कब्रिस्तान में महिला के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/S.P साहब के रोंगटे खड़े हो गए/
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“बरघट की काली रात: अंधविश्वास, लालच और पाप की सज़ा”
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बरघट गाँव में रात जल्दी उतरती थी। दिन ढलते ही हवा में धूल और ईंधन की गंध घुल जाती, और दूर कहीं खेतों के पार से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती। गाँव वालों का कहना था—“बरघट की रात में कुछ ऐसा है, जो आदमी के भीतर की सच्चाई बाहर निकाल देती है।”
कुछ लोग इसे डर कहते, कुछ इसे किस्मत—और कुछ इसे अंधविश्वास।
बरघट, जबलपुर ज़िले का एक छोटा सा गाँव था, जहाँ खबरें भी पगडंडी से चलकर आती थीं। और उन्हीं पगडंडियों पर चलता था—अनवर।
अनवर पेशे से मिस्त्री था। हाथ में हुनर था। ईंट, गारा, छज्जा, छत—सब पर पकड़। घर बनाता तो लोग तारीफ करते, “काम एकदम पक्का करता है।” पैसा भी ठीक-ठाक मिल जाता। मगर अनवर की ज़िंदगी का असली सच उसके काम में नहीं—उसकी आदतों में छिपा था।
वह जितना कमाता, उससे ज़्यादा उड़ा देता। शराब, दिखावा, बेफिक्रियां—और गलत संगत। गाँव के कुछ लोग धीरे से कहते, “अनवर का दिल घर में नहीं लगता।”
घर में उसकी पत्नी सलमा थी—सुंदर, मेहनती, और भीतर से लगातार टूटती हुई। सलमा चाहती थी कि जिंदगी संभल जाए। वह रोज़ अनवर से कहती—“थोड़ा बचा लिया करो। कल को क्या होगा?”
अनवर हँसकर बात टाल देता। कभी-कभी झल्ला भी जाता। फिर घर में वही झगड़ा, वही कटुता, वही थकान।
लेकिन इन झगड़ों की जड़ सिर्फ पैसे नहीं थे।
उनके पास औलाद नहीं थी।
सालों से सलमा यही खालीपन ढो रही थी। वह कभी खुद को दोष देती, कभी अनवर को। अनवर भी कभी सलमा पर इल्ज़ाम रख देता, कभी अपनी किस्मत को कोसता। दोनों डॉक्टरों के पास गए, दवाइयाँ खाईं, रिपोर्टें कराईं—पर जब उम्मीद बार-बार लौटकर खाली हाथ आती है, तो इंसान के भीतर का डर किसी भी दरवाज़े पर दस्तक दे देता है।
और उसी दरवाज़े का नाम था—अंधविश्वास।
बरघट में तांत्रिकों की कमी नहीं थी। कोई धागा बाँध देता, कोई राख दे देता, कोई डर दिखाकर पैसे ऐंठ लेता। सलमा और अनवर भी वही करने लगे। जैसे कोई पुजारी या तांत्रिक दिखा, हाथ दिखाने बैठ गए। हर बार नए वादे, हर बार नया खर्च, और हर बार वही खालीपन।
फिर एक सुबह आई—12 दिसंबर 2025।
उस दिन सुबह करीब आठ बजे, सलमा और अनवर घर में थे। खाना भी सामने था, बातचीत भी चल रही थी। तभी बाहर से आवाज आई। दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था—अब्दुल।
गाँव में लोग उसे तांत्रिक कहते थे। उसकी आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास था, जैसे वह दूसरों की कमजोरियों की नस पकड़ता हो। सलमा ने उसे देखते ही जल्दी से पल्लू ठीक किया। अनवर ने थाली सरका दी। दोनों के चेहरे पर वही उम्मीद उतर आई, जो अक्सर किसी “चमत्कार” की तलाश में दिखती है।
