गोबर की आग: एक बहू ने कैसे बचाई पूरे परिवार की इज्जत
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वित्र आग: जब गोबर की महक ने बचाई खानदान की पगड़ी
गाँव के रसूखदार रमाकांत जी के घर में आज भारी गहमागहमी थी। आज उनके स्वर्गीय पिताजी का श्राद्ध था। पूरे गाँव के पंचों और सौ से अधिक मेहमानों को न्योता दिया गया था। हलवाई अपनी कढ़ाइयां चढ़ा चुका था, लेकिन तभी रमाकांत का बेटा रवि हाँफता हुआ घर आया।
“बाबूजी, गजब हो गया! पूरे शहर में गैस की किल्लत है। एजेंसी वालों ने हाथ खड़े कर दिए हैं, पीछे से हड़ताल चल रही है। मैंने तीन गाँव छान मारे, पर कहीं एक सिलेंडर नहीं मिला,” रवि ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।
रमाकांत जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। “क्या मतलब? 12 बज चुके हैं, 2 बजे सरपंच और पंच पत्तल बिछाकर बैठ जाएंगे। अगर उन्हें खाना नहीं मिला, तो मेरे बाप-दादा की इज्जत बीच चौराहे पर नीलाम हो जाएगी!” उन्होंने गुस्से में अपनी बहू सुमन को डांटा, “बहू, तुझे आज ही याद आना था कि गैस खत्म है? दो दिन पहले जुबान पर ताला लगा था?”
सुमन ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबूजी, मैंने परसों ही रवि जी को पर्ची दी थी। कल रात भी बताया था कि चूल्हे की आंच पीली पड़ रही है।”
रमाकांत जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। बाहर कल की बारिश से लकड़ियाँ भी भीग चुकी थीं। तभी सुमन ने हिम्मत जुटाकर कहा, “बाबूजी, अगर आप आज्ञा दें तो एक उपाय है। हमारे तबेले में ताजा गोबर है और वो नीला ड्रम भी खाली पड़ा है। मैं एक घंटे में ‘बायोगैस’ (गोबर गैस) का जुगाड़ बना सकती हूँ। कम से कम इतना खाना तो बन ही जाएगा कि पंच भूखे न रहें।”
रमाकांत जी चिल्ला पड़े, “क्या बकवास है! मेरे बाबूजी के श्राद्ध का पवित्र खाना तू गोबर की गंदगी से बनाएगी? यह घर है, कोई कबाड़खाना नहीं! रवि, टेंट उखड़वा दो, कह दो कि रमाकांत भिखारी हो गया है, पर मैं यह अशुद्ध काम नहीं करूँगा।”
रमाकांत जी के मना करने के बावजूद, सुमन चुप नहीं बैठी। उसे पता था कि उसके ससुर का गुस्सा उनकी झूठी शान के पीछे छिपा डर है। उसने चुपके से गौशाला में जाकर काम शुरू किया। उसने नीले ड्रम में गोबर और पानी का घोल मिलाया, एक पाइप जोड़ा और एम-सील से उसे सील किया। ड्रम को जल्दी गर्म करने के लिए उसने नीचे थोड़ी भीगी लकड़ियाँ जला दीं ताकि मीथेन गैस बनने की प्रक्रिया तेज हो सके।
उधर आंगन में रमाकांत जी हताश बैठे थे। तभी 1:45 बजे सुमन बाहर आई, उसके हाथ गोबर से सने थे और चेहरे पर पसीना था। उसने चूल्हा जलाया और अचानक— नीली आंच धधक उठी!
“बाबूजी! आग जल गई! विज्ञान ने काम कर दिया,” सुमन ने खुशी से चिल्लाकर कहा।
रमाकांत जी दौड़कर आए, पर आग देखकर खुश होने के बजाय वे और भड़क गए। “बुझा इसे! अभी बुझा! अगर पंचों को पता चला कि खाना गोबर की गैस पर बना है, तो वे मुझे समाज से बाहर कर देंगे।”
सुमन ने लाठी पकड़ ली और कहा, “नहीं बाबूजी! आज यह आग नहीं बुझेगी। आज सुबह जब मैंने इसी गोबर से आंगन लीपा था, तब वह पवित्र था। आज जब वही गोबर आपकी पगड़ी बचाने के लिए आग बना, तो अशुद्ध कैसे हो गया? आप धर्म के नाम पर अपने अहंकार को पूज रहे हैं!”
तभी बाहर से सरपंच जी की आवाज आई, “रमाकांत भाई, कहाँ हो? भूख लगी है, खाना लाओ!”
मजबूरी में रमाकांत जी को झुकना पड़ा। हलवाई ने कड़ाही चढ़ाई। सुमन उस कच्चे पाइप को अपने हाथों से दबाकर बैठी रही ताकि गैस लीक न हो। गैस का दबाव इतना तेज था कि पाइप उसके हाथों को छील रहा था, लेकिन उसने पाइप नहीं छोड़ा।
सरपंच जी और पंचों ने खाना शुरू किया। सरपंच जी बोले, “वाह रमाकांत! ऐसी शुद्ध और स्वादिष्ट पूड़ियाँ आज तक नहीं खाईं। पर ये रसोई से कैसी महक आ रही है? जैसे कहीं गोबर हो?”
रमाकांत जी के पसीने छूट रहे थे। उन्होंने झूठ बोला कि हवा उल्टी चल रही है, इसलिए तबेले की महक आ रही है। लेकिन सरपंच जी रसोई में चले गए। वहाँ उन्होंने देखा कि दीवार के पीछे सुमन जमीन पर बैठी है, उसके हाथ खून से लथपथ हैं और वह एक पाइप को कसकर पकड़े हुए है जो एक नीले ड्रम से आ रहा है।
रमाकांत जी ने रोते हुए सब सच उगल दिया। “सरपंच जी, मुझे बिरादरी से बाहर कर दीजिए। मैंने गोबर की गैस पर खाना बनवाया है। मेरी बहू पिछले आधे घंटे से अपने छिले हुए हाथों से उस पाइप को पकड़े है ताकि आपकी थाली खाली न रहे।”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सरपंच जी ने आगे बढ़कर सुमन के सिर पर हाथ रखा। “रमाकांत, तुम पागल हो गए हो। सजा किस बात की? इस बेटी ने आज सिर्फ चूल्हा नहीं जलाया, पूरे गाँव की आँखें खोल दी हैं।”
सरपंच जी ने गर्व से कहा, “जो आग एक बेटी ने अपने खून-पसीने और सूझबूझ से जलाई हो, उससे ज्यादा शुद्ध इस दुनिया में कुछ नहीं हो सकता। हम सब यही खाना खाएंगे और गर्व से खाएंगे!”
रमाकांत जी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और सुमन के घायल हाथों के पास रख दी। “बहू, आज से यह पगड़ी मेरे सिर पर नहीं, तेरे इन हाथों की सेवा करेगी। तूने आज सिर्फ इज्जत नहीं बचाई, मुझे इंसानियत का असली पाठ पढ़ाया है।”
उस दिन गाँव के 100 लोगों ने बड़े चाव से बायोगैस पर बना खाना खाया। सुमन की उस ‘देसी तकनीक’ ने साबित कर दिया कि जब पढ़ाई और संस्कार मिलते हैं, तो गोबर भी ‘पवित्र अग्नि’ बन जाता है।
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