तलाक के सालों बाद मज़दूर पति पहुँचा IAS बनी पूर्व पत्नी के दरवाज़े
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यह कहानी त्याग, पश्चाताप और सामाजिक दूरियों के बीच दबे एक प्रेम की है। यहाँ नंदिनी और राघव की कहानी को विस्तार से दिया गया है:
अधूरा न्याय और अनकहा त्याग
जिला कलेक्टेट के विशाल वातानुकूलित कक्ष के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर की चिलचिलाती धूप और शोरगुल से यहाँ का माहौल बिल्कुल विपरीत था। नंदिनी शर्मा, जिले की जिलाधिकारी (DM), अपनी मेज के पीछे बैठी फाइलों के अंबार को निपटाने में व्यस्त थीं। उनकी उंगलियों में थमा महंगा पेन हर हस्ताक्षर के साथ किसी न किसी का भाग्य तय कर रहा था। कमरे का तापमान आरामदायक था, लेकिन नंदिनी के माथे पर चिंता की लकीरें खिंची थीं। जनता दरबार खत्म होने को था, फिर भी फरियादियों की लंबी कतार कम होने का नाम नहीं ले रही थी।
तभी दरवाजे पर एक संकोच पूर्ण आहट हुई। जैसे ही दरवाजा खुला, वातानुकूलित कमरे की कृत्रिम ठंडक में अचानक पसीने, चूने और मिट्टी की एक तीखी गंध घुल गई। नंदिनी ने अपनी पेशेवर गरिमा बनाए रखते हुए नजरें उठाईं। सामने खड़े व्यक्ति को देखकर उनके हाथ में थमी कलम हवा में ही थम गई।

वह एक दुबला-पतला, अस्थिपंजर जैसा दिखने वाला पुरुष था। कपड़ों पर सफेदी और सीमेंट के दाग लगे थे। नंगे पैर धूल से सने थे और एड़ियां फटी हुई थीं। उसने सिर इतना नीचे झुका रखा था कि चेहरा स्पष्ट नहीं दिख रहा था। नंदिनी के दिल की धड़कन रुक सी गई। 15 साल! पूरे 15 साल बीत चुके थे, लेकिन वह उन झुकते हुए कंधों को कैसे भूल सकती थी? यह राघव था। वही राघव, जिसके साथ कभी उसने सात फेरे लिए थे और एक छोटी सी झोपड़ी में सुनहरे भविष्य के सपने बुने थे।
आज नंदिनी जिले की सबसे शक्तिशाली अधिकारी थी और राघव एक दिहाड़ी मजदूर। सामाजिक प्रतिष्ठा की यह खाई इतनी गहरी थी कि उसमें उनका पूरा अतीत समा सकता था।
राघव ने धीरे से हाथ जोड़े। उसकी हथेलियों पर काम की लकीरें गहरे घावों की तरह उभरी थीं। नंदिनी के भीतर भावनाओं का ज्वार उठ रहा था। उसे याद आया वह दिन जब राघव ने उसे घर से निकाला था, यह कहकर कि “तुम मेरे लिए सिर्फ एक बोझ हो।” उस अपमान की आग ने ही नंदिनी को आज इस कुर्सी तक पहुँचाया था। लेकिन आज उसे अपनी जीत में कोई स्वाद महसूस नहीं हो रहा था।
“कहिए, क्या समस्या है आपकी?” नंदिनी ने अपनी आवाज को सख्त बनाने की कोशिश की, पर उसमें एक हल्का सा कंपन आ ही गया।
राघव सिहर उठा। उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, “मैडम सर, एक अर्जी लाया हूँ।” उसने ‘नंदिनी’ नहीं कहा, ‘पत्नी’ नहीं कहा, बस ‘मैडम सर’ कहा। इस संबोधन ने नंदिनी के अहंकार और पुराने जख्मों, दोनों पर एक साथ प्रहार किया।
राघव ने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज निकाला। उसके हाथ कांप रहे थे। यह दृश्य नंदिनी को अतीत में ले गया, जब राघव ने अपनी प्रिय ‘हीरो साइकिल’ बेचकर उसके लिए यूपीएससी की किताबें खरीदी थीं। तब भी उसके हाथ ऐसे ही कांप रहे थे, डर से नहीं, बल्कि उत्साह से। उसने कहा था, “नंदिनी, तुम बस पढ़ाई करो। बाकी सब मैं देख लूँगा।” और फिर एक दिन अचानक सब बदल गया था। उसने उसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया था।
