों में घूम रहा था, वह अब तिरंगे में लिपटा हुआ वापस आएगा।

भाग 5: अंतिम विदाई का भावुक दृश्य

शनिवार का दिन चढ़ते-चढ़ते पत्नी को भी एहसास हो गया कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। लोगों की आवाजें, रिश्तेदारों का रोना और प्रमोद का न आना सब बता रहा था कि उसकी दुनिया उजड़ चुकी है। जब उसे बताया गया कि प्रमोद अब नहीं रहे, अस्पताल के उस कमरे में जो चीख गूंजी, उसने पत्थर दिल को भी पिघला दिया।

प्रशासन और सेना ने प्रमोद के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ शुरू कर दीं। पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम के बाद पूरे राजकीय सम्मान के साथ गाँव लाया जा रहा था। रविवार की सुबह जब प्रमोद जाधव का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ एंबुलेंस से गाँव पहुँचा, पूरा गाँव उमड़ पड़ा। भारत माता की जय के नारे लग रहे थे। लेकिन उन नारों में जोश से ज्यादा दर्द था।

फूलों से सजी गाड़ी में जब वह घर के आंगन में पहुँचे तो बूढ़े मां-बाप का रो-रो कर बुरा हाल था। जिस बेटे के सहारे वे बुढ़ापा काटने की सोच रहे थे, आज उसी बेटे की अर्थी उनके सामने थी।

भाग 6: पत्नी और बेटी की भावुक विदाई

श्मशान घाट पर चिता सजाई जा चुकी थी। सेना के जवान सलामी देने के लिए तैयार थे। हजारों की भीड़ जमा थी। तभी भीड़ में हलचल हुई। एक एंबुलेंस श्मशान घाट के करीब आकर रुकी। दरवाजा खुला और वहां से जो दृश्य सामने आया, उसने वहां मौजूद हर शख्स को रोने पर मजबूर कर दिया।

एंबुलेंस से एक स्ट्रेचर उतारा गया। उस स्ट्रेचर पर प्रमोद की पत्नी लेटी हुई थी। अभी कल ही तो डिलीवरी हुई थी। शरीर में इतनी ताकत नहीं थी कि वह खड़ी हो सके या चल सके। लेकिन पति को अंतिम विदाई देने की जिद के आगे डॉक्टरों और परिवार को झुकना पड़ा। उस स्ट्रेचर के साथ परिवार की एक महिला की गोद में वह नन्ही सी जान थी—महज 8 या 10 घंटे पहले जन्मी प्रमोद की बेटी।

पत्नी को स्ट्रेचर सहित प्रमोद के पार्थिव शरीर के पास ले जाया गया। उसने कांपते हाथों से अपने पति के चेहरे को छुआ। शायद वह कह रही होगी—उठो देखो हमारी बेटी आई है, वही बेटी जिसका तुम्हें इंतजार था। तुम इसे गोद में क्यों नहीं लेते?

वहां मौजूद हर इंसान सिसक रहा था। सेना के अधिकारियों की आंखें भी नम थीं। वे अनुशासन में बंधे थे, लेकिन जज्बात उनकी आंखों से बह रहे थे। परिवार वालों ने उस नन्ही बच्ची को, जो सफेद कपड़ों में लिपटी थी, उसके पिता के पार्थिव शरीर के पास किया। एक पिता जो अपनी बेटी को देखने के लिए तड़प रहा था, अब शांत पड़ा था। बेटी जो अपने पिता की गोद की गर्माहट कभी महसूस नहीं कर पाएगी, वो उनके पास थी।

भाग 7: गाँव का गर्व और दुख

सेना की टुकड़ी ने अपने साथी को अंतिम सलामी दी। हवा में गोलियों की गूंज हुई, बिगुल बजा। प्रमोद जाधव का अंतिम संस्कार पूरे विधिविधान के साथ किया गया। मुखाग्नि दी गई और पंचतत्व में विलीन हो गया भारत मां का एक और सपूत। लेकिन पीछे छोड़ गया अनगिनत सवाल और एक कभी न भरने वाला खालीपन।

गाँव के लोग कहते हैं कि प्रमोद गया नहीं है, बल्कि उस बच्ची के रूप में वापस आ गया है। हो सकता है कल को वह बच्ची भी बड़ी होकर अपने पिता के नक्शे कदम पर चले और सेना में जाए, या डॉक्टर, इंजीनियर बने। उसके नाम के साथ उसके पिता का बलिदान हमेशा जुड़ा रहेगा।

भाग 8: समाज की जिम्मेदारी

यह कहानी हमें रिश्तों की अहमियत भी सिखाती है। प्रमोद और उनकी पत्नी की कहानी देखिए—मौत भी उनके प्यार को कम नहीं कर पाई। पत्नी का स्ट्रेचर पर आना इस बात का सबूत है कि भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्म का होता है।

सरकार मुआवजे का ऐलान कर देगी, कुछ पैसे बैंक अकाउंट में आ जाएंगे, गैस एजेंसी या पेट्रोल पंप का लाइसेंस मिल सकता है। लेकिन क्या वह नोटों की गड्डी उस पिता की जगह ले सकती है? नहीं। इसलिए समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसे परिवारों को अकेला न छोड़ें। उनकी बेटी को कभी यह महसूस न हो कि वह अकेली है—पूरा देश उसका परिवार है।

भाग 9: सड़क सुरक्षा और जीवन की अनिश्चितता

इस घटना ने सड़क सुरक्षा का मुद्दा भी उजागर किया है। थोड़ी सी सावधानी किसी की जान बचा सकती थी, किसी का सुहाग उजड़ने से बच सकता था, किसी बच्ची को अनाथ होने से बचाया जा सकता था। जब भी सड़क पर चलें, याद रखें कि घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है।

जीवन कितना अनिश्चित है, यह प्रमोद की कहानी से पता चलता है। हम कल की प्लानिंग करते हैं, लेकिन अगले ही पल क्या होगा, कोई नहीं जानता।

उपसंहार

प्रमोद जाधव की शहादत और उनके परिवार के त्याग को नमन। यह कहानी सिर्फ सतारा की नहीं, पूरे हिंदुस्तान की है। हमारे जवान सिर्फ बॉर्डर पर नहीं, अपनी निजी जिंदगी में भी कितने बड़े बलिदान देते हैं। हमें सैनिकों और उनके परिवारों का सम्मान हर दिन करना चाहिए।

दोस्तों, अगर इस कहानी ने आपकी आंखों को भी नम किया है, तो प्रमोद जाधव को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए कमेंट बॉक्स में “जय हिंद” या “अमर रहे” जरूर लिखें। यह सिर्फ दो शब्द नहीं, हमारी कृतज्ञता है उस वीर के प्रति। जब आप अपने परिवार के साथ हों, एक पल के लिए प्रमोद जाधव को याद कीजिएगा। उस 8 घंटे की बच्ची के लिए दुआ कीजिएगा, आपकी दुआओं में बहुत ताकत होती है।

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