ज़ालिम सास ने जुड़वां बेटियों के पैदा होने पर बहू को घर से निकाल दिया।

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उस्ताद करीम और शबनम — संघर्ष से सफलता और प्यार की कहानी

पुराने शहर की तंग गलियों में एक छोटा सा घर था। उस घर में रहते थे उस्ताद करीम और उनकी बेटी शबनम। करीम साहब का काम था जूते गांठना और चप्पल सिलना। उनके हाथों में हमेशा चमड़े की खास खुशबू रहती थी, और दिल में अपनी बेटी के लिए बड़े अरमान।

शबनम जब से होश में आई थी, उसने अपने अब्बू को सुबह से शाम तक काम में डूबा देखा था। वह जानती थी कि उसके अब्बू की हर सिलाई में उसके ख्वाबों का धागा बुना होता था। एक दिन शबनम ने अपने अब्बू से पूछा, “अब्बू, आप इतनी मेहनत क्यों करते हैं?” करीम साहब ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, जब तुम्हारी अम्मी इस दुनिया से गईं, तो उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हें इतना पढ़ाना कि तुम अपने पैरों पर खड़ी हो सको। बस उसी वादे को निभा रहा हूं।”

शबनम की आंखें नम हो गईं। उसने अपने अब्बू के हाथ चूमे और कहा, “अब्बू, मैं आपको कभी शर्मिंदा नहीं होने दूंगी।” सच में, शबनम ने अपने अब्बू को कभी शर्मिंदा नहीं किया। कॉलेज में वह हमेशा अव्वल रहती, घर संभालती और अपने वालिद की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखती।

पड़ोसी अक्सर कहते, “करीम भाई, अल्लाह ने अगर आपको बेटा दिया होता, तो भी शायद उतना नेक ना होता जितनी आपकी शबनम है।” लेकिन किस्मत के खेल अजीब होते हैं।

Zalim Saas Ne Judwa Beti Ki Paidayish Par Bahu Ko Ghar Se Nikala|जालिम सास  की कहानी/सास बहू की कहानी

एक दिन शहर के बड़े ताजिर हाजी सलीम अपनी बीवी रजिया बेगम के साथ करीम साहब की दुकान पर आए। वे अपने बेटे आमिर के लिए खास डिजाइन के जूते बनवाने आए थे। हाजी साहब ने कहा, “उस्ताद, शादी के लिए जो जूते बना रहे हो, वो बिल्कुल परफेक्ट होने चाहिए।” करीम साहब ने आदब से कहा, “जी हां जी साहब, आपका काम हमेशा की तरह बेहतरीन होगा।”

इसी दौरान शबनम कॉलेज से लौटी। सफेद सूट, सिर पर दुपट्टा, किताबों का बैग कंधे पर। उसकी सादगी में एक नूर था जो देखने वाले को दोबारा देखने पर मजबूर कर देता। रजिया बेगम ने पूछा, “उस्ताद, यह कौन है?” करीम साहब ने फक्र से कहा, “मेरी बेटी है, बेगम साहिबा, कॉलेज से आ रही हैं।” रजिया बेगम बोली, “मास्टर्स कर रही है क्या?” शबनम ने सलाम करते हुए कहा, “जी हां, उर्दू अदब में।”

उस दिन के बाद रजिया बेगम कई बार दुकान आईं। कभी छोटे-मोटे काम के बहाने, कभी बातचीत के लिए। शबनम की तमीज, तालीम और अंदाज उन्हें बहुत भाने लगा। एक महीने बाद हाजी सलीम और रजिया बेगम दोबारा आए, मगर इस बार साथ में एक रिश्ता भी था। हाजी साहब ने कहा, “उस्ताद करीम, हम आपकी बेटी के लिए रिश्ता लेकर आए हैं।”

करीम साहब के हाथ से औजार गिर पड़े। बोले, “हाजी साहब, आप हमारे जैसे छोटे लोगों से…” रजिया बेगम ने नरमी से कहा, “धन-दौलत से इंसान की कीमत नहीं होती, उस्ताद। आपकी बेटी में वह खूबियां हैं जो हमारे बेटे आमिर के लिए मुकम्मल हैं।”

