एसपी वैशाली सिंह की कहानी | पुलिस की गलतफहमी और आख़िरी अंजाम

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वर्दी का गुरूर और न्याय की गूँज: रोहन की कहानी

अध्याय 1: सेब वाली अम्मा और ममता का संघर्ष

शहर के कोलाहल भरे बाज़ार में सूरज की पहली किरण के साथ ही अनीता देवी अपनी छोटी सी रेहड़ी सजा लेती थीं। उनकी रेहड़ी पर लाल, ताज़ा सेब चमकते थे। अनीता देवी की उम्र ढल चुकी थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—अपने बेटे रोहन के लिए गर्व की चमक।

अनीता देवी कहती थीं, “मेरा रोहन देश की सरहद पर खड़ा है। वह मेरी ढाल है।” गाँव के लोग उन्हें ‘फौजी की माँ’ कहकर सम्मान देते थे। अनीता अपनी मेहनत से गुज़ारा करती थीं ताकि जब रोहन घर आए, तो उसे अपनी माँ की लाचारी न देखनी पड़े।

बाज़ार में गर्मी बढ़ रही थी। तभी अचानक भीड़ में हलचल हुई। दरोगा गुप्ता सिंह अपनी सरकारी जीप से उतरा। उसके साथ एक सिपाही था जो साए की तरह उसके पीछे चलता था। गुप्ता सिंह की आँखों में अहंकार था। वह अनीता की रेहड़ी के पास रुका और बिना कुछ पूछे सेब चखने लगा।

अध्याय 2: अन्याय की शुरुआत

गुप्ता सिंह ने एक किलो ताज़ा सेब पैक करवाए। अनीता ने बड़ी उम्मीद से थैला आगे बढ़ाया और कहा, “साहब, एक किलो पूरे हैं। मेहनत की कमाई है मेरी, इसके पैसे दे दीजिए।”

दरोगा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आई। उसने कहा, “पैसे? तुझे पता है तू किससे पैसे मांग रही है? यह पूरा इलाका मेरे इशारे पर चलता है।”

अनीता डरी नहीं। उसने नम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा, “साहब, कानून तो सबके लिए बराबर है। मैंने मेहनत की है, मुफ्त में कुछ नहीं मांग रही।” यह सुनते ही दरोगा का पारा चढ़ गया। उसने आव देखा न ताव, अनीता के चेहरे पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया और उसकी पूरी रेहड़ी पलट दी। लाल सेब धूल में बिखर गए। बाज़ार के लोग खामोश खड़े रहे—डर और शर्म की वजह से।

अध्याय 3: सरहद पर पहुँचती आवाज़

अनीता की इस बेइज्जती को बाज़ार में काम करने वाले एक युवक, सुरेश ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया। उसने सोचा कि अगर यह वीडियो रोहन तक पहुँच जाए, तो शायद न्याय हो सके।

उधर, कश्मीर की बर्फीली चोटियों पर रोहन ड्यूटी पर था। उसका मोबाइल बजा। जैसे ही उसने वह वीडियो देखा, उसके सीने में आग लग गई। अपनी माँ को ज़मीन पर गिरा हुआ और रोते हुए देखकर एक सैनिक का दिल दहल गया। उसने तुरंत अपने सीनियर ऑफिसर से छुट्टी मांगी और घर की ओर रवाना हुआ।

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अध्याय 4: रोहन की वापसी और सन्नाटा

रोहन जब घर पहुँचा, तो उसकी माँ ने बात छिपानी चाही। लेकिन रोहन की आँखों में जो दृढ़ता थी, उसके सामने माँ को सच उगलना पड़ा। रोहन ने सादे कपड़े पहने और सच्चाई की तह तक जाने का फैसला किया। उसने एक ऑटो लिया और उसी रास्ते से गुज़रा जहाँ दरोगा गुप्ता सिंह की चौकी थी।

दरोगा और उसके सिपाही राहगीरों को रोककर फर्जी चालान काट रहे थे और पैसे वसूल रहे थे। रोहन के ऑटो को भी रोका गया। रोहन ने कागज़ दिखाए, लेकिन दरोगा ने ₹1000 की मांग की। रोहन ने विरोध किया, तो दरोगा ने उसे भी अंदर डालने की धमकी दी।

