कोलकाता की लड़की ने इज़्ज़त बचाने के लिए कुर्बान की अपनी जान

.

.

प्रस्तावना

आज की कहानी एक अजीब कहानी है। यह कहानी कोलकाता की है और मैं उस कहानी के ऊपर जाऊं, उससे पहले उस कहानी से जुड़ी हुई चीजों के साथ शुरू करता हूं। बात फरवरी 2003 की है। फरवरी 2003 में एक दिन अचानक वेस्ट मिदनापुर जो डिस्ट्रिक्ट है कोलकाता के पास, वहां एक जंबोनी इलाका है। जंबोनी इलाके से एक लोकल क्रिमिनल था, जिसके पीछे पुलिस पड़ी हुई थी क्योंकि बहुत सारे ऐसे क्राइम हुए थे जिसके लिए तलाश थी।

शेख राजू की गिरफ्तारी

और उस गैंग का एक शख्स पुलिस के हत्थे चढ़ता है और उसकी भी तलाश थी एक डकैती के सिलसिले में। जब उसे पकड़ा गया तो पता चला कि उसका नाम शेख राजू है और पुलिस को यह जानकारी थी कि एक शेख राजू नाम का लड़का इस गैंग से जुड़ा हुआ है और वो काफी सारे क्राइम कर रहा है लोकल लेवल पर। तो मिदनापुर पुलिस शेख राजू को गिरफ्तार करती है। गिरफ्तार के बाद डकैती के इल्जाम में फिर उसे कोर्ट पर पेश किया जाता है और अदालत उसे न्यायिक हिरासत में मिदनापुर जेल भेज देती है।

जेल में नया जेलर

यह फरवरी 2003 की बात है। इसके बाद मार्च, अप्रैल, मई। तीन महीने गुजर जाते हैं। शेख राजू मिदनापुर जेल में ही बंद है। 3 महीने बाद मई में उस जेल में एक नए जेलर का ट्रांसफर होता है। और यह जेलर जो थे, यह पहले अलीपुर जेल में रह चुके थे। तो जब मई में यह वहां पहुंचते हैं और जेलर का काम है हर कैदियों से मिलना, उसके बारे में जानकारी रखना।

तो मुलाकात के सिलसिले के दौरान अचानक एक दिन उनकी मुलाकात शेख राजू से होती है। उस जेलर की जो अभी-अभी वहां 3 महीने के बाद पोस्टिंग पर मिदनापुर जेल पहुंचे हैं। तो जैसे ही शेख राजू से मुलाकात होती है तो उसका चेहरा देखकर वह चौंक उठते हैं। नाम पूछते हैं। वह बताता है शेख राजू है। लेकिन उन्हें कुछ शक होता है।

पुलिस की जांच

उसके बाद उससे पूछताछ करते हैं। वापस अपने ऑफिस में जाते हैं। फिर जेल के कागजात निकलवाते हैं और इसको किस जुर्म में भेजा गया वो सारी डिटेल क्योंकि होती है। वो उसकी फाइल पढ़ते हैं। फाइल पढ़ते हैं तो उसमें भी शेख राजू नाम लिखा हुआ था। लेकिन उन्हें कुछ डाउट होता है।

उसके बाद वह वापस अलीपुर जेल के अपने साथियों से कुछ बात करते हैं, तस्वीर मंगाते हैं और उसके बाद फिर वह शेख राजू के पास पहुंचते हैं। तब पता चलता है कि इसका नाम शेख राजू है ही नहीं। इसका असल में जो नाम है वो है सजल बरुई। और यह सजल बरुई वह था जो 1993 में, मतलब यह जो 2003 की बात कर रहे हैं, इससे ठीक 10 साल पहले पूरे कोलकाता, बंगाल बल्कि हिंदुस्तान के अलग-अलग शहरों में भी जिसके नाम से लोग वाकिफ थे।

सजल की कहानी

दो वजह थी जो उसने क्राइम किया और जिस उम्र में क्राइम किया उन दोनों वजहों से तो जेलर को पता चलता है कि ये शेख राजू नहीं, असल में ये तो सजल बरुई है और यह वो है जो जेल से भागा हुआ है। लेकिन जिस जुर्म में यह जेल से भागा, गिरफ्तारी किसी और मामले में हुई और इसने अपनी पहचान छुपाई। इसके बाद वह सारे प्रूफ पुख्ता सारी चीजें रखी जाती हैं। तो फिर पता चलता है कि हां यह सजल बरुई है और वह खुद भी मान लेता है।