अब्दुल बैठा। दान-दक्षिणा रखी गई। उसने अनवर का हाथ देखा, फिर सलमा की बातें सुनीं। सलमा बोली—“हमारे घर में औलाद नहीं, झगड़े बढ़ गए हैं। कुछ कर दो।”
अब्दुल ने लंबी साँस ली, जैसे कोई बहुत बड़ा रहस्य खोलने वाला हो। फिर बोला—“समाधान है। लेकिन दान-दक्षिणा मोटी होगी।”
अनवर तुरंत बोला—“पैसों की चिंता मत करो। उपाय बता दो।”
अब्दुल ने धीरे-धीरे, शब्दों में ऐसा जाल बुना कि सुनने वाला खुद उसमें फंस जाए। उसने कहा—“दस महीने में संतान होगी… पर एक खास ‘कर्म’ करना होगा।”
सलमा की आँखें चमक उठीं। दस महीने। बेटा। एक नई शुरुआत।
पर अब्दुल की बात का अगला हिस्सा सलमा और अनवर की जिंदगी का सबसे खतरनाक मोड़ बन गया—क्योंकि उसने ऐसे काम की ओर धकेला, जो इंसानियत और कानून—दोनों के खिलाफ था।
सलमा उस क्षण माँ बनने की लालसा में इतनी डूबी थी कि सही-गलत का फर्क धुंधला पड़ गया। और अनवर… अनवर के भीतर पहले से ही बहुत कुछ बिगड़ा हुआ था।
अब्दुल दान लेकर चला गया, और पीछे छोड़ गया—एक ऐसा विचार, जो धीरे-धीरे अपराध बनकर उभरा।
सलमा ने अनवर पर दबाव डालना शुरू कर दिया। वह डराने लगी—“अगर तुमने नहीं किया, तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगी।”
अनवर परेशान दिखता, पर भीतर कहीं उसे भी लग रहा था कि यह “रास्ता” उसकी विकृत सोच को छूट दे देगा।
और इसी बीच, किस्मत ने एक और दरवाज़ा खोल दिया—कब्रिस्तान का।
गाँव के मुखिया राशिद ने आकर कहा—“कब्रिस्तान में गंदगी फैल गई है, चारदीवारी बनवानी है। काम तुम्हें मिलता है।”
अनवर के चेहरे पर खुशी फैल गई। वह बोला—“कल सुबह से शुरू कर दूंगा।”

राशिद चला गया।
और अनवर के भीतर कुछ ऐसा जाग गया, जिसे वह खुद भी पूरी तरह शब्दों में नहीं कह सकता था।
काम के लिए उसे मजदूर चाहिए था। उसे याद आया—रहमान। मेहनती मजदूर, पर शराब का आदी।
अनवर रहमान के घर पहुँचा। दरवाज़ा आयशा ने खोला—रहमान की पत्नी।
आयशा सुंदर थी, पर चेहरे पर गरीबी का तनाव साफ था। अनवर की नजरें वहीं अटक गईं। उसकी नियत में खोट उतर आया।
उसने पूछा—“रहमान कहाँ है?”
आयशा बोली—“नशे में पड़ा है।”
अनवर भीतर गया। रहमान सच में बेसुध था।
आयशा ने धीमे स्वर में कहा—“मुझे हजार रुपये चाहिए। घर में कुछ नहीं।”
वह पल… बरघट की एक और गलती का दरवाज़ा था।
अनवर ने पैसे को सौदे में बदलने की कोशिश की—और आयशा ने मजबूरी में अपनी चुप्पी चुन ली।
यहाँ कहानी का सच बहुत कड़वा है: जब आदमी लालच के साथ सत्ता ले आता है—गरीबी अक्सर हार जाती है।
(इस हिस्से में मैं किसी भी अनुचित/आपत्तिजनक विवरण में नहीं जाऊँगा।)
इसके बाद रहमान को काम पर बुला लिया गया। अगली सुबह कब्रिस्तान में तीन लोग मिले—अनवर, रहमान और राशिद।
चारदीवारी का काम शुरू हुआ। ईंटें लगीं, गारा बना, धूप तेज हुई।
दिन सामान्य था—पर शाम को एक मौत हुई। गाँव की महिला फातिमा का देहांत हो गया। लोग जनाज़ा/दफन के लिए कब्रिस्तान आए।
अनवर ने दूर से देखा, और उसके भीतर का अंधेरा मुस्कुरा उठा।
उसके कानों में अब्दुल के शब्द गूंजे।