जब शबनम को यह पता चला, तो उसकी दुनिया बदल गई। शहर के सबसे अमीर घर में रिश्ता। वह समझ नहीं पा रही थी कि खुश हो या डर जाए। उसने पूछा, “अब्बू, क्या आपको लगता है मैं उस घर में ठीक से रह पाऊंगी?” करीम साहब ने उसकी हथेली थामते हुए कहा, “बेटी, तुम्हारी अम्मी हमेशा कहती थीं कि इंसान की असली दौलत उसका किरदार होता है। तुम्हारे पास वह दौलत है जो किसी रुपए-पैसे से नहीं मिलती।”

रिश्ता तय हो गया। शहर में चर्चा थी कि मोची की बेटी का रिश्ता सेठ के बेटे से हो रहा है। कुछ लोग करीम साहब की किस्मत की तारीफ करते, कुछ तंज कसते कि यह रिश्ता टिकेगा नहीं।

जब आमिर पहली बार शबनम से मिला, तो उसने कहा, “शबनम, मैंने तुम्हारे बारे में अम्मी से बहुत सुना है। मुझे लगता है हमारी जोड़ी अच्छी रहेगी।” शबनम ने नजरें झुका कर कहा, “अल्लाह का जो फैसला है, वही बेहतर है।”

शादी की तैयारियां शुरू हुईं। करीम साहब ने अपनी पूरी जमा पूंजी लगा दी। हर रस्म में यह ध्यान रखा कि कहीं कोई कमी न रह जाए। रजिया बेगम भी मुस्कुराती रही और बार-बार कहती, “बेटी, यह घर अब तुम्हारा है।”

मगर शबनम के दिल में बेचैनी थी। उसे मालूम था कि गरीब घर से अमीर घर में जाना सिर्फ पता बदलने जैसा नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का रुख बदल जाता है।

शादी का दिन आया। शबनम दुल्हन के लिबास में बेहद खूबसूरत लग रही थी। करीम साहब की आंखों में आंसू थे। बोले, “बेटी, तुम्हारी अम्मी होती तो कितनी खुश होती।” शबनम ने गले रुंधे स्वर में कहा, “अब्बू, वो ऊपर से हमें देख रही हैं और खुश हैं।”

विदाई के वक्त करीम साहब ने दुआ दी, “बेटी, हमेशा सच्चाई के साथ रहना। दुनिया चाहे जितनी बदल जाए, अपने संस्कार कभी मत भूलना।” शबनम रोती रही। जानती थी कि एक दौर खत्म हो रहा है और नया शुरू।

जब वह नई दुल्हन बनकर हाजी सलीम के घर पहुंची, तो घर की रौनक देखकर दंग रह गई। मार्बल के फर्श, क्रिस्टल की झाड़फानूस, महंगे कालीन। यह वो दुनिया थी जिसे उसने सिर्फ ख्वाबों में देखा था।

मगर जो बात उसे सबसे ज्यादा आखरी लगी, वह थी रजिया बेगम के चेहरे पर आया बदलाव। शादी से पहले जो गर्मजोशी थी, अब कहीं गुम थी।

पहली रात आमिर ने कहा, “शबनम, मैं चाहता हूं तुम यहां अपने घर जैसा महसूस करो। अगर कभी कोई परेशानी हो, तो मुझसे कहना।” शबनम ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “आमिर, मैं कोशिश करूंगी कि आपके घर वालों को कभी कोई शिकायत न हो।”

वह नहीं जानती थी कि उसकी यह कोशिश उसे कितनी भारी पड़ेगी।

शादी के कुछ दिन बाद ही शबनम को एहसास हुआ कि रजिया बेगम का रवैया बदल गया है। पहले जो प्यार से बेटी कहती थीं, अब सिर्फ शबनम कहकर बुलाती थीं। उनके लहजे में सख्ती थी, जो शबनम के दिल को छुपती रहती।

