तलाकशुदा IPS पत्नी 5 साल बाद पति की झोपड़ी पहुंची… सच जानकर पूरा गांव सन्न रह गया…”
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तलाकशुदा आईपीएस पत्नी पाँच साल बाद पति की झोपड़ी पहुँची… और जो सच सामने आया, उसने पूरे गाँव को सन्न कर दिया
सुबह की ठंडी धूप गाँव की कच्ची गलियों पर ऐसे फैल रही थी, जैसे किसी ने आसमान से चुपचाप उजाला उंडेल दिया हो। खेतों से आती हल्की आवाज़ें, बैलों की घंटियों की टनटनाहट और कहीं-कहीं मुर्गे की बाँग—सब कुछ रोज़ जैसा ही था। लेकिन उस दिन गाँव की हवा में कुछ अलग था, कुछ ऐसा जो आने वाले तूफान का संकेत दे रहा था।
अचानक एक सफेद सरकारी जीप गाँव के कच्चे रास्ते पर मुड़ी। नीली बत्ती की हल्की चमक ने बच्चों का ध्यान खींच लिया। वे दौड़ते हुए जीप के चारों ओर जमा हो गए। गाँव में इतनी चमचमाती गाड़ी कम ही आती थी। जीप रुकी। दरवाज़ा खुला और उसमें से उतरी एक महिला—कड़क सफेद वर्दी में, कंधों पर सितारे, चेहरे पर सख़्ती और आँखों में गहरी थकान।
वह थीं आईपीएस अधिकारी अंजलि राठौड़।
पूरा गाँव उन्हें देखता रह गया। यह वही अंजलि थीं, जिनका नाम जिले में ईमानदारी और सख़्ती की मिसाल माना जाता था। लेकिन आज उनकी चाल में आत्मविश्वास कम और बोझ ज़्यादा था। उनकी आँखें किसी को नहीं ढूँढ रही थीं—सिवाय गाँव के कोने में खड़ी एक पुरानी, मिट्टी और तिरपाल से बनी झोपड़ी के।
उसी झोपड़ी में रहता था राघव।
पाँच साल पहले अंजलि और राघव का रिश्ता टूट चुका था। वह एक होनहार, महत्वाकांक्षी आईपीएस अधिकारी थीं और राघव—एक सीधा-सादा गाँव का लड़का, जो अपने पिता की छोटी सी खेती सँभालता था। दोनों की दुनिया अलग थी, सोच अलग थी। प्यार हुआ था, शादी हुई थी, लेकिन समय के साथ मतभेद बढ़ते गए।

अंजलि के लिए करियर सब कुछ था। राघव भावनाओं को ज़्यादा अहमियत देता था। बहसें बढ़ीं, दूरी बढ़ी और अंततः अंजलि ने तलाक का फैसला लिया। राघव ने कोई विरोध नहीं किया। उसने बस इतना कहा था—
“अगर तुम्हें लगता है मैं तुम्हारी राह का बोझ हूँ, तो मैं हट जाता हूँ।”
और वह सचमुच हट गया। शहर छोड़कर वापस गाँव आ गया। झोपड़ी में रहने लगा। अंजलि ने सोचा था कि समय सब कुछ ठीक कर देगा, लेकिन कहीं न कहीं अपराधबोध उनके भीतर जिंदा रहा। फिर भी पाँच साल तक वह कभी राघव से मिलने नहीं आईं।
आज आई थीं।
अंजलि झोपड़ी के पास पहुँचीं। चारपाई, टूटी बाल्टी, रस्सी पर सूखते फटे कपड़े—सब कुछ राघव की हालत बयान कर रहा था। दरवाज़े पर ताला लटका था। पास ही एक बूढ़ी औरत बकरी को चारा डाल रही थी।
“माई… यह झोपड़ी राघव की है?” अंजलि की आवाज़ खुद उन्हें अजनबी लगी।
बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा, वर्दी पहचानी और फिर धीमे से बोली,
“हाँ… लेकिन तू कौन है?”