और उसने रहमान को उसी दिन रात रुकने का लालच दिया—“पैसे दूँगा, शराब दूँगा।”
रहमान पहले घबराया, फिर लालच में मान गया।
रात आठ बजे के बाद कब्रिस्तान का माहौल बदल जाता है। दिन का शोर चला जाता है, और पत्थरों के बीच केवल हवा चलती है।
दोनों ने शराब पी। नशा बढ़ा।
और फिर… अनवर ने ऐसा अपराध किया, जिसे कोई सभ्य समाज शब्दों में भी रखना नहीं चाहता।
इतना कहना काफी है कि उसने कब्रों का अपमान किया और एक घोर अमानवीय हरकत की।
रहमान डरता रहा, लेकिन शराब और पैसों ने उसे कायर बना दिया। वह चुप रहा।
और यह चुप्पी ही आगे चलकर सबसे बड़ा विस्फोट बनी।
इसके बाद अनवर ने रहमान को और पिला दिया ताकि वह ढंग से सोच न सके। रात गहरी हुई। रहमान घर पहुँचा तो लड़खड़ा रहा था। आयशा ने दरवाज़ा खोला। अनवर भी साथ था।
उस रात किसी ने उन्हें आते देखा—पड़ोसन रुबीना।
रुबीना ने कुछ नहीं कहा, बस देखा।
और देखने भर से ही गाँव का सच बदलने लगता है।
सुबह रुबीना ने रहमान को रोककर कहा—“तुम्हारे घर में जो हो रहा है, वह सही नहीं।”
रहमान का चेहरा तमतमा गया। उसने आयशा से पूछा।
आयशा ने डर में झूठ बोला—“रुबीना पैसे मांग रही थी, नहीं दिए तो बदनाम कर रही है।”
रहमान ने कुछ देर तक मान लिया।
इंसान अक्सर वही मानता है जो उसे कम दर्द दे।
पर उसी दिन गाँव में फिर एक मौत हुई। एक हफ्ते के भीतर दूसरी महिला का देहांत।
कब्रिस्तान में दफन हुआ।
अनवर फिर खुश हुआ।
और फिर वही पैसों-शराब का लालच देकर उसने रहमान को रात रोक लिया।
दूसरी रात भी कब्रिस्तान में अपराध हुआ।
रहमान भीतर से टूटने लगा।
क्योंकि अब उसे समझ आने लगा था—यह “सिर्फ गलती” नहीं थी, यह राक्षसीपन था।
वह खुद भी अपराध का हिस्सा बन चुका था—अपने डर और लालच के कारण।
दिन बीतते गए।
22 दिसंबर 2025 की सुबह, रहमान कब्रिस्तान की तरफ जा रहा था। रास्ते में लोग कहने लगे—“भाई, अनवर को तुम्हारे घर आते-जाते देखा है।”
एक, दो नहीं—कई लोग।
अब रहमान का भ्रम टूट गया।
उसने सोचा—“मैं चुप रहा, इसलिए यह सब बढ़ा।”
और उसी पल उसने फैसला किया—अब नहीं।
दिन भर वे काम करते रहे। शाम को रहमान ने खुद अनवर को कहा—“आज रात शराब पीते हैं।”
अनवर फँस गया। उसे लगा, रहमान अब भी उसी तरह लालच में है।
रात साढ़े सात बजे रहमान शराब लेकर आया। दोनों ने पी।
अनवर नशे में अपने मुँह से वह बात बोल गया, जिसे रहमान सुनना नहीं चाहता था—कि वह आज रात “फिर” वही अमानवीय अपराध करने वाला है।
रहमान का पेट उलट गया। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की मिट्टी ही गंदी हो गई हो।
वह उठकर बाहर निकला।
सीधे मुखिया राशिद के पास गया।
राशिद ने पूरी बात सुनी—और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
कब्रिस्तान में अपराध? वह भी ऐसा?
राशिद ने तुरंत थाना फोन किया।
और फिर—राशिद और रहमान पुलिस को लेकर कब्रिस्तान की तरफ दौड़े।
रात का अंधेरा था। चारदीवारी अधूरी थी।
कब्रिस्तान के भीतर—एक आदमी संदिग्ध तरीके से खुदाई कर रहा था।
पुलिस ने टॉर्च मारी।
“कौन है?”