एक सुबह शबनम रसोई में नाश्ता बना रही थी। रजिया बेगम ने चाय की आलोचना की और कहा, “यह चाय क्या है? बिल्कुल फीकी बनाई है।” शबनम ने विनम्रता से कहा, “अम्मी, मैं दोबारा बनाती हूं, आपको कैसी पसंद है?” रजिया बेगम ने ताने से कहा, “तुम्हारी उम्र में मैं अपनी सास की हर पसंद-नापसंद जानती थी। यहां तो हर बात सिखानी पड़ेगी।” आमिर ने टोका, “अम्मी, शबनम अभी नई है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी।” रजिया बेगम ने जवाब दिया, “तुम बहुत जल्दी उसका पक्ष लेने लगे हो।”

रोजाना यह सिलसिला चलता रहा। रजिया बेगम हर काम में कमी निकालती। शबनम चुपचाप सुनती और काम करती।

एक दिन शबनम की कॉलेज की दोस्तें, सफिया और नाजिया, मिलने आईं। रजिया बेगम को यह पसंद नहीं आया। उसने कहा, “अगली बार मिलने वाले आए तो पहले पूछना।”

शबनम शर्मिंदा हो गई। जब दोस्त चले गए, तो रजिया बेगम ने साफ कहा, “अब तुम इस घर की बहू हो, हर तरह के लोगों को घर में बुलाना ठीक नहीं।”

शबनम ने धीरे से कहा, “अम्मी, वे मेरी बचपन की सहेलियां हैं।” रजिया बेगम ने सख्त लहजे में कहा, “अब तुम्हारा दर्जा बदल गया है, इन बातों को समझो।”

उस रात शबनम ने आमिर से कहा, “क्या मैं अपने दोस्तों से नहीं मिल सकती?” आमिर ने कहा, “ऐसा क्यों? तुम जिससे चाहो मिल सकती हो।” शबनम ने बताया, “अम्मी को अच्छा नहीं लगता।” आमिर ने कहा, “मैं उनसे बात करूंगा।” लेकिन जब आमिर ने अपनी मां से बात की, तो रजिया बेगम ने कहा, “मैं सिर्फ शबनम की इज्जत की बात कर रही हूं। अमीर घरों में यही तमीज होती है।”

महीने बीतते गए। शबनम धीरे-धीरे समझ रही थी कि यहां उसकी जगह क्या है। रजिया बेगम के तानों का सिलसिला बढ़ता गया। एक दिन रजिया बेगम ने कहा, “देखो तो, आज भी दाल में नमक कम है। तुम्हारे पिता के घर खाना बनाना सीखा था या नहीं।”

यह सुनकर शबनम का दिल बैठ गया। उसने दृढ़ता से कहा, “अम्मी, मेरे अब्बू ने मुझे सिर्फ खाना बनाना नहीं बल्कि जिंदगी जीना भी सिखाया है।”

रजिया बेगम को यह नागवार गुजरा। उन्होंने कहा, “अब तो जवाब भी देने लगी है। मैं तुम्हारी भलाई की बात करती हूं और तुम उल्टा जवाब देती हो।” हाजी सलीम ने टोका, “रजिया, बच्चे को संभलने का वक्त दो।” रजिया बेगम ने जवाब दिया, “आप मर्दों को क्या पता घर कैसे चलता है।”

आमिर ऑफिस से आता तो शबनम हमेशा खुश दिखने की कोशिश करती। वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से घर में कोई तनाव हो।

एक शाम आमिर ने गौर किया कि शबनम बहुत चुप है। पूछा, “क्या बात है, शबनम? तुम उदास लग रही हो।” शबनम ने मुस्कुराने की कोशिश की, “कुछ नहीं, बस थोड़ी थकान है।” आमिर ने कहा, “मुझसे सच कहो, क्या अम्मी ने कुछ कहा है?” शबनम ने सिर हिलाया, “नहीं, अम्मी तो मेरी भलाई के लिए ही कहती हैं।”

आमिर ने फिर मां से बात की। कहा, “अम्मी, शबनम बहुत अच्छी लड़की है, आप उसे थोड़ा प्यार दें।” रजिया बेगम ने कहा, “मैं उसे प्यार नहीं करती। लेकिन बेटा, प्यार का मतलब यह नहीं कि गलतियों को नजरअंदाज कर दें। हमारे घर की बहू हीरे जैसी होनी चाहिए थी, और हमें चमड़ा मिल गया।”

