तलाक के बाद मेरी पूर्व सास ने मुझे फोन करके मुझसे मुआवज़ा माँगा।
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विद्या देश पांडे: संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी
“तुम्हारा पति अस्पताल में है, पैसे लेकर आओ।” पूर्व सास की आवाज फोन पर गूँजते ही विद्या के मन में कई भाव उमड़ने लगे। वह तीन सेकंड तक चुप रही, फिर जोर से हँस पड़ी। माफ कीजिए, कौन? तीन महीने पहले कोर्ट में खड़े होकर उसी देवेश आहूजा ने कहा था कि उसे विद्या से कोई रिश्ता नहीं चाहिए। उसी कुसुम आहूजा ने वकील से कहा था कि यह तो हमारा पैसा लूटकर भाग रही है। और आज अचानक, पैसे की जरूरत के चलते, मैं फिर से उनकी बहू बन गई थी।
मेरा नाम विद्या देश पांडे है। उम्र 62 साल। पुणे के कोठरुड़ इलाके में मेरा अपना दो बीएचके फ्लैट है। पिछले 35 साल तक मैं एक प्रतिष्ठित कॉलेज की हेड लाइब्रेरियन रही। किताबों के बीच मेरी जिंदगी बीती। सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक लाखों पन्नों को संभालते हुए हजारों विद्यार्थियों को सही किताब खोज कर देना और शाम को घर आकर अपनी जिंदगी की किताब में हर रोज़ एक नया अध्याय लिखते हुए—दुख का, अपमान का, मौन का।
पर उन्हें नहीं पता था कि मैं कौन हूं।
लाइब्रेरियन होना सिर्फ किताबें रखना नहीं होता। हर चीज को सही जगह रखना, हर पन्ने को संभालना, हर रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना हमारा काम है। और मैंने 32 साल तक अपनी शादी के हर पन्ने को ठीक उसी तरह संभाला था। हर अपमान, हर ताना, हर झूठ—सब कुछ दर्ज किया था मैंने, तारीख के साथ, समय के साथ, गवाहों के साथ।
और आज जब कुसुम ने फोन किया तो मुझे हँसी आ गई। क्योंकि मैं जानती थी कि अब मेरी बारी थी।
शुरुआती दिन: एक नई बहू की कहानी
साल 1980 की बात है। मैं 22 साल की थी, बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी और लाइब्रेरी साइंस में डिप्लोमा कर रही थी। मेरे पिताजी एक छोटे सरकारी ऑफिस में क्लर्क थे, मां घर संभालती थीं। हमारा घर छोटा था, लेकिन किताबों से भरा हुआ। बचपन से पढ़ने का शौक था। जब मेरी सहेलियां फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ती थीं, मैं प्रेमचंद और महादेवी वर्मा पढ़ती थी।

मेरी शादी देवेश आहूजा से एक रिश्तेदार के जरिए तय हुई। वह 25 साल के थे, एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट। उनकी मां कुसुम विधवा थीं। देवेश इकलौते बेटे थे। पहली मुलाकात में देवेश बहुत शांत और भले लगे थे। कुसुम जी मुस्कुराती रहीं, मेरी हाथ की चाय की तारीफ की, कहा कि बहू बहुत सुशील लगती है। मेरे पिताजी खुश थे कि बेटी अच्छे घर जा रही थी।
शादी के पहले महीने सब कुछ सामान्य था। मुझे पुणे के एसएन कॉलेज की लाइब्रेरी में असिस्टेंट लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई, तनख्वाह ₹5000 थी, जो उस वक्त अच्छी रकम थी। मैं खुश थी, सोचा था कि अपनी कमाई से घर चलाने में मदद करूंगी, कुछ बचत भी कर लूंगी।
पर दूसरे महीने की पहली तारीख को कुसुम जी ने मेरे सामने हाथ बढ़ाया। “बहू, तनख्वाह आ गई होगी, दे दो, मैं घर का खर्च संभालूंगी।” मैं चौंक गई। मां जी, लेकिन… उनकी आवाज़ में पहली बार वो सख्ती थी जो अगले 32 साल मेरे कानों में गूंजती रही। “यह घर है, होटल नहीं। यहां सब मिलताजुलता है। तुम्हारी तनख्वाह भी, देवेश की तनख्वाह भी, सब कुछ मेरे पास आएगा। समझी?”
मैंने देवेश की तरफ देखा। वह अखबार पढ़ रहे थे जैसे कुछ सुना ही नहीं। पहली बार मेरी पूरी तनख्वाह कुसुम जी के हाथ में गई। मैंने सोचा शायद यही नियम है। शायद मैं नई बहू हूं इसलिए नहीं समझ रही।
पर अगले महीनों भी यही सिलसिला चलता रहा। तीसरे महीने मैंने हिम्मत करके कहा, “मां जी, मुझे कुछ पैसे चाहिए। मुझे अपने मां-बाबूजी के लिए कुछ लाना है।” कुसुम जी ने ताना मारा, “तुम्हारे मां-बाबूजी भूखे मर रहे हैं क्या? तुम्हें यहां रखा है, खिलाया है, यही कम है। अब हर महीने तुम मायके में पैसे भेजोगी?”
