घर बुलाकर किया बडा कांड | 10 दिन तक बंद कमरे में क्या हुआ? | Viral

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बंद कमरे का सच

भूमिका

दिल्ली की चमक-दमक, ऊँची इमारतें और पॉश कॉलोनियाँ—यहाँ हर कोई अपने सपनों को पूरा करने आया है। लेकिन इन्हीं सपनों के शहर में कई बार ऐसे डरावने सच छुपे होते हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कहानी है चाहना ठाकुर की, हिमाचल की एक साधारण, पढ़ी-लिखी, संस्कारी लड़की, जिसकी शादी एक इंजीनियर से हुई थी। दोनों का जीवन खुशहाल था, लेकिन एक दिन एक ऐसा शख्स उनकी जिंदगी में आया, जिसने सब कुछ बदल दिया।

अध्याय 1: विश्वास की शुरुआत

साल 2015, चाहना अपने पति राघव के साथ दिल्ली के महरौली इलाके के एक फ्लैट में रहती थी। दोनों युवा, पढ़े-लिखे और अपने-अपने करियर में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। चाहना की दुनिया बहुत छोटी थी—बस उसका घर, पति और कुछ सपने।

एक दिन उनके इलाके में एक राजनीतिक रैली हुई। वहाँ आम आदमी पार्टी के नेता नरेश यादव से चाहना और राघव की मुलाकात हुई। नरेश ने खुद को समाजसेवी, वकील और आम जनता का हितैषी बताया। उसने चाहना को बेटी की तरह मान दिया, राघव को भाई कहा। चाहना को लगा कि दिल्ली जैसे शहर में कोई बड़ा आदमी उन्हें अपने परिवार की तरह देखता है, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। धीरे-धीरे नरेश का आना-जाना, फोन कॉल, वीडियो कॉल बढ़ने लगे। कभी वह मदद के नाम पर, कभी इमोशनल ब्लैकमेल कर के चाहना के परिवार से जुड़ता चला गया।

अध्याय 2: रिश्तों का छलावा

नरेश ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए चाहना और राघव को इस्तेमाल करना शुरू किया। वह कभी चुनावी प्रचार में मदद मांगता, कभी परिवार की समस्या बताकर सहानुभूति चाहता। चाहना और राघव ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस व्यक्ति को वे पिता-भाई जैसा मानते हैं, उसका असली मकसद कुछ और है।

2020 के चुनाव में नरेश जीत गया। उसने चाहना को अपनी जीत की खुशी में बुलाया, परिवार से मिलवाया। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन यह सब एक जाल था। नरेश ने धीरे-धीरे चाहना पर मानसिक दबाव बनाना शुरू किया। वह उसे अकेले मिलने के लिए बुलाता, बार-बार भावनात्मक बातें करता, और उसे भरोसे में लेता गया।

अध्याय 3: बंद कमरे की कैद

2 मार्च 2021 को नरेश ने चाहना को अपने घर एक जरूरी मीटिंग के बहाने बुलाया। चाहना के पति ऑफिस में थे, पिता बीमार थे। नरेश ने बार-बार फोन कर के उसे मजबूर किया कि वह जरूर आए। चाहना ने पिता जैसा रिश्ता समझकर हाँ कर दी।

शाम को वह नरेश के घर पहुँची। घर में सन्नाटा था। नरेश ने नौकर को छुट्टी दे दी, भाई को किसी बहाने से बाहर भेज दिया। अब पूरे फ्लैट में सिर्फ चाहना और नरेश थे। चाहना को वॉशरूम जाना था, नरेश ने रास्ता दिखाया। जैसे ही चाहना बाहर निकली, उसने देखा कि सभी दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं। टीवी की आवाज फुल वॉल्यूम पर थी, एसी फुल स्पीड पर चल रहा था। चाहना को कुछ अजीब लगा, लेकिन वह समझ नहीं पाई।

अचानक नरेश ने चाहना को पीछे से पकड़ लिया। वह घबरा गई, चिल्लाने लगी, लेकिन नरेश ने उसकी आवाज दबाने के लिए उसका मुँह बंद कर दिया। उसने जबरदस्ती चाहना की मर्यादा भंग की, उसकी आत्मा को कुचल दिया। चाहना गिड़गिड़ाती रही, रोती रही, लेकिन नरेश पर कोई असर नहीं हुआ। उस रात चाहना की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