नंदिनी ने कागज पढ़ा। वह उसकी गरीबी या बीमारी के लिए नहीं था। वह गाँव के उस प्राथमिक विद्यालय को बचाने के लिए था, जिसे कुछ बिल्डर और गाँव का प्रधान मिलकर तोड़ना चाहते थे। यह वही स्कूल था जहाँ उनकी नन्ही बेटी, जो अब इस दुनिया में नहीं थी, कुछ दिनों के लिए पढ़ने गई थी।
राघव ने सिर झुकाए हुए ही कहा, “साहब, अगर वह स्कूल टूट गया, तो गाँव के बच्चे वैसे ही अनपढ़ रह जाएंगे जैसे… जैसे मैं रह गया।” उसकी आवाज में एक गहरा दर्द था।
नंदिनी ने महसूस किया कि उसकी आईएएस की कुर्सी, लाल बत्ती वाली गाड़ी, सब कुछ इस क्षण निरर्थक है। उसने सीधे राघव की आँखों में देखा। राघव 42 साल का था, लेकिन 60 का लग रहा था। आँखों में बस एक बुझी हुई राख थी।
“इस मामले की जाँच होगी। मैं खुद देखूँगी,” नंदिनी ने कहा। राघव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, “धन्यवाद मैडम सर, भगवान आपका भला करे।” और वह मुड़कर बाहर निकल गया। उसका जाना नंदिनी को ऐसा लगा जैसे उसके शरीर से कोई हिस्सा अलग होकर जा रहा हो।
नंदिनी अपनी कुर्सी पर जड़वत बैठी रह गई। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, उनकी आँखों से आंसू बह निकले। यह आंसू सिर्फ पुराने प्रेम के नहीं थे, बल्कि उस अपराधबोध के थे जो अचानक जाग उठा था। उन्होंने हमेशा सोचा था कि राघव ने उन्हें धोखा दिया है, लेकिन आज उसकी आँखों में जो त्याग देखा था, उसने उनके विश्वास की नींव हिला दी।
नंदिनी ने तुरंत आदेश दिया, “गाड़ी तैयार करो!” उन्हें उस गाँव जाना था। सच जानना था।
सफेद एंबेसडर कार धूल भरी सड़क पर आगे बढ़ रही थी। गाँव पहुँचकर नंदिनी ने देखा कि स्कूल की दीवारें जर्जर थीं। वहाँ राघव एक भारी बोरी पीठ पर लादे टूटी हुई ईंटें जमा कर रहा था। उसके फटे हुए बनियान से उसकी पसलियां झांक रही थीं। तभी स्कूल के पीछे से एक बूढ़ी औरत लाठी टेकती बाहर आई। वह राघव की माँ थी।
नंदिनी के कदम अपने आप उनकी ओर बढ़ गए। “काकी!” नंदिनी के मुँह से अनायास निकला। बूढ़ी औरत ने अपनी धुंधली आँखों से देखा और बड़बड़ाई, “यह आवाज तो मेरी बहुरिया जैसी है… मेरी नंदिनी जैसी।”
राघव का चेहरा पीला पड़ गया। उसने अपनी माँ को अंदर ले जाने की कोशिश की, पर माँ ने उसका हाथ झटक दिया। “तू नंदिनी है ना?” माँ ने पूछा। नंदिनी ने धीरे से सिर हिलाया। बूढ़ी माँ नंदिनी के पैरों में झुक गई, “बेटा तू आ गई! मैंने कहा था राघवा से, एक दिन मेरी बहुरिया जरूर आएगी।”
नंदिनी ने उन्हें थाम लिया। माँ ने राघव की ओर इशारा कर कहा, “देख मेरा राघवा, यह पगला तो कहता था कि तू मर गई।”
यह सुनते ही नंदिनी काँप उठी। राघव ने झूठ बोला था कि नंदिनी मर चुकी है? क्यों?
नंदिनी उस तंग झोपड़ी के भीतर गई। वहाँ केवल टूटी खाट और मिट्टी का चूल्हा था। राघव कोने में अपराधी की तरह खड़ा था। “मैं मर चुकी हूँ, राघव?” नंदिनी की आवाज बर्फ जैसी ठंडी थी। “15 साल से मैं सोच रही थी कि तुमने मुझे बोझ समझकर निकाला, और तुम यहाँ सबको बता रहे हो कि मैं मर गई?”
