गरीब बच्चे ने सड़क पर पड़ा हुआ एक लॉटरी टिकट उठाया और कई दिनों तक उससे खेलता रहा।

.

.

मुंबई, सपनों का शहर, जहां लाखों लोग हर रोज़ एक नई उम्मीद लेकर आते हैं। मगर इस शहर की चमक के पीछे अनगिनत जिंदगियों का अंधेरा भी छुपा है। इसी शहर के धारावी इलाके की गणेश नगर चॉल में रहता था शंकर, उसकी पत्नी पार्वती और उनका सात साल का बेटा गोलू। उनका घर बस 10×10 फीट का एक कमरा था, जिसमें उनकी पूरी दुनिया सिमटी थी।

शंकर कभी बिहार के एक छोटे से गांव का मजबूत नौजवान था। पर बाढ़ ने उसकी खेती, घर और सपनों सबको बहा दिया। मजबूरी में वह मुंबई आ गया, सोचा था यहां नया जीवन मिलेगा। लेकिन मुंबई ने उसकी उम्मीदों की जगह उसे संघर्ष और थकावट दी। अब वह पास की फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर था। दिनभर तपती भट्टियों के सामने भारी लोहे के सरिए उठाता, बदले में बस तीन-चार सौ रुपये मिलते। महंगे शहर में यह कमाई ऊंट के मुंह में जीरे जैसी थी। पार्वती लोगों के घरों में चौका-बर्तन कर पति का हाथ बटाती, लेकिन पिछले साल से वह भी बीमार रहने लगी थी। उसके जोड़ों में दर्द रहता, खासकर बारिश में।

इन दोनों की अंधेरी दुनिया में रोशनी की किरण था गोलू। गोलू बाकी बच्चों से अलग था, शांत और अपनी कल्पनाओं में खोया रहता। उसके पास महंगे खिलौने नहीं थे। उसके खिलौने थे सड़क के पत्थर, खाली माचिस की डिब्बियां और बोतलों के ढक्कन। वह इन्हें जादुई चीज़ें बना देता—कभी सिपाही, कभी गाड़ी, कभी नाव। शंकर और पार्वती चाहते थे कि गोलू उनकी तरह मजदूर न बने, पढ़े-लिखे और साहब बने। मगर जानते थे कि यह सपना शायद कभी पूरा न हो।

एक दिन फैक्ट्री बंद थी। पार्वती की तबीयत ज्यादा खराब थी, डॉक्टर ने महंगी दवाइयां लिखी थीं और घर में राशन भी खत्म हो रहा था। शंकर उदास अपनी चॉल की टूटी सीढ़ी पर बैठा बीड़ी पी रहा था। तभी गोलू दौड़ता हुआ आया, “बाबूजी देखो मुझे क्या मिला!” उसके हाथ में रंगीन कागज का टुकड़ा था—एक लॉटरी टिकट। शायद किसी अमीर की जेब से गिरा या गाड़ी से उड़कर आया था। गोलू को नंबरों से मतलब नहीं था, उसे बस उस टिकट का गुलाबी रंग और घोड़े की तस्वीर पसंद थी।

शंकर ने एक नजर देखा, “क्या है ये? कचरा है, फेंक दे।”
“नहीं बाबूजी, ये कचरा नहीं है, ये राजा का खत है। देखो घोड़ा बना है, राजा मुझे अपने महल बुला रहा है!”
शंकर बेटे की मासूमियत पर मुस्कुराया, फिर अपनी लाचारी याद कर उदास हो गया। “जा बेटा, खेल।”

अब वह टिकट गोलू का सबसे कीमती खजाना बन गया। वह उसे कभी कमीज की जेब में रखता, कभी स्कूल की किताब में। उससे बातें करता, कहानियां बनाता—कभी टिकट जादुई कालीन, कभी नाव। पार्वती टोकती, “फेंक दे इसे, कोई बीमारी लग जाएगी।” मगर गोलू और कस कर छिपा लेता।

दिन गुजरते रहे। एक शाम शंकर फैक्ट्री से लौट रहा था, तो उसके पुराने गांव के दोस्त मिले। वे भी मजदूरी करते थे। “अरे शंकर, चल आज एक चाय हो जाए!”
चाय की दुकान पर सब अपनी-अपनी गरीबी का दुखड़ा रो रहे थे। तभी उनमें से एक बूढ़े काका ने कहा, “रोने से क्या होगा? किस्मत को आजमाओ।”
“कैसे आजमाएं काका?”
“देखो ये लॉटरी टिकट बस दस रुपये का है। अगर लग गया तो सात पुश्तों की गरीबी मिट जाएगी।”

सब हंसने लगे। “काका आप भी… ये सब अमीरों के चोंचले हैं।”
काका बोले, “कल रात भगवान ने सपने में छह नंबर बताए, कहा किस्मत बदलने वाले हैं।”
“तो आपने ही क्यों नहीं खरीदी करोड़ों की लॉटरी?”
“मैंने खरीदी है, पर भगवान ने कहा ये नंबर किसी और की किस्मत में हैं। तुम सब भी लिख लो, क्या पता किसकी तकदीर चमक जाए।”

काका ने एक कागज पर कोयले से नंबर लिखे: 42, 8, 15, 99, 7, 21
शंकर ने भी देखे, पर उसे यह सब बकवास लगा। “मेरे पास तो बच्चों के लिए दूध लाने के भी पैसे नहीं हैं, काका लॉटरी कहां से खरीदूंगा?”
वो घर लौट गया, नहीं जानता था किस्मत को वहीं छोड़ आया है।