अध्याय 4: 10 दिन की यातना

नरेश ने चाहना को धमकी दी कि अगर उसने किसी को कुछ बताया तो उसकी वीडियो वायरल कर देगा, उसके पति को मार देगा। चाहना डरी-सहमी रही। नरेश ने उसे 10 दिनों तक अलग-अलग जगहों पर कैद कर के रखा—कभी अपने रिसोर्ट में, कभी फ्लैट में, कभी सुनसान जगहों पर। चाहना के पति को जब उसकी गुमशुदगी का अहसास हुआ, तो उसने हर जगह ढूँढना शुरू किया। एक दिन चाहना ने किसी तरह अपने पति को फोन कर के सब सच बता दिया—कैसे नरेश ने उसे कैद कर रखा है, कैसे उसके साथ दरिंदगी कर रहा है।

राघव ने पुलिस में शिकायत की, लेकिन नरेश की राजनीतिक पहुँच के कारण कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टा नरेश ने चाहना पर ही एक्सटॉर्शन का केस कर दिया।

अध्याय 5: हिम्मत की जीत

चाहना ने हार नहीं मानी। उसने सारी बातें डायरी में लिखनी शुरू कर दी। उसने फ्लैट की दीवारों पर हर तारीख, हर घटना मार्कर से लिख दी। हर बार जब वह आत्महत्या करने की सोचती, तो माँ-बाप, पति और अपने आत्मसम्मान की खातिर रुक जाती। एक दिन उसने सुसाइड नोट भी लिख दिया, लेकिन किस्मत से बच गई।

चाहना ने फैसला किया कि वह चुप नहीं बैठेगी। उसने सोशल मीडिया पर अपनी कहानी साझा की, महिला आयोग, प्रधानमंत्री तक अपनी आवाज पहुँचाई। धीरे-धीरे उसकी कहानी वायरल होने लगी। समाज के कुछ जागरूक लोगों ने उसका साथ दिया। मीडिया ने भी खबर छापी, जिससे पुलिस हरकत में आई।

अध्याय 6: सच सामने आया

पुलिस ने दोबारा जांच शुरू की। चाहना ने सबूत दिए—डायरी, दीवारों पर लिखे बयान, मेडिकल रिपोर्ट, अस्पताल के रिकॉर्ड, जहाँ नरेश ने फर्जी नाम से इलाज कराया था। पुलिस ने नरेश को गिरफ्तार किया, केस कोर्ट में गया। चाहना की हिम्मत और साहस ने सबको चौंका दिया।

राघव भी धीरे-धीरे डिप्रेशन से बाहर आने लगा। उसे एहसास हुआ कि उसकी पत्नी ने कितनी बड़ी लड़ाई अकेले लड़ी है। दोनों ने एक-दूसरे का सहारा बनना सीखा।

अध्याय 7: इंसाफ की उम्मीद

आज चाहना कोर्ट के चक्कर काट रही है। समाज में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं, लेकिन चाहना टूटती नहीं। वह कहती है, “मैं हिमाचल की बेटी हूँ, मैं डरूंगी नहीं। मैं आखिरी साँस तक लड़ूँगी।”

उसका संदेश है—किसी के स्टेटस, पावर या रिश्ते के नाम पर आँख बंद कर भरोसा मत करो। जब कोई गैर आपको बेटी या बहन कहे, तो सतर्क हो जाओ। समाज में छुपे भेड़ियों को पहचानो, चुप मत रहो। क्योंकि अन्याय सहना भी उतना ही बड़ा गुनाह है जितना अन्याय करना।

अंतिम विचार

यह कहानी सिर्फ चाहना की नहीं, हर उस महिला की है जो किसी पर विश्वास कर के धोखा खाती है। नरेश जैसे लोग समाज में नकाब पहन कर घूमते हैं, लेकिन ज़रूरत है कि हम ऐसे चेहरों को बेनकाब करें। चाहना का संघर्ष, उसकी हिम्मत, उसकी आवाज़—हर महिला के लिए प्रेरणा है। अगर आपको लगता है कि चाहना को इंसाफ मिलना चाहिए, तो उसकी आवाज़ को दबने मत दीजिए।

याद रखिए, अपराधी जितना दोषी है, उतना ही दोषी वह समाज भी है जो चुप रहता है। इसलिए जागरूक बनिए, सतर्क रहिए, और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाइए।