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अनुराधा केस: रिश्तों की कैद और सच्चाई की चीख
प्रस्तावना
जब सच्चाई खुली तो बड़ा सवाल था कि आखिर अब हमारा समाज कहां जा रहा है। यह कहानी है अनुराधा की—एक ऐसी लड़की, जिसकी जिंदगी उसके अपने घर के लोगों की नफरत और शैतानी योजना के कारण मौत के रास्ते पर जा पहुंची। और उसके बाद जो हुआ वह इतना क्रूर था कि सुनकर मन कांप उठे।
यह केस उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के तरबगंज थाना क्षेत्र का है, जिसे पुलिस ने अपनी कड़ी मेहनत और निष्ठा से कुछ ही दिनों में सुलझा लिया। खासकर पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल के नेतृत्व में टीम ने असंभव को संभव कर दिखाया।

कहानी की शुरुआत
17 नवंबर 2025 की सुबह थी। तरबगंज थाना क्षेत्र में पीड़ी बंधा का इलाका सुनसान रहता है। चारों तरफ झाड़ियां, पेड़ और बीच में लंबा सा रास्ता। सुबह के वक्त यहां से गांव के लोग ही गुजरते हैं जो अपने रोजमर्रा के कामों के लिए खेतों की तरफ जाते हैं। उस दिन कुछ ग्रामीण उसी रास्ते से जा रहे थे कि उनकी नजर आगे मंडराते कौवों पर पड़ी।
धीरे-धीरे वे उस तरफ बढ़े। जैसे ही पास पहुंचे, सबके कदम अचानक रुक गए। सड़क के किनारे एक युवती की ल@श पड़ी थी और पहली नजर में ही साफ दिख रहा था कि किसी वाहन ने उसे बहुत बेरहमी से कुचल दिया है। कुछ लोगों की चीख निकल गई और कुछ वहीं जड़ होकर खड़े रह गए। किसी ने हिम्मत कर 112 नंबर पर फोन मिलाया और पुलिस को सूचना दी।
सूचना मिलते ही तरबगंज पुलिस मौके पर पहुंच गई। शुरुआती मुआयना करते ही पुलिस को भी यही लगा कि यह शायद साधारण सड़क हादसा है। श@व देखकर साफ लग रहा था कि किसी वाहन ने युवती को कुचल दिया है। पुलिस ने बिना देरी किए श@व को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया ताकि मौत की असली वजह सामने आ सके।
पहचान की पहेली
पुलिस की एक टीम आसपास के गांवों में गई। किनारे बसे घरों और नजदीकी बस्तियों में लोगों से पूछताछ की। लड़की की तस्वीर दिखाई गई, लेकिन किसी ने उसे पहचाना नहीं। पुलिस ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। फोटो और जानकारी कई लोकल ग्रुप्स और पेजों पर शेयर की गई। लेकिन कई घंटे गुजर जाने के बाद भी एक भी सुराग नहीं मिला।
ऐसे ही दो दिन बीत गए। पहचान ना होने की वजह से जांच वहीं अटक गई थी। पुलिस इसे एक आम सड़क हादसा मानकर ही आगे बढ़ रही थी। लेकिन तभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई और इस रिपोर्ट ने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट का रहस्य
पोस्टमार्टम रिपोर्ट हाथ में आते ही पुलिस अधिकारियों के होश उड़ गए। जो मामला अब तक एक साधारण एक्सीडेंट समझा जा रहा था, वह असल में सीधी-सादी हत्या थी। रिपोर्ट में साफ लिखा था कि युवती के शरीर पर कई एंटीमर्टम चोटें थीं, यानी उसे मरने से पहले ही बुरी तरह पीटा गया था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसके निजी अंगों पर भी चोटों के निशान मिले थे। अब पुलिस को यकीन हो गया कि यह कोई सड़क हादसा नहीं बल्कि एक निर्दयी और प्लानिंग के साथ की गई हत्या है। मामला गंभीर था, इसलिए गोंडा के पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने तुरंत एक्शन लिया।
