कनाडा से भारत लौट रही 9 महीने की गर्भवती गुरसिख लड़की को अमृतसर एयरपोर्ट पर किया गया गिरफ्तार!
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अधूरे सपने और सलाखों का स्वागत: अमृतसर एयरपोर्ट की वो दर्दनाक दास्तान
कनाडा की जमा देने वाली ठंड में जब मनप्रीत को पता चला कि वह माँ बनने वाली है, तो उसकी आँखों में सबसे पहली तस्वीर पंजाब के लहलहाते खेतों और अपनी माँ के आँचल की आई। मनप्रीत पिछले पाँच सालों से ओंटारियो में रह रही थी। दिन-रात की हाड़तोड़ मेहनत, पीआर (PR) की भागदौड़ और परदेस की तन्हाई के बीच यह आने वाला नन्हा मेहमान उसके और उसके पति गुरजोत के लिए परमात्मा का सबसे बड़ा आशीर्वाद था।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मनप्रीत की एक ही जिद थी— “मैं अपने पहले बच्चे को अपनी माँ की गोद में जन्म देना चाहती हूँ।” पंजाब के संस्कारों में यह केवल एक रिवाज नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सुरक्षा का अहसास है। गुरजोत ने उसे बहुत समझाया कि 9 महीने की गर्भावस्था में इतना लंबा सफर जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन मनप्रीत का मन अमृतसर की गलियों और श्री हरमंदिर साहिब के दर्शन के लिए तड़प रहा था। डॉक्टरों से लंबी सलाह और एयरलाइंस से ‘फिट टू फ्लाई’ सर्टिफिकेट लेने के बाद, उसने अपनी घर वापसी की टिकट बुक कराई।
सफर के दिन, मनप्रीत ने नीले रंग का ढीला-ढाला सूट पहना था। उसके चेहरे पर गर्भावस्था की एक प्राकृतिक चमक थी, लेकिन आँखों में लंबी यात्रा की थकान। टोरंटो एयरपोर्ट पर उसे व्हीलचेयर मिली, और हर कदम पर उसे लग रहा था कि वह अपनी मिट्टी के करीब जा रही है। जहाज में बैठे हुए 14-15 घंटों का सफर एक सदी जैसा लग रहा था। पैरों में भारी सूजन आ गई थी, पीठ दर्द से बेहाल थी, और बार-बार होने वाली ‘बेबी किक्स’ उसे याद दिला रही थीं कि वह अकेली नहीं है। उसने मन ही मन अरदास की, “सच्चे पातशाह, बस खैरियत से अमृतसर पहुँचा देना।” उसे क्या पता था कि अमृतसर की धरती पर उतरते ही उसकी अरदास एक अग्निपरीक्षा में बदलने वाली है।

जैसे ही जहाज अमृतसर के श्री गुरु रामदास जी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा, मनप्रीत की आँखों में आँसू आ गए। खिड़की से बाहर दिख रही पंजाब की धूप उसे सुकून दे रही थी। वह धीरे-धीरे यात्रियों की कतार में इमीग्रेशन काउंटर की ओर बढ़ी। उसे लग रहा था कि अगले आधे घंटे में वह बाहर खड़ी अपनी माँ के गले लगकर रोएगी। जब उसका नंबर आया, तो उसने मुस्कुराते हुए अपना पासपोर्ट अधिकारी को दिया। अधिकारी ने कंप्यूटर पर कुछ टाइप किया और अचानक उसकी उंगलियाँ रुक गईं। उसने मनप्रीत की ओर एक अजीब नजर से देखा और अपने पास बैठे दूसरे अधिकारी को इशारा किया।
“मैडम, आप यहीं रुकिए। हमें कुछ चेक करना है,” अधिकारी ने रुखे स्वर में कहा। मनप्रीत घबरा गई। “वीर जी, सब ठीक तो है? मैं बहुत थकी हुई हूँ, मुझे घर जाना है।” अधिकारी ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ ही मिनटों में वहां दो-तीन सुरक्षाकर्मी और एक महिला पुलिसकर्मी आ पहुँचे। उन्होंने घेरा बनाकर कहा, “आपके खिलाफ एलओसी जारी है। आप यहाँ से बाहर नहीं जा सकतीं। आपको हमारे साथ थाने चलना होगा।”
यह सुनते ही मनप्रीत के पैरों तले जमीन खिसक गई। “एलओसी? मेरे खिलाफ? पर मैंने किया क्या है?” वह चिल्लाई। उसकी आवाज में बेबसी थी। इमीग्रेशन हॉल में खड़े बाकी यात्री ठहर गए। एक 9 महीने की गर्भवती महिला, जिसका पेट साफ दिख रहा था, जो मुश्किल से खड़ी हो पा रही थी, उसे अपराधी की तरह घेरा जा रहा था। पता चला कि सालों पहले किसी पुराने जमीनी विवाद या शादी से जुड़े किसी पुराने मामले में उसे ‘भगोड़ा’ घोषित कर दिया गया था। मनप्रीत को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अक्सर एनआरआई परिवारों में पीछे से मुकदमे दर्ज हो जाते हैं और जानकारी न होने पर वे अदालती प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाते।
