कार पलटी, तो खुला राज़! प्रॉपर्टी डीलर को अगवा करने वाले गुंडे नहीं, बल्कि 4 ख़ूबसूरत लड़कियाँ थीं। जानिए, इस डिजिटल जाल की पूरी कहानी।

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भाग १: राहुल का रंगीन मिज़ाज

मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में राहुल राठौर (३८) नाम का एक प्रॉपर्टी डीलर रहता था। राहुल का कारोबार अच्छा-ख़ासा था। वह पैसे वाला था, शादीशुदा था, और गांधी नगर की पॉश कॉलोनी में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। लेकिन राहुल की दौलत और आराम भरी ज़िंदगी में एक बड़ी कमी थी—वह था उसका अय्याश मिज़ाज।

राहुल को नई-नई लड़कियों से संबंध बनाने का शौक़ था। अपनी पत्नी के होते हुए भी, उसका मन हमेशा बाहर भटकता रहता था। उसके लिए डिजिटल दुनिया एक नया शिकारगाह थी। वह घंटों सोशल मीडिया पर बिताता, ख़ासकर इंस्टाग्राम पर, जहाँ वह सुंदर लड़कियों को तलाशता।

१५ अगस्त २०२५ के आसपास, राहुल के इंस्टाग्राम पर एक नई फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। नाम था आयुषी। प्रोफ़ाइल पर आयुषी की तस्वीरें देखकर राहुल का मन मचल उठा। वह तुरंत रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लेता है।

आयुषी ने चैटिंग शुरू की। पहले सामान्य बातचीत, फिर दोस्ती गहरी होती गई। राहुल को लगता था कि वह एक और आसान शिकार फँसा रहा है। आयुषी भी बड़ी चालाकी से राहुल की तारीफ़ करती, उसे वीडियो कॉल करती और उसकी प्रॉपर्टी डीलिंग के काम में दिलचस्पी दिखाती।

करीब एक महीने की बातचीत के बाद, आयुषी ने एक दिन फ़ोन पर कहा, “राहुल, मेरी एक बहन है, कृतिका। वह शादीशुदा है और उसके पति अच्छे पैसे कमाते हैं। उन्हें उज्जैन में एक बड़ी प्रॉपर्टी ख़रीदनी है। क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?”

राहुल तो पहले से ही मिलने के लिए बेचैन था। उसने तुरंत हाँ कर दी। “क्यों नहीं, आयुषी? हम कहाँ मिल सकते हैं?”

आयुषी ने मिलने की जगह बताई: शहर के बाहर एक सुनसान ओवरब्रिज। “वहाँ लोग कम आते-जाते हैं, हम आराम से बात कर सकते हैं।”

राहुल की पत्नी को इस बारे में कानों-कान ख़बर नहीं थी कि उसका पति इंस्टाग्राम पर किसी लड़की से बात कर रहा है और उससे मिलने की तैयारी कर रहा है। राहुल भी अपनी हवस में इतना अंधा हो चुका था कि उसने यह सोचने की ज़हमत नहीं उठाई कि आयुषी कौन है और उसका इरादा क्या है।

भाग २: ओवरब्रिज पर मौत का इंतज़ार

१५ सितंबर, २०२५ की शाम, राहुल अपनी चमचमाती कार लेकर आयुषी के बताए हुए ओवरब्रिज पर पहुँचा। जगह वाकई सुनसान थी। राहुल ने अपनी घड़ी देखी, वह बेचैनी से इंतज़ार कर रहा था।

थोड़ी देर बाद, आयुषी वहाँ आई। राहुल उसे देखते ही पहचान गया, क्योंकि वे घंटों वीडियो कॉल पर बात कर चुके थे। लेकिन आयुषी अकेली नहीं थी। उसके साथ तीन और लड़कियाँ थीं: कृतिका (जिसे आयुषी ने अपनी बहन बताया था), पूजा और नेहा।

राहुल को लगा, यह तो सोने पर सुहागा है। चार-चार ख़ूबसूरत लड़कियाँ!