अगले दिन पार्वती की तबीयत और बिगड़ गई। अस्पताल ले जाना पड़ा, डॉक्टर ने महंगी दवाएं लिखीं। शंकर पूरी तरह टूट गया, फैक्ट्री मालिक ने उधार देने से मना कर दिया, दोस्त भी मदद नहीं कर सके।

उस रात शंकर हारा हुआ घर लौटा। गोलू कंकड़ों से खेल रहा था, उन्हें लॉटरी टिकट पर बने नंबरों पर रख रहा था। “बाबूजी देखो, मैं गिनती सीख रहा हूं!”
शंकर ने जवाब नहीं दिया, बस दीवार का सहारा लेकर बैठ गया। गोलू ने नंबर पढ़ने शुरू किए:
“चार और दो—42, आठ, एक और पांच—15, नौ और नौ—99, सात, दो और एक—21”

शंकर को लगा जैसे किसी ने सिर पर हथौड़ा मार दिया। यही तो वो नंबर हैं जो काका ने बताए थे! उसने कांपते हाथों से वो कागज निकाला, नंबर मिलाए—हूबहू वही।
“बाबूजी, मेरा राजा का खत!”
शंकर ने टिकट छीन लिया, गोलू रोने लगा। मगर शंकर सुन नहीं रहा था, उसे लग रहा था जैसे कोई चमत्कार उसकी आंखों के सामने हो रहा है।

“पार्वती, देख ये क्या है!”
पार्वती ने टिकट देखा, “गोलू का वही गंदा कागज?”
“नहीं, ये हमारी किस्मत है!”
शंकर ने पूरी कहानी सुनाई—चाय की दुकान, काका, सपना, छह लकी नंबर। पार्वती भी हैरान थी।
“पर रिजल्ट कैसे पता चलेगा?”
“कल सुबह अखबार में आएगा।”

वो रात परिवार के लिए कयामत थी। ना शंकर सोया, ना पार्वती। गोलू भी अपने खिलौने के छिन जाने के गम में सिसक कर सो गया। शंकर और पार्वती टिकट को बार-बार देखते रहे, डर और उम्मीद में।

सुबह होते ही शंकर भागा, अखबार खरीदा। कांपते हाथों से पन्ने पलटे, नजर गई राज्य लॉटरी के नतीजों पर। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
पहला नंबर—42, मिला।
दूसरा—8, मिला।
तीसरा—15, मिला।
चौथा—99, मिला।
पांचवां—7, मिला।
आखिरी—21, मिला।

छह के छह नंबर मिल गए।
“पार्वती… हम जीत गए!”
शंकर फर्श पर बैठ गया, अखबार को सीने से लगाए फूट-फूट कर रोने लगा। पार्वती भी रो रही थी—ये आंसू दुख के नहीं, सालों की लाचारी और अविश्वसनीय खुशी के थे।

लॉटरी का पहला इनाम था—5 करोड़ रुपये।
उस 10×10 के कमरे में एक सूरज उग आया था, जो उनकी सात पुश्तों की जिंदगी बदलने वाला था।

खबर चॉल में जंगल की आग की तरह फैल गई। पहले किसी को यकीन नहीं हुआ, फिर लॉटरी ऑफिस से पुष्टि हो गई। माहौल त्योहार जैसा हो गया। पड़ोसी मिठाई खिलाने आने लगे। शंकर और पार्वती कुछ दिनों तक जैसे सपने में जीते रहे। जब पैसे बैंक में आए, शंकर ने पहला काम किया—पार्वती का बड़े अस्पताल में इलाज करवाया। गांव के साहूकार का कर्ज चुकाया। गणेश नगर की चॉल को अलविदा कहा, मुंबई के अच्छे इलाके में सुंदर घर खरीदा। गोलू का एडमिशन शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में करवाया।

जिस दिन गोलू नई यूनिफार्म पहनकर स्कूल बस में बैठा, शंकर और पार्वती की आंखों में खुशी के आंसू थे। शंकर ने फैक्ट्री की नौकरी छोड़ दी, कपड़ों का कारोबार शुरू किया। दोस्तों को पार्टनर बनाया, और उस बूढ़े काका को इनाम का बड़ा हिस्सा दिया। काका ने बस उतना ही लिया जितने में बाकी जिंदगी आराम से कट जाए।

शंकर अपनी दौलत को कभी नहीं भूला। जानता था कि यह मेहनत से नहीं, किस्मत और बच्चे की मासूमियत से मिली है। उसने कमाई का बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए दान किया। गणेश नगर की चॉल में एक चैरिटेबल क्लीनिक खुलवाया ताकि किसी और शंकर को पत्नी के इलाज के लिए दर-दर न भटकना पड़े।

एक शाम शंकर अपने नए घर की बालकनी में पत्नी और बेटे के साथ सूर्यास्त देख रहा था। गोलू ने पूछा, “बाबूजी क्या अब मैं राजा बन गया?”
शंकर मुस्कुराया, बेटे को सीने से लगा लिया।
“नहीं बेटा, तू राजा नहीं, तू तो जादूगर है। जिसने अपनी मासूमियत से हम सब की तकदीर बदल दी।”

यह कहानी सिखाती है कि उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। किस्मत कब और किस रूप में दरवाजे पर दस्तक दे दे, कोई नहीं जानता।