शबनम ने यह सब सुन लिया। वह रसोई से पानी लेने आई थी और दरवाजे के पास खड़ी थी। “चमड़ा मिल गया” यह शब्द उसके दिल में तीर की तरह चुभ गए। उस रात शबनम बहुत रोई। उसने अपनी दोनों बेटियों को गोद में लिया और कहा, “मेरी बच्चियों, तुम्हारी अम्मी तुम्हारे लिए दुनिया से लड़ेगी।”

Ek Bewa Aurat Ki Beti Ki Shaadi Wale Din Uska Shauhar Dahej ke liye Kya  Kiya।दर्दनाक इमोशनल स्टोरी - YouTube

कुछ महीने बाद शबनम को पता चला कि वह मां बनने वाली है। यह खुशखबरी उसके लिए नई उम्मीद लेकर आई। उसे लगा शायद अब रजिया बेगम का दिल पिघलेगा। हाजी सलीम तो बहुत खुश हुए, लेकिन रजिया बेगम का रिएक्शन अलग था। उन्होंने कहा, “देखते हैं लड़का होगा या लड़की।”

शबनम की तकलीफें बढ़ती गईं। रजिया बेगम के तानों का सिलसिला जारी रहा। हर दिन कोई नई शिकायत होती। रजिया बेगम ने कहा, “इतनी कमजोर है कि ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती। पता नहीं बच्चा कैसा होगा।”

शबनम ने यह सुना और उसका दिल बैठ गया। उसने धीरे से कहा, “बेटा, तुम्हारी नानी को तुम्हारा इंतजार है।” आमिर अपनी बीवी का बहुत ख्याल रखता था। रोज ऑफिस से फल लेकर आता और पूछता, “तबीयत कैसी है?”

एक दिन शबनम बहुत बीमार महसूस कर रही थी। उसे चक्कर आ रहे थे। उसने कहा, “अम्मी, मैं आज खाना नहीं बना पाऊंगी, तबीयत बहुत खराब है।” रजिया बेगम ने तल्खी से कहा, “यह बहाने बनाने का वक्त है। घर में इतने लोग हैं और बहू कहती है खाना नहीं बना सकती।”

शबनम ने खुद को संभाला और रसोई में जाकर खाना बनाया। लेकिन खाना बनाते वक्त उसे चक्कर आए और वह बेहोश होकर गिर गई। आमिर जब ऑफिस से आया तो शबनम को बिस्तर पर पड़ा देखा। पास ही डॉक्टर बैठे थे।

डॉक्टर ने कहा, “कुछ खास नहीं, बस कमजोरी से बेहोश हो गई थी। आराम की जरूरत है।” आमिर ने अपनी मां से पूछा, “शबनम इतनी कमजोर कैसे हो गई?” रजिया बेगम ने बचकर कहा, “मैंने कहा था आराम करने को, लेकिन इसे लगता है सब काम खुद ही करने हैं।”

शबनम जब होश में आई तो उसने आमिर का हाथ पकड़ा और कहा, “मैं ठीक हूं, आप परेशान मत हो।” आमिर ने प्यार से कहा, “तुम्हें अपना पूरा ख्याल रखना है, बाकी सब काम छोड़ो।”

लेकिन अगली सुबह से फिर वही सिलसिला शुरू हो गया। रजिया बेगम चाहती थी कि शबनम सब काम करे और शबनम अपनी हालत के बावजूद भी सब करने की कोशिश करती रही।

जैसे-जैसे डिलीवरी का समय पास आया, रजिया बेगम की चिंता बढ़ती गई। लेकिन वह शबनम की सेहत की नहीं, बल्कि इस बात की थी कि बच्चा लड़का होगा या लड़की। वह अक्सर कहती, “अल्लाह करे लड़का हो, नहीं तो लोग क्या कहेंगे?”

शबनम के दिल में दर्द उठता। वह सोचती, अगर लड़की हुई तो क्या हाल होगा?