जांच का दायरा
उन्होंने जांच के लिए पांच विशेष टीमें गठित की और हर टीम को साफ निर्देश दिया—किसी भी हालत में इस हत्याकांड का जल्द से जल्द खुलासा होना चाहिए। पुलिस ने पूछताछ का दायरा और ज्यादा बढ़ा दिया। एक अलग टेक्निकल टीम बनाई गई जिसे मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल्स और डंप डाटा खंगालने का जिम्मा दिया गया।
आसपास के सभी थानों को अलर्ट कर दिया गया कि अगर किसी क्षेत्र में कोई लड़की लापता है तो तुरंत जानकारी दें। पड़ोसी जिलों को भी सूचना भेजी गई। लेकिन मामला अब भी पूरी तरह ब्लाइंड था। दिन बीतते जा रहे थे। न लड़की की पहचान हो पा रही थी और न ही कोई शुरुआती सुराग मिल रहा था।
मुखबिर की सूचना और जांच
12 दिन गुजर गए। इसी दौरान अचानक एक मुखबिर से बेहद अहम सूचना मिली। पास वाले जिले बस्ती के वाल्टरगंज थाना क्षेत्र में एक गांव है—परसा जागीर। वहां की एक 22 साल की लड़की बीते 12 दिनों से लापता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई गई थी।
पुलिस एक भी सुराग मिस नहीं करना चाहती थी। सूचना मिलते ही तरबगंज पुलिस की एक टीम तुरंत बस्ती जिले के लिए रवाना हो गई और कुछ ही घंटों में गांव पहुंच गई। गांववालों से पूछताछ हुई और टीम सीधे उस घर पर पहुंची जहां वह लापता युवती रहती थी। घर के अंदर उसकी मां निर्मला और भाई मनीष मौजूद थे।
पहले तो दोनों ने पुलिस के सवालों से बचने की कोशिश की। कभी कहते लड़की कहीं गई होगी, कभी कहते हम खुद ढूंढ रहे हैं। लेकिन उनके जवाब शुरू से ही उलझे हुए और एक दूसरे से उलटे थे। पुलिस को शक गहरा गया और फिर दोनों को थाने लाकर सख्ती से पूछताछ शुरू की गई।
सच्चाई का खुलासा
कुछ ही घंटों में दोनों टूट गए और जो कहानी उन्होंने बताई उसे सुनकर पुलिस भी सन्न रह गई। उनके बयान के मुताबिक जो कुछ हुआ था वह इतना निर्मम, इतना हैवानियत भरा, इतना क्रूर था कि उसे सुनकर शैतान भी अपना चेहरा छुपा ले।
दरअसल वह लड़की जिसका श@व गोंडा में मिला था, उसका नाम अनुराधा था। वह बस्ती जिले के परसा जागीर गांव में रहती थी। घर में कुल चार भाई बहन थे। सबसे बड़ा भाई आशीष पुणे में पत्थरों की सप्लाई का काम करता था। छोटा भाई मनीष बस्ती के आवास विकास विभाग में नौकरी करता था। अनुराधा और उसकी बड़ी बहन दोनों अभी पढ़ाई ही कर रहे थे। घर की देखभाल और खेतीबाड़ी की जिम्मेदारी मां निर्मला के कंधों पर थी क्योंकि पिता का कुछ साल पहले ही निधन हो चुका था।
अनुराधा पढ़ाई में ठीक-ठाक थी। वह गांव से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर गणेशपुर डिग्री कॉलेज में स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा थी। हर रोज सुबह वह साइकिल से कॉलेज जाया करती थी। गांव वाले बताते हैं कि अनुराधा बेहद शांत स्वभाव की थी। उसकी कुछ चुनिंदा सहेलियां थीं और उन्हीं के साथ वह खेतों वाले रास्ते से होकर कॉलेज जाती थी।
शक और पारिवारिक तनाव