रोहन समझ गया कि यह सिर्फ उसकी माँ का मामला नहीं है, बल्कि यह दरोगा पूरे तंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है।

अध्याय 5: थाने में अपमान का दूसरा दौर

रोहन सीधा थाने पहुँचा। वहाँ का SHO अरवन सिंह अपनी कुर्सी पर पैर रखकर बैठा था। रोहन ने अपनी माँ के साथ हुए अन्याय की रिपोर्ट लिखवानी चाही।

SHO ने हंसते हुए कहा, “अरे, वो सेब वाली बुढ़िया का बेटा! रिपोर्ट लिखवानी है? ₹1000 निकाल।”

रोहन ने कहा, “साहब, रिपोर्ट तो मुफ्त में होती है।”

SHO ने झिड़कते हुए उसे बाहर निकाल दिया और कहा कि तुम जो चाहे कर लो, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। रोहन चुपचाप बाहर निकल आया। लेकिन यह खामोशी हार नहीं थी, यह एक बड़े तूफान की दस्तक थी।

अध्याय 6: दोस्तों का साथ और रणनीती

रोहन ने अपने पुराने साथियों को फोन किया—अहमद, कुलदेव और कैप्टन आर्यन चौधरी। ये वो जांबाज़ थे जो सरहद पर रोहन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। शाम तक सब एक साथ थे।

रोहन ने कहा, “हमें कानून हाथ में नहीं लेना है। हमें वर्दी का सम्मान करना है, लेकिन उन लोगों को हटाना है जो वर्दी को बदनाम कर रहे हैं।”

उन्होंने सीधे ज़िला प्रशासन (District Administration) से संपर्क किया। रोहन की सेवा और उसकी माँ के साथ हुए व्यवहार की जानकारी ज़िला अधिकारी (DM) तक पहुँची। DM वैशाली सिंह अपनी ईमानदारी के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने मामले की गंभीरता को समझा।

अध्याय 7: न्याय की गूँज (The Climax)

अगले दिन, रोहन अपने साथियों के साथ फिर से उसी थाने में पहुँचा। SHO और दरोगा गुप्ता सिंह उन्हें देखकर फिर से मज़ाक उड़ाने लगे।

“अरे! फिर आ गए सर्कस दिखाने? निकलो यहाँ से!” SHO ने दहाड़ते हुए कहा।

तभी रोहन ने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाया। पूरे थाने में सन्नाटा छा गया। बाहर सरकारी गाड़ियों के सायरन की आवाज़ गूँजी। DM वैशाली सिंह अपने पूरे दलबल के साथ थाने के अंदर दाखिल हुईं।

SHO और दरोगा के चेहरे का रंग उड़ गया। उनकी घिग्घी बंध गई।

DM ने सख्त आवाज़ में पूछा, “क्या यह थाना है या वसूली का अड्डा? एक फौजी की माँ पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?”

गुप्ता सिंह हकलाने लगा, “मैडम… वो… गलती हो गई।”

DM ने मेज़ पर रखी फाइल उठाई और कहा, “कानून का मज़ाक उड़ाने वालों के लिए इस वर्दी में कोई जगह नहीं है। दरोगा गुप्ता सिंह और SHO अरवन सिंह, तुम दोनों को अभी और इसी वक्त सस्पेंड किया जाता है। विभागीय जांच शुरू की जाए और अनीता देवी के नुकसान की भरपाई तुम्हारी सैलरी से की जाएगी।”

अध्याय 8: नया सवेरा

थाने से निकलते वक्त बाज़ार के वही लोग जो पहले डर के मारे चुप थे, अब तालियाँ बजा रहे थे। अनीता देवी के पास जाकर रोहन ने उनका हाथ थामा। आज उन बिखरे हुए सेबों का इंसाफ हो गया था।

रोहन ने अपनी माँ से कहा, “माँ, सरहद पर दुश्मन से लड़ना जितना ज़रूरी है, समाज के अंदर के इन गद्दारों से लड़ना भी उतना ही ज़रूरी है।”

बाज़ार में फिर से ताज़ा सेब बिकने लगे, लेकिन अब वहाँ डर का साया नहीं, बल्कि सम्मान की हवा बह रही थी।