अनवर पलटा। नशे में था, घबराया हुआ।
पुलिस ने उसे वहीं दबोच लिया।
कुछ मिनटों में कब्रिस्तान की हवा बदल गई।
अब वहाँ सिर्फ अंधेरा नहीं था—वहाँ कानून था।
अनवर को थाने लाया गया। पूछताछ हुई।
शुरू में वह बचने की कोशिश करता रहा, फिर अचानक उसने तांत्रिक का नाम लिया—“अब्दुल ने कहा था… संतान होगी…”
पुलिस वालों ने उसकी बात सुनी और एक-दूसरे को देखा—ऐसी मूर्खता पर गुस्सा भी आता है और डर भी।
क्योंकि अंधविश्वास जब अपराध बन जाए, तो वह सिर्फ एक आदमी को नहीं डुबोता—पूरे समाज को गंदा करता है।
मामला ऊपर तक गया।
जिले के एस.पी. तक रिपोर्ट पहुँची।
कागज पर लिखी बातें पढ़कर भी एस.पी. के रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि यह सिर्फ अपराध नहीं था—यह इंसानियत पर हमला था।
एस.पी. ने साफ कहा—“इसमें ढिलाई नहीं होगी। जो भी शामिल है—तांत्रिक, मददगार, सब पर कार्रवाई होगी।”
चार्जशीट तैयार हुई।
सबूत, गवाह, घटनाक्रम—सब जोड़ा गया।
रुबीना की गवाही, गाँव वालों के बयान, राशिद का कॉल रिकॉर्ड, रहमान का इकबाल-ए-हिस्सा (कि वह लालच में चुप रहा)—सब दर्ज हुआ।
अब्दुल की तलाश शुरू हुई।
क्योंकि अपराध सिर्फ हाथों से नहीं होता—कभी-कभी अपराध भड़काने वाले शब्दों से भी होता है।
गाँव में एक सन्नाटा छा गया।
सलमा घर में बैठी थी। उसे अब समझ आ रहा था कि जिस “चमत्कार” के लिए उसने ज़िद की, वह किस दलदल में बदल गया।
पर पछतावे का दर्द अक्सर तब आता है, जब नुकसान हो चुका होता है।
रहमान और आयशा के घर का माहौल भी टूट चुका था।
भरोसा, सम्मान, सब बिखर गया।
रहमान को एहसास हुआ कि लालच ने उसे कायर बनाया—और कायरता ने अपराध को जगह दी।
आयशा समझ गई कि मजबूरी में चुनी गई गलत चुप्पी भी एक दिन ज़हर बनकर वापस आती है।
और सलमा समझ गई कि अंधविश्वास की आग सबसे पहले अपने ही घर को जलाती है।
कुछ महीने बाद अदालत में सुनवाई शुरू हुई।
जज ने साफ कहा—“अंधविश्वास के नाम पर कोई भी अमानवीय कृत्य स्वीकार नहीं। यह गंभीर अपराध है।”
यहाँ फैसला अदालत करेगी—पर यह निश्चित था कि बरघट की रातों में जो हुआ, वह बरघट के माथे पर एक दाग बनकर रह जाएगा, जब तक लोग सीख नहीं लेते।
और सीख बहुत स्पष्ट थी:
पहला: जब दुख बड़ा हो, तब भी फैसला विवेक से करो—डर से नहीं।
दूसरा: तांत्रिकों के वादों में फँसकर जीवन मत बिगाड़ो।
तीसरा: लालच, शराब और गलत संगत—तीनों मिलकर इंसान को राक्षस बना देते हैं।
चौथा: अगर आप कुछ गलत होते देखें—चुप मत रहें। रिकॉर्ड रखें, सही जगह शिकायत करें।
क्योंकि अपराध का सबसे बड़ा साथी अक्सर अपराधी नहीं—चुप्पी होती है।
बरघट की वह काली रात गुजर गई।
लेकिन उसकी गूंज—कब्रिस्तान की दीवारों पर नहीं, लोगों के मन में रह गई।
और शायद यही गूंज किसी अगली जिंदगी को अंधविश्वास से बचा ले—यही इस कहानी का असली मकसद है।
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