गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की मौत: कोरियन कल्चर, गेमिंग लत और पारिवारिक हालात के बीच उलझी जांच
गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित भारत सिटी सोसाइटी में तीन नाबालिग बहनों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। 12, 14 और 16 वर्ष की तीनों बच्चियों ने नौवीं मंज़िल से छलांग लगाकर जान दे दी, या फिर यह किसी गहरी साजिश और मानसिक दबाव का नतीजा था—इस सवाल का जवाब अब भी जांच के दायरे में है। पुलिस, फॉरेंसिक टीम और सामाजिक विशेषज्ञ हर पहलू को खंगाल रहे हैं।
घटना का पूरा विवरण
घटना गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी के बी-टावर स्थित फ्लैट नंबर 907 की है। नौवीं मंज़िल पर स्थित इस फ्लैट की एक खिड़की से तीनों बच्चियां नीचे गिरीं। सोसाइटी के मैदान में तीन अलग-अलग स्थानों पर उनके शव मिले, जिन्हें B1, B2 और B3 के रूप में चिह्नित किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि एक बच्ची का शव इमारत की दीवार से महज़ एक फुट की दूरी पर मिला, जिससे पड़ोसियों और चश्मदीदों के मन में कई सवाल खड़े हो गए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस खिड़की से बच्चियों ने छलांग लगाई, उसे लगभग ढाई महीने पहले ही बदला गया था। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि इससे पहले भी किसी तरह की कोशिश की गई हो सकती है, हालांकि पुलिस ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

कोरियन गेम या कोरियन कल्चर?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा “कोरियन गेम” को लेकर हुई। सोशल मीडिया और कुछ बयानों में दावा किया गया कि बच्चियां किसी खतरनाक कोरियन गेम की 50 टास्क वाली चुनौती में फंसी थीं। हालांकि पुलिस का स्पष्ट कहना है कि अब तक किसी विशेष गेम की पुष्टि नहीं हुई है।
जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार बच्चियों का झुकाव पिछले कई वर्षों से कोरियन कल्चर की ओर था। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, साल 2020 में, सबसे बड़ी बहन इशिका को कोरियन ड्रामा, कोरियन म्यूज़िक और फिल्मों की आदत लग गई। धीरे-धीरे उसकी दो छोटी बहनें प्राची और पाखी भी उसी दुनिया में डूबती चली गईं।
स्कूल से दूरी और एक अलग दुनिया
कोविड के बाद जब स्कूल खुले, तब भी तीनों बच्चियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हैरानी की बात यह है कि 12, 14 और 16 साल की उम्र में वे क्रमशः दूसरी, तीसरी और चौथी कक्षा में ही पढ़ रही थीं। बीते दो सालों से उनका स्कूल से कोई संपर्क नहीं था।
पड़ोसियों और बच्चियों के दोस्तों के मुताबिक, वे खुद को भारत से ज़्यादा कोरिया से जोड़ने लगी थीं। उन्होंने अपने लिए कोरियन नाम तक रख लिए थे—
इशिका: मारिया
प्राची: आज़िया
पाखी: सिंडी
इन नामों की पुष्टि उनके मोबाइल फोन के वॉलपेपर से भी हुई, जिसमें तीनों की तस्वीरों का कोलाज था और ऊपर कोरियन भाषा में नाम लिखे हुए थे।
कोचिंग टीचर और दोस्तों का खुलासा
बच्चियों के एक दोस्त ने ऑफ-कैमरा बातचीत में बताया कि वे कोचिंग सेंटर में भी कोरियन भाषा में पढ़ाने की मांग करती थीं। कोचिंग टीचर ने करीब डेढ़-दो महीने पहले शिकायत भी की थी कि बच्चियां कोरियन शब्दों का अत्यधिक इस्तेमाल कर रही हैं और पढ़ाई में रुचि नहीं ले रही हैं।
दोस्तों के अनुसार, बच्चियां देर रात कुछ प्रतिबंधित लिंक के ज़रिए ऐसे गेम्स या कंटेंट तक पहुंचती थीं, जिन पर भारत में पहले से रोक है। हालांकि यह जानकारी पुलिस जांच का हिस्सा है और अभी आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की गई है।
यूट्यूब चैनल और डिजिटल दुनिया
जांच में यह भी सामने आया कि तीनों बहनों ने मिलकर एक यूट्यूब चैनल बनाया था, जिसका नाम “किलर क्वीन” था। इस चैनल पर वे कोरियन भाषा और कल्चर से जुड़ा कंटेंट पोस्ट करती थीं। बाद में पिता की डांट के बाद यह चैनल डिलीट कर दिया गया, लेकिन तब तक बच्चियां डिजिटल दुनिया में गहराई से जुड़ चुकी थीं।
परिवार की जटिल परिस्थितियां
इस केस में परिवार की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। बच्चियों के पिता चेतन ने दूसरी शादी अपनी पहली पत्नी की बहन से की थी, जिससे तीन बच्चियां हुईं। इसके अलावा घर में दो और छोटे बच्चे और एक मौसी भी रहती थीं। कुल मिलाकर एक ही फ्लैट में आठ लोग रह रहे थे।
पड़ोसियों का दावा है कि परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। करीब दो करोड़ रुपये के कर्ज़ की बात सामने आई है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद बच्चियों के पास स्मार्टफोन और वाई-फाई की सुविधा थी, जिसे लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
मोबाइल छिनने के बाद बदला व्यवहार?
सूत्रों के मुताबिक, घटना से करीब डेढ़ दिन पहले बच्चियों से मोबाइल फोन छीन लिया गया था। इसके बाद उनका व्यवहार काफी आक्रामक और चिड़चिड़ा हो गया। बताया गया कि तीनों बहनें हर काम साथ-साथ करती थीं—साथ सोना, साथ खाना, यहां तक कि वॉशरूम भी साथ जाना और अंदर से लॉक कर लेना।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डिजिटल एडिक्शन और ग्रुप साइकोलॉजी का गंभीर मामला हो सकता है, जिसमें एक बच्ची के विचार बाकी दो पर हावी हो गए हों।
पुलिस जांच कहां तक पहुंची?
पुलिस का कहना है कि:
पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है
मोबाइल फोन की डिजिटल हिस्ट्री खंगाली जा रही है
सुसाइड नोट और डायरी की फॉरेंसिक जांच हो रही है
किसी गेम को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या बच्चियों को समय रहते काउंसलिंग या मनोवैज्ञानिक मदद दी जा सकती थी।
कई सवाल अब भी बाकी
इस दर्दनाक घटना ने समाज के सामने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर पर्याप्त निगरानी थी?
क्या स्कूल न जाने को लेकर समय पर सख्ती या मदद की गई?
क्या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लिया गया?
क्या डिजिटल कंटेंट की लत बच्चों को इस हद तक ले जा सकती है?
निष्कर्ष
गाजियाबाद की यह घटना सिर्फ तीन बच्चियों की मौत का मामला नहीं है, बल्कि यह डिजिटल युग में बच्चों की मानसिक स्थिति, अभिभावकीय जिम्मेदारी और सामाजिक सतर्कता पर एक गंभीर चेतावनी है। कोरियन गेम हो या न हो, इतना साफ है कि बच्चियां एक काल्पनिक दुनिया में इस कदर डूब चुकी थीं कि हकीकत से उनका रिश्ता टूटता चला गया।
अब सबकी निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। सच क्या है, यह आने वाले दिनों में सामने आएगा। लेकिन तब तक यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा—क्या हम अपने बच्चों की दुनिया को सच में समझ पा रहे हैं?
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