उसने हाथ जोड़े, वह महिला पुलिसकर्मी के पैरों में गिर गई। “मेरी हालत देखिए, मैं किसी भी वक्त बच्चे को जन्म दे सकती हूँ। मुझे मेरे माता-पिता के पास जाने दीजिए, मैं कहीं नहीं भागूँगी।” लेकिन कानून की मशीनरी में भावनाएँ नहीं, केवल ‘प्रोसेस’ होता है। अधिकारियों ने कहा कि सिस्टम में नाम आने के बाद वे उसे छोड़ नहीं सकते।
एयरपोर्ट के बाहर का दृश्य और भी हृदयविदारक था। मनप्रीत के पिता एक हाथ में फूलों का हार और दूसरे में लड्डू का डिब्बा लिए गेट की ओर टकटकी लगाए खड़े थे। माँ ने अपनी बेटी की पसंदीदा ‘पिन्नी’ बनाई थी। जब जहाज के आखिरी यात्री भी बाहर आ गए और मनप्रीत नहीं दिखी, तो उनकी बेचैनी बढ़ने लगी। अचानक एक सुरक्षाकर्मी बाहर आया और उसने पिता को किनारे ले जाकर बताया कि उनकी बेटी को गिरफ्तार कर लिया गया है। यह सुनते ही पिता के हाथ से लड्डू का डिब्बा गिर गया। माँ वहीँ जमीन पर बैठ गई और दहाड़ें मारकर रोने लगी। “मेरी धी अपराधी नहीं है! वह तो अपना बच्चा जनने आई है! उसे छोड़ दो!” उनके करुण क्रंदन से वहां खड़े हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
मनप्रीत को पुलिस वैन में बैठाया गया। वह वैन जो अपराधियों के लिए होती है, उसमें एक जीवन को जन्म देने वाली माँ बैठी थी। थाने की दीवारों और वहां की बदबू ने उसकी घबराहट को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। तनाव के कारण उसका ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी। रात भर वह थाने के एक बेंच पर बैठी रही। न तो उसे ठीक से लेटने दिया गया और न ही उसे अपने परिवार से मिलने दिया गया। कानून की दलील थी कि उसे सुबह मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। लेकिन सवाल यह था कि क्या एक गर्भवती महिला को कम से कम अस्पताल में नजरबंद नहीं रखा जा सकता था?
यह खबर आग की तरह पूरे पंजाब में फैल गई। सोशल मीडिया पर लोग पूछने लगे कि क्या यही वह पंजाब है जो अपनी बेटियों का सम्मान करता है? क्या पुलिस इतनी संवेदनहीन हो गई है कि उसे एक गर्भवती महिला और एक अपराधी के बीच का अंतर समझ नहीं आता? विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के अंतिम दिनों में अत्यधिक तनाव ‘प्री-मैच्योर लेबर’ या माँ के लिए ‘स्ट्रोक’ का कारण बन सकता है। यहाँ केवल एक महिला को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि एक अजन्मे बच्चे के जीवन को भी खतरे में डाला गया था।
यह घटना उन लाखों पंजाबियों के लिए एक सबक है जो विदेशों में बसे हैं। अक्सर वे सोचते हैं कि भारत में उनके खिलाफ कोई मामला नहीं है, लेकिन सिस्टम की खामियों के कारण पुराने विवाद कभी भी एलओसी का रूप ले सकते हैं। अगले दिन, भारी हंगामे और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप के बाद, मनप्रीत को मेडिकल आधार पर अंतरिम राहत दी गई और अस्पताल भेजा गया। लेकिन वह डर, वह अपमान और वह सदमा शायद उसकी और उसके बच्चे की स्मृतियों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कानून इंसानों के लिए बना है, इंसान कानून के लिए नहीं। जब किसी प्रक्रिया से किसी निर्दोष की जान को खतरा हो, तो वहां विवेक का इस्तेमाल होना चाहिए। हम अरदास करते हैं कि मनप्रीत एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे और उसे जल्द से जल्द न्याय मिले। पंजाब की मिट्टी जिसे वह चूमने आई थी, उसे वही प्यार मिले जिसकी वह हकदार है।
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