कोलकाता की कहानी

फिर सजल बरुई को यहां मिदनापुर जेल से निकाला जाता है और इसको वापस कोलकाता के जेल में भेज दिया जाता है। अब यहां से इसकी फिर कहानी शुरू होती है। उसके बाद सारी फिर चीजें कि वो जो भागा था वो पकड़ा गया। अब वो क्या कहानी थी वो यह थी। कोलकाता में एक नॉर्थ परगना 24 यह डिस्ट्रिक्ट है। 24 परगना नॉर्थ यहां पे एक दमदम पुलिस स्टेशन है। दमदम इलाका है और उस इलाके में एक फ्लैट नंबर फोर ए फोर्थ फ्लोर पर और यह अपार्टमेंट था शुभम अपार्टमेंट।

बरुई परिवार की कहानी

एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग थी शुभम अपार्टमेंट। तो उसकी चौथी मंजिल पर फ्लैट नंबर फोर ए पर बरुई फैमिली रहा करती थी। अब बरुई फैमिली में जो उनके मुखिया थे सुबल बरुई, उनकी पत्नी नियोती बरुई, उनका एक बड़ा बेटा काजल बरुई और उनका दूसरा छोटा बेटा सजल बरुई। ये चार लोग रहते थे।

अब यहां कहानी यह थी कि सुबल बरुई ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ दिया था और फिर उन्होंने एक दूसरी शादी कर ली। पहली पत्नी उनकी मिनाती बरुई थी। लेकिन उनके साथ बनी नहीं और मिनाती से उनको जो बेटा पैदा हुआ था उसका नाम था सजल बरुई। मिनाती को छोड़ने के बाद उन्होंने नियोती से शादी कर ली और नियोती से एक और बेटा पैदा हुआ जिसका नाम था काजल बरुई।

सजल का संघर्ष

तो पप्पू नाम के गुदने के बाद सजल को उस वक्त बड़ा धक्का लगा। अफसोस हुआ। फिर थोड़ा वक्त गुजरा उनकी बन भी गई और फिर सजल को वो अपने साथ भी रखने लगे। तो अब सजल जो है अपनी सौतेली मां और सौतेले भाई और बाप के साथ इसी फोर्थ फ्लोर के अपार्टमेंट में रहा करता था दमदम इलाके में।

लेकिन बचपन से उसे लगा कि उसके साथ सौतेला सलूक किया गया है। और जो उसकी मां का हक मारा गया। उसके बाप ने दूसरी शादी की और पहली उसकी जो मां को मिलना चाहिए था वह सारा अधिकार नहीं मिला। यह सारी चीजें उसके अंदर बचपन से स्कूल में वह पढ़ता था और कहीं ना कहीं उसके दिल में उसको लगता था कि उसको उसकी मां उसको टॉर्चर भी करती है सौते।

बदला लेने की योजना

ये सारी चीजें घर कर गई और उसे लगा कि इसका कुछ ना कुछ बदला लेना है। पांच दोस्त थे सजल के। उन पांचों दोस्तों को भी सजल के घर की कहानी मालूम थी और वो पांचों दोस्त भी उस वक्त हाई स्कूल में पढ़ते थे। आखिर में यह लोग फैसला करते हैं कि इस जो उसकी मां के साथ हुआ उस अपमान का बदला जो अधिकार छीना गया उसको कैसे लिया जाए। उम्र जबकि अभी सिर्फ 17 साल भी पूरी नहीं हुए।

सजल का घातक निर्णय

इसके बाद सजल तय करता है कि वह इसका बदला लेगा और पूरी प्लानिंग करता है। 22 नवंबर 1993 की यह बात है। 22 नवंबर 1993 की सजल की उम्र थी 16 साल 11 महीने 7 दिन। 16 साल, 11 महीने और सात दिन का सजल था। पांच दोस्तों के साथ ये लोग जाते हैं। रबर के ग्लव्स खरीदते हैं। ड्रैगर खरीदते हैं। भौजाली खरीदते हैं। वह सारे तेज हथियार।

यह सारी चीजें खरीदने के बाद शाम 7:30 बजे सबसे पहले सजल अपने घर जाता है। घर के अंदर उस वक्त उसकी मां टीवी देख रही थी। अकेली थी नियोती जो सौतेली मां। यह अंदर जाता है। उसके बाद इसके पीछे से बाकी के पांच दोस्त आते हैं जो सबके पास हथियार थे। सबसे पहले ये मां को उसी के रूम में एक चेयर पे और रस्सी वस् भी खरीदा था।