एक रात अचानक शबनम को तेज दर्द हुआ। आमिर जल्दी-जल्दी उसे अस्पताल ले गया। पूरा घर अस्पताल पहुंचा। हाजी सलीम ने चिंता से पूछा, “डॉक्टर साहब, सब ठीक तो है ना?” डॉक्टर ने कहा, “जी हां, लेकिन डिलीवरी में थोड़ा वक्त लगेगा, प्रार्थना करते रहिए।”

कई घंटों की प्रतीक्षा के बाद डॉक्टर बाहर आया। खुशी से कहा, “मुबारक हो, आपको जुड़वा बेटियां हुई हैं।” आमिर की खुशी का ठिकाना नहीं था। हाजी सलीम भी मुस्कुराए। लेकिन रजिया बेगम का चेहरा उतर गया। उसने निराशा से कहा, “दो-दो बेटियां?”

आमिर ने कहा, “अम्मी, बेटियां भी तो अल्लाह की रहमत हैं।” रजिया बेगम ने जवाब दिया, “हां बेटा, लेकिन खानदान का नाम कौन बढ़ाएगा?”

जब आमिर शबनम से मिला, तो वह बहुत कमजोर थी, लेकिन खुश थी। शबनम ने मुस्कुराते हुए कहा, “आमिर, दो छोटी परियां मिली हैं हमें।” आमिर ने प्यार से कहा, “हां शबनम, बिल्कुल तुम्हारी तरह खूबसूरत।”

जब रजिया बेगम शबनम से मिलने आईं, तो उनके चेहरे पर निराशा साफ थी। उन्होंने बेरुखी से पूछा, “कैसी तबीयत है?” शबनम ने कहा, “ठीक हूं अम्मी। बच्चियों को देखिए कितनी प्यारी हैं।”

रजिया बेगम ने बच्चियों को देखा, लेकिन उनके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो एक दादी के चेहरे पर होनी चाहिए। उन्होंने धीरे से कहा, “एक तो गरीब घर की बहू, ऊपर से दो-दो बेटियां। हमारे खानदान का नाम कौन बढ़ाएगा?”

शबनम के दिल पर इन शब्दों का बहुत गहरा असर हुआ। कमजोर हालत में भी उसने धीरे से कहा, “अम्मी, बेटियां भी तो रहमत होती हैं।” रजिया बेगम ने मुंह फेर लिया और बिना कुछ कहे वहां से चली गई।

उस रात शबनम बहुत रोई। उसने अपनी दोनों बेटियों को देखती और सोचा, “इन मासूमों का क्या कसूर है?” वह अपनी बेटियों को सीने से लगाया और कहा, “मेरी बच्चियों, तुम्हारी अम्मी तुम्हारे लिए दुनिया से लड़ेगी।”

घर वापसी के बाद हालात और भी मुश्किल हो गए। रजिया बेगम का रवैया और सख्त हो गया। वह बच्चियों की तरफ कभी प्यार से नहीं देखती थी। अक्सर कहती, “दो-दो बेटियों का बोझ सिर पर आ गया। पता नहीं इनकी शादी कैसे होगी।”

शबनम चुप रहती लेकिन उसके दिल पर हर बात का असर होता। वह दिन-रात अपनी बेटियों की देखभाल करती, घर का काम संभालती और रजिया बेगम के तानों को सहती।

जब आमिर को पता चलता कि अम्मी का रवैया ठीक नहीं है, तो वह परेशान होता। उसने कहा, “अम्मी, यह क्या बात है? यह मेरी बेटियां हैं, आपकी पोतियां हैं।”

रजिया बेगम ने जवाब दिया, “हां बेटा, लेकिन बेटे की खुशी कुछ और होती है।”

शबनम यह सब देख रही थी। वह समझ गई थी कि उसकी बेटियों को यहां वह प्यार नहीं मिलेगा जिसकी वे हकदार हैं। लेकिन वह हार मानने वाली नहीं थी। उसने फैसला किया कि वह अपनी मेहनत और प्यार से अपनी बेटियों को वह सब देगी जो एक मां दे सकती है।