मेरी आंखों में आंसू आ गए। पर मैं चुप रही।
साल भर में मुझे समझ आ गया कि यह घर नहीं, एक तिजोरी थी जहां मेरी कमाई जमा होती थी और मुझे एक पैसा भी नहीं मिलता था। मैं अपनी किताबों के लिए पैसे मांगती तो कुसुम जी कहतीं, “किताबें पति है, ससुराल है, फिर भी किताबें तुम्हें औरत बनना सीखना चाहिए।”
देवेश कभी मेरी तरफ नहीं बोले। मैं लाइब्रेरी में जाती थी, वहां जिंदा महसूस करती थी। किताबों के बीच, विद्यार्थियों के बीच मुझे लगता था कि मेरा वजूद है।
संघर्ष की राह
कुसुम जी अक्सर कहती थीं, “लाइब्रेरी बस किताबें उलटती पलटती हो, घर का काम करो पहले।” पर मैं नौकरी नहीं छोड़ी क्योंकि मुझे पता था अगर वह भी गई तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा।
मेरी बेटी तनवी का जन्म हुआ। मैं 29 साल की थी। मातृत्व अवकाश के बाद जब मैं फिर से काम पर गई तो कुसुम जी ने कहा, “अब तो बच्ची हो गई, फिर भी नौकरी शर्म नहीं आती?” पर मैं गई, क्योंकि मैं चाहती थी कि मेरी बेटी मेरी तरह किसी के आगे हाथ ना फैलाए।
अगले दस साल ऐसे ही बीते। मैं सुबह छह बजे उठती, नाश्ता बनाती, तनवी को तैयार करती, कुसुम जी की चाय बनाती, फिर कॉलेज जाती। शाम को वापस आकर खाना बनाती, घर संभालती, तनवी को पढ़ाती। रात को जब सब सोते, मैं अपनी लाइब्रेरी साइंस की किताबें पढ़ती।
मैं आगे बढ़ना चाहती थी और मैं आगे बढ़ी। दस साल में मैं असिस्टेंट से सीनियर लाइब्रेरियन बन गई। मेरी तनख्वाह बढ़कर ₹15,000 हो गई, पर कुसुम जी के हाथ में वैसी ही जाती रही। मुझे एक भी पैसा नहीं मिलता था।
एक दिन मैंने देवेश से कहा, “मुझे कुछ पैसे चाहिए अपने लिए। मैं कमाती हूं, लेकिन मेरे पास कुछ नहीं है।” उन्होंने मेरी तरफ देखा भी नहीं। बस बोले, “मां जी, जो करती हैं घर के लिए करती हैं। तुम्हें दिक्कत क्या है?”
साल 2000 में तनवी 20 साल की हो गई और इंजीनियरिंग कर रही थी। मैं हेड लाइब्रेरियन बन चुकी थी। मेरी तनख्वाह ₹35,000 थी। सोचा अब तो कुसुम जी को मानना पड़ेगा। फिर से कहा, “मां जी, मुझे अपने नाम पर कुछ बचत करनी है।” कुसुम जी ने ऐसे कहा जैसे मैंने कोई पाप की बात कही हो, “यह पैसा परिवार का है, तुम्हारे नाम पर क्यों?”
देवेश ने पहली बार आवाज उठाई, “तुम बहुत ज्यादा सोचने लगी हो।” उस रात मैं अपने छोटे से कमरे में बैठकर रोई। मैंने बीस साल काम किया था और मेरे पास एक रुपया भी नहीं था। मेरे नाम पर कुछ नहीं था।
बदलाव की शुरुआत
मुझे याद आया कि लाइब्रेरी में एक किताब थी “महिलाएं और आर्थिक आत्मनिर्भरता।” उसमें लिखा था कि हर औरत को अपने नाम पर कुछ होना चाहिए। अपना बैंक अकाउंट, अपनी संपत्ति, अपनी बचत।
उस रात, 7 दिसंबर 2000 को तनवी के 20वें जन्मदिन की रात, मैंने फैसला किया कि अब मैं चुप नहीं रहूंगी। पर मैं लड़ाई नहीं करूंगी, मैं योजना बनाऊंगी।
अगले पांच साल मैंने अपनी आजादी की नींव रखी, पर किसी को पता नहीं चला क्योंकि मैं लाइब्रेरियन थी—चुपचाप, व्यवस्थित, धैर्यवान।
2001 में मेरी तनख्वाह ₹400 हो गई। हर महीने मैं अपनी पूरी तनख्वाह कुसुम जी को देती। वह खुश होती, सोचती कि मैं उनकी आज्ञाकारी बहू हूं। पर उन्हें नहीं पता था कि मेरी तनख्वाह सीधे बैंक अकाउंट में आती थी। उस अकाउंट के बारे में उन्हें पता था, लेकिन मैंने दूसरा अकाउंट खोल लिया था, पुणे की दूसरी शाखा में, जहां कोई नहीं जानता था।