आजकल गांव में भी बच्चों के पास फोन होना कोई बड़ी बात नहीं है। अनुराधा के पास भी एक मोबाइल था जो उसे इंटर पास करने पर मिला था। वह उसे पढ़ाई के लिए ही इस्तेमाल करती थी और कभी-कभी अपनी सहेलियों से बात भी कर लेती थी।
मां निर्मला को शक होने लगा कि अनुराधा शायद फोन का गलत इस्तेमाल कर रही है। उन्हें लगता था कि बेटी किसी लड़के से बात करती है। इसी बात को लेकर मां-बेटी के बीच आए दिन हल्की-फुल्की कहासुनी होने लगी। निर्मला उसे समझाती, डांटती, लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह बात आगे चलकर इतना बड़ा रूप ले लेगी।
घटना की रात
सुबह से ही फोन को लेकर मां और अनुराधा के बीच झगड़ा हुआ था। शाम को जब मनीष काम से घर लौटा तो मां ने फिर वही बात उसे बता दी कि यह लड़की किसी लड़के से बात कर रही है। वैसे मनीष यह सब नई बात नहीं सुन रहा था। मां और बहन के बीच यह तकरार अब लगभग रोजमर्रा की चीज बन चुकी थी।
लेकिन उस दिन मनीष का गुस्सा काबू में नहीं रहा। उसने बिना कुछ समझे, बिना कुछ सुने अपनी बहन अनुराधा की बेरहमी से पिटाई शुरू कर दी। मारते-मारते जब उसका गुस्सा फिर भी शांत नहीं हुआ तो उसने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। उसने अनुराधा के हाथ और पैर बांध दिए। उसे एक बड़े बोरे में डाला और ऊपर से बोरे को रस्सी से कसकर बांध दिया।
सबसे दर्दनाक बात यह थी कि यह सब उसकी मां निर्मला अपनी आंखों से देख रही थी, लेकिन ना जाने क्यों उस पल उसकी ममता नहीं जागी। वह चुपचाप खड़ी सब देखती रही। मनीष ने बोरे में बंद अनुराधा को अपनी कार की डिग्गी में फेंका और फिर अपने मामा के लड़के मुस्कान को फोन कर दिया। मां को भी कार में बैठाया और घर से निकल पड़ा।
हत्या की योजना और क्रूरता
एक बात साफ समझ लेना—अनुराधा उस समय मरी नहीं थी। वह पूरी ओश में थी, डरी हुई चीख भी नहीं पा रही थी और अंदर बंद होकर हाथ-पैर मार रही थी। मामा के घर पहुंचने के बाद मनीष ने अपनी मां को वहीं छोड़ दिया और अपने मामा के लड़के मुस्कान को साथ लेकर सीधे अकबरपुर टांडा वाली दिशा में निकल पड़ा।
उनकी योजना थी कि अनुराधा को किसी ईंट भट्ठे के अंदर फेंक दें, जहां ना कोई उसे देखेगा और ना ही कभी कोई सुराग मिलेगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। जब वे उस रास्ते पर पहुंचे तो देखा कि आगे पुल का कंस्ट्रक्शन चल रहा था और रास्ता बंद था। मजबूरी में गाड़ी वापस मोड़नी पड़ी।
रास्ता बदलने के बाद वे दुबोलिया विशेषगंज होते हुए नवाबगंज पहुंच गए। यहीं पर एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी में पेट्रोल भरवाया और फिर रात के अंधेरे में सीधा निकल पड़े तरबगंज थाना क्षेत्र के उस सुनसान मार्ग की तरफ, जहां अगली सुबह लोगों को अनुराधा की ल@श मिली थी।
अंतिम क्रूरता
यहां पहुंचकर इन दरिंदों ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं। सड़क बिल्कुल सुनसान थी। इनमें से एक गाड़ी चला रहा था और दूसरे ने पीछे की डिग्गी से बोरी निकाली जिसमें अनुराधा अभी भी जिंदा थी। बिना सोचे-समझे उन्होंने बोरी का मुंह ढीला किया और चलती कार से ही उसे नीचे फेंक दिया। डामर की उस सख्त सड़क पर गिरते ही उसका शरीर छलनी हो गया।
