कुलदीप सिंह सेंगर: रसूख, राजनीति और न्याय की लड़ाई – एक बेटी की जंग

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की एक 16 साल की लड़की, अपने परिवार के साथ नौकरी की आस में विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के घर पहुंची थी। परिवार भाजपा का समर्थक था, जाति से क्षत्रिय, सनातनी। उन्हें उम्मीद थी कि “जनता के सेवक” विधायक उनकी मदद करेंगे। लेकिन किस्मत ने ऐसा चक्र चलाया कि बेटी की जिंदगी एक भयानक हादसे में बदल गई।

1. नौकरी की तलाश और पहली दरिंदगी

साल 2017, जून की गर्मी। लड़की अपने रिश्तेदार के साथ विधायक सेंगर के घर नौकरी मांगने गई। सेंगर ने उसे अकेले बुलाया और उसके साथ बलात्कार किया। लड़की ने विरोध किया, लेकिन रसूखदार विधायक के आगे उसकी एक न चली। उसे गायब करवा दिया गया। पुलिस ने उसे 10 दिन तक अपनी कस्टडी में रखा, फिर परिवार को सौंप दिया।

लड़की और उसकी मां ने थाना, कोर्ट, हर जगह न्याय की गुहार लगाई। लेकिन सेंगर के रसूख के आगे कोई सुनवाई नहीं हुई। पुलिस शिकायत तक दर्ज नहीं करती थी।

2. पिता की मौत और सिस्टम का दमन

लड़की के पिता ने इंसाफ की लड़ाई शुरू की, लेकिन विधायक के भाई और पुलिस वालों ने उन्हें बुरी तरह पीटा। पोस्टमार्टम में 14 चोटों के निशान मिले। उल्टा, पिता पर ही मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया। बेटी ने योगी आदित्यनाथ के आवास पर आत्मदाह का प्रयास किया। अगले ही दिन पिता की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई।

पूरा परिवार सदमे में था। जिस बेटी के साथ बलात्कार हुआ, उसके पिता को मार डाला गया। चाचा जेल में डाल दिए गए, जबकि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। चाची और मौसी को सीबीआई की गवाही के लिए जाते वक्त रायबरेली के पास ट्रक से टक्कर मारकर मार दिया गया। ट्रक की नंबर प्लेट पर कालिख लगी थी, ताकि पहचान न हो सके।

3. रसूखदार विधायक और राजनीति का खेल

कुलदीप सिंह सेंगर का राजनीतिक सफर बड़ा रसूखदार रहा। 2002 में बसपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने। बाद में मायावती ने पार्टी से निकाल दिया। 2017 में भाजपा में शामिल हुए, बांगरमऊ सीट से विधायक बने। मोदी-योगी के नेतृत्व में सेंगर का जलवा था। जिले के एसएसपी तक उसकी चाय पार्टी में शामिल होते थे।

जब यह मामला सामने आया, तो एसएसपी से लेकर मुख्यमंत्री तक, किसी की हिम्मत नहीं थी सेंगर पर हाथ डालने की। अदालत ने सीबीआई को जांच सौंपी, तब जाकर गिरफ्तारी हुई। लेकिन रसूख ऐसा कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज चुनाव जीतने के बाद सेंगर को जेल में धन्यवाद देने पहुंचे। मीडिया के सामने उसे “यशस्वी और लोकप्रिय विधायक” बताया।

4. अदालत, जमानत और न्याय का संघर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की सजा पर रोक लगाई, साथ में कुछ “मासूम” शर्तें रखीं—दिल्ली नहीं छोड़ सकता, हर सोमवार पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करेगा, पासपोर्ट जमा करेगा। अगर कोई शर्त तोड़ी तो जमानत रद्द होगी।
पीड़िता कहती है—”आप उसकी ताकत नहीं जानते। उसके लोग मेरे परिवार को खत्म कर देंगे। कई गवाह मारे जा चुके हैं।”

सेंगर के भाई ने पिता की हत्या की, फिर भी दोनों बाहर हैं। दूसरी तरफ चाचा, जिनका कोई अपराध नहीं, 7 साल से तिहाड़ जेल में बंद हैं। पत्नी का एक्सीडेंट करवा दिया गया। परिवार तबाह हो गया।

5. न्याय की लड़ाई और बेटी का संघर्ष

पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया—”4 जून 2017 को सेंगर के घर नौकरी मांगने गई थी, वहां उसने रेप किया। विरोध किया तो गायब करवा दिया। पुलिस ने खोजा, 10 दिन तक रखा, फिर परिवार को सौंपा। शिकायत दर्ज कराने गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।”

पिता की हत्या के बाद केस सीबीआई को ट्रांसफर हुआ। सेंगर, उसके भाई और पुलिस वालों की गिरफ्तारी हुई। लेकिन असली न्याय अब भी दूर था।
गवाही के लिए जाते वक्त चाची और मौसी की हत्या कर दी गई। पीड़िता और वकील किसी तरह बच गए।

6. राजनीति, जाति और सत्ता का खेल

सेंगर क्षत्रिय था, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जाति का। करणी सेना और दूसरे संगठन चुप रहे। पीड़िता का परिवार भाजपा को वोट देता था, फिर भी न्याय नहीं मिला।
जजमेंट सुनकर लड़की ने कहा—”मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं सुसाइड कर लूं।” उसके छोटे बच्चे हैं, इसलिए जिंदा रहना मजबूरी है।

कोर्ट ने कहा—”सेंगर पीड़िता के घर के 5 किमी के दायरे में नहीं आएगा।” लेकिन असली खतरा उसके लोगों से है, जो उन्नाव में खुले घूम रहे हैं। गवाहों की सुरक्षा हटा दी गई।
देश की बेटियां कैसे सुरक्षित रहेंगी, जब बलात्कारियों को रसूख और सत्ता बचा लेती है?

7. मीडिया, समाज और सवाल

सेंगर जैसे नेताओं को “लोकप्रिय” और “यशस्वी” कहा जाता है। मीडिया में बहस होती है—”अगर बलात्कारी और हत्यारा लोकप्रिय है, तो पतित और कलंक किसे कहते हैं?”
क्या मोदी-योगी जवाब देंगे?

8. इंसाफ की उम्मीद

कोर्ट ने शर्तें लगाईं, लेकिन पीड़िता को भरोसा नहीं। उसके परिवार को लगातार धमकी मिलती है। गवाहों की हत्या, एक्सीडेंट, पुलिस की मिलीभगत—सब कुछ सामने है।
देश में बेटियों की सुरक्षा पर सवाल है। जब सत्ता, जाति और रसूखदार लोग बलात्कारियों को बचाते हैं, तो न्याय दूर हो जाता है।

9. अंतिम विचार

यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं, पूरे सिस्टम की है। राजनीति, जाति, धर्म, सत्ता—सब मिलकर न्याय को दबा देते हैं।
पीड़िता ने मौत और जिंदगी से लड़कर अपना केस लड़ा, संघर्ष किया। लेकिन क्या यही न्याय है?
क्या बेटियों की सुरक्षा सिर्फ भाषणों और वादों तक सीमित है?

सवाल यही है—क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब न्याय सच में सबके लिए बराबर होगा?

जय हिंद।