तलाक का फैसला सुनते ही पति रो पड़ा, पत्नी हंसने लगी.. फिर जो हुआ उसने सबको रुला दिया।

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संगीता, मयंक और परी का सफर

भाग 1: संगीता की पहचान

संगीता, कानपुर के सिविल लाइन इलाके में रहने वाली एक आत्मनिर्भर और सफल महिला थी। उसकी पहचान एक ब्रांड के रूप में थी। उसने एमबीए की डिग्री हासिल की थी और एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत थी। उसके कदमों में एक अलग ही अंदाज था, जैसे वह जमीन पर नहीं, हवा में चल रही हो। लोग उसे देखकर कहते थे, “संगीता बहुत स्मार्ट है।” लेकिन उसकी मां, शांति देवी, जानती थीं कि स्मार्ट होने और इंसान होने में बहुत फर्क होता है।

शादी के बाद जब संगीता मयंक के घर आई, तो उसने पहले ही दिन साफ कर दिया था, “मैं किसी के नीचे नहीं झुकूंगी।” मयंक सरकारी बैंक में क्लर्क था। वह सीधा-साधा, मेहनती और दिल का बहुत नरम था। उसे लगा था कि शादी के बाद सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन संगीता की सोच कुछ और ही थी।

भाग 2: संघर्ष की शुरुआत

शादी के पहले महीने में ही तानों की बारिश शुरू हो गई थी। संगीता लगातार मयंक से कहती, “तुम्हारी इतनी कम सैलरी में घर कैसे चलेगा? तुम्हारे दोस्त कितने बोरिंग हैं। मेरे साथ कहीं जाने लायक भी नहीं। इस छोटे से घर में मैं कैसे रहूंगी?” मयंक चुप रहता, सोचता शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन समय के साथ दरार और गहरी होती गई।

संगीता अब हर शाम अपने ऑफिस के सहकर्मियों के साथ पार्टियों में जाने लगी। रात को 11-1 बजे घर आना आम बात हो गई थी। मयंक दरवाजे पर बैठा इंतज़ार करता, खाना गर्म रखता और जब वह आती, तो उसके चेहरे पर थकान की जगह उत्साह होता। जैसे घर आना उसके लिए कोई खुशी नहीं, बस मजबूरी हो।

शांति देवी ने एक दिन बेटे से कहा, “बेटा, संगीता को समझाओ। घर में बीवी का होना भी जरूरी है।” मयंक ने मां को चुप कराया। “मां, वो पढ़ी-लिखी है। उसे भी अपनी जिंदगी जीने का हक है।” लेकिन अंदर ही अंदर वह भी टूट रहा था।

भाग 3: खुशखबरी और निराशा

फिर एक दिन खुशखबरी आई। संगीता गर्भवती थी। मयंक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने सोचा, “अब सब बदल जाएगा। अब घर में एक नन्ही सी जान आएगी और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।” लेकिन संगीता के चेहरे पर वह खुशी नहीं थी। बल्कि एक झुझलाहट थी। “अभी मेरे करियर का बेस्ट टाइम था। यह प्रेगनेंसी मेरी प्लानिंग में नहीं थी।”

नौ महीने बाद जब बेटी का जन्म हुआ, तो मयंक ने उसका नाम रखा ‘परी’। उसकी छोटी सी गुड़िया उसकी जिंदगी का मतलब बन गई। लेकिन संगीता के लिए परी एक बोझ बन गई। रात को बच्ची रोती तो वह कहती, “मुझे सोने दो। तुम संभालो।”

धीरे-धीरे परी की हर जिम्मेदारी मयंक और शांति देवी पर आ गई। मां ने फिर से एक बार मां का फर्ज निभाना शुरू कर दिया। अपनी पोती को गोद में लेकर उसे लोरी सुनाकर उसकी हर छोटी-छोटी जरूरत का ख्याल रखकर और मयंक दिन में बैंक और रात में घर संभाल रहा था।