उस समय वो सांसे ले रही थी, दर्द से तड़प रही थी। लेकिन दो हैवान, एक सुनसान सड़क और कोई मदद करने वाला नहीं था। पोस्टमार्टम में साफ लिखा था मौत का कारण हेमोरेजिक शॉक—यानि ज्यादा खून बह जाने से उसकी जान गई थी।
चलती गाड़ी से मासूम को नीचे फेंक देने के बाद भी इन हैवानों का दिल नहीं पसीजा। ड्राइवर ने गाड़ी रोकी और फिर उसे बैक गियर में डाल दिया। धीरे-धीरे गाड़ी पीछे आती गई और कुछ ही सेकंड में उस मासूम की जिंदगी को कुचल कर हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। यह सब कर लेने के बाद यह हैवान बिना पीछे देखे फरार हो गए।
पुलिस की जीत और समाज का सवाल
30 नवंबर 2025 को पुलिस ने अनुराधा की मां निर्मला और भाई मनीष दोनों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। दो दिन बाद पूरे मामले में शामिल तीसरे आरोपी मामा का लड़का मुस्कान भी पुलिस के ह@थे चढ़ गया। तीनों आरोपी अब सलाखों के पीछे हैं और आगे कोर्ट में कार्यवाही चलेगी।
पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने पूरी टीम को ₹25,000 का पुरस्कार भी दिया। इस केस में पुलिस की निष्ठा और ईमानदारी ने एक मिसाल कायम की, लेकिन जो पीड़ा उस मासूम ने सही वह कभी भुलाई नहीं जा सकती।
समाज के लिए आईना
इस घटना का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमारा समाज जा किधर रहा है? मां-बाप और भाई जिनके हाथों में सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, वही बिना कुछ सोचे समझे अपने ही घर की बेटियों को मौत के घाट उतार रहे हैं और उनके हाथ तक नहीं कांपते।
हम ना पूरी तरह आधुनिक हो पा रहे हैं और ना ही पुरानी परंपराओं को सही ढंग से निभा पा रहे हैं। बीच में फंसी हैं हमारी बेटियां जिन्हें कभी इज्जत के नाम पर, कभी शक के नाम पर, तो कभी अहम के नाम पर कुर्बान कर दिया जाता है।
अगर किसी परिवार को बेटियों पर इतना ही शक है, इतनी ही संकुचित सोच है तो फिर उनके लिए यही बेहतर होगा कि वह बेटी की शादी समय से कर दें, ना कि देर करें और फिर छोटी सी गलतफहमी पर उसकी जान ही ले लें।
इस मासूम अनुराधा ने क्या गुनाह किया था? सिर्फ इतना कि उसके पास फोन था, वह किसी से बात करती थी और मां-बेटी के बीच झगड़े होते थे। क्या इतनी सी बात पर किसी की जिंदगी छीन ली जाती है?
समापन
दोस्तों, मेरी राय तो साफ है—जिस समाज में बेटियों की जान इतनी सस्ती हो जाए, वह समाज धीरे-धीरे अंधकार की तरफ ही जा रहा है। आप इस सोच के बारे में क्या कहते हैं? क्या यह सही है कि शक के नाम पर बेटियों की हत्या कर दी जाए? या फिर समाज को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए?
कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं। अनुराधा अब वापस तो नहीं आ सकती, लेकिन अगर यह कहानी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे, लोग इस घटना को समझें, उसके प्रति सहानुभूति जताएं तो शायद उसकी आत्मा को थोड़ी सी शांति मिले।
जय हिंद।
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