एक दिन करीम साहब अपनी नवासियों से मिलने आए। जब उन्होंने अपनी बेटी की हालत देखी, तो उनका दिल बैठ गया। उन्होंने चिंता से पूछा, “शबनम, बेटी, तू ठीक तो है ना?” शबनम ने मुस्कुराते हुए कहा, “हां अब्बू, मैं बिल्कुल ठीक हूं। देखिए आपकी नवासियां कितनी प्यारी हैं।”

करीम साहब ने दोनों बच्चियों को गोद में लिया और कहा, “मेरी रानी बेटियां, अल्लाह इन्हें लंबी उम्र दे।” जब करीम साहब जाने लगे तो उन्होंने शबनम से कहा, “बेटी, अगर कभी कोई तकलीफ हो तो अब्बू को बताना। मैं हमेशा तेरे साथ हूं।”

शबनम ने सिर हिलाया, लेकिन वह जानती थी कि वह अपने अब्बू को कभी परेशान नहीं करेगी। उस रात उसने अपनी बेटियों को देखा और सोचा, “मेरी बच्चियों, तुम्हारी अम्मी तुम्हारे लिए दुनिया से लड़ेगी।”

शबनम की बेटियां आयशा और फातिमा अब छह महीने की हो गई थीं। दोनों बिल्कुल परी जैसी सुंदर थीं। आयशा में शबनम की आंखें थीं, तो फातिमा में आमिर की मुस्कान।

लेकिन घर का माहौल अभी भी वैसा ही था। रजिया बेगम कहती, “काश कम से कम एक लड़का होता।” कभी-कभार वह बच्चियों को गोद में लेती थी, लेकिन उनके चेहरे पर वह खुशी नहीं होती थी जो एक दादी के चेहरे पर होनी चाहिए।

शबनम रात-दिन अपनी बेटियों की देखभाल में लगी रहती। वह उन्हें दूध पिलाती, उनके साथ खेलती, लोरियां गुनगुनाती। बच्चियां भी अपनी अम्मी को देखकर खुश हो जातीं।

एक दिन शबनम ने कहा, “देखो अम्मी कैसे मुस्कुरा रही हैं।” रजिया बेगम ने रूखे लहजे में कहा, “हां, मुस्कुराना तो आता है, बाकी देखते हैं आगे चलकर क्या करती हैं।”

आमिर को अपनी बेटियों से बहुत प्यार था। वह ऑफिस से आकर उन्हें गोद में लेता, उनके साथ खेलता। हाजी सलीम भी अपनी पोतियों को बहुत प्यार करते थे। वे अक्सर कहते, “शबनम बेटी, यह दोनों हमारे घर की रौनक हैं।”

एक दिन आमिर के कुछ दोस्त घर आए। उन्होंने आमिर की बेटियों को देखकर कहा, “यार आमिर, यह दोनों तो बिल्कुल गुड़ियों की तरह हैं।” आमिर खुशी से बोला, “हां भाई, अल्लाह का शुक्र है।”

रजिया बेगम यह सब सुन रही थीं। उन्हें लगा जैसे लोग उनसे झूठी तारीफ कर रहे हों। उस शाम जब मेहमान चले गए, तो रजिया बेगम ने आमिर से कहा, “बेटा, लोग मुंह पर कुछ और कहते हैं, पीठ पीछे कुछ और।”

आमिर ने पूछा, “अम्मी, आप क्या कह रही हैं?” रजिया बेगम ने कहा, “मैं कह रही हूं कि दो बेटियों के बाप होना कोई गर्व की बात नहीं है। लोग पीठ पीछे हंसते हैं।”

आमिर ने दृढ़ता से कहा, “अम्मी, यह मेरी बेटियां हैं, मुझे इन पर फक्र है।”

लेकिन रजिया बेगम का मन नहीं मानता था। वह हर वक्त कुछ ना कुछ कहती रहती।

इसी बीच एक दिन हादसा हो गया। आमिर सुबह ऑफिस जा रहा था। उसकी आदत थी कि जाने से पहले वह अपनी बेटियों को चूमता। उसने कहा, “शबनम, मैं चलता हूं। बच्चियों का ख्याल रखना।” शबनम ने कहा, “हां, आप जाइए। शाम को जल्दी आइएगा।”