राघव ने एक गहरी सांस ली। “हाँ सरकार, गाँव वालों के लिए तुम मर चुकी हो। अगर उन्हें पता चलता कि तुम जिंदा हो और शहर में पढ़ रही हो, तो वे मुझे और तुम्हें जीने नहीं देते।”
राघव ने राज खोला, “उस रात केवल हमारा झगड़ा नहीं हुआ था। गाँव के साहूकार ने धमकी दी थी। मेरी जमीन, घर सब गिरवी था। कर्ज के बदले वह तुम्हें ले जाना चाहता था। तुम्हें बचाने के लिए मैंने तुम्हें बोझ कहा, तुम्हें नफरत से भर दिया ताकि तुम कभी पीछे मुड़कर न देखो। और गाँव में खबर फैला दी कि तुम्हारी मृत्यु हो गई, ताकि कोई तुम्हारी तलाश न करे।”
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। “तुमने यह सब मेरे लिए किया?”
राघव कड़वाहट से मुस्कुराया, “तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे सपनों के लिए। मैं तो अनपढ़ मजदूर हूँ, पर तुमड़ने के लिए बनी थी। अगर तुम मेरे साथ रहती, तो इसी धुएं और कर्ज में दम तोड़ देती। मैंने बस पिंजरा खोला था, पंख तुम्हारे अपने थे।”
नंदिनी को अपनी नफरत पर शर्म आने लगी। तभी बाहर शोर हुआ। गाँव का प्रधान और कुछ गुंडे लाठियां लेकर आ गए थे। “ए राघव! बाहर निकल!” प्रधान चिल्लाया। गुंडे स्कूल की दीवार गिराने आगे बढ़े।
“रुकिए!” एक बुलंद आवाज ने सबको चौंका दिया।
नंदिनी झोपड़ी से बाहर निकली। जिलाधिकारी के रूप में उनका प्रभाव इतना था कि प्रधान के हाथ-पाँव फूल गए। “डी… डी… डीएम मैडम!” प्रधान हकलाया।
नंदिनी ने कड़ककर कहा, “किसके आदेश से यह निर्माण हो रहा है? यह सरकारी जमीन है। इसे हाथ लगाने का मतलब है राज्य सरकार को चुनौती देना।”
पुलिस ने तुरंत प्रधान और गुंडों को घेर लिया। नंदिनी ने घोषणा की, “इस मामले की पूरी जाँच होगी और स्कूल की जमीन वापस ली जाएगी।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। गाँव वाले जो राघव को ‘पागल’ समझते थे, अब उसे सम्मान की नजर से देख रहे थे। राघव धीरे से नंदिनी के पास आया। “धन्यवाद मैडम सर।”
नंदिनी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से उसका नाम लिया, “राघव! क्या तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए? कोई नौकरी? कोई घर?”
राघव ने उदास मुस्कान के साथ सिर हिलाया। “नहीं सरकार। जिसकी उम्मीद थी, वह तो बहुत पहले खो गई। अब बस यह स्कूल बच जाए, यही बहुत है। मेरा क्या है? मैं तो धूल हूँ, आज यहाँ कल वहाँ।”
नंदिनी ने अपना पर्सनल कार्ड राघव की ओर बढ़ाया। “अगर कभी भी किसी चीज की जरूरत हो, तो मुझे सीधे फोन करना।” राघव ने कांपते हाथों से कार्ड लिया और उसे माथे से लगा लिया।
नंदिनी अपनी गाड़ी की ओर बढ़ी। सायरन बजाते हुए गाड़ियाँ धूल उड़ाती चली गईं। राघव वहीं खड़ा उस गाड़ी को तब तक देखता रहा जब तक वह ओझल नहीं हो गई।
गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी नंदिनी की आँखों से आंसू बह रहे थे। वह आज एक बड़ी जंग जीत चुकी थी, लेकिन अंदर से हार गई थी। उसे समझ आया कि असली ताकत जिलाधिकारी की कुर्सी में नहीं, बल्कि उस फटे हाल मजदूर के निस्वार्थ त्याग में थी।
राघव ने उसे ‘साहब’ बनाया था, और खुद ‘मिट्टी’ बन गया था। यह दुनिया नंदिनी को एक सफल अधिकारी के रूप में जानती थी, लेकिन नंदिनी जानती थी कि वह सिर्फ राघव के त्याग की एक सुंदर इमारत है।
सूरज ढल रहा था। राघव फिर से अपनी पीठ पर ईंटों की बोरी लादकर स्कूल की दीवार की मरम्मत करने लगा। उसे किसी प्रशंसा की भूख नहीं थी। वह बस उस स्कूल को देख रहा था, जहाँ कभी उसकी मुन्नी पढ़ी थी और जहाँ से उसकी नंदिनी के लिए न्याय की शुरुआत हुई थी।
कलेक्टर साहिबा का मिशन शुरू हो चुका था, लेकिन राघव का मिशन तो 15 साल पहले ही पूरा हो गया था, जब उसने अपनी ‘नंदिनी’ को आजाद किया था।
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