भाग 4: संगीता की नई जिंदगी

संगीता अब पहले से भी ज्यादा व्यस्त हो गई थी। ऑफिस के बाद जिम, जिम के बाद शॉपिंग और फिर दोस्तों के साथ डिनर। घर आती तो सिर्फ सोने के लिए। परी धीरे-धीरे समझने लगी थी कि उसकी मां कौन है, लेकिन उसकी मां उसे समझने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती थी।

एक शाम, मयंक जल्दी घर आया। हाथ में परी के लिए एक नया खिलौना और संगीता के लिए उसकी पसंद की मिठाई। वह चाहता था कि आज शाम थोड़ी अलग हो। पर घर पहुंचा तो मां ने बताया, “संगीता एक हफ्ते के लिए गोवा गई है। ऑफिस की ट्रिप है।” मयंक ने कुछ नहीं कहा, लेकिन इस बार दिल में कुछ चुभा।

हफ्ता बीतने के बाद भी संगीता नहीं लौटी। फोन पर सिर्फ इतना कहती, “ट्रिप बढ़ गई है।” फिर एक दिन मयंक के एक साथी ने उसे मोबाइल पर कुछ दिखाया। फेसबुक पर संगीता की फोटो गोवा की नहीं, बल्कि दिल्ली के किसी महंगे रेस्टोरेंट की थी और उसके साथ था एक आदमी, अर्जुन। कैप्शन में लिखा था, “आखिरकार मिल गई वो जिंदगी जो मैं जीना चाहती थी।”

भाग 5: टूटते रिश्ते

मयंक के हाथ से फोन गिर गया। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। परी उसकी गोद में खेल रही थी, बेखबर। मासूम मयंक ने उसे सीने से लगाया और रो पड़ा। शांति देवी ने बेटे को रोते देखा तो उनकी आंखें भी भर आई। लेकिन इस दर्द की कोई दवा नहीं थी।

जब संगीता लौटी तो मयंक ने उससे कुछ नहीं पूछा। बस इतना कहा, “परी के लिए एक बार सोच लो।” संगीता हंस पड़ी। एक ठंडी बेरहम हंसी। “परी मेरी गलती थी। और तुम तो बस एक एक्सीडेंट थे मेरी जिंदगी में। अब मैं अर्जुन के साथ रहना चाहती हूं। मुझे तलाक चाहिए।”

मयंक का गला सूख गया। दिल टूटने की आवाज भी कोई सुन सकता है क्या? शायद नहीं। मयंक ने संगीता से लड़ाई नहीं की। उसने कोर्ट में बहस नहीं की। क्योंकि वह जानता था जहां प्यार खत्म हो जाए, वहां लड़ना बेईमानी है। तलाक हो गया। लेकिन जब फैसला आया कि परी की कस्टडी संगीता को मिलेगी, तो मयंक की दुनिया उजड़ गई।

भाग 6: कोर्ट का फैसला

कोर्ट ने कहा था, “बच्ची को मां की जरूरत होती है।” मयंक को सिर्फ महीने में एक बार मिलने की इजाजत मिली। उस दिन जब परी को लेकर संगीता जा रही थी, तो परी ने मयंक की शर्ट पकड़ रखी थी। “पापा, मैं आपके साथ रहूंगी।” मयंक ने उसे गले लगाया और आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, जल्द ही मिलेंगे पक्का।”

लेकिन परी की समझ में कुछ नहीं आया। वो रोती रही और मयंक खड़ा देखता रहा। संगीता ने अर्जुन के साथ नई जिंदगी शुरू कर दी। एक महंगे फ्लैट में जहां सब कुछ था, लेकिन परी के लिए प्यार नहीं था। अर्जुन एक बिजनेसमैन था, पैसे वाला लेकिन दिल का खाली। उसे बच्चों से चिढ़ थी।

भाग 7: परी की उदासी

संगीता को भी अब परी एक रुकावट लगने लगी थी। वो सुबह ऑफिस निकल जाती और रात देर से लौटती। परी को एक नौकरानी के भरोसे छोड़ देती। परी अब बदलने लगी थी। वो हंसना भूल गई। स्कूल से आकर चुपचाप कोने में बैठी रहती।