हत्या की योजना

उस रस्सी के साथ पूरा बांध देते हैं। हाथ पैर सब कुछ मारते नहीं हैं तब। थोड़ी देर इंतजार करते हैं। इसके बाद जो सौतेला भाई था काजल वो पहुंचता है घर पे। जैसे ही वो घर पहुंचता है पांचों दोस्त उसके ऊपर भी काबू पाते हैं। उसे दूसरे रूम में ले जाते हैं और दूसरे रूम में ले जाकर उसे भी कुर्सी से उसके हाथ पैर बांध देते हैं। मारते नहीं हैं।

वक्त गुजरता है। अब रात के 12:00 बज चुके थे। जब 12:00 बज जाता है पूरी रात वो अपने मां के साथ सौतेली मां, सौतेले भाई और बाप के लाश के साथ उसी घर के अंदर रहता है। फोर्थ फ्लोर पे करीब 12 घंटा गुजारने के बाद 11 घंटा। अगले दिन दोपहर को 12:00 बजे चीखता है कि मदद करो मदद करो। पड़ोसी आवाज सुन के भाग कर आते हैं।

पुलिस की कार्रवाई

फिर पुलिस को बुलाया जाता है। अंदर आते हैं तो देखते हैं कि हर तरफ लाश है और सजल जो है वह खुद बंधा हुआ है सजल। उससे पूछताछ होती है तो बताता है कि 7:30 बजे की बात है। रात को वो घर में था। अचानक टीवी देख रहा था मां के साथ। सात डाकू आते हैं डकैत जिसमें से दो पंजाब के लग रहे थे। पंजाबी बोल रहे थे। उनके पास बंदूके थी और वह सारा लूटपाट करते हैं और सबको मारते हैं। सबको बांध देते हैं। मुझे भी बांधते हैं मारते हैं और सारा सामान लेके चले जाते हैं।

लेकिन बाकी को जो जख्म थी वो सब मर चुके थे। लेकिन सजल के ऊपर इतने गहरे कोई चोट के निशान नहीं थे। तो पुलिस को थोड़ा सा शक होता है। हालांकि दोस्तों को बांधने के बाद थोड़े बहुत उसको पीट के भी गए थे ताकि वो नेचुरल लगे। लेकिन लगा कि जिस तरीके से बाकी को मारा इसे क्यों छोड़ दिया गया?

सजल की सफाई

तो कहीं ना कहीं वो सस्पिशियस था। लेकिन घर में तीन-तीन कत्ल और बाकी चीजें कुछ पता नहीं तो पुलिस गिरफ्तार भी नहीं कर रही थी। उधर बाकी के दोस्त रात को जाने के बाद अगले दिन सब अपने स्कूल जाते हैं। क्लास अटेंड करते हैं। पुलिस अब इन्वेस्टिगेट करती है। आखिर में सब कुछ जो है आकर उसी घर में रुक जाता है और सजल पे ही शक जाता है।

सच का खुलासा

इसके बाद पुलिस सख्ती से फिर सजल से पूछताछ करती है और पूछताछ में वह टूट जाता है और उसे कोई पछतावा नहीं। वो कहता है कि हां मैंने मारा है और मुझे कोई पछतावा नहीं। मुझे कोई अफसोस नहीं है। तो पुलिस उसकी बिहेवियर को और उसकी सोच को देख के भी दंग रह जाती है। इसके बाद उसके कहने पर उसके दोस्तों को भी पकड़ा जाता है।

दोस्तों की गिरफ्तारी

उनके दोस्तों में से भी किसी को पछतावा नहीं था। उन्होंने कहा हमारे दोस्त थे और इसकी फैमिली में ऐसीऐसी चीजें थी और हमने उसको ठीक किया तो किसी के ऊपर कोई पछतावा नहीं। इसके बाद इन लोगों के ऊपर मुकदमा चलता है। लोअर कोर्ट सजल को सजा मौत देती है।

न्यायालय की कार्रवाई

हालांकि अब यहां पे ये चीज है कि उस वक्त जिस दिन ये कत्ल हुआ उस दिन सजल की उम्र 16 साल, 11 महीने और सात दिन थी। लेकिन उस वक्त उस जमाने में 93 में जो जुबिनाइल एक्ट था उसमें 16 साल की उम्र मानी जाती थी। कि अगर 16 साल से कम उम्र है तो फिर वो जुविनाइल में आएगा। 16 साल से ऊपर है तो फिर वो एडल्ट के तौर पर उसको ट्रीट किया जाएगा।