अंजलि कुछ पल चुप रहीं, फिर कहा,
“मैं… उसकी पत्नी थी।”
बूढ़ी औरत की आँखों में अजीब सी चमक आ गई।
“अरे… तू ही है वो शहर वाली बहू… जो उसे छोड़ गई थी।”
यह शब्द अंजलि के सीने में चुभ गए।
“बहुत देर कर दी बिटिया,” बूढ़ी औरत ने कहा।
“देर? क्यों? राघव कहाँ है?” अंजलि घबरा गईं।
“दो महीने से बीमार है। अकेला पड़ा था। आज सुबह सरकारी अस्पताल गया है।”
अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बिना एक पल गंवाए वह जीप में बैठीं और अस्पताल की ओर निकल पड़ीं।
अस्पताल छोटा था, लेकिन भीड़ भरा। बेड नंबर 12 पर राघव लेटा था—कमज़ोर, सूखा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई। अंजलि के कदम रुक गए। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“राघव…” उनकी आवाज़ काँप रही थी।
राघव ने आँखें खोलीं। उन्हें देखते ही हल्की मुस्कान आई—न कोई शिकायत, न कोई गुस्सा।
“तुम आई…” उसने बस इतना कहा।
अंजलि टूट गईं।
“मैं बहुत देर से आई… मुझे माफ कर दो।”
राघव ने धीमे से कहा,
“तुम आई… यही काफी है।”
कुछ देर की खामोशी के बाद राघव बोला,
“अंजलि, बहुत कुछ है जो तुम नहीं जानती। जब जानोगी… तो पूरा गाँव सन्न रह जाएगा।”
अंजलि ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मुझे सब जानना है।”
राघव ने गहरी साँस ली और सच का पहला पर्दा उठाया।
पाँच साल पहले, अंजलि के प्रमोशन से ठीक पहले, उनके खिलाफ एक झूठी शिकायत दर्ज होने वाली थी। गाँव के कुछ रसूखदार लोग, नेता और दो भ्रष्ट पुलिस अफसर अंजलि को हटाना चाहते थे। उन्होंने राघव से कहा था कि वह अपनी पत्नी के खिलाफ बयान दे।
“अगर वह बयान दर्ज हो जाता,” राघव बोला, “तो तुम्हारा करियर खत्म हो जाता।”
अंजलि सन्न रह गईं।
“लेकिन… मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला।”
“क्योंकि मैंने वह शिकायत दर्ज ही नहीं होने दी,” राघव ने कहा।
उसने बताया कि उसने बयान देने से इनकार कर दिया। बदले में उसे धमकाया गया, पीटा गया और अंततः मजबूर किया गया कि वह अंजलि से अलग हो जाए—ताकि उसे चुप कराया जा सके।
“मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा करियर मेरी वजह से रुके,” राघव बोला।
“इसलिए मैंने खुद को ऐसा बना लिया कि तुम मुझसे नफरत करने लगो।”
अंजलि रो पड़ीं।
“तुमने मेरे लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया…”
राघव ने मुस्कुराकर कहा,
“प्यार कभी-कभी साथ रहने में नहीं… दूर जाने में भी होता है।”
फिर उसने वह सच बताया, जिसने अंजलि की रूह हिला दी।
राघव गाँव में हो रहे अवैध धंधों का गवाह था—ज़मीनों पर कब्ज़ा, तस्करी, हथियारों की सप्लाई। उसी वजह से उसे धीरे-धीरे ज़हर दिया गया, ताकि उसकी मौत एक बीमारी लगे।
“वे नहीं चाहते थे कि मैं जिंदा रहूँ,” राघव बोला।
“क्योंकि मैं सब जानता था।”
अचानक मशीन की आवाज़ तेज़ हो गई।
अंजलि ने उसे झकझोर लिया।
“राघव… मत जाओ… अब मैं हूँ… मैं सब ठीक कर दूँगी।”
राघव ने आखिरी बार उसकी ओर देखा और फुसफुसाया,
“अब सच… तुम्हारी वर्दी संभालेगी…”
मशीन की आवाज़ थम गई।
तीन दिन बाद पूरा गाँव पुलिस से घिरा था। नेता, जमींदार, भ्रष्ट अफसर—सब गिरफ्तार हुए। झोपड़ी के सामने अंजलि खड़ी थीं। आँखों में आँसू और सीने में गर्व।
उन्होंने धीमे से कहा—
“तुम अकेले नहीं थे, राघव। तुम्हारा सच जिंदा है।”
पूरा गाँव सन्न था।
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