चारों लड़कियाँ एक-एक करके राहुल की कार में आकर बैठ गईं। राहुल ड्राइविंग सीट पर बैठा था।

आयुषी ने मीठी आवाज़ में कहा, “राहुल, तुम पीछे वाली सीट पर आ जाओ। हमें तुमसे कुछ ज़रूरी और निजी बात करनी है।”

राहुल ने बिना सोचे-समझे ड्राइविंग सीट छोड़ दी और पीछे चला गया। आयुषी उसके क़रीब बैठ गई।

राहुल अपनी अय्याशी में डूब चुका था। उसने तुरंत आयुषी के साथ छेड़खानी शुरू कर दी। आयुषी भी उसका साथ दे रही थी। राहुल इतना अंधा था कि उसने यह भी ध्यान नहीं दिया कि कार में बाक़ी तीन लड़कियाँ भी मौजूद हैं।

शारीरिक संबंध बनाने के दौरान, बाक़ी तीनों लड़कियाँ भी राहुल को उकसाने लगीं। राहुल के लिए यह स्थिति असहनीय होती जा रही थी। वह घबरा गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

इसी बीच, पूजा ने चुपके से अपना मोबाइल निकाला और इस पूरे वाकये का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया।

राहुल को अब एहसास हुआ कि वह बुरी तरह फँस चुका है। कार के चारों दरवाज़े लॉक थे, और ये चारों लड़कियाँ उसे बाहर निकलने नहीं दे रही थीं।

भाग ३: शिकंजा और पचास लाख की माँग

अचानक, कार का माहौल बदल गया। आयुषी का चेहरा सख़्त हो गया।

तभी दो लड़के वहाँ पहुँचे और कार में बैठ गए। एक ड्राइवर सीट पर बैठ गया—संजय गुर्जर, और दूसरा आगे की सीट पर—फूल गुर्जर।

संजय ने पीछे मुड़कर राहुल की तरफ़ देखा, जो पसीने से तर हो चुका था।

“राहुल, देखो अब तुम्हारा वीडियो बन चुका है। अगर तुम ज़्यादा बदतमीज़ी करोगे, तो यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाएगा। पूरी दुनिया तक फैल जाएगा।”

फूल ने आगे कहा, “अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी इज़्ज़त बच जाए, तो चुपचाप हमें पचास लाख रुपये दे दो और यहाँ से निकल जाओ।”

राहुल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। ₹५० लाख!

जब राहुल ने पैसे देने से मना किया, तो संजय और फूल ने उसे कार के अंदर ही मारना-पीटना शुरू कर दिया। चारों लड़कियों ने मिलकर उसके हाथ-पैर मोटी रस्सी से कसकर बाँध दिए।

राहुल की हालत ख़राब हो गई। वह गिड़गिड़ाने लगा, हाथ जोड़कर अपनी जान की भीख माँगने लगा। वह अय्याश प्रॉपर्टी डीलर, जो लड़कियों को शिकार समझता था, अब ख़ुद शिकार बन चुका था। पूरी रात, वे लड़कियाँ और लड़के उसे टॉर्चर करते रहे।

“इतने पैसे मैं कहाँ से लाऊँ?” राहुल रोया। “थोड़े बहुत पैसे होते तो मैं एडजस्ट कर लेता।”

लेकिन उन लोगों ने उसे ज़बरदस्ती प्रताड़ित किया।

अगले दिन, १६ सितंबर की सुबह, जब राहुल को लगा कि अगर उसने पैसे नहीं दिए, तो वे उसे मार डालेंगे, तो वह अंततः बातचीत करने पर मजबूर हो गया।

लंबी बातचीत के बाद, डील ₹१५ लाख पर तय हुई।

भाग ४: पुलिस का दाँव

इधर, राहुल के परिवार वाले परेशान थे। १६ सितंबर की शाम को, राहुल के जीजाजी और परिवार के अन्य सदस्य चिमनगंज थाने पहुँचे और राहुल के लापता होने की रिपोर्ट लिखवाई।

पुलिस अभी मामले पर विचार ही कर रही थी कि तभी राहुल के जीजाजी के फ़ोन पर एक नोटिफिकेशन आया—राहुल का फ़ोन ऑन हुआ था।