उम्र कैद का मामला

200 में 18 साल ये 16 साल को बढ़ाकर 18 साल किया गया था सन 200 में। तो जब सजल ने ये जुर्म किया था तब यह 16 साल जो विनायल एक्ट में आता था। और उसके 7 साल के बाद एक्ट में संशोधन करके इसको 18 साल कर दिया गया था।

निर्भया केस का संदर्भ

तो जब सजल ने यह कत्ल किया था उसने तब उसकी 16 साल और 11 महीने और सात दिन की उम्र थी। तो कुछ इसमें अगेंस्ट में थे और कुछ सपोर्ट में उनका कहना था कि अगर 17 साल से कम उम्र में इसने इतनी प्लान करके मर्डर किया था तो फिर रहम की गुंजाइश नहीं है।

सामाजिक प्रतिक्रिया

क्योंकि यह बचपना नहीं दिखाता। एक मैच्योर की तरह उसने एक प्रोफेशनल की तरह कत्ल किया था। लेकिन बहुत सारे और ऐसे केसेस थे जिनको सामने रखकर फिर कहा गया कि नहीं 18 ही सही है। अब इसका दूसरा पहलू यह है कि 93 में सजल ने ये किया 200 में जो निर्भया हुआ यही 18 जो था उसमें सिर्फ 7 महीने कम था जो नाबालिक इसमें शामिल था और उस 7 महीने कम होने का फायदा उसे यह हुआ कि वो सिर्फ 3 साल की सजा काट कर आज हम बाकी चार की फांसी की बात कर रहे हैं और वो 2015 में ही रिलीज हो चुका है।

पुलिस की कार्रवाई

बरी हो चुका है और अब पता नहीं कहां है। लेकिन अगर 16 साल वाला एक्ट ना बदला होता 200 में जो 200 के पहले 16 ईयर था वही रहता तो फिर निर्भया का यह गुनहगार भी बच नहीं सकता था क्योंकि इसकी उम्र 17 साल और 5 महीने थी जब निर्भया के ऊपर यह सारी चीजें हुई थी।

सामाजिक जागरूकता

तो दूसरा पहलू उसका ये भी हैं। [संगीत] इस पूरे मामले में जो बात बाद में बहुत सारी चीजें हुई इसको लेकर उसमें यह था कि क्या एक बच्चे का दिमाग जो बिल्कुल नॉर्मल बिल्कुल वैसे दिखता है और वो ऐसा काम कर सकता है। इस पे बहुत सारे साइकेटिस्ट अलग-अलग तमाम चीजें हुई। इसकी भी बड़ी उस वक्त इलाज किया गया। परखने की कोशिश की गई।

सजल का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

इसके दिमाग में क्या चल रहा था। तो पता चला कि कहीं ना कहीं जो जड़ में चीजें आई थी वो आई थी इसकी मां की वजह से और उसे लगा था कि मेरे बाप ने मेरी मां के साथ गलत किया और उसका हक किसी और को दिया और उसके मुकाबले उसके सौतेले बेटे को भी ज्यादा घर में इज्जत और तवज्जो मिलती है।

सामाजिक बदलाव

तो इन चीजों ने उसे उस उम्र में ही एक तरह से बागी और कातिल बना दिया जिस उम्र में बच्चों को इन जुर्मों के बारे में शायद समझने की भी सलाहियत नहीं होती है। तो यह थी पूरी कहानी सजल बरुई की जिसका नाम शेख राजू भी था, जिसका नाम कमल भी था।

निष्कर्ष

कहते हैं कि जो 200 में यह एक्ट आया था 16 साल से बढ़ाकर 18 साल करने का क्योंकि पहले था कि उसमें कहीं ना कहीं जब यह सारी चीजें एक्ट पे बहस हो रही थी तब सजल बरुई के इस केस को भी रखा गया था और कहा गया था कि जब यह कत्ल किया था उसने तब उसके 16 साल और 11 महीने और सात दिन की उम्र थी।

तो कुछ इसमें अगेंस्ट में थे और कुछ सपोर्ट में उनका कहना था कि अगर 17 साल से कम उम्र में इसने इतनी प्लान करके मर्डर किया था तो फिर रहम की गुंजाइश नहीं थी।

समापन