नौकरानी लक्ष्मी ने कई बार संगीता से कहा, “दीदी, बच्ची बहुत उदास रहती है। आप उससे बात कीजिए।” लेकिन संगीता को फुर्सत कहां थी? उसकी नई जिंदगी में परी के लिए वक्त नहीं था। अर्जुन अक्सर शराब पीकर आता और फिर शुरू होता चिल्लाना। “इस बच्ची को कहीं भेज दो। मुझे इसका रोना-धोना बर्दाश्त नहीं होता।” संगीता चुप रहती।

कभी-कभी वह भी परी पर चिल्ला देती। “चुप रहो! हमेशा रोती क्यों रहती हो?” परी सहमी रहती। उसे अपने पापा की याद आती। दादी की कहानियां याद आती। वो रात में रोकर सो जाती।

भाग 8: खतरा

एक दिन अर्जुन के घर पर उसका दोस्त समीर आया। देखने में भला लगता था, लेकिन अंदर से सड़ा हुआ था। संगीता और अर्जुन बाहर डिनर पर गए थे। परी घर में अकेली थी, लक्ष्मी के साथ। समीर वहीं रुका था। लक्ष्मी किचन में काम कर रही थी।

समीर धीरे से परी के कमरे में गया। परी अपनी किताबों में लगी थी। समीर ने प्यार से कहा, “अरे परी बेटा, अंकल के साथ खेलोगी?” परी ने मासूमियत से हां कह दी। समीर ने उसे गोद में बिठाया। लेकिन फिर उसके हाथ गलत जगह जाने लगे। परी को अजीब लगा। उसने हाथ हटाने की कोशिश की।

समीर ने धीरे से कहा, “चुप रहो। किसी को बताया तो तुम्हारी मम्मी को बहुत तकलीफ होगी।” परी डर गई। छ साल की बच्ची को क्या समझ थी? वो बस सहम गई। लक्ष्मी को कुछ शक हुआ। वो दौड़ी आई। समीर ने झट से परी को नीचे उतारा और हंसते हुए कहा, “बस, यूं ही खेल रहे थे।”

लेकिन लक्ष्मी ने परी के चेहरे पर डर देखा। उसकी आंखों में आंसू थे। उस रात लक्ष्मी ने परी को अपने पास सुलाया। धीरे-धीरे पूछा, “बेटा, वो अंकल ने कुछ किया?” परी ने सिर हिलाया। फिर रोते हुए बोली, “दीदी, मुझे डर लग रहा है।”

भाग 9: मयंक का निर्णय

लक्ष्मी का खून खौल गया। लेकिन वह जानती थी कि संगीता उसकी बात नहीं सुनेगी। इसलिए उसने एक फैसला लिया। उसने चुपके से मयंक का नंबर निकाला, जो एक बार परी की डायरी में लिखा देखा था।

अगले दिन उसने मयंक को फोन किया। “सर, मैं लक्ष्मी बोल रही हूं। परी बेबी की नौकरानी। आपको जल्दी आना होगा। परी बेबी खतरे में है।” मयंक का दिल धक से रह गया। “क्या हुआ? मेरी बेटी ठीक तो है?”

लक्ष्मी ने डरते-डरते सब बता दिया। समीर के बारे में, उस रात की घटना के बारे में। मयंक के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। “मैं अभी आ रहा हूं।” मयंक ने फोन काटा और शांति देवी से सब बताया। मां रो पड़ी। “हे भगवान, हमारी परी के साथ यह क्या हो रहा है?”