रास्ते में एक तेज रफ्तार ट्रक ने आमिर की गाड़ी को टक्कर मार दी। गाड़ी पलट गई। आमिर को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया। उसके सिर में गहरी चोट आई और खून बह रहा था।

घर में फोन आया, “आमिर का एक्सीडेंट हो गया है, जल्दी अस्पताल आइए।” शबनम का होश उड़ गया। रजिया बेगम रोने लगी। हाजी सलीम जल्दी तैयार होने लगे।

हाजी सलीम ने कहा, “शबनम, चलो जल्दी।” शबनम ने रोते हुए कहा, “अब्बू, बच्चियों का क्या करूं?” रजिया बेगम ने कहा, “तू चल, मैं देख लूंगी।”

अस्पताल पहुंचकर जो नजारा देखा, वह दिल दहला देने वाला था। आमिर का सिर पट्टियों में बंधा था, चेहरे पर खून के धब्बे थे। वह बेहोश था।

डॉक्टर ने बताया, “मरीज की हालत गंभीर है। बहुत खून बह गया है। तुरंत O नेगेटिव ब्लड चाहिए, वरना देर हो जाएगी।”

हाजी सलीम ने कहा, “डॉक्टर साहब, जो भी करना पड़े कीजिए, हमारे बेटे को बचाना है।”

डॉक्टर ने पूछा, “आप लोगों में से किसी का ब्लड ग्रुप O नेगेटिव है?”

सबने अपना ब्लड ग्रुप चेक कराया। हाजी सलीम का बी पॉजिटिव था, रजिया बेगम का एबी पॉजिटिव। कोई मैच नहीं हो रहा था।

हाजी सलीम ने कहा, “डॉक्टर साहब, ब्लड बैंक से मंगवाइए।” डॉक्टर ने कहा, “मैंने चेक कराया है, O नेगेटिव उपलब्ध नहीं है। आप जल्दी किसी को खोजिए।”

शबनम चुपचाप सब सुन रही थी। अचानक वह आगे बढ़ी। कहा, “डॉक्टर साहब, मेरा ब्लड ग्रुप O नेगेटिव है, आप मेरा खून ले लीजिए।”

डॉक्टर खुश हुए, “बहुत अच्छा, लेकिन आप ठीक तो हैं ना? कोई कमजोरी तो नहीं?” शबनम ने कहा, “मैं ठीक हूं, डॉक्टर साहब।”

रजिया बेगम घबरा गईं, “पगली, तेरी दो नन्ही बेटियां हैं, अभी तक तू दूध पिलाती है, खुद को खतरे में क्यों डाल रही है?”

शबनम ने आंसुओं से भरी आंखों से कहा, “अम्मी, अगर आमिर बच गया तो बेटियां अपने बाप के साथ रहेंगी, और अगर नहीं बचा तो मेरी जिंदगी का क्या मतलब?”

हाजी सलीम के आंसू निकल गए। रजिया बेगम भी रो पड़ीं। हाजी सलीम ने कहा, “बेटी, तू बहुत अच्छी है, लेकिन अपना भी ख्याल रखना।”

शबनम को ऑपरेशन थिएटर के पास ले जाया गया। उसे दो बोतल खून दिया गया। वह पहले से ही कमजोर थी। खून देने के बाद हालत और भी नाजुक हो गई।

नर्स ने कहा, “बेटी, अब तुम आराम करो, आमिर का ऑपरेशन चल रहा है।”

शबनम वहीं बेंच पर लेट गई। उसके होंठ सूख गए, चेहरा पीला पड़ गया। लेकिन दिल में सिर्फ एक दुआ थी, “या अल्लाह, आमिर को बचा ले।”

तीन घंटे बाद डॉक्टर बाहर आया। कहा, “ऑपरेशन सफल हो गया है, मरीज अब खतरे से बाहर है।”

सुनकर सबके चेहरे खुशी से चमक उठे। हाजी सलीम ने सजदा किया। रजिया बेगम ने आंसू पोंछे।

हाजी सलीम ने कहा, “शबनम बेटी, तेरी वजह से मेरा बेटा बच गया।”