कॉलेज से मिलने वाले बोनस, ओवरटाइम का पैसा, प्रोजेक्ट फीस सब उस दूसरे अकाउंट में जाने लगे। 5000, 10,000, कभी 15,000।
साल 2003 में मैंने अपनी पहली संपत्ति खरीदी—कोठोड में एक छोटा सा प्लॉट ₹5 लाख में। पूरी रकम मेरे गुप्त अकाउंट से निकली। रजिस्ट्री मेरे नाम पर हुई। घर में किसी को पता नहीं चला।
साल 2005 में दूसरी संपत्ति, साल 2008 में तीसरी संपत्ति। 15 साल में मैंने ₹33 लाख बचाए थे। तीन संपत्तियां मेरे नाम पर थीं। घर में किसी को पता नहीं था क्योंकि मैं वैसे ही पुरानी साड़ियां पहनती थी, वैसे ही कुसुम जी के पैर छूती थी, वैसे ही चुपचाप काम करती थी।
मैं जानती थी कि अगर उन्हें शक हुआ तो सब खत्म हो जाएगा।
सच्चाई का सामना
मैं सिर्फ पैसे नहीं बचा रही थी, मैं सबूत भी इकट्ठा कर रही थी। हर बार जब कुसुम जी मुझे अपमानित करती, मैं लिख लेती—तारीख, समय, क्या कहा, किसके सामने कहा।
20 साल के रिकॉर्ड, 20 डायरियां, सैकड़ों पन्ने।
2010 में एक और घटना हुई। मैंने देवेश को एक औरत के साथ देखा। कॉफी शॉप में हंसते हुए हाथ पकड़े हुए। मेरा दिल टूट गया। 32 साल की शादी, और मेरे पति किसी और के साथ। पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं अपने कमरे में बैठकर रोई। फिर सोचा, यह भी लिख लूं।
मैंने एक प्राइवेट डिटेक्टिव को काम पर रखा। उसने 6 महीने तक देवेश को फॉलो किया। फोटो, वीडियो, रिपोर्ट बनाई। वह औरत ऋतु बोस थी, 42 साल की तलाकशुदा, एक ब्यूटी पार्लर चलाती थी। देवेश उससे 2 साल से मिल रहे थे।
सारे सबूत अपनी तिजोरी में रख दिए। साल 2013 में तनवी की शादी हो गई। मेरी बेटी सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गई। मुझे गर्व था। मैंने उसे वह सब दिया जो मुझे नहीं मिला था—शिक्षा, स्वतंत्रता, आत्मविश्वास।
अंतिम लड़ाई और आज़ादी
2015 में कुसुम जी ने कहा, “अब तू बूढ़ी हो रही है, नौकरी छोड़ दे, घर संभाल।” मैंने मना कर दिया। पहली बार साफ मना किया। देवेश ने मारा, थप्पड़। मां जी से बदतमीजी की।
मैंने एडवोकेट परिणीता कुलकर्णी से संपर्क किया। उन्होंने कहा, “आप तलाक ले सकती हैं और आपकी सारी संपत्ति सुरक्षित रहेगी।” पर मैंने कहा, “मुझे रिटायरमेंट तक इंतजार करना है।”
अगले पांच साल और सबूत इकट्ठे किए—रिकॉर्डिंग्स, बैंक स्टेटमेंट्स, मेडिकल रिपोर्ट्स, गवाह।
2020 में तलाक मिला। मेरी सारी संपत्ति मेरे नाम पर रही। मैं आजाद थी।
नई जिंदगी की शुरुआत
मैंने अपना फ्लैट खरीदा, अकेले शांति से रहने लगी। पहली बार मेरा अपना घर, अपना बैंक अकाउंट, अपनी आजादी।
तीन महीने बाद कुसुम जी का फोन आया, पैसे मांगने। मैंने साफ मना कर दिया। मेरी बेटी तनवी को सब कुछ बताया। तनवी रोई, माफी मांगी। मैंने समझाया कि अब मैं किसी के लिए नहीं झुकूंगी।
विद्या का संदेश
आज मैं तलाकशुदा महिलाओं के लिए समर्थन समूह चलाती हूं। उन्हें सिखाती हूं कि कैसे अपने लिए खड़े हों, अपनी आजादी पाएं।
उम्र सिर्फ एक संख्या है। अगर 62 की उम्र में भी आप अपने लिए खड़े हो सकते हैं, तो आप जीत सकते हैं।
रिश्ते सम्मान से चलते हैं, मजबूरी से नहीं। अगर 30 साल तक आपने मुझे इंसान नहीं समझा, तो अब मैं क्यों समझूं कि आप मेरे पति हैं?
विद्या देश पांडे की कहानी यह सिखाती है कि हर महिला में वह ताकत होती है जो उसे पहचानने की जरूरत होती है। अपने लिए खड़ी होइए, अपना हक लीजिए, अपनी आवाज़ बुलंद कीजिए।
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