भाग 10: पुलिस स्टेशन

मयंक सीधा पुलिस स्टेशन पहुंचा। लेकिन वहां उसे निराशा हाथ लगी। इंस्पेक्टर ने कहा, “देखिए, बच्ची की कस्टडी मां के पास है। आपको कोर्ट जाना होगा और सबूत भी चाहिए।” मयंक समझ गया कि अब सिर्फ कानून नहीं, सबूत की लड़ाई लड़नी होगी।

उसने लक्ष्मी से बात की। “दीदी, आप परी का ध्यान रखिए। मैं कुछ करता हूं।” लक्ष्मी ने हिम्मत दिखाई। उसने अपने फोन में रिकॉर्डिंग ऐप डाल लिया। अगली बार जब समीर आया, तो लक्ष्मी तैयार थी।

उसने चुपके से रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। समीर ने फिर वही कोशिश की। लेकिन इस बार लक्ष्मी ने तुरंत दरवाजा खोला और चिल्लाई, “क्या कर रहे हो?” समीर घबरा गया। उसने गालियां दी और चला गया। लेकिन सब कुछ रिकॉर्ड हो चुका था।

भाग 11: कोर्ट में सुनवाई

लक्ष्मी ने तुरंत मयंक को भेज दिया। मयंक के हाथ कांप रहे थे। जब उसने वह रिकॉर्डिंग सुनी, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ा। “मेरी बेटी, मेरी मासूम बेटी।” अब वह चुप नहीं रहेगा। अब वो लड़ेगा अपनी बेटी के लिए।

अगले दिन मयंक सीधा हाई कोर्ट पहुंचा। उसके हाथ में सबूत था। रिकॉर्डिंग, लक्ष्मी का बयान और सबसे बड़ा सबूत परी का डर। उसने इमरजेंसी में कस्टडी बदलने की अर्जी लगाई। वकील ने कहा, “मयंक जी, यह आसान नहीं होगा, लेकिन हम कोशिश करेंगे।”

कोर्ट में सुनवाई हुई। जज ने रिकॉर्डिंग सुनी। संगीता वहां खड़ी थी, लेकिन उसके चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी। बस एक बेचैनी थी। जज ने पूछा, “आप अपनी बेटी को किसके भरोसे छोड़ती हैं?” संगीता ने जवाब दिया, “मैं काम करती हूं। नौकरानी है उसके लिए।”

और आपके साथी अर्जुन और उनके दोस्त समीर के बारे में आप क्या कहेंगी? जज का सवाल तीखा था। संगीता चुप रह गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

भाग 12: जज का फैसला

जज ने फैसला सुनाया। “परी की कस्टडी तत्काल प्रभाव से पिता मयंक को दी जाती है। मां संगीता को केवल कोर्ट की निगरानी में और काउंसलिंग के बाद ही बेटी से मिलने की इजाजत होगी।” मयंक की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन इस बार खुशी के आंसू थे। उसने हाथ जोड़कर जज को धन्यवाद दिया।

उसी शाम मयंक परी को लेने पहुंचा। परी जब अपने पापा को देखा, तो दौड़ती हुई आई। “पापा!” उसने मयंक के गले लग गई और जोर-जोर से रोने लगी। मयंक ने उसे सीने से लगाया। “अब कोई तुझे डराएगा नहीं बेटा। अब तेरा पापा तेरे साथ है हमेशा।”

परी ने कांपती आवाज में पूछा, “पापा, अब मैं वहां नहीं जाऊंगी ना? अब वो अंकल नहीं आएंगे?” मयंक ने उसका माथा चूमा। “नहीं बेटा, अब सिर्फ तेरी दादी की कहानियां आएंगी और पापा का प्यार।”

भाग 13: नया जीवन

घर पहुंचते ही शांति देवी ने परी को गोद में उठा लिया। “मेरी लाडली आ गई। अब कोई परेशानी नहीं।” परी ने दादी के गले में चेहरा छुपा लिया। उसे अपना घर मिल गया था। अपना सुकून मिल गया था।

धीरे-धीरे परी फिर से हंसने लगी। स्कूल में दोस्त बनाने लगी। रात को बिना डरे सो जाती। मयंक हर सुबह उसे स्कूल छोड़ता और शाम को लेने जाता। शांति देवी उसके लिए खाना बनाती। कहानियां सुनाती। परी की जिंदगी में फिर से रोशनी आ गई थी।