जीजाजी ने तुरंत कॉल किया। उधर से राहुल की धीमी आवाज़ आई।

“जीजाजी, मेरे घर की अलमारी में ₹१५ लाख रखे हैं। मैं आपको लोकेशन भेज रहा हूँ। आप पैसे लेकर वहाँ आ जाइए। अकेले आना। किसी को मत बताना, पुलिस को भी नहीं।”

इतना कहकर राहुल ने फ़ोन काट दिया, और उसका मोबाइल फिर से बंद हो गया।

पुलिस और परिवार तुरंत समझ गए कि राहुल का अपहरण हो चुका है और फिरौती माँगी जा रही है।

पुलिस ने तुरंत एक योजना बनाई। उन्होंने परिवार को पैसे दिए (लेकिन पैसे के साथ जीपीएस ट्रैकर भी लगाया), और उन्हें बताए गए स्थान पर भेजा। पीछे-पीछे, चार-पाँच गाड़ियों में पुलिस भी सादे कपड़ों में छिपकर चल रही थी।

जैसे ही परिवार वाले बताए गए स्थान पर पहुँचे, एक गाड़ी आकर रुकी। राहुल के परिवार वालों ने तुरंत उस गाड़ी का पीछा करना शुरू कर दिया।

उस गाड़ी में चारों लड़कियाँ और दोनों लड़के बैठे थे।

जब किडनैपर्स को एहसास हुआ कि उनका पीछा किया जा रहा है, तो उन्होंने गाड़ी तेज़ी से भगाना शुरू कर दिया।

पुलिस ने भी फ़िल्मी अंदाज़ में उनका पीछा किया। तंग गलियाँ, उबड़-खाबड़ सड़कें—पीछा करते-करते पुलिस ने उनकी गाड़ी को टक्कर मारने की कोशिश की।

अचानक, एक मोड़ पर ड्राइवर का संतुलन बिगड़ गया, और किडनैपर्स की गाड़ी फिसलकर खेत में जा गिरी और बुरी तरह पलट गई।

गाड़ी पलटते ही, अंदर बैठे चारों लड़कियाँ और दोनों लड़के किसी तरह बाहर निकले और भागने लगे।

इसी बीच, मौक़े पर पहुँचे राहुल के परिवार वालों ने पलटी हुई गाड़ी से राहुल को सही-सलामत बाहर निकाला। राहुल के हाथ-पैर बँधे हुए थे, और वह बुरी तरह डरा हुआ था।

भाग ५: गैंग का पर्दाफ़ाश

पुलिस ने तुरंत छानबीन शुरू की और कुछ ही घंटों में सभी छह आरोपियों—आयुषी, कृतिका, पूजा, नेहा, संजय गुर्जर और फूल गुर्जर—को गिरफ़्तार कर लिया।

राहुल को थाने लाया गया और उससे गहन पूछताछ की गई। तब राहुल ने धीरे-धीरे पूरी सच्चाई बताई—इंस्टाग्राम पर दोस्ती, उसका अय्याश मिज़ाज, और ओवरब्रिज पर हुई सारी घटना।

जाँच में पता चला कि ये चारों लड़कियाँ मूल रूप से जबलपुर की रहने वाली थीं। वे उज्जैन आकर एक गैंग चलाती थीं। उनका काम था: पहले सोशल मीडिया पर अमीर और अय्याश लोगों को फँसाना, फिर उन्हें ब्लैकमेल करना और पैसे वसूलना।

राहुल राठौर जैसे लोग, जिनके घर में बीवी होते हुए भी वे दूसरी लड़कियों से संबंध बनाते थे, उनके लिए यह एक ज़रूरी सबक था। राहुल की जान तो बच गई, लेकिन उसकी अय्याशी ने उसे एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया था, जहाँ उसकी इज़्ज़त और जान दोनों ख़तरे में पड़ गई थीं।

पुलिस ने सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की। इस घटना ने उज्जैन के लोगों को एक गहरी सीख दी: डिजिटल ज़माने में अनजान लोगों से बनी दोस्ती कभी-कभी मौत का जाल बन सकती है। राहुल ने अपनी लापरवाही से अपनी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी थी।