शबनम मुस्कुराई, लेकिन इतनी कमजोर हो गई थी कि खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

रजिया बेगम ने चिंता से पूछा, “डॉक्टर साहब, इसकी तबीयत ठीक तो है ना?” डॉक्टर ने कहा, “कमजोरी है, लेकिन आराम से ठीक हो जाएगी। बहुत बहादुर है यह।”

उस रात अस्पताल में बीती। आमिर अभी भी बेहोश था, लेकिन सांस सामान्य चल रही थी। शबनम बार-बार आमिर को देखती और माथे पर हाथ रखकर दुआएं करती। धीरे से कहती, “आमिर उठो, बच्चियां तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।”

रजिया बेगम यह सब देख रही थीं। पहली बार उन्हें लग रहा था कि शबनम कितनी अच्छी है।

अगली सुबह आमिर की आंख खुली। वह धीरे-धीरे होश में आ रहा था। आमिर ने कमजोर आवाज में कहा, “शबनम, कहां हो?” शबनम ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा और कहा, “मैं यहां हूं, आमिर।”

आमिर ने पूछा, “तुम ठीक तो हो ना?” शबनम ने कहा, “हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं। आप कैसा महसूस कर रहे हो?”

आमिर ने गौर किया, “बेहतर, लेकिन तुम बहुत कमजोर लग रही हो।”

जब आमिर को पता चला कि शबनम ने अपना खून देकर उसकी जान बचाई, उसकी आंखें नम हो गईं। उसने कहा, “शबनम, तुमने यह क्या किया? तुम्हारी अपनी सेहत का क्या?”

शबनम ने कहा, “आमिर, मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं हूं। तुम्हारे बिना बच्चियां अधूरी हैं।”

रजिया बेगम यह सब देख रही थीं। उनके दिल में पहली बार शबनम के लिए सच्चा प्यार उमड़ रहा था।

अस्पताल से घर वापसी का दिन आया। आमिर अब धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, और शबनम खून देने की वजह से बहुत कमजोर थी, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि थी।

घर पहुंचकर शबनम ने अपनी बेटियों आयशा और फातिमा को गोद में लिया। वे खुश होकर मुस्कुरा रही थीं। रजिया बेगम यह नजारा देख रही थीं। कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे थे।

आमिर का पूरा ध्यान रखना शबनम की दिनचर्या बन गई थी। दवाइयों का समय, खाना और बातें कर मन बहलाना सब कुछ वह करती।

रजिया बेगम भी धीरे-धीरे शबनम की अच्छाई समझने लगीं। एक दिन शबनम बुखार में तड़प रही थी। रजिया बेगम ने पहली बार प्यार से कहा, “शबनम बेटी, तू ठीक है,” और खुद उसकी देखभाल की।

यही मौका था जब उन्होंने शबनम को “बेटी” कहा।

उसके बाद रजिया बेगम ने शबनम से माफी मांगी, “बेटी, मैंने तुझे कभी समझा नहीं। तू हीरे से भी कीमती है।”

शबनम ने कहा, “अम्मी, आपने जो किया, मेरी भलाई के लिए किया।”

आमिर और हाजी सलीम भी वहां थे। आयशा और फातिमा रो रही थीं। रजिया बेगम ने उन्हें गोद में उठाया और कहा, “मेरी रानी बेटियां, अब यह घर इन्हीं से रोशन रहेगा।”

घर का माहौल बदल गया। रजिया बेगम शबनम से बेटी जैसी प्यार करने लगीं। अब शबनम बस आराम करती और बच्चियों की देखभाल करती।

करीम साहब भी खुश हुए। कुछ महीने बाद शबनम फिर मां बनने वाली थी। इस बार नवजात बेटा हुआ। रजिया बेगम खुश थीं। अब उनकी खुशी सिर्फ बेटे के लिए नहीं, बल्कि शबनम की खुशी के लिए थी।

इस तरह शबनम की सच्चाई, प्यार और कुर्बानी ने पूरे घर को बदल दिया। आयशा, फातिमा और हसन अब खुश थे, और घर में सुकून और प्यार का माहौल कायम था।

समाप्त