भाग 14: संगीता का सामना

लेकिन कुछ महीनों बाद एक दिन घर के दरवाजे पर दस्तक हुई। मयंक ने दरवाजा खोला तो सामने संगीता खड़ी थी। उसकी आंखें लाल थीं। चेहरा सूजा हुआ था। जैसे रातों से रोई हो।

मयंक, “मुझे परी से मिलना है।” उसकी आवाज में गिड़गिड़ाहट थी। मयंक ने सख्त आवाज में कहा, “कोर्ट के आदेश के बिना नहीं। तुमने अपनी बेटी का भरोसा तोड़ा है संगीता। वो अब भी डरती है।”

संगीता घुटनों पर बैठ गई। “मैंने गलती की। बहुत बड़ी गलती की। अर्जुन को छोड़ दिया मैंने। सब कुछ छोड़ दिया। बस अपनी बेटी को वापस चाहती हूं।”

शांति देवी बाहर आईं। “संगीता बेटा, मां बनना आसान नहीं है। यह सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, जिम्मेदारी का रिश्ता है।”

संगीता ने हाथ जोड़े। “मुझे मौका दीजिए। मैं बदल गई हूं। काउंसलिंग ली है। अब मैं समझती हूं कि मां का मतलब क्या होता है।”

भाग 15: परी के लिए संघर्ष

मयंक ने कुछ नहीं कहा। लेकिन कुछ हफ्तों बाद कोर्ट की इजाजत से संगीता को परी से मिलने का मौका मिला। पहली मुलाकात में परी छुपी रही। दूसरी बार भी वह पास नहीं आई। लेकिन संगीता ने हार नहीं मानी।

वह हर बार आती। परी के लिए उसकी पसंद की चीजें लाती। चुपचाप बैठी रहती। कुछ नहीं बोलती, बस परी को देखती रहती। एक दिन परी ने खुद पूछा, “आप रोज क्यों आते हो?” संगीता की आंखें भर आईं। “क्योंकि मैं तुझसे माफी मांगना चाहती हूं बेटा। मैंने तुझे बहुत दुख दिया।”

परी चुप रही। फिर धीरे से बोली, “आप पहले कहां थीं? जब मुझे आपकी जरूरत थी।” संगीता का गला भर आया। “मैं गलत रास्ते पर थी। लेकिन अब मैं सीख गई हूं। प्लीज मुझे एक मौका दो।”

भाग 16: धीरे-धीरे सुधार

महीनों बाद परी थोड़ी नरम पड़ी। एक दिन उसने संगीता के पास बैठकर कहा, “आप वो गाना गाओ ना जो पहले गाती थी।” संगीता ने गुनगुनाया। परी मुस्कुराई। घाव भरने लगे थे। लेकिन निशान अभी भी थे।

मयंक और संगीता के बीच वो रिश्ता कभी नहीं लौटा। लेकिन परी के लिए दोनों ने मिलकर काम किया। संगीता अब एक जिम्मेदार मां बनने की कोशिश में थी। मयंक एक समझदार बाप बना रहा।

परी अब हंसती थी, खेलती थी। लेकिन उसके दिल में एक सवाल हमेशा रहता, “क्या टूटे रिश्ते सच में जुड़ सकते हैं?” शायद कुछ दरारें हमेशा रहती हैं, लेकिन प्यार और समय उन्हें कम जरूर कर देता है।

निष्कर्ष

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि रिश्तों में संघर्ष और कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन अगर हम एक-दूसरे के लिए प्रयास करें, तो हम अपने टूटे रिश्तों को फिर से जोड़ सकते हैं। संगीता ने अपनी गलतियों से सीखा और मयंक ने अपनी बेटी के लिए हर संभव कोशिश की।

प्यार, माफी और समझ से ही रिश्ते मजबूत होते हैं। हमें हमेशा एक-दूसरे का साथ देना चाहिए, चाहे हालात कैसे भी हों। इस कहानी में संगीता, मयंक और परी ने अपने-अपने तरीके से एक-दूसरे के लिए अपनी जिम्मेदारियों को निभाया और एक नया जीवन शुरू किया।